गुलाम गौस, न्यू एज इस्लाम
१८ अक्टूबर, २०१४
“नवाए अफगान जिहाद” मैगज़ीन के जुलाई २०१४ के शुमारे में तालिबान के नजरिया साज़ काशिफ अल खैरी ने पुरे ज़ोर व शोर के साथ लगभग तमाम पाकिस्तानी मुसलमानों पर ‘कुफ्र’ और “इर्तेदाद” का लेबल लगाया है। इसने ऐसा गैर इस्लामी कार्य जान बुझ कर ज़र्बे अज्ब आपरेशन के बाद किया। पाकिस्तान में आम शहरी, राजनीतिक और दिफाई शोबों और इस्लामी उल्मा के बीच ज़र्बे अज्ब आपरेशन को बड़े पैमाने पर हिमायत हासिल हुई थी। इस मुसल्लमा इस्लामी हकीकत को अनदेखा करते हुए कि किसी भी मुसलमान की उस वक्त तक तकफीर करना गैर इस्लामी है जब तक वह खुद खुले आम कुफ्र का इकरार ना कर ले काशिफ अल खैरी ने पुरी दरोग गोई के साथ हास्यास्पद अंदाज़ में अपने लेख की शीर्षक “कुफ्र व इर्तेदाद का मुजाहेदीने इस्लाम के खिलाफ इत्तेहाद” रखा। उन्होंने तमाम गैर वहाबी मुसलमानों और गैर मुस्लिमों के कत्ल का जबरी जवाज़ पेश किया है जिसकी बुनियाद केवल वहाबियाई नज़रियात पर है। और इस तरह उन्होंने ना केवल यह कि पुरी बे गैरती के साथ कुरआन व हदीस और उनके अर्थ का गलत इस्तेमाल किया बल्कि चारों इस्लामी फिकही मज़ाहिब की भी खिलाफ वर्जी की है।
तालिबानी मैगज़ीन ‘नवाए अफगान जिहाद’ के उद्धरण जिनमें पाकिस्तानी मुसलमानों पर काफिर मुर्तद होने का आरोप लगाया गया है
तालिबानी नजरिया साज़ काशिफ अली अल खैरी लिखते हैं: “दक्षिणी वजीरिस्तान में जब पाकिस्तानी फ़ौज ने मिशन “ज़र्बे अज्ब” शुरू किया तो सेकुलर मानसिकता रखने वालों की ख़ुशी की कोई हद नही रही। मुशर्रफ, कयानी और ज़रदारी जैसे गुमराह लोगों ने इसमें दखल अंदाजी करने से गुरेज़ किया, तथापि शरीफ ने ऐसा करने का फैसला कर लिया। शैख़ रशीद, शुजाअत सहित हर जमात इस आपरेशन के एलान पर फ़ौज के सदके वारी जा रही है! मज़हब फरोशों की कबील में राफजी और मुशरिक टोला दिल व जान “वारने “पर तैयार बैठा है........इत्तेहाद बैनल मुर्तदीन का सरबराह राफजी रजा नासिर सरशारी ए जज़्बात में आकर इस कदर लम्बी हांक बैठा कि बाकी अश अश करते रह गए.....आपरेशन के एलान के केवल ३ घंटों बाद उसने अपना “एलानिया” दाग दिया कि ”मैं उत्तरी वजीरिस्तान में तक्फीरियों के खिलाफ आपरेशन में पाकिस्तान फ़ौज को एक लाख शिया रज़ा कार देने का एलान करता हूँ” ज़रा अंदाजा तो कीजिये कि अब नौबत यहाँ तक आ पहुंची है कि मुता की पैदावार और हराम की औलाद ‘ पाकिस्तानी फ़ौज के लिए “रज़ा कारी’ करेगी, वह भी दस बीस या सौ हज़ार नहीं पुरे एक लाख मुता की पैदाइश ‘नापाक फ़ौज के साथ होंगे....ऐसे में इस फ़ौज पर अल्लाह पाक की तरफ से बरसने वाली लानत को कौन रोक पाएगा???
