
डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी, न्यू ऐज इस्लाम
(भाग पाँच)
10 मार्च 2026
पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना और आपस में सम्मान के साथ पेश आना बहुत ज़रूरी है। जब पड़ोसियों के बीच मज़बूत और दोस्ताना रिश्ते होते हैं, तो समाज में एकता और आपसी सहयोग की भावना पैदा होती है। यह एक शांतिपूर्ण और व्यवस्थित समाज बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है। जब हम इस संदर्भ में इस्लाम की शिक्षाओं का अध्ययन करते हैं, तो हमें पता चलता है कि इस्लाम पड़ोसियों के अधिकारों का ध्यान रखने और उनके साथ भलाई और अच्छे व्यवहार की बहुत ज़ोर देकर हिदायत देता है।
यह बात भी स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि इस्लाम पड़ोसी के अधिकारों को केवल एक ही धर्म के लोगों तक सीमित नहीं करता। पड़ोसी चाहे मुसलमान हो या किसी दूसरे धर्म, संस्कृति या सभ्यता से जुड़ा हुआ हो, हर हाल में उसके अधिकारों का सम्मान करना चाहिए।
जब लोग अपने पड़ोसियों का ख्याल रखते हैं, तो समाज में स्वाभाविक रूप से मेल-मिलाप और सहनशीलता बढ़ती है। अगर किसी मुसलमान का पड़ोसी गैर-मुस्लिम है, तो उसे और भी अधिक सावधानी रखनी चाहिए कि उसके पड़ोसी का कोई अधिकार प्रभावित न हो। क़ुरआन करीम में स्पष्ट रूप से कहा गया है:
“अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी को शरीक न ठहराओ। माता-पिता के साथ भलाई करो, रिश्तेदारों, अनाथों और ग़रीबों के साथ अच्छा व्यवहार करो, पास के पड़ोसी और दूर के पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार करो, अपने पास बैठने वाले साथी, मुसाफ़िर और अपने अधिकार में रहने वालों के साथ भी अच्छा व्यवहार करो। बेशक अल्लाह घमंड करने वालों और शेख़ी बघारने वालों को पसंद नहीं करता।”
इस आयत से पता चलता है कि इसमें एक ईश्वर पर विश्वास, माता-पिता के साथ भलाई, रिश्तेदारों के साथ अच्छा व्यवहार, अनाथों और गरीबों की देखभाल और पड़ोसियों के साथ अच्छे आचरण की शिक्षा दी गई है। इस आयत में पड़ोसियों की तीन किस्मों का भी उल्लेख किया गया है: जार ज़िल-क़ुर्बा, जार अल-जुनुब और साहिब बिल-जंब।
इन तीनों प्रकारों की संक्षेप में व्याख्या करना उचित होगा।
जार ज़िल-क़ुर्बा से मुराद वह पड़ोसी है जो रिश्तेदार भी हो।
जार अल-जुनुब से मुराद वह पड़ोसी है जो रिश्तेदार नहीं है। इसलिए उसका दर्जा पहले वाले के बाद बताया गया है। कुछ विद्वानों ने यह भी कहा है कि जार ज़िल-क़ुर्बा से मतलब मुसलमान पड़ोसी है और जार अल-जुनुब से मतलब गैर-मुस्लिम पड़ोसी है।
मुफ्ती मुहम्मद शफी उस्मानी लिखते हैं कि विद्वानों की इस बात पर सहमति है कि पड़ोसी चाहे पास का हो या दूर का, रिश्तेदार हो या गैर-रिश्तेदार, मुसलमान हो या गैर-मुसलमान—हर हाल में उसकी मदद करना और उसका ख़्याल रखना अपनी क्षमता के अनुसार ज़रूरी है।
साहिब बिल-जंब का अर्थ साथ बैठने वाला साथी भी हो सकता है। इसमें वह व्यक्ति भी शामिल है जो सफ़र के दौरान ट्रेन, जहाज़, बस या गाड़ी में आपके पास बैठा हो। इसी तरह कोई व्यक्ति जो किसी बैठक या सभा में आपके पास बैठा हो, वह भी इसमें शामिल है।
इस्लामी शिक्षाएँ केवल मुस्तक़िल पड़ोसियों के अधिकारों पर ही ज़ोर नहीं देतीं, बल्कि उन लोगों के अधिकारों को भी अहमयत देती हैं जो सफ़र या किसी सभा में थोड़े समय के लिए हमारे पास बैठते हैं। उनके साथ भी अच्छा व्यवहार करना चाहिए। कम से कम यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारी बातों या कामों से उन्हें कोई तकलीफ़ न पहुँचे। हमें ऐसी बात नहीं करनी चाहिए जिससे उनका दिल दुखे और ऐसा कोई काम भी नहीं करना चाहिए जिससे उन्हें परेशानी हो।
उदाहरण के लिए, किसी के सामने सिगरेट का धुआँ नहीं छोड़ना चाहिए, पान खाकर उसकी तरफ़ थूकना नहीं चाहिए और इस तरह नहीं बैठना चाहिए जिससे दूसरे व्यक्ति की जगह कम हो जाए।
