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Hindi Section ( 29 Sept 2011, NewAgeIslam.Com)

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Changes In The Collective Thinking Of Muslims- Part 1 मुसलमानों की सामूहिक सोच में परिवर्तन – भाग 1


हसन कमाल (उर्दू से अनुवाद-समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

पिछले बारह बरसों से वैश्विक स्तर पर मुसलमानों की सामूहिक सोच एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक सफर तय कर रही थी, बस इस सफर का मकसद अस्पष्ट और दिशा तय नहीं थी। इस सोच की शुरुआत ईराक पर अमेरिकी हमले से हुई थी, और इसे और तेज रफ्तार बनाने में 9/11 की अशोभनीय घटना का हाथ था। इस घटना की प्रतिक्रिया के तौर पर पूरी दुनिया के मुसलमानों ने विश्व भर का रवैय्या अपने प्रति बहुत आक्रामक पाया। उन्हें हर जगह शक की नजर से देखा जाने लगा, जिससे उनकी सोच बुरी तरह प्रभावित हुई। जैसा कि हमेशा से होता आया है कि चारों तरफ से मायूस होने के बाद इंसान के सामने अल्लाह की ज़ात पर भरोसा मनोवैज्ञानिक सुकून का अकेला ज़रिया रह जाता है। उसे एहसास होने लगता है कि उसकी मुश्किलों की असल वजह अपने दीन से बेगाना हो जाना है। वैश्विक स्तर पर बहुत तेज़ी से मुसलमानों का झुकाव इस्लाम और इस्लामी शिक्षाओं की तरफ होने लगा। ये भी हमेशा से होता आया है कि कुछ स्वार्थी लोग इस झुकाव की दिशा अपनी ओर मोड़ लेते हैं। वो दीन की तरफ इस झुकाव को अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों के लिए इस्तेमाल करने में कामयाब हो जाते हैं।

अपने देश सऊदी अरब की सरकार से नाराज़ ओसामा बिन लादेन ने भी यही किया और मुसलमानों के एक बड़े समूह को अपने और अपने तथाकथित जिहाद के पक्ष में कर लिया। इसकी प्रतिक्रिया और भी ज़्यादा हुई। दुनिया में मुसलमानों से नाराज़गी और भी बढ़ गयी। दूसरी तरफ इस सच्चाई से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि मुसलमानों के प्रति दुनिया के इस आक्रामक रवैय्ये के पीछे तर्क कम और भेदभाव (पूर्वाग्रह) ज़्यादा था। इस सच्चाई से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इस्लाम के दुश्मनों में इज़राइल की यहूदी सरकार सबसे आगे थी। इज़राइल की यहूदी सरकार पर हमेशा ये खौफ रहा है कि कहीं दुनिया फिलिस्तीन के संघर्ष से प्रभावित होकर उसका समर्थन देने वाली न हो जाये। वो एक बार ये देख चुकी थी कि यासिर अराफात को आतंकवादी साबित करने की उसकी हर कोशिश के बावजूद दुनिया ने यासिर अराफात और उनके संघर्ष की सच्चाई को स्वीकार कर ही लिया था, बल्कि एक वक्त ऐसा भी आया कि अमेरिकी प्रशासन को भी मानना पड़ा कि सिर्फ यासिर अराफात ही इस क्षेत्र में शांति की ज़मानत बन सकते हैं। इज़राइल की यहूदी सरकार यासिर अराफात की मौत के बाद एक बार फिर फिलिस्तीनी संघर्ष को आतंकवादी कारवाई साबित करने पर तुली हुई थी। इज़राइल की यहूदी सरकार ने ये ज़हर फैलाना शुरु किया कि इस्लाम असल में आक्रामक मज़हब है और हिंसा की तालीम देता है, हालांकि इससे उसका मकसद सिर्फ ये था कि दुनिया किसी भी हाल में फिलिस्तीन की हमदर्द न बनने पाये। लेकिन कुछ हालात ने और कुछ इस दुष्प्रचार ने मुसलमानों के लिए बहुत ही नकारात्मक स्थिति पैदा कर दी। हमे कहने दीजिए कि इस सूरते हाल का हिंदुस्तान में भी ब्राह्मण लॉबी ने मुसलमानों के खिलाफ बहुत इस्तेमाल किया।

