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Hindi Section ( 14 March 2021, NewAgeIslam.Com)

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Allama Iqbal and Cultural Narcissism अल्लामा इकबाल और सांस्कृतिक आत्ममोह


हक्कानी अल कासमी

१८ नवंबर, २०१४

भारत के विभाजन के बाद, इकबाल को समझने की दिशा बदल गई। भारत में इकबाल का नाम लेना भी अपराध ठहरा। इसकी पुरी तफसील प्रोफेसर जगन्नाथ आज़ाद ने अपने लेखों में दर्ज किया है। अल्लामा इकबाल का नाम पाकिस्तान के गठन और पाकिस्तान की अवधारणा के संस्थापक के उत्प्रेरक के रूप में जाना जाने लगा। और सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा जैसा तरानाभी इस लंतरानीको रोक नहीं सका। अल्लामा इकबाल पाकिस्तानी बना दिए गए जबकि उनकी वफात (२१ अप्रैल १९८३) के वक्त पाकिस्तान का कोई भौगोलिक अस्तित्व ही नहीं था और अब तुरफा ए तमाशा यह है कि अल्लामा इकबाल को तालिबानी मानसिकता रखने वाला एक बड़ा वर्ग अल्लामा इकबाल के शाहीनको भी आतंकवाद की एक मजबूत प्रतीक के तौर पर पेश करता है और उनके बहुत सारे अशआर का रिश्ता तालिबान की आतंकवाद, बुनियाद परस्ती से जोड़ रहा है। यहाँ तक कि इकबाल के वह सारे अशआर जिनमें उन्होंने शोषणकारी उपनिवेशवादी ताकतों के खिलाफ विरोध किया है उन्हें भी दहशतगर्दी के कारकों से जोड़ दिया गया है।

अल्लामा इकबाल के इन अशआर को भी हिंसा की तरगीब करार दिया जा रहा है।

जिस खेत से दहकां को मयस्सर ना हो रोज़ी

उस खेत के हर खोशा ए गंदुम को जला दो

गर्माओ गुलामों का लहू सोजे यकीं से

कुंजश्के फरोमाया को शाहीन से लड़ो

उठो मेरी दुनिया के गरीबों को जगा दो

काखे उमरा के दरो दीवार हिला दो

ऐ जुए आब बढ़ के हो दरियाए तुंदों तेज़

साहिल तुझे अता हो तो साहिल ना कर कुबूल

क्या पता आने वाले कल में अल्लामा इकबाल के शेरों का रिश्ता ऐसी मानसिकता के लोगों माओवादी और नक्सली विचारों से भी जोड़ दें। विडंबना यह है कि हर वह फ़िक्र जो एक निष्क्रिय समाज एक कमजोर राष्ट्र और एक जमे हुए राष्ट्र को जुटाने की शक्ति रखता है, इस पर डॉक्टर इसरार आलम की बनाई नई इस्तेलाह प्रतीकात्मक द्वैतवाद राष्ट्र को नास्तिकता से प्रभावित करता है। इब्ने रुशद, इब्ने तैमिया, इब्ने अरबी और सर सैय्यद की तकफीर के सिलिसले इस रविश से जुड़े हुए हैं। या फिर फासीवादी मानसिकता इसमें बुनियाद परस्ती के तत्व तलाश करने लगती है। इकबाल के साथ भी यही हुआ कि वह काफिर होते होते बचे तो फासीवादी मानसिकता ने उन पर तालिबानी फ़िक्र के पेश रौ होने का आरोप लगा दिया और यह बड़ी विडंबना है कि जो भी फ़िक्र इस्लामी मिल्लत की बेदारी के लिए सामने आती है या मिल्लत की तरक्की या तजदीद की बात करती है तो उसका रिश्ता वैचारिक उग्रवाद से जोड़ दिया जाता है। शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी की तजदीदी फ़िक्र का रिश्ता भी इस्लामी उग्रवाद से जोड़ दिया गया और उनकी लेखों को अस्पष्ट आतंकवाद का सरचश्मा करार दिया गया। आर उपाध्याय ने अपने एक लेख में लिखा है कि

Combination of Islamic extremism of Wahab and religio - Political Strategy of Waliullah has become the main source of inspiration of Islamic terrorism as we see today

(वहाब नज्दी की इस्लामी उग्रवाद और शाह वलीउल्लाह की मज़हबी राजनीतिक रणनीति का इश्तेराक इस्लामी आतंकवाद की तहरीक का केंद्रीय स्रोत बन चुका है जैसा कि हम आज देख रहे हैं)