मौलाना अबुल अ‘ला मौदूदी ने इस विषय की बहुत विस्तार से व्याख्या की है। उनके अनुसार “पास बैठने वाला साथी” में केवल दोस्त ही शामिल नहीं हैं, बल्कि वह हर व्यक्ति भी शामिल है जो किसी समय हमारे साथ हो जाता है। जैसे बाज़ार में हमारे साथ चलने वाला व्यक्ति, दुकान में हमारे पास बैठा हुआ ग्राहक, या सफ़र में मिलने वाला साथी। ऐसी आरज़ी साथ-संगत भी एक सभ्य और अच्छे इंसान पर यह ज़िम्मेदारी डालती है कि वह उसके साथ भलाई का व्यवहार करे और उसे तकलीफ़ देने से बचे।
इससे स्पष्ट होता है कि इस्लाम हर तरह के पड़ोसियों के अधिकारों पर ज़ोर देता है। आम तौर पर हमारे समाज में यह समझा जाता है कि पड़ोसी केवल वही है जो हमारे घर के पास रहता है। लेकिन हम उन लोगों के अधिकारों को भूल जाते हैं जो सफ़र, सभा या अन्य परिस्थितियों में कुछ समय के लिए हमारे पड़ोसी बन जाते हैं। इसी उपेक्षा के कारण आज समाज में कई समस्याएँ और विवाद पैदा हो रहे हैं।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इस्लाम यह नहीं कहता कि केवल अपने धर्म के पड़ोसियों के साथ ही अच्छा व्यवहार किया जाए। बल्कि इस्लाम हर पड़ोसी के अधिकारों की रक्षा पर ज़ोर देता है, चाहे वह मुसलमान हो या गैर-मुस्लिम।
पड़ोसियों के अधिकारों के बारे में पैग़म्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की कई सही हदीसें भी मिलती हैं जो क़ुरआन के इस आदेश को और मज़बूत करती हैं। एक हदीस में आता है:
“फ़रिश्ता जिब्रील मुझे लगातार पड़ोसी के बारे में नसीहत करते रहे, यहाँ तक कि मुझे लगा कि शायद वह उसे वारिस बना देंगे।”
(सहीह मुस्लिम)
एक दूसरी हदीस में पैग़म्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया:
“वह व्यक्ति जन्नत में प्रवेश नहीं करेगा, जिसका पड़ोसी उसकी तकलीफ़ से सुरक्षित नहीं है।”
(सहीह मुस्लिम)
इन हदीसों से दो महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं। पहली बात यह कि पड़ोसियों का ख़्याल रखना इतना महत्वपूर्ण है कि फ़रिश्ता जिब्रील ने भी बार-बार इसकी ताकीद की। इससे पड़ोसी के अधिकारों की अहमियत स्पष्ट होती है।
दूसरी बात यह है कि जो व्यक्ति अपने पड़ोसी को तकलीफ़ पहुँचाता है, वह जन्नत में प्रवेश नहीं करेगा। इसलिए पड़ोसियों के अधिकारों का सम्मान करना केवल एक अच्छे समाज की स्थापना के लिए ही ज़रूरी नहीं है, बल्कि यह एक धार्मिक कर्तव्य भी है जिसका असर आख़िरत में भी होगा।
दुर्भाग्य से आज के समय में नफ़रत के माहौल ने समाज में कई समस्याएँ पैदा कर दी हैं। समाज में मेल-मिलाप और सहनशीलता कम हो रही है और पड़ोसियों के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।
समाज के लोगों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि उनका व्यवहार उनके धार्मिक सिद्धांतों के अनुसार है या नहीं। केवल बातें करना काफ़ी नहीं है, बल्कि ज़रूरी है कि हम अपने व्यवहार से पड़ोसियों के अधिकारों की रक्षा करें और समाज में सकारात्मक भूमिका निभाएँ। जब हम अपने जीवन को इन सिद्धांतों के अनुसार ढालेंगे, तो इसके अच्छे परिणाम सामने आएँगे।
इस आयत में यह शिक्षा भी दी गई है कि जैसे ही व्यक्ति अपने पड़ोसियों के अधिकारों का सम्मान करें, वैसे ही पड़ोसी देशों को भी एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए। किसी भी देश को अपनी ताकत के घमंड में दूसरे देश की शांति और सुरक्षा के लिए ख़तरा नहीं बनना चाहिए। लेकिन आज हम देखते हैं कि कई बार पड़ोसी देश एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान नहीं करते, जिसके कारण निर्दोष लोगों को कष्ट उठाना पड़ता है और उनके अधिकार छिन जाते हैं।
जब समाज में स्वार्थ और घमंड हावी हो जाते हैं, तो उससे अस्थिरता और नुक़सान होता है। इसलिए समाज में शांति और सुरक्षा के लिए प्रयास करना ज़रूरी है। यह तभी संभव है जब हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार अपने पड़ोसी के साथ भलाई और न्याय का व्यवहार करे।
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Part-1: Human Rights in Islam-Part-1इस्लाम में इंसानी हूक़ूक़
Part-2: Dignity and Respect in Islam-Part-2 इस्लाम में गरिमा और सम्मान
Part-3: Dignity and Respect in Islam-Part-3 इस्लाम में सम्मान और गरिमा का अधिकार
Part-4: Right to Privacy in Islam-Part-4 इस्लाम में राज़दारी का अधिकार
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