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Hindi Section ( 17 Feb 2021, NewAgeIslam.Com)

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Was Swami Vivekananda anti-Islam क्या स्वामी विवेकानंद इस्लाम विरोधी थे?

गुलाम रसूल देहलवी, न्यू एज इस्लाम

४ सितंबर, २०१३

नरेंद्र नाथ दत्त जिन्हें दरवेशी चुन लेने के बाद स्वामी विवेकानंद का नाम दे दिया गया, १२ जनवरी, १८६३ को कलकत्ता में पैदा हुए। वह उन प्रभावी अध्यात्मिक रहनुमाओं में से एक थे जिन्होंने भारत के अहया ए नौ में काबिले कद्र खिदमात अंजाम दीं। वह वेदांत के फलसफे की तजदीद, आलमी भाई चारे और धार्मिक सद्भावना के ज़बरदस्त हामी थे। रामकृष्ण परमहंस के ख़ास शागिर्द होने की वजह से उन्होंने आलमी पैमाने पर दो रूहानी तहरीकों की बुनियाद रखी जिन्हें रामकृष्ण मठऔर रामकृष्ण मिशनके तौर पर जाना जाता है। उनकी मानवीय फलाह व बहबूद और सामाजिक सेवाओं के सिद्धांतों से प्रभावित हो कर दोनों संगठन एक शताब्दी से अधिक समय से पूरी सक्रियता के साथ इंसानियत की फलाह व बहबूद और खिदमते खल्क के विभिन्न कामों में मसरूफ हैं।

स्वामी जी, धार्मिक तास्सुब के सख्त विरोधी थे। उनका मानना था कि खुदा तक पहुँचने के रास्ते तंग, मसदूद, मुकफ्फल या किसी एक सिद्धांत तक सीमित नहीं हैं। हालांकि वह एक हिन्दू थेमगर उन्होंने ज़ात पात के निज़ाम पर आधारित हर बरतरी की सख्त निंदा की और सामाजिक समानता और साम्प्रदायिक सद्भाव का स्टैंड चुना।

विवेकानंद का मानना था कि सारे धर्म अपने हतमी मकासिद में एक हैं। जैसे हिन्दू फलसफे के अनुसार मोक्ष (आज़ादी) के माध्यम से निर्वान (ब्रह्मा या खुदा से मिलन) ज़िन्दगी का हकीकी और हतमी मकसद है। बिलकुल उसी तरह इस्लामी रूहानियत (तसव्वुफ़) के अनुसार इंसान की सबसे बड़ी कामयाबी विसाले इलाही में निहित है।

Swami Vivekananda drew the entire world's attention to our Nation's rich history & strong cultural roots through his speech in Chicago(1893)

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बदकिस्मती से, हिन्दू और मुसलमान दोनों फिरकों के कुछ मज़हबी कट्टरपंथी अपने नापाक उद्देश्यों के प्राप्ति के लिए भारत के दो सबसे बड़े धर्मों के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक राब्तों को खराब कर रहे हैं। अपने इस हानिकारक उद्देश्यों के प्राप्ति की मजनूनाना कोशिश में वह सरासर दरोग गोई पर आधारित यह अफवाह फैला रहे हैं कि स्वामी विवेकानन्द इस्लाम के ज़बरदस्त विरोधी थे, जबकि हकीकत इसके बिलकुल उलट है। स्वामी जी इस्लाम के बुनियादी मूल्यों के बहुत बड़े मद्दाह थे जिनके बारे में उनका अकीदा यह था कि पूरी धरती पर इस्लाम की बका की वाहिद वजह उसके अन्दर छुपे ज़बरदस्त रूहानी व अखलाकी मूल्य हैं। अपने इस स्टैंड का इज़हार करते हुए उन्होंने अपने एक ख़िताब में सवालिया अंदाज़ में यह बयान दिया कि तुम पूछते हो कि पैगम्बरे मसावात मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दीन में क्या खूबी है? अगर उनके धर्म में कोई खूबी या अच्छाई नहीं होती तो उनका दीन आज तक कैसे ज़िंदा रहता? केवल अच्छी चीज़ ही ज़िंदा और बाकी रहती है, अगर उनकी शिक्षाओं में कोई अच्छाई नहीं होती तो इस्लाम कैसे जिंदा रहता? उनके मज़हब में बहुत अच्छाई है।

