New Age Islam
Wed May 20 2026, 03:48 AM

Hindi Section ( 23 Apr 2018, NewAgeIslam.Com)

Comment | Comment

Letters of Khawja Gharib Nawaz to Hadrat Qutubuddin Bakhtiyar Kaki- Secrets of Holy Kalima- Part-1 खवाजा गरीब नवाज़ के पत्र खवाजा क़ुतुबुद्दीन के नाम- कलमा तैय्यबा की हकीक़त

गुलाम गौस सिद्दीकी, न्यू एज इस्लाम

(उर्दू से अनुवाद)

हजरत ख्वाजा गरीब नवाज़ भारत के तमाम औलिया के सुल्तान हैं और हजरत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी राजधानी दिल्ली के सुलतान हैंl यह दोनों भारत के प्रसिद्ध वलियों में से हैं जो परिचय के मोहताज नहींl हजरत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ के खलीफा हैं जिनका मज़ार शरीफ दिल्ली के महरौली शरीफ में स्थित हैl इस लेख का असल उद्देश्य पाठकों की सेवा में हजरत ख्वाजा गरीब नवाज़ के पत्रों को पेश करना है जो उन्होंने अपने ख़ास खलीफा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी रहमतुल्लाह अलैह के नाम जारी फरमायाl यह पत्र फ़ारसी भाषा में लिखे गए थे, जिनका अनुवाद “असरारे हकीकी” के नाम से किताबी शकल में बहुत पहले सामने आ चुका हैl इस पुस्तक का नुस्खा जो मेरे पास है उसके उर्दू अनुवादक का नाम तो किताब में दर्ज नहीं था लेकिन उसके प्रकाशक का नाम मुहम्मद अकबर कादरी अत्तारी है और उसका प्रकाशन अकबर बुक सेलार्ज़ के माध्यम से सितम्बर सन 2004 में हुआl हम उनके शुक्रिया के साथ उन पत्रों को पेश कर रहे हैं और दुआ करते हैं कि अल्लाह पाक इन सेवाओं को कुबूल फरमाए और पाठकों को इन पत्रों से लाभ उठाने की तौफीक अता फरमाएl आमीन बजाहे सय्यदुल मुरसलीन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लमl

इन पत्रों को पेश करने से पहले हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ और हज़रत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार रदिअल्लाहु अन्हुमा के संबंध में कुछ बातें करना जरुरी समझता हूँ कि यह दोनों औलिया अल्लाह अवश्य अल्लाह के दोस्त हैंl वाली का अर्थ ही दोस्त हैl जो अल्लाह पाक का वली होगा वह हर हाल में अल्लाह से मुहब्बत करेगाl औलिया अल्लाह ने अल्लाह से मुहब्बत कीl उनकी अल्लाह से मुहब्बत की यह दलील थी कि उन्होंने हुजुर अलैहिस्सलाम की आज्ञा का पालन कियाl हुजुर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आज्ञा का पालन ही अल्लाह पाक से मुहब्बत करने की दलील है, क्योंकि अल्लाह पाक से मुहब्बत अल्लाह पाक के कलाम व अहकाम पर अमल करने का नाम हैl और अल्लाह पाक का कलाम हुजुर अलैहिस्सलाम के माध्यम से ही हम तक पहुंचा हैl अल्लाह के इन दोनों वालियों नें इस वास्तविकता और इसके असरार व भेद को अच्छे से पहचाना इसलिए वह अल्लाह के दोस्त कहलाएl कुरआन करीम ने बहुत सुंदर और स्पष्ट अंदाज़ में इस वास्तविकता को बयान फरमाया है:

قل ان کنتم تحبون اللہ فاتبعونی یحببکم اللہ(3:31)

अर्थात: ऐ महबूब (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तुम फरमा दो कि लोगों! अगर तुम अल्लाह को दोस्त रखते हो तो मेरे आज्ञाकारी हो जाओ, अल्लाह तुम्हें दोस्त रखे गाl (अनुवाद कुरआन, कंज़ुल ईमान)