“इसके बाद मुशरेकीन का दोसरा गिरोह “सरगर्म” हुआ और ‘सुन्नी तहरीक’ के सरबराह एजाज़ क़ादरी ने 19 जून को मानसहरा में एलान किया कि “पाक फ़ौज अगर आदेश करे तो हम एक लाख मुस्तफाई सिपाही अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ जिहाद के लिए देने को तैयार हैं.......इसे कहते हैं बड़े मियाँ सो बड़े मियाँ छोटे मियाँ लानतुल्लाह!” ......अर्थात यह एक लाख नफरी वजीरिस्तान से भी आगे बढ़ कर अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ “जिहाद” के लिए मुहय्या की जाएगी....जी हाँ! वही अफगानिस्तान के तालिबान जो पूरब और पश्चिम के मुशरेकीन और दुनिया के कुफ्फार की फौजों को अधमरा कर के घरों को भिजवाए बैठे हैं, अब उनका मुकाबला यह हलवा खोर और तीजे चालीसवें पर पलने वाले करेंगे! और मज़े की बात यह है कि वाकिफाने हाल के बकौल यही एजाज क़ादरी कराची के इलाके नाज़िमाबाद में मौजूद अपने घर से निकलते समय भी वह “उद्धम” मचाता है कि इसके जाती मुहाफ़िज़ भी उसे गाली देते थक जाते हैं.......कभी घर के पिछवाड़े से झांकता है कि गली में कोई “आतंकवादी” तो नहीं, कभी अध खुली खिड़की की ओट ले कर “छातियाँ” मारता है कि कोई दुश्मने जान की ताक में तो नहीं बैठा! फिर मुश्किल से अपने खौफ को दबा कर कांपते हुए घर से बाहर आने की “जुररत मंदाना” फैसला करता है!”
“इसी कबीले के एक और गिरोह ‘जो अमेरिका से डॉलर वसूल कर मुजाहेदीन के खिलाफ जुलुस निकालता
रहा’ के एक सौ “उलेमा” ने २२ जून को फतवा दिया कि “फ़ौजी आपरेशन ‘ज़र्ब अज्ब’ जिहाद है”! इस फतवा में अलबत्ता यह सराहत नहीं की गई कि इस “जिहाद, के मसारिफ की मद में अमेरीकी कांग्रेस डॉलरों की खेप क्यों रवाना कर रही है?
ज़ाहिर है ऐसे “असंबंधित” सवालों पर “बोत वालों” के गज़ब का निशाना
बनने की बजाए बेहतर है कि जर्बे अज्ब के हक़ में फतवा जारी कर के अल्लाह के ग़ज़ब के हक़
दार बन जाओ! क्योंकि इन दीन फरोश “उलेमा” का ईमान ही यह है
कि “ऐ जहां मिट्ठा, उगा किन्ने डीठा”.....ताहिर अलकेनेड्वी इस दौड़ में क्यों पीछे रहता,
उसने भी “फतवा” दाग दिया कि “मैं इस आपरेशन को अज़ीम जिहाद करार देता हूँ, इस जिहाद की हिमायत शरई तौर पर पूरी कौम पर फर्ज़ हो चुकी है”....यक़ीनन यह वही “शरीअत” होगी जो अज़् अव्वल ता आखिर “आलमे रुया” की मोहताज है क्योंकि मौसूफ़ खुद बयान कर चुके हैं
कि उनकी “तालीम व तरबियत” के तमाम मराहिल आलमे
रुया में तय हुए! अब “अज्गासे अहलाम” की बुनियाद पर “फतवों” का तोरमार तो बांधा जा सकता है लेकिन पाकीज़ा शरीअत
और दीने मुतह्हर के हकीकी इल्म की रु से इस ज़ुल्म की हिमायत करने का तसव्वुर भी नहीं
किया जा सकता......सलीबी आकाओं की खुश नुदी के लिए शुरू की जाने वाली इस फौजी कार्रवाही
की हिमायत मुशरेकीन के टोले ने ही अपना फर्ज़ नहीं समझा बल्कि “कबीला ए मुवह्हेदीन” भी पेश पेश रहा, जिसकी नुमाइंदगी हाफ़िज़ सईद के जिम्मे लगाई गई।“
“तथापि इन तमाम संगठनों
को यह बात याद रखनी चाहिए कि अल्लाह की हिमायत मुजाहिदों को हासिल होगी। अगर किसी निर्णायक
