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Human Unity in Islam इस्लाम में इंसानी एकता का तसव्वुर

डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी, न्यू ऐज इस्लाम

7 अप्रैल, 2026

अल्लाह, जो पूरी कायनात का पैदा करने वाला और उसे चलाने वाला है, उसने इंसानों को धरती पर पैदा किया। उसने उन्हें सोचने, समझने और दुनिया पर ग़ौर करने की क्षमता दी। साथ ही सही और ग़लत में फ़र्क करने के लिए अक्ल दी, और अपनी मर्जी से फैसले लेने की आज़ादी भी दी। इसके अलावा, इंसान को धरती पर अपना ख़लीफा बनाया। इससे साफ पता चलता है कि इस्लाम सभी इंसानों की इज्ज़त, सम्मान और गरिमा को मानता है और इंसानी एकता का पूरा निज़ाम पेश करता है।

इस्लाम सिखाता है कि सभी इंसान एक हैं और किसी के साथ नस्ल, धर्म, समाज या इलाके के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। यह किसी भी तरह की नाइंसाफी या ऊँच-नीच पर आधारित समाज को सही नहीं मानता।

बल्कि इस्लाम सभी इंसानों को इंसानियत, हमदर्दी, प्यार और आपसी सहयोग के दायरे में जोड़ता है। यह लोगों में समझ और जागरूकता पैदा करता है और पूरी इंसानियत में एकता का भाव जगाता है। यहाँ तक कि यह धर्म और समुदाय के बीच की दूरियों को भी कम करके पूरी इंसानियत को एक मानता है।

यह बात क़ुरआन में कई जगह बताई गई है। इस्लाम इंसान की हैसियत और दर्जा भी तय करता है। अल्लाह ने इंसान को धरती पर अपना खलीफाबनाकर उसे खास सम्मान दिया है। सूरह अल-बक़रा (2:30) में इसका ज़िक्र मिलता है, जहाँ अल्लाह फरिश्तों को इंसान के पैदा होने की जानकारी देता है। इससे इंसान की अहमियत और इज्जत का पता चलता है।

एक और आयत में कहा गया है:

हमने इंसान को सबसे अच्छे रूप में पैदा किया। (सूरह अत-तीन 95:4)

इसका मतलब है कि हर इंसान बहुत अच्छे और सम्मानजनक तरीके से बनाया गया है। यह इज्जत किसी खास धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी इंसानों के लिए है। इसलिए सभी इंसान बराबर हैं और एकता के हकदार हैं।

इस्लाम रंग, नस्ल, भाषा या देश के आधार पर किसी को ऊँचा या नीचा नहीं मानता। इसके बजाय, यह तक़वायानी नेक चरित्र और अल्लाह के डर को ही असली पैमाना मानता है। क़ुरआन में कहा गया है (सूरह अल-हुजरात 49:13):

ऐ लोगो! हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हारे क़ौमें और क़बीले बनाए ताकि तुम एक-दूसरे को पहचान सको। अल्लाह के नज़दीक तुममें सबसे इज़्ज़त वाला वह है जो सबसे ज़्यादा परहेज़गार है।

इस आयत से पता चलता है कि सभी इंसानों की शुरुआत एक ही है। सब एक ही माँ-बाप की औलाद हैं, इसलिए कोई भी जन्म से बड़ा या छोटा नहीं है।

अबुल आला मौदूदी के अनुसार, सभी इंसान एक ही चीज़ से पैदा हुए हैं, एक ही तरीके से बनाए गए हैं और एक ही अल्लाह के बंदे हैं। क़ौम, भाषा और शक्ल-सूरत का फर्क सिर्फ पहचान और आपसी सहयोग के लिए हैं, न कि घमंड या भेदभाव के लिए। फ़ज़ीलत अच्छे चरित्र और नेकी में है।

 इंसानी एकता की सारी खूबियाँ  पैदा होने की प्रक्रिया में ही मौजूद हैं। इसलिए लोगों के बीच भेदभाव करना इंसानियत के ख़िलाफ़ है और समाज के लिए नुक़सानदेह है। आज भी हम देखते हैं कि नस्ल, भाषा, देश और समाज के आधार पर भेदभाव होता है। अफ़सोस की बात है कि यह समस्या मुसलमानों में भी कहीं न कहीं मौजूद है।

मुसलमानों में जात-पात जैसी बातें इतिहास और समाज के असर से पैदा हुई हैं, न कि इस्लाम की शिक्षा से। अशराफ, अजलाफ और अरज़ाल जैसा तसव्वुर भी इसी कारण पैदा हूआ है। इस्लाम ऐसे भेदभाव को सही नहीं मानता। यह एक सामाजिक समस्या है, जिसे इस्लामी सिद्धांतों की रोशनी में ख़त्म करने की ज़रूरत है।

इस्लाम बराबरी, भाईचारे और इंसानी एकता का सच्चा पैरोकार है। इसलिए ज़रूरी है कि हर तरह़ के भेदभाव को ख़त्म किया जाए, ताकि इस्लाम की असली शिक्षाबराबरी और एकताको समाज में लागू किया जा सके।

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URL:  https://newageislam.com/hindi-section/human-unity-islam/d/139565

 

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