स्वामी विवेकानंद का उपरोक्त बयान स्वामी विवेकानंद की शिक्षा के शीर्षक से लिखी गई एक किताब मोहम्मद और इस्लामके एक सुंदर बाब का एक अंश है। यह किताब ब्रिटिश लेखक क्रिस्टोफर ईशरवुड (Christopher Isherwood) के ३० पन्नों पर फैले हुए एक हैरत अंगेज़ इल्मी मुकदमे पर आधारित है। यह बाब अमेरिकी श्रोताओं के सामने किये गए विवेकानंद के ख़िताब के चुने हुए इक्तिबासों का एक मजमुआ है। बिना किसी तबसिरे के मैं पाठकों के सामने उनमें से कुछ इक्तिबासत को इस उम्मीद के साथ नकल कर रहा हूँ कि पाठक इस्लाम और हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से संबंधित स्वामी विवेकानंद के एतेहासिक बयानों की हकीकी अहमियत व मानवियत को खुद से बखूबी समझेंगे:

मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपनी ज़िन्दगी के जरिये इस बात का मुजाहेरा किया कि मुसलमानों के बीच कामिल मसावात होनी चाहिए। नस्ल ज़ात रंग या लिंग का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। तुर्की का सुलतान अफ्रिका के बाज़ार से एक हब्शी खरीद सकता है, और जंजीरों में उसे तुर्की ला सकता है, लेकिन वह अपनी कमतर काबिलियत और सलाहियत के बिना भी सुलतान की बेटी से भी शादी कर सकता है। इसकी तुलना इस हकीकत के साथ करें कि कालों और अमेरिकी हिन्दुस्तानियों के साथ इस देश (संयुक्त राज्य अमेरिका) में कैसा सुलूक किया जाता है, और हिन्दू क्या करते हैं? अगर आप के मिशनरियों में से किसी को किसी रुढ़िवादी शख्स की खुराक को चुनने का मौक़ा हाथ आए तो वह उसे दूर फेंक देगा।

जैसे ही एक शख्स मुसलमान हो जाता है, इस्लाम के तमाम अनुयायी किसी किस्म का कोई भेदभाव बरते बिना उसे एक भाई के तौर पर स्वीकार कर लेते हैं, जो कि किसी दुसरे धर्म में नहीं पाया जाता। अगर कोई अमेरिकी हिन्दुस्तानी मुसलमान बन जाता है तो, तुर्की के सुलतान को उसके साथ खाना खाने में कोई आपत्ती नहीं होगी। अगर उसके पास दिमाग है तो वह किसी आला मर्तबा से महरूम नहीं होगा। इस देश में, मैंने अभी तक कोई ऐसा चर्च नहीं देखा है जहां गोर मर्द और हब्शी (काले) साथ साथ इबादत के लिए झुक सकें।

यह एक गलत बयान है जो हमें बावर किया जाता है कि मुसलमान इस बात पर विश्वास रखते हैं कि महिलाओं के पास भी रूह होती है......मैं मुसलमान नहीं हूँ, लेकिन मुझे इस्लाम का अध्ययन करने के भरपूर मौके मिले। मुझे कुरआन पाक में एक भी आयत ऐसी नहीं मिली जो यह कहती हो कि औरतों के पास कोई रूह नहीं है बल्कि असल में कुरआन यह साबित करता है कि उनके पास रूह है।

धार्मिक आज़ादी की वेदांती रूह ने (भारतीय) इस्लाम को प्रभावित किया है। भारत का इस्लाम किसी दुसरे देश के इस्लाम से बिलकुल भिन्न है। कोई अराजकता या अलगाव केवल उस समय घटित होता है, जब दुसरे देशों से मुसलमान आते हैं और भारत में अपने हम मजहबों पर उन लोगों के साथ ना रहने की तबलीग करते हैं जो उनके मज़हब के नहीं हैं।

