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Real Sufis vs. Fake ‘Sufis’: Spiritual Training Is Missing असली सूफी बनाम नकली 'सूफी': खानकाहों से तसव्वुफ़ की तालीमात गायब होती जा रही है

गुलाम गौस सिद्दीकी, न्यू एज इस्लाम

2 अक्टूबर 2021

तसव्वुफ़ की निंदा करने से पहले, नकली और असली सूफियों के बीच अंतर करें

प्रमुख बिंदु:

1. सच्चे सूफियों ने तसव्वुफ़ के मार्ग पर चलने से पहले कई वैज्ञानिक और बौद्धिक उपलब्धियां हासिल कीं

2. सच्चे सूफियों की रचनाएं अज्ञानता के अंधकार को प्रकाश में बदलने के लिए सदियों से काम कर रही हैं।

3. बौद्धिक स्तर पर नकली सूफियों के आधार पर असली सूफियों पर मूर्खता का आरोप लगाना बहुत बड़ा अन्याय होगा।

4. धार्मिक विशेषज्ञों ने आध्यात्मिक शिक्षा और प्रशिक्षण की व्यावहारिक आवश्यकता को नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया है, जो इस्लामी तसव्वुफ़ के साथ एक बड़ा अन्याय है।

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कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और आलोचक बौद्धिक जगत पर नियंत्रण पाने पर आमादा हैं। अपने जुनून के कारणवे आमतौर पर तसव्वुफ़ और सुफिया के बारे खुराफात और बकवास बातें करने से नहीं कतराते, भले ही उन्हें इसकी कोई समझ न हो। सत्य के साधकों को गुमराह करने के लिए सूफियों के खिलाफ सबसे आम आरोप यह है कि तसव्वुफ़ अनपढ़ और अज्ञानी लोगों का एक समूह है। उनका कहना है कि जिनके पास समझ और अंतर्दृष्टि है वे तसव्वुफ़ के पास नहीं जाते। ऐसे बेतुके आरोप लगाने से पहले ऐसे विरोधियों को तसव्वुफ़ का इतिहास जान लेना चाहिए। यह उल्लेखनीय है कि सच्चे सूफियों ने तसव्वुफ़ के मार्ग पर चलने से पहले कई वैज्ञानिक और बौद्धिक उपलब्धियां हासिल की हैं।

इमाम कुशैरी, अबू तालिब मक्कीइब्न अरबीइमाम राज़ीइमाम ग़ज़ालीइब्न खलदुन, शेख अब्दुल कादिर जिलानीख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरीशहाबुद्दीन सुहर्वर्दीहज़रत ज़करिया मुल्तानीमुजद्दिद अल्फे सानीहज़रत अली हुजवेरीये सभी न केवल तसव्वुफ़ के अग्रदूत थे बल्कि बुद्धि और ज्ञान के क्षेत्र के भी शहसवार थे।

क्या इन प्रख्यात शिक्षकों और सूफी विद्वानों पर अज्ञानता का आरोप लगाने का साहस किसी में हैअज्ञान के अंधकार को प्रकाश में बदलने के लिए इन प्रबुद्ध सूफियों का लेखन सदियों से काम कर रहा है। पाकपट्टन के सूफी सम्राट एलान करते थे कि अज्ञानता एक मूर्ख राक्षस है जिसकी आंखें मृगतृष्णा और वास्तविकता के बीच अंतर नहीं कर सकती हैं। उनके अनुसारएक अज्ञानी व्यक्ति हृदय और आत्मा के रोगों को पहचानने और उनका इलाज करने में असमर्थ होता है।

हजरत निजामुद्दीन औलिया ने किसी ऐसे व्यक्ति को आध्यात्मिक खिलाफत नहीं दी जो आलिमे दीन न हों। कशफ अल-महजूब के अनुसारतीन प्रकार के लोगों से बचना चाहिए: १) बेईमान उलेमा, २) धोखेबाज गरीब, और ३) अज्ञानी सूफी। अल्लामा इब्ने जौज़ी के अनुसार, जो खुद तसव्वुफ़ और सूफियों के आलोचक माने जाते हैंसुफिया और औलिया कुरआनी विज्ञानफिकहहदीस और तफसीर के इमाम थे।

