New Age Islam
Wed Apr 29 2026, 04:52 PM

Hindi Section ( 6 Jan 2014, NewAgeIslam.Com)

Comment | Comment

The True Meaning Of Jihad: Refutation Of Extremist Islamist Ideology By Ulema And Sufis जिहाद का सही अर्थ: जिहाद के बारे में उलमा और सूफ़ी संतों के विचार

 

 

 

 

ग़ुलाम ग़ौस, न्यु एज इस्लाम

30 मार्च, 2013

जिहाद छेड़ने का मकसद दुनिया से उत्पीड़न, बुराई को खत्म करना है। अल्लाह के बेगुनाह बंदों की रक्षा करना और इंसानों को अमन व शांति, आज़ादी, समानता और न्याय प्रदान करना है।

विभिन्न इस्लामी उलेमा ने जिहाद को न्याय को बढ़ावा देने और हिंसा को समाप्त करने के रूप में परिभाषित किया है।  विभिन्न समुदायों के इस्लामी विद्वानों ने जिहाद को शांति स्थापित करने और लोगों के मौलिक अधिकारों और विशेषाधिकारों के संरक्षण का साधन बताया है।

इब्ने कमाल की परिभाषा के अनुसार जिहाद के कई प्रकार हैं,जैसे जैसे शारीरिक जिहाद, वित्तीय जिहाद, विशेषज्ञ परामर्श के द्वारा जिहाद, ज़बान से जिहाद, कलम से जिहाद, असल फौज की ताकत को बढ़ाने के द्वारा जिहाद, इस्लामी देश की सीमाओं पर गश्त के द्वारा जिहाद और वैचारिक सीमाओं की रक्षा के लिए जिहाद: इन सभी विभाजनों का उद्देश्य शांति बनाए रखना और बुराई को समाप्त करना है।

जिहाद का मूल सार उसके बिल्कुल खिलाफ है जो आज वहाबी उग्रवादी और धार्मिक कट्टरपंथियों के द्वारा प्रचारित किया जा रहा है। वहाबी उलमा शेख यूसुफ अलअबीरी का फतवा 'नवाए अफगान जिहाद' में प्रकाशित हुआ था जिसका खंडन मोहम्मद यूनुस, सुल्तान शाहीन और सुहेल अरशद जैसे विशेषज्ञ इस्लामी विद्वानों ने किया था और जिसे न्यु एज इस्लाम पर प्रकाशित किया गया था। अब मैं विभिन्न देशों में जिहाद के नाम पर युद्ध में सक्रियता के साथ भाग लेने वाले संगठनों के सम्बंध में विभिन्न प्रमुख और मशहूर उलमा के खंडन वाले बयान पेश करूँगा।

प्रसिद्ध सूफी इस्लामी विद्वान मौलाना यासीन अख्तर मिस्बाही का ये बयान है: ''जिस तरह कोई भी व्यक्ति विभिन्न देशों में सक्रिय मुस्लिम संगठनों का आँख बंद करके उनके हर काम का अनुमोदन नहीं कर सकता है, उसी तरह मुस्लिम संगठनों के सभी कामों को आमतौर पर अवैध करार देना नैतिक रूप से सही नहीं है।''

उन्होंने ये भी कहा कि ''बेरहमी से और अंधाधुंध हत्याओं को आँख बंद करके क़िताल नहीं कहा जा सकता है जिसका ज़िक्र कुरान में है, जिसमें वास्विक लड़ाई शामिल है। दुनिया के विभिन्न देशों में मुस्लिम संगठनों के द्वारा दुश्मनों के खिलाफ उठाए गए कदमों या उनके द्वारा किये जाने वाले हमलों को आत्मरक्षा या बदला लेने के लिए उठाये गये क़दम करार दिया जा सकता है। लेकिन उन्हें जिहाद नहीं कहा जा सकता।''

मौलाना वहीदुद्दीन खान का कहना है,''जिहाद के नाम पर गैर सरकारी मुस्लिम संगठनों के कदमों के गैर इस्लामी होने में कोई शक नहीं है, जो कि क़िताल के समान हैं। ये जिहाद के नाम पर दंगे के अलावा और कुछ भी नहीं है। जिहाद का ऐलान करना सिर्फ सरकार या राज्य का काम है जिसका ज़िक्र कुरान में जिहाद के रूप आया है। गैर सरकारी संगठन शांतिपूर्ण तरीके को अपनाकर जिहाद कर सकते हैं। सशस्त्र जिहाद छेड़ना उनकी ज़िम्मेदारी नहीं है।''