शाह वलीउल्लाह ने इस्लामी आधुनिकता के माध्यम से पुरी कौम को बेदार करने की कोशिश की तो उनके इफ्कार व नज़रियात का रिश्ता उग्रवाद से जोड़ दिया और इकबाल भी इसी फिकरी नहज पर अपनी शायरी के माध्यम से पूरी कौम को बेदार कर रहे थे, कमज़ोर मिल्लत में नई रूह फूंक रहे थे, मुस्लिम कौम को नए इमरानी और राजनीतिक अवधारणा से आगाह कर रहे थे तो उनकी शख्सियत को भी मस्ख करने की कोशिश की गई। जबकि इकबाल ऐसे शाएर थे जिन्होंने तमाम सकारात्मक इफ्कार से अपना सरोकार रखा और अपने खयाल को रौशन किया। गौतम बुद्ध, गुरुनानक, स्वामी तीरथ, भरतरी हरी और इमामे हिन्द श्री राम के ख्यालों को अपने फिकरी तर्क में नुमाया महत्व दी।

इकबाल का बुनियादी फिकरी मंशुर मानव जाती का सम्मान था। उनकी फ़िक्र का रिश्ता जुए कम आब से नहीं बल्कि बड़े समुंद्र से था। उन्होंने अपनी शायरी में हमेशा सार्वभौमिकता और इंसानियत की बात की। वह एक सीमित कौमियत के कायल कभी नहीं रहे। उनका साफ़ तौर पर कहना था

होस ने टुकड़े टुकड़े कर दिया है नौए इंसान को

उखुवत का बयां हो जा मुहब्बत की जुबां हो जा

ये हिंदी वह खुरासानी यह इरानी वह तूरानी

तू ऐ शर्मिंदा साहिल उछल कर बे करां होजा

इकबाल ने अपनी शायरी के माध्यम से इस आक्रामक राष्ट्रवाद का विरोध किया जो औपनिवेशिक यूरोप का दिया हुआ तसव्वुर था। ऐसी वतनियत जो जन्गुइज़्म की सीमा में दाखिल हो जाती है इकबाल ने इसका विरोध किया था और यही वजह है कि वहदते इंसानियत के तसव्वुर को आमने सामने लाते हुए उन्होंने कहा था

उन ताज़ा खुदाओं में बड़ा सबसे वतन है

जो पैराहन उसका है वह मज़हब का कफन है

इकबाल ने नक्स दोई को मिटाने की बात की और एक नया शिवाला बनाने की गुफ्तगू की उनका बुनियादी उद्देश्य पुरी कौम में खुदी की रूह फूंकना और उनके ज़मीर को बेदार करना था। उन्होंने मिल्लते इस्लामिया को भी अकवामे आलम के सकारात्मक विचारों से अनुग्रह प्राप्त करने का विचार दिया था और पूरब व पश्चिम की सीमाएं मिटा दी थीं।

मशरिक से हो बेज़ार ना मगरिब से हज़र कर

फितरत का इशारा है कि हर शब को सहर कर

इकबाल के यहाँ मज़हबी और तहज़ीबी आत्ममोह का कोई तसव्वुर नहीं था और ना ही उन्होंने ने अपनी कौम के इम्तियाज़ और तफव्वुक की बात की। बल्कि उन्होंने हर तरह के इम्तियाजों के खिलाफ एहतिजाज किया। यही वजह है कि उन्होंने स्वामी राम तीरथ की प्रशंसा करते हुए कहा था

आह खोला किस अदा से तूने राजे रंग व बू

मैं अभी तक हूँ असीरे इम्तियाज़े रंगो बू

इकबाल की पुरी शायरी सार्वभौमिक अवधारणा और विचार से पूर्ण है। सीमित भौगोलिक कल्पना उनके दिमाग में जन्म ले ही नहीं सकती था इसी लिए इकबाल को ना पाकिस्तान की कल्पना का कारक करार दिया जा सकता है और ना ही तालिबानी फ़िक्र का पेशरौ। इकबाल तो हमेशा बहते हुए पानी के किनारे किसी और ज़माने का ख्वाब देखते रहे। वह ख्वाब तो साकार नहीं हो सका हाँ यह अवश्य हुआ कि तंग नज़री ने उनके ख्वाबे फरदां का खून कर दिया और यह सब उस जैनुवी ताबीरहै जिसकी वजह से वर्तमान काल में हर फ़ालतू बात भी सार्थक हो गई है। जेनुई कलामिये को मज़हबी सहिफा की तरह भारत में भी प्रमाणिक समझा जाने लगा है और हमारे राजनीतिक, सामाजिक और तकनीकी सिस्टम पर अब यही फ़िक्र हावी होती जा रही है और इसी के मीजान पर हर फ़िक्र की पैमाइश हो रही है। अल्लामा इकबाल के इफ्कार का रिश्ता तालिबानी फ़िक्र से जोड़ना इसी ज़ेनुइयत का हिस्सा है।

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