परिणाम तक पाकिस्तानी फ़ौज इस मिहीम को जारी रखती है तो मुजाहेदीन भी इसके लिए तैयार
हैं। इंशाअल्लाह वह इस जंग में पाकिस्तानी फ़ौज को शिकश्त देंगे। इसके पाकिस्तानी फ़ौज
के हामियों का क्या होगा।“
इसी लिए यह सारी तफरिकात को मिटा कर कुफ्र के झंडे तले जमा हुए
हैं और इस लड़ाई में मुजाहेदीन इस्लाम की शिकस्त के मुन्तजिर हैं! अल्लाह पाक ने चाहा
तो मुजाहेदीन के हाथों में मुत्तहेदा कुफ्र और उसके आवान, अंसार व हव्वारीन की आरजुओं और तमन्नाओं का खून होगा और राजनीतिक
व तिरा बख्ति ही हिज्बुश्शैतान का मुकद्दर ठहरे गी! इंशाअल्लाह”।
उपर्युक्त इक्तिबास से यह बात बिलकुल ज़ाहिर है कि तालिबान के
नजरिया साज़ काशिफ अली अल खैरी ने पाकिस्तान के तमाम गैर वहाबी मुसलमानों को मुशरिक
करार दिया है जिससे पाकिस्तान की मुस्लिम अक्सरियत पर भविष्य में हमलों का खतरा और
भी शदीद हो जाता है। उन्होंने बुनियादी तौर पर डॉक्टर मुहम्मद ताहिरुल क़ादरी,
मौलाना सरवत एजाज़ क़ादरी (सुन्नी तहरीक के रहनुमा),
शिया आलिम राजा नासिर अब्बास जाफरी (जनरल सेक्रटरी
मजलिसे वहदते मुस्लिमीन) और सूफी ज़हन रखने वाले अनेकों मुफ़्तीयों और उलेमा को हदफ़ बनाया
है। इसकी वजह केवल यह है कि उन्होंने मिशन जर्बे अज्ब की खुले आम हिमायत की और इस तालिबानी
दहशत गर्दों के खिलाफ जिहाद करार दिया।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि तालिबानी आतंकवादियों के अनुसार
जिहाद का अर्थ केन्द्रीय धारे में शामिल तमाम गैर वहाबी सूफी मुसलमानों और सुन्नी बरेलवियों
समेत तमाम शियों का क़त्ल करना है। काशिफ अली अल खैरी साहब की तरह दुसरे तमाम गैर वहाबी
सूफी मुसलमानों और सुन्नी बरेलवियों सहित तमाम शियों का क़त्ल करना है। काशिफ अली अल
खैरी साहब की तरह दुसरे तमाम तालिबानी और वहाबी भी उन मुसलमानों को मुशरिक और मुर्तद
मानते हैं। सूफी मुसलमानों को “मुशरिकों की जमात” और पाकिस्तानी शियों
को “मुता की पैदावार और हराम की
औलाद” करार दे कर तालिबानी
नजरिया साज़ काशिफ अली अल खैरी साहब ने हास्यास्पद अंदाज़ में यह कहता है कि तालिबानी
आतंकवादियों ने दुनिया के तमाम मुशरेकीन को शिकश्त दे दी है। इसी वजह से “ फातेहा ख्वानी करने वाले, हलवा खाने वाले, तीजा और चालिस्वां मानने वाले “इन आतंकवादियों का मुकाबला नहीं कर सकते।
तालिबानी नज़रियात के मुह्लिक प्रोपेगेंडे जो दुनिया भर के तमाम
सूफी मानसिकता रखने वाले मुसलमानों के लिए नुक्सान दह है कि पेशे नज़र कुरआन व हदीस
के मुकम्मल तौर पर मस्ख शुदा मुआनी से तमाम मुसलमानों को आगाह रखना वक्त की सबसे अहम
जरूरत है। उन्हें यह भी बताना जरुरी है कि गैर वहाबी सुन्नी मुसलमानों को क़त्ल करने
के लिए कुफ्र, इर्तेदाद,
जिहाद और मुजाहिद जैसे अलफ़ाज़ का किस तरह गलत इस्तेमाल
किया जा रहा है।
मेरी अखलाकी और इंसानी ज़िम्मेदारी का तकाजा है कि मैं कुफ्र,
इर्तेदाद या शिर्क के बहाने गैर वहाबी शिया और सुन्नी
मुसलमानों को क़त्ल करने के तालिबानी और वहाबी नजरिये की तरदीद करूँ। सबसे पहले हमें