इस आयत से स्पष्ट हुआ कि अल्लाह से सच्ची मुहब्बत का तकाज़ा और दलील यह है कि अल्लाह के महबूब नबी (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) से भी मुहब्बत की जाए, और उनसे मुहब्बत का मतलब यह है कि उनकी सुन्नतों पर अमल किया जाए, उनके बताए गए तरीकों पर चला जाएl इसलिए जो अल्लाह का वली और दोस्त होगा वह जरुर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की बात पर अमल करेगाl सरकार ख्वाजा गरीब और हुजुर ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी (रदिअल्लाहु अन्हुमा) तो सर्वसम्मति से अल्लाह के वली और दोस्त थेl ख्वाजा गरीब नवाज़ की शाने महबूबी का यह आलम था कि जब आप ने विसाल फरमाया तो आपके माथे पर कुदरत के कलम से लिखा हुआ था: हबीबुल्लाह माता फी हुब्बिल्लाहीl अर्थात यह अल्लाह का हबीब है जिसकी जान अल्लाह की मुहब्बत गयी हैl यह नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत और फरमाबरदारी का इनाम ही था कि हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ रहमतुल्लाही अलैह को इतना बड़ा दर्जा मिलाl अगर वह अपने पाक नबी की सुन्नत को तर्क कर देते तो इस दर्जे पर ना होते, क्योंकि हुजुर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है:(لو ترکتم سنۃ نبیکم لضللتم (مشکوۃ अर्थात अगर तुम अपने नबी की सुन्नत छोड़ दोगे तो गुमराह हो जाओगे, हज़रत शैख़ सादी अलैहि रहमह ने किया ही खूब फरमाया है:

खिलाफे पयंबर राहे गुज़ीद/ कि हरगिज़ बमंज़िल ना ख्वाहद रसीद

अनुवाद: पैगम्बर के खिलाफ जो चलेगा वह हरगिज़ गंतव्य को नहीं पहुँच सकता हैl

हुजुर ख्वाजा गरीब नवाज़ रदिअल्लाहु अन्हु ईमान और रसूल की सुन्नत की अहमियत बयान करते हुए फरमाते हैं:

क़यामत के रोज़ पचास विभिन्न स्थानों पर विभिन्न प्रशन किये जाएँगेl पहले स्थान पर ईमान और उसके नियम और अल्लाह पाक की पहचान के गुणों से संबंधित प्रश्न होगाl अगर इस संबंध में बाल बराबर भी बयान ना कर सके तो वहीँ से सीधा जहन्नुम भेज दिया जाएगाl दुसरे स्थान पर नमाज़ और दुसरे फाराइज़ के बारे में सवाल होंगे, अगर ओहदा बर आमद हो गया, ठीक ठीक जवाब दे दिया तो बेहतर, वरना वहीँ से दोज़ख भेज दिया जाएगा (और जितना अल्लाह चाहेगा, दोज़ख में सज़ा के तौर पर रहेगा, यह बे अमल मोमिन का अंजाम है)l फिर तीसरे स्थान पर नबी की सुन्नत के बारे में सवाल किया जाएगाl अगर उनसे ओहदा बरामद हो गया तो रिहाई मिल जाएगी वरना मुवक्किलों के हाथों, हुजुर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सेवा में भेजा जाएगा कि यह व्यक्ति आपकी उम्मत से है लेकिन सुन्नत अदा करने में कोताही की हैl

जब ख्वाजा साहब इन लाभों को बयान कर चुके तो बहुत रोने लगे और यह शब्द जुबान से इरशाद फरमाया: अफ़सोस है उस व्यक्ति पर जो कयामत के दिन पैगम्बरे खुदा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बारगाह में शर्मिन्दा होगा जो उनकी बारगाह में शर्मिन्दा होगा कहाँ जाएगाl (दलिलुल आरेफीन: पृष्ठ 9,10 अनुवादक, एज़न: हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ रदिअल्लाहु अन्हु और सुन्नत की इत्तेबा अज़ मौलाना अब्दुल मुबीन नोमानी)

हुजुर ख्वाजा गरीब नवाज़ ने अपने ख़त, जो अपने खलीफा हज़रत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी रहमतुल्लाही अलैहि की ओर भेजा, में कलिमा तय्यबा, ईमान, नमाज़ और दुसरे फ़राइज़ के तथ्यों, ज्ञान और उनके कुछ भेद व असरार को बखूबी बयान किया हैl इस तरह ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी रहमतुल्लाही अलैह ने हुजुर ख्वाजा गरीब नवाज़ से इल्म व मारफत का फैज़ हासिल किया और फिर आप ख्वाजा गरीब नवाज़ की तालीमात पर अमल करते हुए विलायत के कमाल पर पहुंचेl

