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Hindi Section ( 28 Jun 2012, NewAgeIslam.Com)

Islam, Slavery and Saudi Arabia गु़लामी, इस्लाम और सऊदी अरब

 


ग़ुलाम रसूल देहलवी, न्यु एज इस्लाम

11जून, 2012

(उर्दू से तर्जुमा- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

सऊदियों की इस्लाम बेज़ार हरकतें अब पर्दाए ख़फ़ा में नहीं रह गईं बल्कि मीडिया की कवरेज पा कर धीरे धीरे मंज़रे आम पर आ रही हैं। पिछले दिनों जब तमिलनाडू से ताल्लुक़ रखने वाले शादीशुदा जवान पेरियासामी की सऊदी अरब में २० साला गु़लामी और क़ैद व बंद की ज़िंदगी ख़बर बन कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आई तो हर सच्चे मुसलमान का कलेजा काँप उठा और सर शर्म से नीचे झुक गया। पेरियासामी की उम्र २८ साल की थी जब उसने अपनी बाइज़्ज़त ज़िंदगी और नई नवेली दुल्हन को अलविदा कह कर एक बेहतर जॉब पाने के वादे पर सऊदी अरब का रख़्ते सफ़र बांधा था। मगर ये वादा उसके लिए एक इंतेहाई महंगा सौदा साबित हुआ, जिसके नतीजा में उसके और उसकी बीवी के अगले २० साल ज़हनी, जिस्मानी, नफ़सियाती, मआशी और समाजी तौर पर इंतेहाई अलमनाक दौर से गुज़रे।

ये दर्दनाक कहानी ऐसे बहुत से हिंदुस्तानी ग़रीबों की हालते ज़ार को बयान करती है, जिन्हें अच्छी तनख़्वाहों के बहाने ख़लीजी ममालिक में हायर करके उनसे ऊंट और बकरियां चराने को कहा जाता है। पेरियासामी की दास्तान यही है। तालीम याफ़्ता ना होने की वजह से वो बाआसानी इस चंगुल में फंस गया और फिर उसके साथ २० सालों तक मुसलसल ग़ुलाम की तरह सुलूक किया गया, उसका पासपोर्ट ज़ब्त कर लिया गया, रात दिन जानवर की तरह काम लेने के बावजूद सिर्फ एक ही वक़्त का खाना दिया जाता और मेहनताना तनख़्वाह से भी महरूम रखा जाता। उसे इतनी सख़्त ज़हनी व जिस्मानी अज़ीयतें पहुंचाई गई थीं कि जब हिंदुस्तानी कौंसिल के दबाव पर सऊदी हुकूमत ने उसे वापिस भेजने का इंतेज़ाम किया तो वो दिमाग़ी तवाज़ुन खो जाने की वजह से अपने गांव का पता भी ना बता सका। जब उसे ये मालूम हुआ कि उसकी बीवी एक लंबी मुद्दत तक इंतिज़ार करने के बाद उससे मायूस हो कर दूसरी शादी कर चुकी है तो घर लौटने की ख़ुशी में चेहरे पर जो थोड़ी बहुत रमक़ पैदा हुई थी, वो भी ग़ायब हो गई। (इंडियन ऐक्सप्रेस डाट काम)

गु़लामी और सऊदी अरब:

सऊदी अरब में अगरचे 1962 में गु़लामी पर क़ानूनी पाबंदी आइद कर दी गई थी, मगर अमली तौर पर ये ग़ैरइंसानी रस्म अभी तक बरक़रार है। इस पर सितम ये है कि आला सतह के सऊदी उल्मा और मज़हबी शयूख़ उसकी ताईद कर रहे हैं। मिसाल के तौर पर 2003 में एक मारूफ़ सऊदी मुफ़्ती शेख़ सालेह अलफ़ौज़ान ने अंधा धुंद ये फ़तवा सादर किया कि गु़लामी इस्लाम का हिस्सा है, और जो कोई भी इसके ख़ातमा की बात करता है वो काफ़िर है।