यह जानना चाहिए कि उन वहाबी नजरिया साजों के
नज़दीक इस्लामी फिकह की कानूनी कद्र क्या है जो उन सूफी ज़हन रखने वाले मुसलमानों के
लिए शिर्क और कुफ्र जैसे अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हैं हालांकि मेरे खयाल से यह सूफी
ज़हन रखने वाले मुसलमान हकीकी इस्लामी शिक्षाओं पर गामज़न हैं। अब हम गहराई के साथ निम्नलिखित
कुरआनी आयत और हुजुर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हदीसों का मुताला करते हैं।
कुरआन में तक्फिरियत का अदमे जवाज़
“ऐ ईमानदारों जब तुम
ख़ुदा की राह में सफ़र करो तो (किसी के क़त्ल करने में जल्दी न करो बल्कि) अच्छी तरह जॉच
कर लिया करो और जो शख्स (इज़हारे इस्लाम की ग़रज़ से) तुम्हे सलाम करे तो तुम बे सोचे
समझे न कह दिया करो कि तू ईमानदार नहीं है (इससे ज़ाहिर होता है) कि तुम (फ़क्त) दुनियावी
आसाइश की तमन्ना रखते हो मगर इसी बहाने क़त्ल करके लूट लो और ये नहीं समझते कि (अगर
यही है) तो ख़ुदा के यहॉ बहुत से ग़नीमतें हैं (मुसलमानों) पहले तुम ख़ुद भी तो ऐसे ही
थे फिर ख़ुदा ने तुमपर एहसान किया (कि बेखटके मुसलमान हो गए) ग़रज़ ख़ूब छानबीन कर लिया
करो बेशक ख़ुदा तुम्हारे हर काम से ख़बरदार है”।
उपर्युक्त आयत में यहाँ तक कहा गया है कि अगर कोई यह दिखाने
के लिए “अस्सलामु अलैकुम” कहे कि वह एक मुसलमान
है तब उसे काफिर नहीं कहा जाना चाहिए। हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दौरे
हयात में जब कुछ मुसलमानों को सलाम करने वाले किसी मुसलमान के बारे में शक हुआ तो हमारे
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे फरमाया: “क्या तुम उसके दिल का हाल जानते हो कि उसने इस्लाम कुबूल किया
है या नहीं?” (मुस्लिम शरीफ)
वह हदीस जिनमें किसी मुसलमान को काफिर कहने की मनाही सख्ती के
साथ की गई है दर्ज निम्नलिखित हैं
हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं:” अगर कोई शख्स अपने भाई को काफिर कहता है तो यक़ीनन
उनमें से एक काफिर है।“ (सहीह बुखारी जिल्द ८ किताब ७३ हदीस नम्बर १२५)
यही हदीस मुस्लिम शरीफ में थोड़े अलग अलफ़ाज़ के साथ रिवायत की
गई है:
हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं: “जो कोई भी अपने भाई को काफिर कहता है उसकी हकीकत
उनमें से किसी एक की तरफ लौटे गी। अगर उसकी बात सच है तो ठीक, वरना उसकी बात उसी की तरफ लौट जाएगी(और इस तरह तोहमत
लगाने वाला शख्स खुद काफिर हो जाएगा) [सहीह मुस्लिम किताब १००, नम्बर ०११७]
“जिस शख्स ने किसी
मोमिन को काफिर कहा गोया कि उसने उसका कत्ल कर दिया”। (तिरमिज़ी और बुखारी)
“जो शख्स शहादत के
कलमे की गवाही दे उसे काफिर ना कहो। जो शख्स शहादत के कलमे की गवाही देने वाले को काफिर
कहता है वह कुफ्र के करीब है। (तबरानी में इब्ने उमर से मरवी है)
“ईमान की बुनियाद तीन
चीजों पर है। जो शख्स शहादत के कलमे की गवाही दे उसे किसी भी गुनाह के लिए काफिर ना
कहो और ना ही किसी बद आमाली की वजह से उसे इस्लाम से खारिज मत करो”। (अबू दाउद)