ये ज़हरीले यहूदी दुष्प्रचार का ही नतीजा था कि अमेरिका की यहूदी लॉबी ने अमेरिका को ईराक पर हमला करने के लिए राज़ी कर लिया। ये मुसलमानों की सोच पर एक और चोट थी। दुनिया भर के मुसलमान चाहे वो सद्दाम हुसैन के हमदर्द न भी हों, लेकिन उन्हें यक़ीन था कि अमेरिका का हमला बिलकुल गलत और अनैतिक था। अमेरिका और पश्चिमी देशों से मुसलमानों की नाराज़गी और बढ़ गयी। बिल्कुल उसी तरह बहुसंख्यक मुसलमान ट्विन टावर की तबाही पर दुःखी थे और इस कदम को बिल्कुल गलत मानते थी, लेकिन पश्चिमी दुनिया जिस तरह और जिन नारों के साथ (राष्ट्रपति बुश ने इसे सलीबी जंग तक कह दिया था) हमला किया था, मुसलमान इससे सहमत नहीं थे। मुसलमान ये भी देख रहे थे कि अमरीकी ट्विन टावर पर हमले में कोई अफगानी शामिल नहीं था। बहरहाल इन दो घटनाओं की वजह से दुनिया ने मुसलमानों के प्रति जो रवैय्या अख्तियार किया उससे सिर्फ ओसामा बिन लादेन जैसे तत्वों को फायदा पहुँचाया। इन तत्वों ने मुसलमानों की नाराज़गी का जमकर शोषण किया। अगर ये कहा जाय तो गलत न होगा कि दुनिया ने खुद मुसलमानों को ओसामा बिन लादेन की तरफ ढकेलने का काम किया। मुसलमानों में उग्रवाद को बढ़ावा मिला। इस्लाम दुश्मनी, जिहाद और इस्लामी राज्य की स्थापना की ओर बहुत से मुसलमान आकर्षित हुए, लेकिन इस सच को स्वीकार करना ही होगा इन सब बातों ने सबसे ज़्यादा नुक्सान मुसलमानों को ही पहुँचाया। सबसे बड़ा नुक्सान ये था कि बेक़ुसूर और मासूम मुसलमान भी दुनिया की नज़र में बेकुसूर और मासूम नहीं रहे। दुनिया भर में मुसलमानों की अंधाधुन्ध गिरफ्तारियाँ किसी के लिए चिंता का विषय नहीं रहीं। ये मान लिया गया कि ओसामा बिन लादेन मुसलमानों के लिए सबसे बड़ा हीरो बन चुका है, हालांकि ये सही नहीं था, लेकिन कुछ तो उग्रवादियों की हरकतों की वजह से सही मालूम होने लगा था और कुछ दुष्प्रचार की वजह से। धनी और प्रभावशाली मुस्लिम देशों मे अलोकतांत्रिक सरकार होने की वजह से मुसलमान इस दुष्प्रचार का तोड़ नहीं कर पाये। लोकतांत्रिक देशों में उनके लिए हमदर्दी कम से कम होती जा रही थी। ये बात ज़्यादा ये ज़्यादा मानी जाने लगी कि मुसलमान लोकतंत्र समर्थक नहीं हैं, लेकिन पिछले कुछ समय में  इन सब हालात में सकारात्मक बदलाव नज़र आया है और इसके कई कारण हैं।