अब आइए निम्नलिखित में हज़रत ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती रह्मतुल्लाही अलैहि के पहले ख़त का अध्ययन करें जिसे हजरत ने अपने खलीफा हज़रत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी रहमतुल्लाह अलैह की तरफ भेजाl इस ख़त में कालिमा तय्यबा की हकीकत, नमाज़ की हकीकत, रोज़े की हकीकत और हज की हकीकत को बहुत दिलकश अंदाज़ में बयान किया गया हैl

पहला पत्र

मुहब्बत हम राज़ अहले यकीन भाई ख्वाजा कुतुबुद्दीन देहलवी! रब्बुल आलमीन रहनुमाई फरमा देl फकीर मुईनुद्दीन चिश्ती की तरफ से,

कलिमा तय्येबा की हकीकत

स्पष्ट हो कि तौहीद के कुछ नुक्ते और हिदायत के कुछ भेद व आसार बारगाहे रिसालत हुजुर अह्म्दे मुजतबा मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से खाकसार को बतौर फैज़ रूहानी हासिल हुए हैं, जिन पर मेरा पूरा ईमान हैl उनहें गौर से सुनो-

एक दिन की बात है कि हुजुर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हज़रत अबू बकर, हज़रत उस्मान, हज़रत इमाम हसन, हज़रत इमाम हुसैन, हज़रत अबू हुरैरा, हज़रत अनस, हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद, हज़रत खालिद, हज़रत बिलाल व दुसरे बड़े सहाबा (रिज्वानुल्लाही ताला अलैहिम अजमईन) से खिताब फरमा कर, हकीक़त के भेद व असरार और मारफ़त की हकीक़त व भेद बयान फरमा रहे थेl लेकिन अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर रदिअल्लाहु अन्हु उस मजलिस शरीफ में हाज़िर न थेl अभी हुजुर पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हकीकत व मारफ़त के असरार व रुमुज़ बयान फरमा ही रहे थे कि इतने में हज़रत उमर रदिअल्लाहु अन्हु भी मजलिस में हाज़िर हुएl पैगम्बरे खुदा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपनी जुबान मुबारक को संबोधित करके फरमाया ऐ जुबान! अब बस कर देl कुछ सहाबा को आश्चर्य हुआ और उनके दिल में यह खयाल पैदा हुआ कि शायद हुजुर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) हज़रत उमर रदिअल्लाहु अन्हु को हकीक़त और मार्फ़त बताना नहीं चाहतेl हज़रत अबू बकर रदिअल्लाहु अन्हु व हज़रत उमर रदिअल्लाहु अन्हु और दुसरे कुछ करीबी लोगों ने हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में अर्ज़ की कि हुजुर! यह क्या माजरा है? हुज़ूरे पाक (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अल्लाह की हकीक़त और मार्फ़त दुसरे तमाम सहाबा किराम (रदिअल्लाहु अन्हुम) के सामने बयान फरमा दिए लेकिन हज़रत उमर (रदिअल्लाहु अन्हु) से इन हकीक़तों के भेदों को आपने छिपा लिए हैंl

हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सभी सहाबा रदिअल्लाहु अन्हुम से फरमाया कि मैं ने उमर (रदिअल्लाहु अन्हु) से रुमुज़ व असरार बातिनी को छिपाया नहीं है बल्कि बात यह है कि दूध पीते बच्चे को अगर मुरगन हलवा और मांस आदि भारी खुराक खिलाया जाए तो उसके लिए खतरनाक होता है लेकिन जब बच्चा बालिग़ हो जाता है तो खाने पीने की कोई चीज उसे हानि नहीं पहुंचातीl हज़रत नबी अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) हज़रत उमर रदिअल्लाहु अन्हु की बातिनी दक्षता और क्षमता के अनुकूल उनसे दुसरे असरार व मारफ़त बयान फरमाने लगेl इसलिए मंजिले जबरूत व लाहुत के हकाएक व दकाएक हज़रत उमर रदिअल्लाहु अन्हु को तलकीन फरमाएl हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, ऐ उमर! من عرف اللہ لا یقول اللہ ومن یقول اللہ ما عرف اللہ अर्थात: जिस व्यक्ति को अल्लाह की मार्फ़त (पहचान) हासिल हो जाती है उसको मुंह से अल्लाह अल्लाह कहने की जरूरत नहीं रहती और जो मुंह से अल्लाह अल्लाह कहता है तो समझ लो कि अभी उसे अल्लाह की मार्फ़त नसीब नहीं हुईl

हज़रत उमर (रदिअल्लाहु अन्हु) ने अर्ज़ किया कि हज़रत यह कैसी मारफत है कि बन्दा अपने मालिक का नाम ही ना ले और उसकी याद को तर्क कर बैठेl नबी अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने जवाब दिया कि अल्लाह का इरशाद है: وھو معکم اینما کنتم अर्थात: जहां कहीं तुम हो वहीँ खुदा तुम्हारे साथ हैl

तो ऐ उमर (रदिअल्लाहु अन्हु)! जो हर समय साथ हो और किसी समय भी नज़र से ओझल ना हो, उसका याद करना क्योंकर जरुरी है?