उपर्युक्त हदीसों से यह कानून माखुज़ होता है कि किसी सहिहुल
अकीदा मोमिन को काफिर न कहा जाए। यह कानून इस कद्र सख्त है कि अगर इलज़ाम दुरुस्त नहीं
है तो इलज़ाम लगाने वाला काफिर माना जाएगा। इसलिए तालिबान के नजरिया साज़ काशिफ अली ने
अहकामे इलाहिया और हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के उपर्युक्त तमाम अकवाल की
खिलाफ वर्जी की है।
क्लासिकी इस्लामी फुकहा और उएल्मा ने किसी भी मुसलमान की तकफीर
को अस्वीकार कर दिया है
इस्लामी फुकहा और क्लासिकी उलेमा ने किसी भी मोमिन के लिए तकफिरी
नजरिये के इस्तेमाल को निषेध करार दिया है। निम्नलिखित में उन इक्तिबासात को नकल किया
गया है जिनसे तालिबानी वहाबी नजरिया साज़ काशिफ अली की तरदीद होती है जिन्होंने तमाम
पाकिस्तानी मुसलमानों की तकफीर की है।
“अहले सुन्नत का एक
उसूल है कि अहले किबला में से किसी को भी काफिर नहीं कहा जा सकता” (शरह अकाएद निस्फिया
मुसन्नेफा अल्लामा सईदुद्दीन तफ्ताजानी-१२१)
“किसी मुसलमान पर उस
वक्त तक कुफ्र का फतवा सादिर नहीं किया जा सकता जब तक उसकी बातों में ईमान की गुंजाइश
बाकी हो” (रद्दुल मुख्तार,
किताबुल जिहाद, फी बयान इर्तेदाद)
किसी मुसलमान पर उस समय तक कुफ्र का फतवा सादिर नहीं किया जा
सकता जब तक उसकी बातों में ईमान की गुंजाइश बाकी हो”
(र्द्दुल मुख्तार, किताबुल जिहाद, फी बयान इर्तिदाद) हनफी मकतबे फ़िक्र के बानी इमाम अबू हनीफा की तरफ इशारा करते
हुए यह कहा गया है कि उन्होंने किसी भी, अहले किबला की तकफीर नहीं की है”। (शरह अल मवाफिक, हिस्सा ५)
इमामे आज़म अबू हनीफा रज़ीअल्लाहु अन्हु ने फरमाया: “कोई भी शख्स उस वक्त तक ईमान से खारिज नहीं हो सकता
जब तक वह इस बात का इनकार ना करे जिससे वह ईमान में दाखिल हुआ है”। (र्द्दुल मुख्तार,
जिल्द ३ पृष्ठ ३१०)
अल्लामा मुल्ला अली कारी ने फरमाया कि “किसी मोमिन को ईमान से खारिज करना एक संगीन काम
है” (शरह अल शिफा,
जिल्द २, सहिफा-५००)
अल्लामा जलालुद्दीन रज़ीअल्लाहु अन्हु ने फरमाया कि “अहले किबला की तकफीर खुद मुशरिकाना अमल है”। ( दलाइलुल मसाइल)
“विभिन्न इमामों ने
स्पष्ट तौर पर यह कहा है कि अगर तकफीर ना करने की कोई भी बुनियाद पाई जाए तो तकफीर
नहीं की जाएगी हालांकि वह बुनियाद कमजोर ही क्यों ना हो”। (रफउल इश्तिबाह अन इबारतुल इश्तिबाह-४)
देहली के तीन बड़े शायरों में से एक मशहूर सूफी बुज़ुर्ग,
ख्वाजा मीर दर्द रज़ीअल्लाहु अन्हु (१७८५) ने कहा:
“हम अहले किबला को काफिर नहीं
कहते हालांकि हो सकता है कि वह अक्सर मामलों में बातिल और भिन्न अकीदों पर अमल पैरा
हों। इसकी वजह यह हकीकत है कि अल्लाह पाक की वहदानियत, मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नबूवत पर ईमान रखना और किबला
की तरफ उनका मुतवज्जोह होना उन्हें उनके ईमान से खारिज नहीं करता। इसलिए उनका शुमार
उन मुसलमानों में होगा जिन्होंने बाद में बिदअत (बिदआते सैय्येयह) और बातिल अकीदों
का इर्तेकाब किया। हुजुर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि अहले किबला