मौलाना शफ़ी मोनिस ने कहा है कि,''हम उन संगठनों से सहमति रखते हैं जो खुदा के संदेश का प्रचार प्रसार शांतिपूर्ण तरीके से बुराई और अन्याय को मिटाने के लिए अल्लाह के रास्ते में संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन जहां तक उन संगठनों का सम्बंध है जिन्होंने जिहाद छेड़ने के लिए हथियार उठा लिए हैं, तो लोगों को उनके तरीके और उद्देश्यों से अवगत रहना चाहिए ताकि वो इस बात का फैसला कर सकें कि वो जिहाद के सम्बंध में कुरान और हदीस में उल्लिखित शर्तें पूरी करते हैं या नहीं।''

मौलाना अब्दुल वहाब खिलजी ने कहा है कि, दुनिया के किसी भी कोने में उत्पीड़न और दमन व हिंसा के खिलाफ उठाई जाने वाली आवाज़ हर एक मोमिन की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है। हर न्याय प्रिय व्यक्ति को खुदा के कानून को स्थापित करने और इस्लाम के प्रचार प्रसार की राह में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए होने वाले संघर्षों को स्वीकार करना चाहिए।''

मशहूर सूफी इस्लामी विद्वान डॉ. मोहम्मद ताहिरुल क़ादरी अपनी किताब ''Fatwa on terrorism and suicide bombings'' में लिखते हैं: ''इस्लाम मानव जीवन की गरिमा और उसकी पवित्रता पर ज़ोर देता है, इसका फैसला इस वास्विकता से किया जा सकता है कि इस्लाम मुस्लिम सैनिकों को लड़ाई में शामिल दुश्मनों के फौजियों का भी नरसंहार करने की इजाज़त नहीं देता है। बच्चों, महिलाओं, बुज़ुर्गों, मरीज़ों, धार्मिक नेताओं और व्यापारियों की हत्या करना इस्लाम में सख्ती के साथ वर्जित है। युद्ध की स्थिति में जो हथियार डाल दें, घरों में छिप जाएं या किसी की शरण में आ जाए उन्हें भी नहीं मारा जा सकता है। आम लोगों का नरसंहार नहीं किया जा सकता। और इसी तरह पूजा स्थलों, इमारतों, खेती और यहाँ तक कि पेड़ को नष्ट नहीं किया जा सकता।

''एक तरफ विवेक, चेतना और दूरदृष्टि पर आधारित इस्लामी कानून हैं तो दूसरी तरफ हर जगह लोगों, बच्चों और महिलाओं का उनके धर्म और पहचान का विभेद किए बिना अंधाधुंध हत्या करने के लिए इस्लाम के नाम का इस्तेमाल किया जा रहा है। अफसोस की बात ये है कि अभी भी कुछ लोग अपनी हिंसक गतिविधियों को जिहाद करार देते हैं। विरोधाभास की इससे बड़ी बात और कोई हो ही नहीं सकती जिसे आज हम इस धरती पर देख रहे हैं। उनके आक्रामक उपायों, अत्याचार और अन्याय से भरी गतिविधियों में और हस्तक्षेप के बदले में गैर मुस्लिम नागरिकों और विदेशी प्रतिनिधियों को अवैध हिरासत में रखना और उनकी हत्या करना किसी भी तरह उचित नहीं हो सकती। जो व्यक्ति ऐसा करता है उसका इस्लाम और पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से कोई सम्बंध नहीं है।''

