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Social Pollution, Our Attitude and Islam सामाजिक प्रदूषण, हमारा रवैया और इस्लाम

डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी, न्यू ऐज इस्लाम

5 मई 2026

सामाजिक प्रदूषण आज के दौर की एक बड़ी समस्या है। आज बहुत तेज़ी से ऐसे कारण पैदा हो रहे हैं जो समाज को ख़राब कर रहे हैं। इसके कारण समाज की सुंदरता, पवित्रता और आध्यात्मिकता ख़त्म होती जा रही है। सवाल यह है कि आख़िर समाज में यह प्रदूषण किन कारणों से फैल रहा है?

सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि इंसान सामाजिक प्राणी है। वह अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक-दूसरे पर निर्भर करता है। समाज में रहते हुए हर व्यक्ति को दूसरे की ज़रूरत होती है। इस्लाम इस आपसी सहयोग (تعاون للبقاء) को इंसानी जीवन के लिए बहुत ज़रूरी व्यवस्था के रूप में पेश करता है। यह एक मुकम्मल सिद्धांत है। इसके बिना किसी भी क्षेत्र में तरक्की संभव नहीं है।

लेकिन आज की हक़ीक़त इससे अलग है। सहयोग के सिद्धांत को नजरअंदाज़ कर दिया गया है और उसकी जगह टकराव (تنازع للبقاء) के सिद्धांत को अपनाया जा रहा है। इस व्यवस्था में ताक़तवर लोग कमज़ोरों पर ज़ुल्म करते हैं और उन्हें हर तरह़ से परेशान करते हैं। इसके कारण कमज़ोर और मज़लूम लोग अपनी इज़्ज़त, आज़ादी और बुनियादी हक़ की रक्षा के लिए संघर्ष करते हैं।

जब लोग सहयोग के बजाय टकराव को अपनाते हैं तो समाज प्रदूषित हो जाता है। सहयोग का विचार हर धर्म में पाया जाता है और हर धर्म ज़ुल्म और टकराव को ग़लत मानता है। इसके बावजूद आज जिस तेज़ी से समाज  का माहौल ख़राब हो रहा है, वह बहुत चिंताजनक है। यह साफ़ दिखाता है कि समाज धार्मिक परंपराओं और नैतिक मूल्यों से दूर होता जा रहा है।

इस्लाम भलाई और परहेज़गारी में सहयोग की शिक्षा देता है। क़ुरआन में कहा गया है:

नेकी और परहेज़गारी में एक-दूसरे की मदद करो, और गुनाह और ज़ुल्म में मदद न करो, और अल्लाह से डरते रहो। बेशक अल्लाह सख़्त सज़ा देने वाला है।

यह शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है। अगर लोग इस पर अमल करें तो ज़ुल्म, अन्याय, शोषण और अपमान ख़त्म हो सकते हैं। समाज साफ़ और पवित्र बन सकता है। सहयोग से एकता, भलाई और सुधार आता है, जबकि टकराव से ज़ुल्म और अन्याय पैदा होता है। इसलिए समाज को बचाने के लिए सहयोग को अपनाना और टकराव को ख़त्म करना ज़रूरी है।

समाज को प्रदूषण से बचाने के लिए हमें अल्लाह के बनाए हुए कानूनों और शिक्षाओं को अपनाना होगा। आम तौर पर क़ानून दो तरह के होते हैं: इंसानों के बनाए हुए और अल्लाह के बनाए हुए। इंसानों के बनाए क़ानून पूरी तरह़ सही नहीं होते, क्योंकि वे इच्छाओं और भावनाओं से प्रभावित होते हैं। जबकि अल्लाह के क़ानून इंसान की ज़रूरतों का ध्यान रखते हैं लेकिन ग़लत इच्छाओं को बढ़ावा नहीं देते।