तसव्वुफ़ के सामान्य आलोचक यह भूल गए हैं कि जब दुनिया के कई हिस्सों में लोग अज्ञानता के अंधेरे में डूबे हुए थेतब सूफी विद्वानों ने लोगों को अंधेरे से बाहर निकालने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी।  तसव्वुफ़ के ऐसे ही एक चमकते सितारे थे इब्न खलदुनजिन्हें दर्शन और इतिहास का इमाम कहा जाता है। सभ्यताओं का उत्थान और पतन इतिहासकारों का पसंदीदा विषय रहा है क्योंकि इब्ने खल्दुन ने इसकी नींव रखी थी। ब्रिटिश इतिहासकार अर्नोल्ड ट्वेनबी के अनुसारइब्ने खल्दुन का मामला "इतिहास का एक दर्शन है जो निस्संदेह अपनी तरह का सबसे बड़ा काम है।" तब से, ट्विनबी सहित बड़ी संख्या में लेखकों ने कई किताबें लिखी हैं जिनमें उन्होंने अपने विचार व्यक्त किए हैं कि कौमें कैसे उरूज और जवाल का शिकार होती हैं। सभी पश्चिमी दार्शनिक इब्ने खलदुन की प्रशंसा करते प्रतीत होते हैं। इब्ने खलदुन ने तसव्वुफ़ में हालते इस्तागराक की स्थिति के बारे में विस्तार से लिखा है।

वहीं तसव्वुफ़ के आसमान में एक और चमकता सितारा दुनिया में हजरत इमाम फखर-उद-दीन राजी के नाम से जाना जाता है। इमाम राज़ी ने सांसारिक विज्ञान और कला प्राप्त करने के बाद अपनी हिकमत दूसरों तक पहुँचाई। उन्होंने कई विषयों पर किताबें लिखींलेकिन वे दर्शनविज्ञान और धर्मशास्त्र में यक्ताए रोज़गार थे। उन्होंने तर्कसंगत विज्ञान में एक गहरी प्रतिष्ठा प्राप्त की। आपके पहले धर्मशास्त्र और दर्शन पर लेख अस्पष्ट और जटिल थे। उनके विचार और नजरिये बहुत अस्पष्ट थे। इमाम अल-ग़ज़ाली और अल-राज़ी ने दार्शनिक विज्ञान की पेचीदगियों को आसानी से हल किया। उन्होंने फलसफे की गांठें इस प्रकार खोल दीं कि अंतर्दृष्टि और जागरूकता के फूल खिले, और उनकी सुगंध से हक़ के तलाशियों के मशामे जां सुगंधित हो गए। इमाम राज़ी ने कहा कि आलिम और अज्ञानी में उतना ही अंतर है जितना सोने और मिट्टी में है। बाहरी विज्ञानों का पालन करके पर सर्वशक्तिमान अल्लाह ने उन्हें बहुत महत्व और गरिमा प्रदान की। उनके ज्ञान और हिकमत की चर्चा पूरी दुनिया में होती थी। वे जहां भी गए, पूरे शहर ने, यहां तक कि राजा ने भी, खुले हाथों से उनका स्वागत किया। उन्हें अमीर और गरीब दोनों पसंद करते थे। हर कोई उन्हें देखने का मौका ढूंढ रहा था।

इस्लामी दर्शन के इतिहास के अनुसारइमाम ग़ज़ालीअल-कुंदीइब्न रुश्दइब्न सीनामुल्ला सदरा और इब्ने खलदुनने विशिष्ट विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में किताबें लिखींजिन्होंने काफी लोकप्रियता हासिल की। हालाँकि, इब्ने अरबी की लेखन शैली उनके पूर्ववर्तियोंबाद की पीढ़ियों और समकालीनों से भिन्न थी। उन्होंने परिणामों तक पहुंचने के लिए विभिन्न विज्ञानों के एकीकरण का समर्थन किया। उनकी सोच में अनेकता में एकता की गुंजाइश थी। उनके अनुसार, ज्ञान के सभी साधन ब्रह्मांड की वास्तविकताओं को एक साथ जोड़कर एक 'व्यापकता' बनाते हैं जिसमें सत्य प्रकाश के रूप में प्रकट होता है।

