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Hindi Section ( 1 Jul 2019, NewAgeIslam.Com)

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Necessity of Tasawwuf In the Establishment of Global Peace – Part 1 विश्व शांति की स्थापना में सूफीवाद की जरूरत



गुलाम गौस सिद्दीकी, न्यू एज इस्लाम

मौजूदा दौर इंसानी तरक्की के ऊँचाई और इल्म व हुनर के सब्र आज़मा चरण से गुज़र रहा हैl दुनयावी तरक्की के बावजूद इंसानी रूह अपने आमाल ए ज़श्त की कसाफत से बुरी तरह मजरूह हो चुकी हैl पूरी दुनिया भौतिकवाद का मैदान बना हुई है, लोग अपनी ज़ात में गुम और मतलब व मुफ़ादपरस्ती में सर से पैर तक डूबे हुए हैंl हक़ व बातिल में तमीज़ करने की सलाहियतों पर घटाटोप का पर्दा लगा हुआ हैl मानवता हर समय खौफ व दहशत की ज़िन्दगी गुज़ारने पर मजबूर हैl हर ओर मज़लूमियत की चीख व पुकार है, कहीं औरतें बेवह हो रही हैं, कहीं बच्चे अनाथ हो रहे हैं, कोई अपनी आँखों के सामने अपनों को बम धमाकों में उड़ता, फटता देख रहा हैl कहीं दीन व मज़हब के नाम पर आतंकवाद तो कहीं कुरआन व सुन्नत की गलत तशरीहात पेश करके उम्मत ए मुस्लिमा को उसके विश्वासों और विचारों से मुनहरिफ़ करने के प्रयास बढ़ावा पा रहे हैं, यहाँ तक कि माद्दा परस्ती ने इंसानी समाज में निशात ए रूह के आबशारों तक रिसाई करने की सभी राहें बंद करने के सामान बहम कर दिए हैंl ऐसे फितने भरे माहौल में तसव्वुफ़ की शिक्षा ही दुखयारी इंसानियत के सरों पर अमन व अमान के शामियाने नस्ब करने का काम कर सकती हैl

सबसे पहले यह दिमाग में रखें कि तसव्वुफ़ कोई बिदअत नहीं बल्कि जब इस्लाम का वजूद हुआ उसी समय से तसव्वुफ़ भी मौजूदा हैl अंतर केवल इतना है कि शुरू में शब्द तसव्वुफ़ परिचित नहीं था लेकिन हकीकत में अपने सभी अवसाफ व कमालात के साथ मौजूद थाl तसव्वुफ़ असल में कुरआन व सुन्नत की सहीह इत्तेबा का नाम हैl तसव्वुफ़ की सबसे बुनियादी शिक्षा है कि इंसान अपने खालिक व मालिक से कल्बी व रूहानी रिश्ता बनाए और फिर उसकी रौशनी में वह दुनिया को अमन व शान्ति, मोहब्बत व भाईचारगी का दरस देl

अल्लामा इब्ने खलदून तसव्वुफ़ की तारीफ़ करते हुए लिखते हैं: “तसव्वुफ़ का अर्थ इबादत में हमेशा पाबंदी करना, अल्लाह पाक की तरफ पूरी तरह मुतव्वाजा रहना, दुनिया की सुन्दरता की तरफ से रू गर्दानी करना, माल व जाह की लज्ज़त जिसकी तरफ आम लोग आकर्षित होते हैं इससे किनारा कश होना, यह तरीका सहाबा और सल्फ सालेहीन में सामान रूप से प्रचलित था” (कश्फुल महजूब, शैख़ सैय्यद अली हजवेरी, उर्दू अनुवाद अज फज्लुद्दीन गौहर, पृष्ठ ११)

तसव्वुफ़ की राह विकल्प करने वाले असल में कुरआन व सुन्नत के आइनादार होते हैं क्योंकि यही दो चीजें तसव्वुफ़ का सोता हैंl प्रारम्भिक दौर में तसव्वुफ़ के लिए एक इस्तेलाह “एहसान” राइज होती थी जिसे हदीस ए पाक ने बहोत खुबसूरत अंदाज़ में बयान किया कि “الاحسان ان تعبد اللہ کانک تراہ فان لم تکن تراہ فانہ یراک” अर्थात असल में एहसान यह है कि तुम अल्लाह पाक की इबादत इस तरह करो कि तुम उसे देख रहे हो और अगर यह संभव ना हो सके तो कम से कम यह विश्वास करो कि वह तुम्हें देख रहा है”l ईमान के साथ जब एहसान होगा तो इखलास पैदा होगा और हर जगह तुम्हें “ھو معکم اینما کنتم (जहां कहीं भी रहो अल्लाह पाक तुम्हारे साथ है), وفی انفسکم افلا تبصرون (वह तुम्हारे नफ्स में है क्या तुम देखते नहीं) और الم یعلم بان اللہ یری (क्या नहीं मालुम कि अल्लाह पाक देख रहा है) की वास्तविकता का मुशाहेदा होगा और यही तुम्हारा दिनप्रतिदिन का हाल बन जाएगाl

