
डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी, न्यू ऐज इस्लाम
(भाग – 6)
11 मार्च 2026
आमतौर पर यह आरोप लगाया जाता है कि इस्लाम ने महिलाओं के अधिकारों और उनकी आज़ादी का अधूरा या कमज़ोर विचार पेश किया है। कुछ आलोचक कहते हैं कि इस्लाम ने महिलाओं को वैसी आज़ादी नहीं दी जैसी आज़ादी का विचार पश्चिमी समाज पेश करता है। इसी सोच के कारण कुछ लोगों ने किताबें भी लिखीं और यह दावा किया कि इस्लाम महिलाओं की स्वतंत्रता का समर्थक नहीं है। लेकिन सच यह है कि ऐसी कई किताबें एक ख़ास उद्देश्य के साथ लिखी गई हैं। इनमें इस्लाम के प्रति विरोध और धार्मिक नफ़रत दिखाई देती है।
वास्तव में इस्लाम न केवल महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करता है बल्कि एक संतुलित व्यवस्था भी पेश करता है जिसमें उनकी गरिमा, सम्मान और स्वतंत्रता शामिल है। दुर्भाग्य की बात है कि आज जो समाज महिलाओं की स्वतंत्रता की सबसे अधिक बात करते हैं, उन्होंने ही महिलाओं को बाज़ार की चीज़ बना दिया है और शालीनता तथा सम्मान के मूल्यों को नुक़सान पहुँचाया है। वे इस खुलापन और अश्लीलता को ही स्वतंत्रता के रूप में पेश करते हैं। यह सही है कि इस्लाम महिलाओं के लिए ग़ैर ज़रूरी और बे-लगाम आज़ादी का समर्थन नहीं करता। लेकिन इस्लाम महिलाओं को उनके सभी महत्वपूर्ण और बुनियादी अधिकार देता है। इनमें व्यक्तिगत अधिकार, पारिवारिक अधिकार, वैवाहिक अधिकार, तलाक़ के बाद के अधिकार, आर्थिक अधिकार, क़ानूनी अधिकार और राजनीतिक अधिकार भी शामिल हैं।
यह भी एक सच्चाई है कि महिलाओं को जो सम्मान, गरिमा और उच्च स्थान इस्लाम ने दिया है, वह इतिहास में बहुत कम सभ्यताओं और धर्मों में देखने को मिलता है। यह केवल एक दावा नहीं है बल्कि इसके ऐतिहासिक प्रमाण भी मौजूद हैं। कई विचारकों, लेखकों और विद्वानों ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि इस्लाम ने महिलाओं को सम्मानजनक स्थान दिया।
इस बात को सही ढंग से समझने के लिए यह ज़रूरी है कि हम इस्लाम से पहले के समय में महिलाओं की स्थिति को देखें, विशेष रूप से अरब समाज में, जिसे इस्लाम से पहले का दौर जाहिलियत का युग कहा जाता है। उस समय महिलाओं की सामाजिक स्थिति बहुत ख़राब थी। उनके साथ कठोर और असभ्य व्यवहार किया जाता था और उनकी गरिमा तथा व्यक्तिगत पहचान का सम्मान नहीं किया जाता था। कई लेखकों ने इस सच्चाई को स्वीकार किया है और ऐतिहासिक प्रमाण भी उस समाज में महिलाओं की ख़सता ह़ालत की पुष्टि करते हैं।
उदाहरण के लिए मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी की किताब “पर्दा”, एडवर्ड हार्टपोल लेकी की “तारीख़-ए-अख़लाक़-ए-यूरोप”, डॉ. खालिद अलवी की “इस्लाम का मुआशरती निज़ाम”, सैयद अमीर अली की “स्पिरिट ऑफ़ इस्लाम”, और डॉ. मुहम्मद ताहिर-उल-क़ादरी की “इस्लाम में इंसानी हुकूक़” में महिलाओं के अधिकारों और विभिन्न समाजों में उनकी स्थिति पर चर्चा की गई है। इसलिए इस्लाम द्वारा महिलाओं को दिए गए सम्मानजनक स्थान को समझाने से पहले यह देखना मुनासिब है कि पुराने समाजों और संस्कृतियों में महिलाओं की स्थिति कैसी थी। इससे यह समझना आसान हो जाता है कि इस्लाम ने महिलाओं की स्थिति को कितना बेहतर बनाया।
जाहिलियत के दौर में महिलाओं की स्थिति
जो लोग इस्लाम की आलोचना करते हैं, वे अक्सर यह भूल जाते हैं कि इस्लाम से पहले महिलाओं की हालत कितनी ख़राब थी। उनकी इज़्ज़त और सम्मान सुरक्षित नहीं थे और उनकी शालीनता तथा व्यक्तिगत अधिकारों की कोई ख़ास चिंता नहीं की जाती थी।