हज़रत उमर रदिअल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ किया कि अल्लाह पाक हमारे साथ है? नबी अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने जवाब में इरशाद फरमाया कि बन्दे के दिल मेंl

हज़रत उमर रदिअल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ की कि बन्दे का दिल कहाँ है?

हुजुर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि इंसान के सांचे मेंl लेकिन याद रहे कि दिल दो प्रकार का होता हैl एक मजाज़ी दिल और दुसरा हकीकी दिलl ऐ उमर! हकीकी दिल वह है जो ना दाहिनी तरफ है ना बाईं तरफ, ना ऊपर है ना निचे की तरफ, ना दूर है ना नज़दीक है लेकिन इस हकीकी दिल की पहचान कोई आसान काम नहीं हैl यह महफ़िल उन अल्लाह के करीबी लोगों का हिस्सा है जो अल्लाह के हुजुर हमेशा डूबे रहते हैं, क्योंकि कामिल मोमिन हकीकत में अर्श ही होता हैl मोमिन का दिल अल्लाह का अर्श हैl

حدیث دل اگر گویم امید دفتر نمی گنجد  /  کمال وصف دل ہرگز بہ بحر و بر و نمی گنجد

بیا اے طالب صادق بحال خویش خوش بنگر / کہ او درعا لمے آمد کے پائے سرنمی گنجد

दिल वाले का ये मर्तबा है:

دل چہ جنیدمی جنباتد عرش دا /  عرش رادل فرش ساز وزیر پاد

और यह कुर्ब व हुजुर बिना मुर्शिदे कामिल के हासिल नहीं हो सकताl कामिल लोग और तालिब सवाल व जवाब नहीं किया करतेl बल्कि वह खामोश और अदब के साथ रहते हैंl

इसलिए हुजुर नबी अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इरशाद फरमाया: मोमिन का قلب المومن حاضرۃ من ذکر الخفی قصو ای ان مقامی ذکر الخفی فھو میت अनुवाद: मोमिन के दिल में ज़िक्रे खफी हर वक्त मौजूद रहता है, इसलिए उसे अनन्त जीवन प्राप्त होती है और मुस्लिम का दिल खफी ज़िक्र से चूँकि गाफिल होता है इसलिए वह वास्तव में मुर्दा गिनती होता हैl

دل کہ از ہمرار خدا غافل است / دل بناید گفت کو مشت گل است

फिर हज़रत उमर रदिअल्लाहु अन्हु ने सवाल किया कि या रसूलुल्लाह! मोमिन और मुस्लिम में क्या अंतर है? हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जवाब दिया कि मोमिन अल्लाह को पहचानने वाला होता है और आरिफ में यह सिफत होती है कि वह खामोशी और गमगीनी की हालत में रहता है और मुस्लिम ज़ाहिद और खुश्क होता हैl

इसके बाद हुजुर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया: لیس المومن یجتمعون فی المساجد ویقولون لا الہ الا اللہ अर्थात: मोमिन वह नहीं जो मस्जिद में जमा होते और जुबानी तौर पर لا الہ الا اللہ कहते हैंl ऐ उमर (रदिअल्लाहु अन्हु)! ऐसे कलिमा कहने वाले हकीकत के कुचे से बेखबर होते हैं, यह मोमिन नहीं, बल्कि मुनाफिक हैं क्योंकि जुबान से तो कलिमा لاالہ الا اللہ का इकरार करते हैं लेकिन कलिमा के असल अर्थ से ना वाकिफ हैंl उनहें ख़ाक भी पता नहीं है कि कलिमा से असल उद्देश्य क्या चीज है? अर्थात لاالہ الا اللہ तो कह लेते हैं लेकिन उन को क्या खबर कि निस्त (जो मौजूद न हो) से क्या मुराद है और हस्त (जो मौजूद हो) से क्या? ऐसा शक्की तौर पर कलिमा कहना शिर्क है और शिर्क व शक बिलकुल कुफ्र हैl ऐसे कलिमे कहने वाले काफिर कहलाते हैं क्योंकि उनहें यह नहीं मालूम कि कालिमा में किसका इंकार मुराद है और किस पर इमान मुराद हैl

हज़रत उमर रदिअल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ की कि फिर कलिमा तय्यबा का असल उद्देश्य किया है?

