
डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी, न्यू ऐज इस्लाम
7 मई 2026
इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए कि भारत एक सेक्युलर देश है। भारत का संविधान लोकतांत्रिक और सेक्युलर मूल्यों का मज़बूत समर्थक है। सेक्युलर राज्य का मतलब यह है कि सरकार किसी एक धर्म को नहीं मानती और न ही किसी खास धर्म का पक्ष लेती है। लेकिन देश के लोगों को यह पूरी आज़ादी होती है कि वे अपनी पसंद के अनुसार किसी भी धर्म, संस्कृति और परम्परा को अपनाएँ।
भारत अपनी “विविधता में एकता” के लिए जाना जाता है। यहाँ अलग-अलग संस्कृतियाँ, सामाजिक परम्पराएँ और भाषाएँ पाई जाती हैं। ये सब बातें साबित करती हैं कि भारत में सेक्युलरिज़्म और लोकतंत्र की जड़ें मज़बूत हैं। भारत की इस पहचान को कोई मिटा नहीं सकता। साझा संस्कृति, सामाजिक मेल-जोल और आपसी भाईचारे की अनगिनत मिसालें हर क़दम पर यह एहसास दिलाती हैं कि भारत एक मज़बूत सेक्युलर देश है।
अगर आज़ादी से लेकर अब तक के सामाजिक और राजनीतिक हालात का अध्ययन किया जाए, तो यह कहा जा सकता है कि मुस्लिम समुदाय ने भारत के सेक्युलर ढाँचे और उसकी परम्पराओं की रक्षा के लिए ईमानदारी से कोशिश की है। साथ ही यह भी मानना पड़ेगा कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पूर्व कुलपति मशीरुल हक़ ने अपनी किताब “मुसलमान और सेक्युलर हिन्दुस्तान” में जो बात लिखी, वह सच है। उन्होंने कहा कि भारत के सेक्युलर विचार रखने वाले लोगों ने, चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान, आम मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को ठीक से समझने की कोशिश नहीं की। धीरे-धीरे भाषणों और लेखों के माध्यम से ऐसा माहौल बना दिया गया कि लोगों को लगने लगा कि सेक्युलरिज़्म और धर्म एक-दूसरे के विरोधी हैं। इसी कारण बहुत से मुसलमानों ने यह महसूस किया कि अगर उन्हें अच्छा मुसलमान बने रहना है, तो उन्हें सेक्युलर नेताओं से ज़ियादा धार्मिक विद्वानों पर भरोसा करना चाहिए।
धर्म और सेक्युलरिज़्म को अलग-अलग बताने के असर आज साफ़ दिखाई दे रहे हैं। अगर सेक्युलरिज़्म को धर्म-विरोधी रूप में पेश न किया गया होता, तो शायद हालात कुछ और होते।
असल में सेक्युलरिज़्म धर्म का विरोधी नहीं है। सैयद आबिद हुसैन ने अपनी किताब “हिन्दुस्तानी मुसलमान आईना-ए-अय्याम में” में इस बात को समझाया है। उन्होंने लिखा कि भारत में बहुत से लोग, ख़ासकर मुसलमान, सेक्युलरिज़्म को ग़लत समझते हैं। वे सोचते हैं कि इसका मतलब धर्म और उसकी अहमियत को नकारना है। जबकि सच्चाई यह है कि सेक्युलरिज़्म ज़रूरी नहीं कि धर्म का विरोधी हो। बहुत से लोग जो राजनीतिक और बौद्धिक सेक्युलरिज़्म को मानते हैं, वे धर्म का सम्मान भी करते हैं और उसे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा समझते हैं।
इस तरह एक विचार यह है कि सेक्युलरिज़्म धर्म का विरोधी नहीं है, जबकि दूसरा विचार इसे धर्म के ख़िलाफ़ मानता है। इस वैचारिक टकराव का फ़ायदा सियासत दानौं ने उठाया। उन्होंने लोगों के बीच यह सोच फैला दी कि धर्म और सेक्युलरिज़्म दो अलग-अलग रास्ते हैं। इससे समाज में विभाजन पैदा हुआ और राजनीतिक दलों को फ़ायदा मिला। जबकि सच्चाई यह है कि सेक्युलरिज़्म धर्म का विरोधी नहीं है।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भी कहा था कि सेक्युलरिज़्म न तो अधर्म है और न ही नास्तिकता। इसका मतलब केवल दुनियावी सुख-सुविधाओं पर ध्यान देना भी नहीं है। बल्कि सेक्युलरिज़्म उन सार्वभौमिक आध्यात्मिक मूल्यों पर ज़ोर देता है जिन्हें अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीकों से प्राप्त करते हैं।
इसी तरह जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी भी भारत के लोकतंत्र और सेक्युलर व्यवस्था की खूबियों को ज़ोर देकर बयान करते हैं। उनका कहना है कि सेक्युलरिज़्म का मतलब यह है कि हर व्यक्ति को अपने पसंद का धर्म अपनाने का अधिकार मिले, और भारतीय संविधान सभी नागरिकों को यह अधिकार देता है। सरकार का अपना कोई धर्म नहीं होता और वह किसी एक विचारधारा को सभी लोगों पर थोप नहीं सकती।