पहला कारण ये है कि मुसलमानों को ये एहसास होने लगा कि ओसामा बिन लादेन और अन्य उग्रवादी तत्व एक ऐसी जंग लड़ रहे हैं, जो शुरु होने से पहले ही हारी जा चुकी है। वो दुनिया के कई देशों से न एक साथ लड़ सकते हैं, और न जीत सकते हैं। ये बात समझ में आने लगी कि विश्व व्यवस्था तो दूर की बात है, मुसलमान खुद उन देशों में, जहाँ सत्ता उनके हाथों में है, इस्लामी रियासत कायम नहीं कर सकते। ग्लोबलाइज़ेशन, घटती हुई सीमाओं और बढ़ती हुई विश्व अर्थव्यवस्था दुनिया को बहुसंस्कृति और मिश्रित संस्कृति की ओर ढकेल रही थी। जिसमें कोई एक व्यवस्था और एक समान व्यवस्था वाले देश की स्थापना मुश्किल से और मुश्किल होती जा रही थी। इससे अलग इस्लामी राज्य की माँग करने वालों के पास भी इस्लामी रियासत का कोई स्पष्ट खाका नहीं था। जो लोग ये माँग कर रहे थे, उनके जोश में कोई कमी नहीं थी। इनमें से कुछ वाकई आला मज़हबी आलिम थे, लेकिन इसमें शक था कि वो एक राज्य की व्यवस्था संभाल सकते हैं। इसके अलावा उन्होंने ये कभी नहीं बताया कि एक इस्लामी राज्य की आर्थिक व्यवस्था क्या होगी? सिर्फ ये कहने से काम नहीं चलता है कि इस्लाम में ब्याज हराम है। अगर किसी देश की जनता ब्याज का लेन देन बंद भी कर दे तो इस सूरते हाल को स्पष्ट नहीं किया गया कि इस्लामी राज्य में विदेशी बैंक किस तरह काम करेंगें, और क्या इन बैंकों में खाता खोलने वाले विदेशी व्यापारी, वित्तीय संस्थान और कम्पनियाँ इस बात पर राज़ी हो जायेंगी कि वो इस्लामी राज्य की आर्थिक व्यवस्था के नियम मानेंगीं?

एक राज्य की कल्पना में कानून व्यवस्था, शिक्षा की व्यवस्था, आर्थिक प्रक्रिया और बहुत सी दूसरी बातें शामिल होती है, और मुसलमान देख रहे थे कि माँग करने वालों में इन मामलों के विशेषज्ञ बिल्कुल भी नज़र नहीं आते, इसलिए बहुत जल्द ये माँग वास्तविक की जगह भावनात्मक मालूम होने लगी और इस एहसास के आम होते ही विश्व स्तर पर मुसलमानों का वैश्विक मनोविज्ञान और सोच में परिवर्तन आने लगा। इस परिवर्तन का पहला सुबूत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश इण्डोनेशिया में मिला। आज से सिर्फ आठ साल पहले इण्डोनेशिया में जमाआ इस्लामिया का बड़ा ज़ोर था। ओसामा बिन लादेन का जादू इण्डोनेशिया में सिर चढ़ कर बोल रहा था। इण्डोनेशिया में बम धमाकों की कई दिल दहला देने वाली घटनाएं हुईं थीं, जिनमें बड़ी संख्या में विदेशी और खासतौर से पश्चिमी देशों के नागरिक मारे गये थे। इस्लामी राज्य की माँग भी सबसे ज़्यादा ज़ोरदार ढंग से वहीं पर थी, लेकिन जब जनरल सुहार्तो की तानाशाही का खात्मा हुआ और इण्डोनेशिया में आम चुनाव हुए, तो नतीजे में न सिर्फ लोकतांत्रिक बल्कि किसी हद तक सेकुलर पार्टियों को कामयाबी मिली। जमाआ इस्लामिया बिल्कुल हाशिये पर पाई गयी।

URL for Urdu article: https://newageislam.com/urdu-section/changes-collective-thinking-muslims-/d/2517

URL: https://newageislam.com/hindi-section/changes-collective-thinking-muslims-part-1/d/5588


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