तसव्वुफ़ हरगिज़ इस बात की शिक्षा नहीं देता कि रह्बानियत इख्तियार करके जंगल व बयाबान की तरफ कूच कर लिया जाए बल्कि दुनिया में रहते हुए अल्लाह से संबंध कायम करने के साथ खुदा के मखलूक के साथ सिलह रहमी और भलाई का मामला उस्तवार किया जाएl

मौलाना रूम फरमाते हैं:

चीस्त दुनिया अज खुदा गाफिल बदन ------------- ने कुमाश व नकरा व फ़रज़न्दोंज़न

(अर्थात दुनिया अल्लाह पाक से गाफिल होने का नाम है ना कि दुनियावी असबाब, माल व ज़र और अहलो अयाल को इख्तियार करने का)l

कमाल बात तो फरागत ए कल्बी और ताल्लुक बिल्लाह है: बगीर रस्म ए ताल्लुक दिला अज मुर्गाबी----------कि औज़ आब चु बर्खास्त खुश्क पर बर्खास्त

अर्थात ए दिल तुझे संबंध की रस्म व रीत अगर सीखना है तो मुर्गाबी से सीख कि वह पानी में रहने के बावजूद जब उससे बाहर आती है तो उसके पुरों पर पानी का मुतलक असर नहीं होताl

कमाल तो इसमें है कि दुनिया में रह कर, दुनिया के पुर कशिश ख्वाहिशात को तर्क करके मालिक ए हकीकी से दिल लगाया जाए, रज़ाए इलाही के हुसूल की खातिर सभी आदेशों की पैरवी की जाए और फिर सालेहीन के पदचिन्हों पर चलते हुए अपना नाम उन नुफूस ए कुदसिया में रजिस्टर कराए जिनके बारे में रब सुबहानहु का फरमान है “یریدون وجھہ” अर्थात वह वजह रब के तालिब हैं “يريدون وجه الله واولئك هم المفلحون” अर्थात वह वजहुल्लाह चाहते हैं और वही असल में सफल हैं (सुरह रूम:३८)

من نہ شادی خواہم ونے خسروی ۔۔۔۔۔آنچہ  می خواہم من از توہم توئی

अर्थात: ना मुझे ख़ुशी चाहिए, ना बादशाहत-------तुझसे जो चीज मुझे चाहिए वह केवल तू है

मौलाना जामी फरमाते हैं:

از زندگیم بندگی تست ہوس ۔۔برزندہ دلاں بے تو حرام است نفس

خواجہ ز تو مقصود دل خود ہر کس ۔۔جامی زتو ہمیں ترامی خواہد بس

अर्थात: अपनी ज़िन्दगी से मेरी आरज़ू केवल तेरी बंदगी हैl जिंदादिल लोगों पर तेरे बिना सांस लेना भी हराम हैl ख्वाजा तुझ से केवल हर व्यक्ति अपना उद्देश्य चाहता है, मगर जामी तुझ से केवल तुझ ही को चाहता है और बस

तसव्वुफ़ कोई बिदअत नहीं जैसा कि कुछ विरोधी तसव्वुफ़ प्रोपेगेंडा करते रहते हैंl तसव्वुफ़ असल में शरीअत के बताए हुए सिद्धांतों पर अल्लाह पाक से संबंध करने का नाम हैl तसव्वुफ़ दिल की निगहबानी का दोसरा नाम है क्योंकि इंसान बज़ाहिर जिस्म और नफ्स का नाम है मगर असल में, दिल का नाम है और अगर दिल मुसलमान ना हो सका तो रुकूअ व सुजूद या जुबान से खुदा का इकरार, दोनों निरर्थ हैंl

तसव्वुफ़ के शिक्षा के अध्ययन से पता चलता है कि तसव्वुफ़ अपनी माहियत के एतेबार से उस शौक का नाम है जो अरबाब ए तसव्वुफ़ के दिल व दिमाग में विसाल ए इलाही के लिए इस शिद्दत के साथ मोजज़न होता है कि यह शौक उनकी पूरी अकली व जज़्बाती ज़िन्दगी पर ग़ालिब हो जाता है और फिर वह अल्लाह की कुर्बत को अपनी ज़िन्दगी का उद्देश्य बना लेटे हैंl जब यह नुफूस ए कुदसिया गुफ्तगू करते हैं तो उसी खुदा की, ख़याल करते हैं तो उसी की, याद करते हैं तो उसी को, कलमा पढ़ते हैं तो उसी का, दरिया की रवानी में, तारों की चमक में, सहरा की वुसअत में, बाग़ की शादाबी में, गर्ज़ कि सारे मज़ाहिर ए फितरत और कुदरत के मनाज़िर में इसे खुदा ही का जलवा नज़र आता है------समाया है तो जब से नज़रों में मेरी-----जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू हैl

और फिर उसी खुदा के जलवे की बरकत से वह अमन व अमान की वास्तविक मंजिल को पा लेता है, जहां केवल प्रेम होती है और फिर इसका संदेश, पैगाम मोहब्बत बन जाता है, इसका डीआरएस, भाईचारगी का हो जाता है, इसका काम उसी मोहब्बत की तार से लोगों के दिलों को जोड़ने का होता है इस तरह कि दुनिया का कोई शख्स इससे जुदा ना रहेl

(जारी)

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