ये सभी बातें साफ़ साबित करती हैं कि मुसलमानों ने भारत की सेक्युलर परम्पराओं और राष्ट्रीय संस्कृति को नुक़सान नहीं पहुँचाया। उनका व्यवहार और योगदान हमेशा सेक्युलर मूल्यों के समर्थन में रहा है। दुख तब होता है जब सेक्युलरिज़्म को कमज़ोर करने और धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाने की कोशिश की जाती है। धर्म के आधार पर हिंसा और भेदभाव पूरी तरह़ ग़लत है और इससे भारत का सेक्युलर ढाँचा प्रभावित होता है।
अगर वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों का अध्ययन किया जाए, तो ऐसा लगता है कि आज की राजनीति केवल निजी हितों और सत्ता की लड़ाई तक सीमित हो गई है। ऐसे माहौल में सच्चा सेक्युलरिज़्म और भारतीय एकता की भावना कमज़ोर पड़ रही है। जब ये मूल्य कमज़ोर होते हैं, तो समाज में कई तरह़ की समस्याएँ पैदा होती हैं।
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अलग-अलग समुदायों के लोग कैसे मिल-जुलकर शांति से रह सकते हैं, जैसा कि वे सदियों से रहते आए हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि हम राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठें और सभी लोगों के अधिकारों और भलाई के लिए काम करें, चाहे उनका धर्म, जाति, रंग या नस्ल कुछ भी हो।
लेकिन वर्तमान सामाजिक ह़ालात लात ज़्यादा उम्मीद नहीं जगाते। ऐसा लगता है कि समाज में मुस्लिम-विरोधी माहौल बढ़ रहा है। इसी का असर है कि धार्मिक भावनाओं को आहत करना, हिन्दू-मुस्लिम नफ़रत फैलाना और इस पर गर्व करना आम बात बनती जा रही है।
ऐसी नकारात्मक राजनीति से कुछ लोगों को राजनीतिक फ़ायदा मिल सकता है, लेकिन इसके नुऊकसान कहीं ज़ियादा हैं। इसलिए नफ़रत भरे बयान देने से पहले यह सोचना चाहिए कि उनका समाज पर क्या असर पड़ेगा। अगर हम निजी हितों से ऊपर उठकर देश की महानता, लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों को महत्व देंगे, तो समाज में सकारात्मक बदलाव आएँगे और सेक्युलर मूल्य मज़बूत होंगे।
आज भारत में जो राजनीतिक सोच दिखाई देती है, वह विभाजन, भेदभाव और नफ़रत पर आधारित लगती है। मुस्लिम-विरोधी भावना को तेज़ी से बढ़ाया जा रहा है और लोगों को यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि अगर राजनीतिक परिणाम बदल गए तो हिन्दुओं को ख़तरा हो जाएगा। जबकि इसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह केवल राजनीतिक भ्रम है। लोगों को इस नफ़रत की राजनीति को समझना होगा ताकि भारत की सेक्युलर व्यवस्था की गरिमा और शक्ति सुरक्षित रह सके।
भारतीय सेक्युलरिज़्म की सच्ची महानता तभी बची रह सकती है जब राजनीतिक हित ऐसे सिद्धान्तों पर आधारित हों जो देश की सेक्युलर और लोकतांत्रिक परम्पराओं को नुक़सान न पहुँचाएँ। अगर राजनीतिक लाभ के लिए लोकतंत्र और सेक्युलर मूल्यों को कुचला जाएगा, तो ऐसे स्वार्थों को छोड़ना होगा ताकि देश में शांति, एकता और भाईचारा बना रहे।
नफ़रत की सियासत को तुरंत नहीं रोका गया, तो समाज में राजनीतिक, नैतिक और सांस्कृतिक संकट पैदा हो सकता है, जो देश की तरक्की के लिए बहुत हानिकारक होगा।
यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि जब भारत के लोग सदियों से मिल-जुलकर रहते आए हैं, तो फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि लोग धर्म, जाति, रंग और नस्ल के नाम पर एक-दूसरे से नफ़रत करने लगे?
राजनीतिक सफलता प्यार, समझदारी और आपसी सम्मान के साथ भी हासिल की जा सकती है। इसके लिए नफ़रत और भेदभाव फैलाने की कोई ज़रूरत नहीं है।
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डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी इस्लामिक इसकोलर, मुसन्निफ़ और न्यु ऐज इस्लाम के मुसतक़िल कालम निगार हैं।
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