अगर समाज अल्लाह के कानूनों पर चले तो वह संतुलित रहेगा। लेकिन अगर इंसानी क़ानूनों को ज़्यादा अहमियत दी जाए तो समाज का संतुलन बिगड़ जाता है। आज समाज में जो बुराइयाँ दिखाई दे रही हैं, उनकी एक बड़ी वजह यही है कि हमने अल्लाह की हिदायतों को छोड़ दिया है। इसी कारण सूद, जुआ, शराब और दूसरी बुराइयाँ समाज में फैल गई हैं, जो समाज को ख़राब कर रही हैं।

अल्लाह के क़ानूनों पर चलने से इंसान की इज़्ज़त बढ़ती है, समाज में अमन आता है और बुराइयाँ ख़त्म होती हैं। आज हमारा ज़िन्दगी गुज़ारने का तरीक़ा धार्मिक शिक्षाओं से टकराता हुआ दिखता है, क्योंकि लोग ऐसे रास्तों पर चल रहे हैं जो उन्हें ग़लत दिशा में ले जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि इंसान इस धरती पर अल्लाह का नाइब है और उसे उसी के बताए रास्ते पर चलना चाहिए।

अगर इंसान अल्लाह की मरज़ी के ख़िलाफ़ चलेगा और अपने बनाए नियमों को लागू करेगा, तो समाज कभी भी अम्न का गिहवार नहीं हो सकता। इसलिए सामाजिक प्रदूषण को ख़त्म करने के लिए हमें अल्लाह के दिए हुए मूल्यों को अपनाना होगा और ग़लत तरीक़ों को छोड़ना होगा।

सामाजिक प्रदूषण की एक बड़ी वजह झूठ और धोखा भी है। जब इंसान अल्लाह की राह से दूर हो जाता है, तो उसमें कई बुरी आदतें पैदा हो जाती हैं। झूठ और धोखा उन्हीं में से हैं। पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने झूठ को मुनाफिक़ की निशानी बताया है।

आज अफ़सोस की बात है कि झूठ आम हो गया है। बड़े-बड़े लोग भी आसानी से झूठ बोलते हैं और दूसरों को धोखा देते हैं। जिस समाज की बुनियाद भरोसे पर हो, उसमें सच्चाई और ईमानदारी बहुत ज़रूरी होती है। जब ये कमज़ोर हो जाते हैं, तो समाज का माह़ौल ख़राब होने लगता है।

झूठ सच को छिपा देता है और धोखा भरोसे को तोड़ देता है। इससे रिश्ते कमज़ोर होते हैं और समाज की नींव हिल जाती है। जब सच्चाई की कद्र नहीं होती, तो इंसाफ भी नहीं हो सकता। अदालतों में झूठी गवाही, व्यापार में बेईमानी और रोज़मर्रा के जीवन में धोखाधड़ी से सही और गलत में फर्क करना मुश्किल हो जाता है।

धोखा सिर्फ पैसों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षा, राजनीति, व्यापार और परिवार हर जगह फैल चुका है। जब लोग अपने फ़ायदे के लिए दूसरों को धोखा देते हैं, तो समाज में भरोसा ख़त्म हो जाता है और नफ़रत, जलन और दुश्मनी बढ़ती है। इससे समाज की तरक्की भी रुक जाती है।

इसीलिए इस्लाम सच्चाई को ईमान की बुनियाद और झूठ को बर्बादी का कारण मानता है। ईमानदारी और सच्चाई एक अच्छे समाज के लिए बहुत ज़रूरी हैं। अगर झूठ और धोखा नहीं रोका गया, तो समाज पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा।

हर इंसान एक शांत समाज चाहता है, और यह इच्छा स्वाभाविक है। लेकिन जब लोग अपनी ग़लत इच्छाओं को पूरा करने लगते हैं, तो समाज में प्रदूषण फैलता हैजैसे टकराव, अल्लाह के कानूनों से दूरी, और झूठ व धोखा। यही वे मुख्य कारण हैं जो आज समाज को प्रदूषित कर रहे हैं۔

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डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी इस्लामिक इसकोलर, मुसन्निफ़ और न्यु ऐज इस्लाम के मुसतक़िल कालम निगार हैं।

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