पैग़ंबरे इस्लाम की जाय पैदाइश और मुहबत वही होने की हैसियत से होना तो ये चाहिए था कि सऊदी अरब से गु़लामी के ख़ात्मा के लिए आलमगीर मुहिम चलाई जाती, क्योंकि यही रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की देरीना ख़ाहिश थी। मगर इसके बिलकुल बरअक्स आज सऊदी अरब की शबिया ऐसे मुल़्क की हो गई है, जहां आए दिन मर्द व ख़वातीन दोनों ही बड़ी तादाद में ग़ुलाम बनाए जा रहे हैं, इन से जबरी तौर पर घरेलू ख़िदमात ली जा रही हैं यहां तक कि इनका जिन्सी इस्तेहसाल भी किया जा रहा है। बिलख़ुसूस हिंदुस्तान, बंगला देश, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, फ़िलपाइन, इंडोनेशिया, सूडान और इथोपिया से सऊदी अरब में एक बड़ी तादाद में बच्चे और जवान मर्द व ख़वातीन हायर किए जाते हैं और उन्हें मोटी तनख़्वाहों का फ़रेब दे कर उनसे घर के छोटे छोटे काम करवाए जाते हैं। इनमें से अक्सर के साथ इंतेहाई ज़ालिमाना और दिलसोज़ बरताव रवा रखा जाता है,  उनके पासपोर्ट ज़ब्त कर लिए जाते हैं, उन्हें धमकियां दी जाती हैं, जिन्सी व जिस्मानी अज़ीयतों में मुब्तेला किया जाता है और उनकी तनख़्वाहें भी हड़प ली जाती हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक़ एशिया व अफ़्रीक़ा के मुख़्तलिफ़ ममालिक से हर साल सऊदी अरब में बड़ी तादाद में ख़वातीन की स्मगलिंग होती है और तिजारती अंदाज़ में इनका जिन्सी इस्तेहसाल किया जाता है। नतीजन ये औरतें मजबूर हो कर क़हबा गिरी के दलदल में फंस जाती हैं। अलावा अज़ीं सऊदी अरब में नाईजीरिया, यमन, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और सूडान से बेशुमार बच्चे इम्पोर्ट किए जाते हैं और उनसे जबरन घरेलू काम लेने के साथ साथ उन्हें भीख मांगने पर भी मजबूर किया जाता है। कुछ सऊदी बाशिंदे ऐसे भी हैं जो मिस्र, यमन, अफडग़ानिस्तान, पाकिस्तान, हिंदुस्तान और बंग्लादेश का सफ़र करते हैं और वहां जाकर तिजारती अंदाज़ में जिन्सी इस्तेहसाल के कारोबार में मुलव्विस पाए जाते हैं। यहां तक कि कुछ सऊदी हज़रात ग़ैर ममालिक में एक मुतैय्यना मुद्दत तक के लिए शादी रचा लेते हैं (मसला निकाह मताअ व निकाहे मिस्यार वग़ैरा) और इस मुद्दत तक महेज़ जिन्सी ताल्लुक़ात क़ायम करने के बाद मनकूहा को तलाक़ दे कर वापस अपने मुल़्क चले आते हैं। ऐसे भी मुतअद्दिद रुसवाकुन वाक़ेआत सुर्ख़ियों में आ चुके हैं कि निहायत कमसिन लड़कियों के साथ शादी करके उन्हें बाइज़्ज़त और ऐशो इशरत की ज़िंदगी गुज़ारने का सब्ज़ बाग़ दिखा कर सऊदी अरब ले जाया गया, लेकिन वहां पहुंच कर उन्हें अचानक ये पता चला कि उनकी हैसियत अपने शौहर की जिन्सी लज़्ज़त के सामान से ज़्यादा कुछ भी नहीं है। इस तरह बिलाख़िर वो लड़कीयां या तो घर की नौकरानी बन कर रह गईं या फिर बाहर जा कर क़हबा गिरी के दलदल में फंस गईं।

गु़लामी और सऊदी हुकूमत:

यूएस स्टेट डिपार्टमेंट की तहक़ीक़ात के मुताबिक़ : सऊदी हुकूमत अपने मुल्क से इंसानी स्मगलिंग को ख़त्म करने के लिए संजीदा नज़र नहीं आ रहा है और ना ही अब तक इसने इसके लिए कोई मुख़लिसाना कोशिश की है। इस बारे में कोई पुख़्ता सबूत फ़राहम नहीं हो सका कि हुकूमत ने इंसानी स्मगलिंग में मुलव्वस लोगों को क़रार वाक़ई सज़ा दी है। मज़ीद बराँ, तिजारती अंदाज़ में लड़कियों और बच्चों का जिन्सी इस्तेहसाल करने वाले स्मगलर्स के ख़िलाफ़ भी हुकूमत ने अमली तौर पर कोई सख़्त क़ानून नाफ़िज़ नहीं किया और ना ही जिन्सी इस्तेहसाल के मुतास्सिरीन के तहफ़्फ़ुज़ को यक़ीनी बनाने की सिम्त कोई पायदार क़दम उठाया। सऊदी हुकूमत की अथारिटी आज तक इन मुतास्सिरीन की शनाख़्त का कोई रस्मी तरीकएकार वज़ा नहीं कर सकी है जिसके नतीजा में आम तौर पर ख़ुद मुतास्सिरीन ही को मुजरिम के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। इसी तरह जबरी घरेलू ख़िदमत involuntary servitude) ) को ख़त्म करने के लिए भी ममलकत ने कोई संजीदा क़ानूनी कोशिश नहीं की है। अगरचे वहां का इमीग्रेशन क़ानून और वीज़ा ऐन्ट्री के लवाज़मात सख़्त से सख़्त तर कर दिए गए हैं, मगर फिर भी बच्चों और औरतों की स्मगलिंग और जिन्सी इस्तेहसाल की रोक थाम के लिए कोई मोअस्सर इक़दाम नहीं किया गया है।

गु़लामी और सल्फ़ी उल्मा:

सऊदी हुकूमत की अफ़सोसनाक बेहिसी का मंज़रनामा देखने के बाद अब आईए मौजूदा गु़लामी के ताल्लुक़ से सऊदी सलफ़ी उल्मा व शयूख़ का मौक़िफ़ मुलाहिज़ा कीजिए!

सऊदी अरब के मुतशद्दिद सल्फ़ी उल्मा ने गु़लामी के शरई जवाज़ के हक़ में बेबुनियाद फतावा सादर कर के वहां इसके फ़रोग़ में बुनियादी किरदार अदा किया, जबकि दुनिया भर के जम्हूर उल्मा का वाज़ेह मौक़िफ़ ये है कि मौजूदा गु़लामी सरता सर ग़ैर इस्लामी है और ये क़ुराने करीम के उसूल व हिदायात से बिलकुल मुतसादिम है।

सऊदी उल्मा का ये मौक़फ़ मीडिया में इस वक़्त सामने आया जब 2003 में आला सतह के सऊदी मुफ़्ती शेख़ सालेह अलफ़ौज़ान ने ये फ़तवा जारी किया कि गु़लामी मज़हबे इस्लाम का हिस्सा है। ये जिहाद का भी जुज़ है, और जिहाद उस वक़्त तक बाक़ी रहेगा जब तक कि इस्लाम ज़िंदा है। जो उल्मा गु़लामी को इस्लाम से ख़ारिज कर रहे हैं, वो उल्मा नहीं बल्कि जोहला हैं। हर वो शख़्स जो इस तरह की बात करता है काफ़िर है। ये फ़तवा शेख़ अलफ़ौज़ान ने उस वक़्त सादर किया जब वो सऊदी हुकूमत के सीनियर उल्मा कौंसल के रुक्न, काउंसल आफ़ रिलिजियस एडिक्टस ऐंड रिसर्च के मेंम्बर, प्रिंस मीताईब मस्जिद, रियाज़ के ख़तीब व इमाम और सऊदी वहाबी उल्मा के सबसे बड़े मर्कज़ इमाम मोहम्मद बिन सऊद इस्लामिक यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर थे। (वर्ल्ड नेट डेली, 10 नवंबर,2003 )

गु़लामी और इस्लाम:

इस बात के सबूत पर बेशुमार दलायल व शवाहिद मौजूद हैं कि इस्लाम ने हमेशा इंसानी गु़लामी की बेख़कनी की कोशिश की है। यहां ये वाज़ेह रहना चाहिए कि अगरचे दौरे इस्लाम के अरब में गु़लामी की रस्म का वजूद मिलता है मगर इसका ये मतलब हरगिज़ नहीं कि इस्लाम ने इसकी ताईद की है बल्कि इसने इंसानों को ग़ुलाम बनाने वालों की हौसला शिकनी करके इसके ख़ात्मा की हर मुम्किना कोशिश की है। इसलिए सऊदी उल्मा का ये क़ौल कि अह्दे इस्लाम में गु़लामी का वजूद इसके जवाज़ पर दलील है, महेज़ एक बेबुनियाद बात है। दर असल अरब के इस मुआशरा में जहां गु़लामी सदियों से चली आ रही थी, अचानक एकबारगी में इसका ख़ात्मा एक मुश्किल अमर था। इसके बावजूद इस्लाम ने सबसे पहले वहां गु़लामी के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की और अपने मोतदिल मिज़ाज के मुताबिक़ बतदरीज इसका सफ़ाया करने की कोशिश की।

गु़लामी से मुताल्लिक़ इस्लाम का बुनियादी नज़रिया:

ऐ लोगो! हमने तुम को एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हारी कौमें और क़बीले बनाए। ताकि तुम एक दूसरे को पहचानो। और ख़ुदा के नज़दीक तुममें ज़्यादा इज़्ज़त वाला वो है जो ज़्यादा परहेज़गार है। बेशक ख़ुदा सब कुछ जानने वाला (और) सब से ख़बरदार है। (14:49)

मज़कूरा करानी आयत की रोशनी में ये बात पूरे वसूक़ से कही जा सकती है कि बुनियादी तौर पर इस्लाम में गु़लामी के लिए कोई गुंजाइश नहीं। लेकिन चूँकि ज़हूरे इस्लाम के वक़्त जंगों में गिरफ़्तार किए गए क़ैदीयों को ग़ुलाम बनाना अरबों में एक आम रिवाज था, जिसके नतीजा में अरब में गुलामों की तादाद बहुत ज़्यादा हो चुकी थी। इसलिए इस्लाम ने गु़लामी के ख़ात्मा की तरफ़ तवज्जो ना दे कर पहले से मौजूद गुलामों के तहफ़्फ़ुज़ और उन के सल्ब होते हुए हुक़ूक़ की बाज़याबी को अपना मतह नज़र बनाया। गुलामों के साथ हुस्ने सुलूक और नरम रवैय्या की तलक़ीन करके इस्लाम ने अव्वलन उनकी आज़ादी के मस्दूद रास्ते वा किए। ख़ुद पैग़ंबरे इस्लाम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने एक बड़ी तादाद में ग़ुलाम मर्दों और औरतों को आज़ाद करके इंसानी आज़ादी के तहफ़्फ़ुज़ की शानदार मिसाल क़ायम फ़रमाई और आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपने उन सहाबा की ख़ूब हौसला अफ़्ज़ाई फ़रमाई जिन्होंने इस सिलसिले में आपकी पैरवी की। वो लोग जो अपने आप को अहले हदीस कहते हैं, उन्हें इस हदीस से सबक़ हासिल करना चाहिए और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम की इस सुन्नते मुबारका पर अमल करना चाहिए और उसे फ़रोग़ देना चाहिए। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने गुलामों के साथ बदसुलूकी करने वालों को सख़्त तंबीया करते हुए फ़रमाया: वो शख़्स जन्नत में हरगिज़ नहीं जाएगा जो अपने गुलामों के साथ बदसुलूकी करता है। सहाबा ने अर्ज़ किया: या रसूलुल्लाह! (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) क्या आपने हमें नहीं फ़रमाया था कि आपके अकीदतमंदों में बहुत से ग़ुलाम और यतीम होंगे? आपने फ़रमाया: हाँ! तो तुम लोग उनके साथ अपने बच्चों की तरह मेहरबानी करो, और उन्हें खाने में वो चीज़ दो जो तुम ख़ुद खाते हो।