व्यावहारिक अद्वेतियत (वेदिक फलसफे का एक मकतबे फ़िक्र) को हिन्दुओं के बीच आलमी पैमाने पर बढ़ावा देना अभी बाकी है.....इसलिए हम इस बात के ज़बरदस्त हामी हैं कि वेदांत के नज़रियात चाहे अपने आप में वह जिस कदर खुबसूरत और शानदार हों, वह अमली इस्लाम की मदद के बिना बिलकुल बेकार और बड़े पैमाने  पर इंसानों के लिए बे सूद हैं------हमारे अपने मुल्क के लिए दो अज़ीम फिकरी निज़ाम इस्लाम और हिन्दू मत का संगम-वेदांत का दिमाग और इस्लाम का जिस्म-ही सिर्फ एक उम्मीद है___मैं अपनी कल्पना से भारत का भविष्य पूर्ण, मतभेद और अराजकता और विवाद से पाक, शानदार और अजेय देखता हूँ जब वेदांत का दिमाग और इस्लाम का जिस्म दोनों मिल जाएंगे।

विवेकानंद ने ऐसे मुसलमानों पर अवश्य आलोचना की है जो मुसलमानों या गैर मुस्लिमों के खिलाफ खबासत व सफ्फाकियत का इर्तिकाब करते हैं, लेकिन उन्हें इस बात पर पक्का यकीन था कि मुसलमानों के मौजूदा आमाल इस्लाम के आफाकी पैगामे उखुवत से बिलकुल उल्टे हैं। उनका मानना था कि इस्लाम ने गैर मुस्लिमों के साथ बेहतर सुलूक और रवादाराना ताल्लुकात की वकालत की है लेकिन बहुत सारे मुसलमान इस्लाम के इस आफाकी अवधारणा का सहीह इदराक करने में भी नाकाम हैं, और इस वजह से वह दुसरे धर्मों के अनुयायियों के लिए असहिष्णु बन गए हैं। तथापि, वह गैर मुस्लिमों के साथ उनकी बदसुलूकी के बुनियादी कारणों से भी वाकिफ थे यानी इस्लामी मज़हबी मसादिर की गलत तशरीह। उन्होंने कहा था कि: तथापि, मुसलमानों के बीच जब भी कोई मुफक्किर पैदा हुआ, वह यकीनी तौर पर उनके बीच जारी अत्याचार के खिलाफ विरोध करता रहा। अपने इस अमल में उसने खुदा की मदद को ज़ाहिर और सच्चाई के एक पहलु को उजागर किया। उसने अपने धर्म के साथ कभी खिलवाड़ नहीं किया। उसने अपनी बातों के जरिये सीधे सच्चाई से पर्दा उठाया।

उपरोक्त शब्दों अपने दीन के साथ खिलवाड़उन लोगों के मल की तरफ इशारा करते हैं जो इस्लामी किताबों और स्रोतों की गलत तशरीह कर के गैर मुस्लिमों के लिए बदसुलूकी या असहिष्णुता को जवाज़ प्रदान करते हैं।

न्यू एज इस्लाम के नियमित स्तंभकार, गुलाम रसूल देहलवी तसव्वुफ़ से जुड़े एक आलिम और फ़ाज़िल (इस्लामी स्कॉलर) हैं।

URL for English article: https://www.newageislam.com/interfaith-dialogue/ghulam-rasool-dehlvi,-new-age-islam/swami-vivekananda-was-certainly-not-anti-islam/d/13346

URL for Urdu translation: https://www.newageislam.com/urdu-section/ghulam-rasool-dehlvi,-new-age-islam-غلام-رسول-دہلو/was-swami-vivekananda-anti-islam-کیا-سوامی--ویویکانند-اسلام-مخالف-تھے-/d/13423

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/ghulam-rasool-dehlvi-new-age-islam/was-swami-vivekananda-anti-islam--क्या-स्वामी-विवेकानंद-इस्लाम-विरोधी-थे/d/124331


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