डॉ. मोहम्मद ताहिरुल क़ादरी ने ये भी कहा है: कुरान और हदीस के गहरे अध्ययन के बाद कोई भी इस बात का फैसला आसानी के साथ कर सकता है कि इस्लाम वैध स्रोतों के द्वारा महान और वैध उद्देश्यों को हासिल करने के लिए ज़रूरी करार देता है। बुरे रास्ते पर चल कर किसी भी महान उद्देश्य में कामयाबी हासिल नहीं की जा सकती है। संक्षेप में ये कि बुरे स्रोतों का उपयोग करके अच्छे परिणाम की उम्मीद नहीं की जा सकती। इंसाफ इंसाफ है और ज़ुल्म ज़ुल्म है। ये तो शैतान की बात है कि इंसाफ ज़ुल्म है ज़ुल्म इंसाफ है। ये दीन की शान और उसका सम्मान ही है जिसने मंज़िल और रास्ते दोनों को सुधारा है।

''जो लोग अपने क्रूर तरीकों और गलत स्रोतों का औचित्य पेश करने के लिए इस हदीस को अपने तर्क का आधार बनाते हैं कि अमल का दारोमदार नीयत पर है, वो इस हदीस का गलत अर्थ निकालते हैं। इससे केवल उन कामों की तरफ इशारा मिलता है जिनका नेक, वैध और कानूनी होना साबित हो चुका है। उनकी स्वीकृति नीयत पर आधारित है। अगर नीयत नेक है तो वो काबिले क़ुबूल हैं वरना वो खारिज की जायेंगी। अगर नीयत अच्छी नहीं है  तो अमल को इबादत नहीं समझा जाएगा और उनके नज़र आने वाले नैतिक मूल्यों के बावजूद उन्हें अस्वीकार कर दिया जाएगा और उन्हें अवैध माना जाएगा। लेकिन जो काम प्रतिबंधित, अनुचित, अवैध और अपमानजनक हैं उन्हें बेहद नेक इरादे के बावजूद कभी भी जायज़, कानूनी, न्यायपूर्ण और विश्वसनीय नहीं बनाया जा सकता। ये एक ऐसा इस्लामी सिद्धांत और कानूनी फार्मूला है जिससे न तो सहाबा, सलफ सालेहीन (पूर्ववर्ती पवित्र लोग), इमामों और मोहद्दिसीन और न ही किसी मुफ़स्सिर ने इंकार किया है। कुछ विद्वानों ने इस हदीस की इस तरह व्याख्या की है कि अमल नीयतों को अभिव्यक्त करते हैं। कोई भी कार्रवाई इरादों के अनुसार रूप लेती है। इसलिए एक आतंकवादी की कार्रवाई उसके इरादे को अभिव्यक्त करती है। उसकी जानलेवा और विध्वसंक गतिविधियां उसकी बुरी नीयत और निंदनीय विचारों और विश्वासों की तरफ इशारा करती हैं।  अगर किसी आतंकवादी की वजह से खून खराबा होता है तो उससे उसके अंदर छिपे ज़ालिम व क्रूर हैवान का ही संकेत मिलता है, रहमत और हमदर्दी से भरी किसी आत्मा का नहीं। ''

विद्वानों के उपरोक्त कथनों से अब ये स्पष्ट हो गया है कि हिंसक और तथाकथित जिहादी कुरान में वर्णित जिहाद के वास्तविक अर्थ के बिल्कुल खिलाफ है।

कुरान की इस आयत में हिंसक आतंकवादियों और नफरत के सौदागरों का स्पष्ट रूप से उल्लेख है।

''वो लोग हैं जिनकी सारी जद्दोजहद (संघर्ष) दुनिया की ज़िंदगी में ही बर्बाद हो गई और वो ये खयाल करते हैं कि हम बड़े अच्छे काम कर रहे हैं।'' (कुरान 18: 104)

अल्लाह का फरमान है: ''अल्लाह तुम्हें इस बात से मना नहीं फरमता कि जिन लोगों ने तुमसे दीन (के बारे) में जंग नहीं की और न तुम्हें तुम्हारे घरों से (यानी देश से) निकाला है कि तुम उनसे भलाई का सुलूक करो और उनसे इंसाफ का बर्ताव करो, बेशक अल्लाह इंसाफ करने वालों को पसंद फरमाता है।'' (8: 60)

URL for English article: https://newageislam.com/radical-islamism-jihad/the-true-meaning-jihad-refutation/d/10955

URL for this article: https://newageislam.com/urdu-section/the-true-meaning-jihad-refutation/d/34634

URL for this article: https://newageislam.com/hindi-section/the-true-meaning-jihad-refutation/d/35149


Loading..

Loading..