डॉ. मुहम्मद ताहिर-उल-क़ादरी अपनी किताब “इस्लाम में इंसानी हुकूक़” में मशहूर विद्वान इब्न हजर अस्क़लानी की किताब “फ़तह अल-बारी शरह सहीह अल-बुख़ारी” के हवाले से लिखते हैं कि उस समय अरब समाज में विवाह के नौ अलग-अलग तरीके राइज थे। जब हम इन तरीकों को देखते हैं तो साफ़ समझ में आता है कि इस्लाम से पहले महिलाओं की स्थिति कितनी असुरक्षित और कमज़ोर थी।
इनमें से कुछ तरीक़े इस प्रकार है:
ज़वाज अल-बुअुला:
इस प्रकार के विवाह में एक पुरुष एक या कई महिलाओं को अपनी पत्नी के रूप में रख सकता था। इस व्यवस्था में महिलाओं की स्थिति लगभग संपत्ति जैसी थी।
ज़वाज अल-बदल:
यह अदला-बदली वाला विवाह था। इसमें दो पुरुष अपनी-अपनी पत्नियों को आपस में बदल लेते थे। महिलाओं को अक्सर इसकी जानकारी भी नहीं होती थी और उनकी सहमति या मेहर की कोई ज़रूरत नहीं होती थी।
निकाह मुतअ:
यह एक अस्थायी विवाह था जिसमें कोई औपचारिक निकाह, गवाह या समारोह नहीं होता था। पुरुष और महिला एक तय समय तक साथ रहने पर सहमत हो जाते थे। समय पूरा होने पर संबंध अपने-आप समाप्त हो जाता था। ऐसे संबंध से पैदा होने वाले बच्चे को केवल माँ से जोड़ा जाता था।
निकाह अल-खिद्न:
इसमें एक पुरुष किसी महिला को बिना निकाह और मेहर के अपने घर में रख लेता था और उससे वैवाहिक संबंध बना लेता था। बाद में आपसी सहमति से यह संबंध समाप्त हो जाता था।
निकाह अल-ज़ग़ीना:
युद्ध के बाद विजेता क़बीला पराजित लोगों की महिलाओं को क़ैद कर लेता था। उन्हें संपत्ति की तरह माना जाता था और उन्हें बेचा या तुह़फ़ा में दिया जा सकता था।
निकाहे शिग़ार:
इसमें एक व्यक्ति अपनी बेटी या बहन का विवाह इस शर्त पर करता था कि दूसरा व्यक्ति भी अपनी बेटी या बहन का विवाह उससे करेगा। इसमें मेहर देना ज़रूरी नहीं था। इस्लाम ने बाद में इस प्रथा को मना कर दिया।
निकाह अल-इस्तिबज़ा:
इस प्रथा में एक पुरुष अपनी पत्नी को किसी दूसरे मज़बूत या प्रतिष्ठित पुरुष के पास भेजता था ताकि उससे एक अच्छा बच्चा पैदा हो सके।
निकाह अल-रह्त:
इसमें कई पुरुष (कभी-कभी दस तक) एक ही महिला से संबंध रखते थे। यदि बच्चा पैदा होता तो महिला उनमें से किसी एक को पिता घोषित कर देती और वह इंकार नहीं कर सकता था।
निकाह अल-बग़ाया:
इसमें दस से अधिक पुरुष भी शामिल हो सकते थे और बच्चे को किसी पुरुष के नाम से जोड़ा जाता था।
(इब्न हजर अस्क़लानी, फ़तह अल-बारी शरह सहीह अल-बुख़ारी, किताब अल-निकाह, भाग 9,पेज 182–185; तथा इस्लाम में इंसानी हुकूक़, पेज 356–357।)
इन ऐतिहासिक उदाहरणों से यह समझना मुश्किल नहीं है कि इस्लाम से पहले अरब समाज में महिलाओं की स्थिति कितनी असुरक्षित और अपमानजनक थी। उनकी इज़्ज़त, शालीनता और पवित्रता को खुले तौर पर दाग़दार किया जाता था।
लेकिन जब हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को पैग़म्बरी मिली तो इस्लाम ने इस स्थिति को पूरी तरह बदल दिया। इस्लाम ने महिलाओं की मानव गरिमा को स्वीकार किया और उन्हें सम्मान, अधिकार और सुरक्षा प्रदान की। ऊपर बताए गए अन्यायपूर्ण और अपमानजनक तरीक़ों को समाप्त कर दिया गया और एक साफ़, सम्मानजनक और न्यायपूर्ण निकाह का निज़ाम स्थापित किया गया, जिसमें पुरुष और महिला दोनों के अधिकार और ज़िम्मेदारियाँ तय की गईं।
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Part-1: Human Rights in Islam-Part-1 इस्लाम में इंसानी हूक़ूक़
Part-2: Dignity and Respect in Islam-Part-2 इस्लाम में गरिमा और सम्मान
Part-3: Dignity and Respect in Islam-Part-3 इस्लाम में सम्मान और गरिमा का अधिकार
Part-4: Right to Privacy in Islam-Part-4 इस्लाम में राज़दारी का अधिकार
Part-5: The Rights of Neighbours in Islam-Part-5 इस्लाम में पड़ोसियों के अधिकार
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