के मामले में एहतियात बरतो और उन्हें काफिर ना कहो”। (इल्मुल किताब पृष्ठ-७५)
तकफीर के सिलसिले में आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा रज़ीअल्लाहु अन्हु
की तालीमात
बिल जूमला तकफीर अहले किबला व असहाबे कलिमा तय्येबा में जुरअत
व जसारत केवल जिहालत बल्कि सख्त आफत जिसमें वबाले अज़ीम व निकाल का सरीह अंदेशा,
वल इयाज़ बिल्लाह रब्बुल आलमीन (फतावा रज्विय्या,
जिल्द: १२, पृष्ठ: ३१७)
मुसलमान के किसी कॉल व फेल में कोई कमज़ोर से कमज़ोर तावील ऎसी
निकलती हो जिसके सबब हुक्म इस्लाम हो सकता हो तो उसकी तरफ जाना लाज़िम है। अगर चाहे
इसमें हज़ार एह्तिमाल जानिबे कुफ्र जाते हों। (फतावा रज्विय्या)
फ़र्जे कतई है कि अहले कलिमा के हर कॉल व फेल को अगर चह बजाहिर
कैसा ही शनीअ व फजीअ हो हत्तल इमकान कुफ्र से बचाएं। (फतावा रज्विय्या)
इस्लाम के एह्तिमाल को छोड़ कर एह्तिमाल कुफ्र की तरफ जाने वाले
इस्लाम को मग्लुब और कुफ्र को ग़ालिब करते हैं। (फतावा रज्विय्या)
जब तक दीन की आवश्यकताओं में से किसी चीज का इनकार ना हो कुफ्र
नहीं। (फतावा रज्विय्या, जिल्द:९ पृष्ठ: ९४२)
इसके आलावा मज़ीद बे शुमार उलेमा और फुकहा में जो इस बात पर मुत्तफिक
हैं कि अहले किबला में से किसी भी शख्स को ना तो काफिर कहा जा सकता है और ना ही उन्हें
काफिर कहा जाना चाहिए। (अल मवाफिक, पृष्ठ- ६००)
खुलासा:
कुरआन व सुन्नत और उन पर आधारित कलासिकी इस्लामी नियमों पर गौर
व खौज़ करने के बाद कोई भी शख्स यह बात बिला तरद्दुद कह सकता है कि किसी मोमिन पर कुफ्र
या शिर्क का आरोप लगाना इस्लामी शिक्षाओं की खिलाफ वर्जी है। लेकिन सवाल यह पैदा होता
है कि क्यों वहाबी ज़हन के लोग सूफी मुसलमानों पर कुफ़ व शिर्क का झुटा इलज़ाम लगाते हैं?
इसका जवाब “ सूफी मुसलमानों के मामूलात जैसे मज़ारों पर हाजरी देना,
अंबिया ए किराम की यौमे विलादत मनाना, शीरनी सामने रख कर फ़ातिहा ख्वानी करना, वसीला (शफाअत) पर और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
के लिए गैब के सबूत पर ईमान रखना वगैरा” है। पूरी गैर जानिबदारी के साथ अगर हम कुरआन व हदीस
का मुताला करें तो हम सूफी मुसलमानों के उन रूहानी मामूलात को ना केवल जायज़ व मुस्तहसन
बल्कि कारे खैर ही पाएंगे। वहाबी नजरिया साजों के नज़दीक यह खुद साख्ता और बातिल गुमान
व नज़रियात के अलावा और कुछ भी नहीं। इसलिए मेरा यह मानना है कि सूफी मुसलमानों पर कुफ्र
व इर्तेदाद का आरोप लगाने वाले वहाबी तकफीरी ग्रुप इस्लामी तालीमात के खूंख्वार दुश्मन
हैं जो इन कानूनी अक़दार से इनकार कर रहे हैं जिनका तअय्युन कुरआन व हदीस ने किया है
और कयामत के दिन उन्हें अपने उन बुरे कामों के हलाकत खेज़ नतीजे की फ़िक्र होनी चाहिए।
जहां तक आम मुसलमानों की अक्सरियत का संबंध है तो वह उन हिंसापूर्ण तकफीरी नज़रियात
को बिलकुल अस्वीकार करते हैं। (वल इयाज़ बिल्लाह रब्बुल आलमीन)
(जारी है)
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