शेख इब्ने अरबी को विभिन्न विज्ञानों पर सैकड़ों पुस्तकों का श्रेय दिया जाता है, जिनमें से अधिकांश अप्रकाशित हैं या पांडुलिपियों के रूप में हैं जो दुनिया भर के प्रमुख पुस्तकालयों को सुशोभित करती हैं। शेखे अकबर की अरबी पुस्तकों का अंग्रेजीफ्रेंचस्पेनिशइतालवी और जर्मन जैसी अत्यधिक विकसित भाषाओं में अनुवाद किया गया है और हाल के वर्षों में उनकी कई तफसीरी और सवानही लेखनी सामने आई हैं क्योंकि पश्चिम ने उन पर विशेष ध्यान दिया है। सूफियों के जीवन की एक वस्तुनिष्ठ परीक्षा से पता चलता है कि उनमें से कुछ मुहद्दिसमहान मुफस्सिरविश्वसनीय फुकहाप्रतिभाशाली दार्शनिक और अपने समय के महान विचारक थे।

आज के नकली सूफियों के बौद्धिक स्तर के आधार पर असली सूफियों पर मूर्खता का आरोप लगाना बहुत बड़ा अन्याय होगा। तसव्वुफ़जो कभी प्रशिक्षण की आध्यात्मिक पद्धति के लिए जाना जाता था, दुर्भाग्य से आज के नकली सूफियों की प्रथाओं के कारण अंधविश्वास का शिकार हो गया है। तसव्वुफ़ अब मुट्ठी भर कर्मकांडों का नाम बन गया है। आज तथाकथित सूफियों ने उस प्रामाणिकता को समाप्त कर दिया है जिस पर तसव्वुफ़ की स्थापना हुई थी। नकली सूफियों ने पूरी पद्धति के अभ्यास को केवल ताबीज, दम दुरूद और उर्स त्योहारों तक सीमित कर दिया है।

तसव्वुफ़ और तरीकत ने शेख के प्रति निष्ठा की शपथ सहित कई अनुष्ठानों की नींव रखी है। दुर्भाग्य सेइस प्रक्रिया के परिणामस्वरूपन तो शेख और न ही उनके अनुयायी एक-दूसरे की वर्तमान स्थिति से अवगत हैं।

धार्मिक विशेषज्ञों ने आध्यात्मिक शिक्षा और प्रशिक्षण की व्यावहारिक आवश्यकता को नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया हैजो इस्लामी तसव्वुफ़ के साथ एक बड़ा अन्याय है। तथाकथित तसव्वुफ़ में दूसरा प्रमुख दोष यह है कि कुरआन और सुन्नत के विज्ञान को मौलवी वर्ग तक सीमित कर दिया गया है। तथाकथित पीर और धोखेबाज स्वार्थी धर्मनिरपेक्ष सूफी लोगों को धोखा देने के लिए इस विचार के साथ आए हैं। उनका मानना है कि कुरआनहदीस और फ़िक़ह पढ़ाना सूफ़ी संतों का नहीं बल्कि मौलवियों का काम है। इस तरहसच्चे सूफियों को प्रेरित करने वाले इस्लामी विज्ञानों को नकारा जा रहा हैऔर लोगों को समझाया जा रहा है कि जिस तरह से, आध्यात्मिकता, हिकमत, विलायत, सच्चाई और अक्ल फ़िक्र का इस्लाम कोई संबंध नहीं है।

इस स्थिति में, मुसलमानों को तथाकथित सूफियों को पहचानना और जागरूक होना चाहिए, साथ ही साथ कुरआन और सुन्नत के आधार पर तसव्वुफ़ प्राप्त करना चाहिए ताकि हज़रत गौस आज़म और हज़रत ख्वाजा ग़रीब नवाज़ के नक्शेकदम पर चल सकें।

English Article: Real Sufis vs. Fake ‘Sufis': Sufism Once Known For Intellectual Progress, Self-Sacrifice and Spiritual Training Is Missing

Urdu Article: Real Sufis vs. Fake ‘Sufis’: Spiritual Training Is Missing اصلی صوفی بمقابلہ جعلی 'صوفی': تصوف جو کبھی دانشورانہ عروج کے لیے مشہور تھا آج نفس کشی اور روحانی تربیت سے خالی ہے

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/intellectual-sufism-spiritual/d/125584

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