हज़रत सय्यदुल मुरसलीन (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया कि इसका मतलब यह है कि अल्लाह के सिवा दुनिया में कोई मौजूद नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम खुदा के मज़हर हैं, तो अल्लाह के तलबगार को चाहिए कि अपने दिल में अल्लाह के गैर का खयाल तक भी ना आने दे और खुदा की ज़ात को ही हर जगह मौजूद समझेl इसलिए अल्लाह का इरशाद है: فاینما تولوا فثم وجہ اللہ ، अनुवाद: अर्थात जिधर देखो अल्लाह पाक का जुहूर हैl

तजल्ली तेरी ज़ात की सू बसू है/ जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है

ऐ उमर (रदिअल्लाहु अन्हु)! जब सालिक अपनी सभी गुणों को न के बराबर समझे और केवल अल्लाह की जात को ही मौजूद समझे उस समय वह सालिक कमाल के मर्तबे को पहुँच जाता हैl इस मर्तबे में सालिक की हालत हदीस: من عرف ربہ فقد کل لسانہ وقطع ارجلہ : का सहीह मिसदाक बन जाती है, अर्थात जिस व्यक्ति को अपने रब की मारफत हासिल हो गई वह गूंगा और लंगड़ा हो गयाl

اسم اللہ ذوق بخشید باوصال  /  بے زباں گوید سخن بس قیل و قال

अर्थ यह है कि कामिल आरिफ पर सुकूत व सुकून की हालत तारी हो जाती है, क्योंकि आह व ज़ारी और इज्तेराबी हरकत उसी समय तक दामनगीर रहते हैं जब तक कि मतलूब का विसाल हासिल नहीं हो जाताl जब तालिब को मतलूब मिल जाए तो लाज़मी अम्र है कि जो आह व फआल और बेचैनी वाले हरकत तलब की हालत में उसे दामनगीर रहते थे, उन सबका सिलसिला खतम हो कर उसकी हालत दूसरी हो जाए और बजाए आह व बुका और कलक व इज़तेराब के उसे निहायत दिल जमइ और सुकूत व सुकून हासिल हो जाएl जभी तो आरिफे कामिल सहीह अर्थ में शहनशाह हो जाता है, उसे अल्लाह की ज़ात के सिवा ना किसी से उम्मीद होती है ना किसी का डरl ऐसे ही लोगों के हक़ में अल्लाह का इरशाद है: لا خوف علیہم ولا ھم یحزنون अर्थात: औलिया अल्लाह को ना किसी का खौफ होता है ना किसी का गम (अनुवादक)

आरिफे कामिल की हालत यादे इलाही से भी गुज़र जाती हैl ऐ उमर! यकीन जानों कि जब तक सालिक अल्लाह के अलावा का वजूद तक भी अपने दिल से ना निकाल दे, तब तक एक कदम भी मंजिले इरफ़ान की राह पर नहीं रख सकता और ना ही पूरा आरिफ बन सकता हैl क्योंकि याद भी एक प्रकार की दोई है और दोई आरेफीन के नजदीक ऐन कुफ्र हैl यह है कलिमा तय्यबा की हकीकतl

अहले फना को नाम से हस्ती के नंग है/ लौहे मज़ार पर मेरी छाती पे संग है

फारिग हो बैठ फ़िक्र से दोनों जहान की/ खतरा जो है सो आइना दिल पे ज़ंग है

जब तक उस हकीकत तक ना पहुंचे उस समय तक तालिब सच्चा मुवह्हिद नहीं बन सकता और अपने मुवह्हिदियत में सरासर झुटा हैl

(अनुवादक)

(जारी)

URL for Urdu articlehttps://www.newageislam.com/urdu-section/letters-khawja-gharib-nawaz-hadrat-part-1/d/114894

URL: https://www.newageislam.com/hindi-section/letters-khawja-gharib-nawaz-hadrat-part-1/d/115008

New Age Islam, Islam Online, Islamic Website, African Muslim News, Arab World News, South Asia News, Indian Muslim News, World Muslim News, Women in Islam, Islamic Feminism, Arab Women, Women In Arab, Islamphobia in America, Muslim Women in West, Islam Women and Feminism

 

Loading..

Loading..