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Hindi Section ( 17 Jan 2014, NewAgeIslam.Com)

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Islam Prohibits Ransacking Places of Worship of the Non-Muslims इस्लाम गैर मुस्लिमों की ईबादत गाहों का अपमान करने से मना करता है

 

 

 

 

 

हाफ़िज़ ताहिर महमूद अशरफ़ी

15 अक्टूबर 2013

तालिबान ने पेशावर के चर्च पर बम हमले में शामिल होने से इंकार कर दिया है लेकिन उनका इस हमले को उचित करार दिया जाना और इसे इस्लामी हुक्म पर अमल कहने को लोगों ने नापसंद किया है और इसने आम तौर पर इस्लाम के खिलाफ नफरत को जन्म दिया है। इससे पहले कि मैं इस दावे की धार्मिक स्थिति को परिभाषित करने की कोशिश करुं मैं ये कहना चाहता हूं कि इस तरह की हरकत पाकिस्तान की प्रसिद्धि और उसकी एकता को नुकसान पहुँचाने वाली है। चूंकि पाकिस्तान एक ऐसा देश है जहां मुसलमान बहुमत में हैं, और यहाँ गैर मुस्लिमों की भी एक बड़ी आबादी है जो कि उतने ही पाकिस्तानी जितने कि मुसलमान हैं। वो पाकिस्तान के निर्माण में शामिल रहे हैं और अब तक इसको बनाने और इसके विकास के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जहां तक इस्लाम का सम्बंध है। जब मैंने इस्लामी देश में गैर मुस्लिमों के अधिकारों के बारे में गहराई से अध्ययन किया तो हैरान हो गया इसलिए कि अगर उनकी अधिकारों का हनन न किया जाए तो उनके अधिकार मुसलमानों के अधिकारों से कहीं कम नहीं हैं।

किसी भी मुसलमान की तरह गैर मुस्लिमों की जान, माल, इज़्ज़त व आबरू की रक्षा राज्य की ज़िम्मेदारी है। नजरान के ईसाइयों के साथ किए गए कई समझौतों में, जिसे नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने ईसाईयों के साथ किया था,  इसमें नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने उनकी जान, माल और इज़्ज़त व आबरू की रक्षा की गारंटी दी थी। विभिन्न अवसरों पर नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का ये कथन नक़ल किया गया है कि उनका धर्म, उनकी ज़मीनें, उनकी जाएदाद, उनके काफिले, उनके पैग़म्बर (ईशदूत) और उनकी मूर्तियाँ सब अल्लाह की हिफाज़त में हैं और नबी करीन सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने भी उनकी हिफाज़त की ज़िम्मेदारी ली है। एक और मौक़े पर नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि उनकी जान और उनकी जाएदादें उतनी ही पवित्र है जितनी मुसलमानों की। इसी तरह नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि मैं क़यामत के दिन उस गैर मुस्लिम की मदद करुंगा जिसे उसकी ज़िंदगी में किसी मुसलमान ने तकलीफ दी हो या उसकी जायदाद को नुकसान पहुँचाया हो।

खून बहा की कल्पना गैर मुस्लिमों पर भी लागू होती है। जिस तरह एक मुसलमान के लिए मुआवज़ा है बिल्कुल उसी तरह गैर मुस्लिमों के मामले में भी ये एक दायित्व है। और उसी तरह चोरी की सज़ा के रूप में हाथ काटना बगैर किसी भेदभाव के लागू किया गया है। मुस्लिम और गैर मुस्लिम की जायदाद के सम्मान के मामले में कोई दोहरा मापदंड नहीं है। धर्म और ईबादत करने के अधिकार और सभी अधिकार अत्यंत पवित्र हैं।

कुरान का फरमान हैः

''धर्म के मामले में कोई ज़बरदस्ती नहीं है'' (2: 256)

जब मदीना में नबी सल्ल्ल्लाहु अलैहि वसल्लम दाखिल हुए तो आपने मक्का के काफिरों, यहूदियों और ईसायों के साथ विभिन्न समझौतों पर हस्ताक्षर किए जिनमें आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने बहुत स्पष्ट रूप से ये बता दिया कि उनमें से हर एक अपने धर्म का पालन करने और अपनी इबादत गाहों में जाने के लिए आज़ाद होगा। इस हद तक कि नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने नजरान के उन ईसाईयों को जो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से मिलने आए थे, आप ने मस्जिदे नबवी में इबादत करने की इजाज़त दी।

उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने किसी भी चर्च या मंदिर को ढहाने का हुक्म नहीं दिया था। जब खालिद बिन वलीद ने दमिश्क को जीता तो आपने एक समझौते पर हस्ताक्षर किया, चार गवाहों की मौजूदगी में किए गए इस समझौते में दूसरी बातों के साथ साथ आपने 14 चर्चों को सुरक्षा प्रदान की (अलबदाया वलनहाया)। मिस्र पर विजय प्राप्त करने के मौके पर औपचारिक रूप से चर्चों को सुरक्षा की गारंटी दी गई थी। अमीर मुआविया ने निर्माणाधीन मस्जिद के विस्तार के लिए एक चर्च की ज़मीन का इस्तेमाल करना चाहा लेकिन जब ईसाइयों ने विरोध किया तो उन्होंने अपने इस प्रस्ताव को स्थगित कर दिया। उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने भी अपने शासनकाल में भी एक ऐसी ही योजना को स्थगित किया था, और अपने गवर्नरों को ईसाइयों की उन सभी भूमियों को लौटाने का हुक्म दिया था जिसका सम्बंध चर्च से था। उमर बिन ख़त्ताब ने वृद्ध गैर मुस्लिम नागरिकों को टैक्स अदा करने से मुक्त कर दिया था और इसके अलावा राज्य निधि से उनके लिए मासिक पेंशन भी निर्धारित कर दिया था।

कुरान और हदीस गैर मुसलमानों के अधिकारों के मामले में स्पष्ट हैं। यहां तक ​​कि हमें गैर मुस्लिमों को बुरा नाम देने से भी मना किया गया है। इसलिए हम कैसे उनकी हत्या या उनकी इबादतगाहों को ढहाने या तोड़फोड़ का औचित्य पेश कर सकते हैं।

मुसलमानों का इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा है कि इस्लामी राज्यों के नियमों ने कभी भी गैर मुस्लिमों को प्रभावित करने की कोशिश नहीं की है। हज़रत उमर का एक सेवक अपने पूरे जीवन में ईसाई ही रहा। जब तातारियों ने इराक पर हमला किया, ईसाई और मुसलमान बन्दी बना लिए गए, इब्ने तैमिया को तातारियों से बातचीत के बीच ईसाइयों और यहूदियों को छोड़कर और मुसलमानों को लेकर भाग जाने का मौका दिया गया था लेकिन इब्ने तैमिया ने इससे इंकार कर दिया और इस बात पर ज़ोर दिया कि जब तक यहूदियों और ईसाइयों को रिहा नहीं कर दिया जाता वो मुसलमानों को लेकर नहीं जाएंगे। मैं इस मौक़े पर हज़रत उमर के धर्मोपदेश को नक़ल करने से नहीं चुकना चाहता जो उन्होंने बैतुल मोक़द्दस को जीतने के बाद दिया था:

मोमिनों का नेता और अल्लाह का बंदा उमर यहां के निवासियों से वादा करता है कि उनके सम्मान और गरिमा, सलीब,  उनके बुज़ुर्ग और बीमार सब सुरक्षित होंगे। किसी को भी इन चर्चों को तबाह करने या उन पर कब्जा करने का अधिकार नहीं होगा। उनकी ज़मीन का एक एक हिस्सा सुरक्षित होगा। धर्म बदलने के लिए उन्हें कोई मजबूर नहीं करेगा। उन्हें खज़ाने से दान मिलते रहेंगे जैसा कि इससे पहले परम्परा रही है (तिबरी)।

पेशावर में चर्च पर हमले की पूरी दुनिया में निंदा की गई है। हमें इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार की जाने वाली गतिविधियों में और उन गतिविधियों में अंतर पैदा करने की ज़रूरत है जो निजी हितों के लिए अंजाम दी गई हैं। अच्छी तरह से जांच किए बिना हर बात पर इस्लाम का लेबल लगाना उचित नहीं है। ऑल पाकिस्तान उलेमा काउंसिल ने ये फतवा जारी किया है कि जो लोग इन मासूमों की हत्या में शामिल हैं उनका इस्लाम से कोई सम्बंध नहीं है। उनका ये दावा कि गैर मुस्लिम मौत के हकदार हैं, गलत है और गैर इस्लामी है। राज्य की ये ज़िम्मेदारी है कि वो गैर मुस्लिमों के जीवन, संपत्ति और सम्मान की रक्षा करे।

हाफ़िज़ ताहिर महमूद अशरफ़ी पाकिस्तान उलेमा काउंसिल के चेयरमैन हैं।

स्रोत: http://www.dailytimes.com.pk/default.asp?page=2013% 5C10% 5C15% 5Cstory_15-10-2013_pg7_11

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