इसी तरह की एक दूसरी हदीस में आपने इरशाद फ़रमाया:

तुम्हारे ग़ुलाम तुम्हारे भाई हैं, लिहाज़ा तुम में से जिस किसी का भाई इस पर मुनहसिर हो, उसे चाहिए कि वो उसे उसी तरह खिलाए पिलाए और उसे कपड़े पहनाए जिस तरह कि वो अपने आप को खिलाता पिलाता और कपड़े पहनाता है। और उसके ऊपर उस की ताक़त से ज़्यादा बोझ ना डाले, अगर तुम उनसे काम लेते हो तो तुम पर ज़रूरी है कि तुम उन की मदद करो (रिवायत: हज़रत अबदुल्लाह इब्न उमर, मुस्लिम शरीफ़)

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपनी उम्मत को गुलामों को आज़ाद करने की ख़ूब तलक़ीन फ़रमाई,  अगरचे आज़ाद करने के लिए किसी को ग़ुलाम ख़रीदना ही क्यों ना पड़े, ये अल्लाह के यहां बहुत पसंदीदा अमल है। तारीख़े इस्लामी में ऐसे बहुत से मवाक़े आए जब आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने और आपके सहाबा ने आपकी तरग़ीब पर गुलामों को बड़ी तादाद में आज़ाद किया। ख़ुद रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने 63 गुलामों को आज़ाद किया, और आप की ज़ौजा मोहतरमा हज़रत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने 67 गुलामों को आज़ाद किया। मजमूई एतबार से आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के अहले बैत और सहाबा किराम ने 39,237 गुलामों को आज़ाद किया ( ह्युमन राईट्स इन इस्लाम, मतबूआ इस्लामिक फ़ाउंडेशन 1976, इंगलैंड, सफ़्हा 453 ( इनमें से सबसे ज़्यादा मशहूर ग़ुलाम हज़रत सफिया बिंत ह्यया थी जिनको आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने आज़ाद करने के बाद अपनी ज़ौजियत के शर्फ़ से नवाज़ा। दूसरे जै़द इब्न हारिस रज़ियल्लाहू अन्हा हैं जिनको आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने अपना मतबनी (मुंह बोला बेटा) बना लिया। (किताब अलतब्क़ात अलकबरी ,इब्ने साद)

मज़कूरा हक़ायक़ व वाक़ियात और अहादीस की रौशनी में गुलामों के ताल्लुक़ से सही इस्लामी नज़रिया और मिज़ाज नब्वी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का बख़ूबी इदराक किया जा सकता है। आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की नज़र में सबसे पसंदीदा अमल ये था कि गुलामों को आज़ाद कर दिया जाय, अगरचे आज़ाद करने के लिए उन्हें ख़रीदना ही क्यों ना पड़ जाय। दूसरी तरफ़ वो लोग जो उनके साथ बदसुलूकी करते हैं, उन्हें बुरा भला कहते हैं या उन्हें मारते पीटते हैं, वो लोग जहन्नुम की आग का ईंधन बनेंगे और सख़्त ग़ज़ब इलाही के मुस्तहिक़ होंगे।

गु़लामी के ख़ात्मा के लिए इस्लाम की पुरज़ोर कोशिश के बावजूद सऊदी अरब में आज भी गु़लामी की जाहिलाना रस्म बरक़रार देख कर कलेजा मुंह को आता है। पेरियासामी की २० साला गु़लामी और क़ैदो बंद की ज़िंदगी की ताज़ा तरीन ख़बर तमाम उम्मते मुस्लिमा के लिए एक लम्हए फ़िक्रिया है जो इस बात का मुतक़ाज़ी है कि तमाम मुसलमानान आलिम सऊदी हुकूमत से इस बात का पुरज़ोर मुतालिबा करें कि वो मुस्लमानों के दीनी मर्कज़ में इस्लाम की शबिया ना बिगड़ने दे और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के लाए हुए दीने रहमत को ज़ुलिम व ज़ियादती और संगदिली का दीन बना कर पेश करने वालों पर फ़ौरा क़दग़न लगाए।

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