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Hindi Section ( 19 May 2026, NewAgeIslam.Com)

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Ethical Values of Journalism पत्रकारिता के नैतिक मूल्य

डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी, न्यू ऐज इस्लाम

19 मई 2026

यह बात सभी जानते हैं कि लोकतंत्र के चार मुख्य स्तंभ होते हैंविधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया। इन सभी संस्थाओं की अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियाँ होती हैं। यदि इनमें से कोई भी संस्था अपनी ज़िम्मेदारी सही ढंग से पूरी नहीं करती, तो इससे लोकतंत्र को नुक़सान पहुँचता है।

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि लोकतंत्र की मज़बूती  में मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका होती है। यदि मीडिया अपनी ज़िम्मेदारियों में लापरवाही करे या जनता के भरोसे के साथ विश्वासघात करे, तो समाज में कई समस्याएँ पैदा होती हैं और लोकतंत्र पर उसका बुरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए मीडिया का नैतिक कर्तव्य है कि वह जनता के मुद्दों और समाज की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर काम करे। सरकार की उन योजनाओं और प्रयासों की सराहना करनी चाहिए जो जनता की भलाई के लिए हों, और उन कामों की आलोचना करनी चाहिए जो समाज में अशांति और नफ़रत फैलाते हों।

पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण नैतिक कर्तव्य यह भी है कि वह बुराइयों के ख़िलाफ़ आवाज उठाए और अच्छी तथा लाभदायक बातों को जनता के सामने लाए। माहिरीन के अनुसार पत्रकारिता की पहली ज़िम्मेदारी यह है कि वह जनता तक सही, सच्ची और समय पर ख़बरें पहुँचाए। इसका यह भी मतलब है कि झूठी खबरें कभी नहीं फैलानी चाहिए। सच और न्याय का साथ देना मीडिया का नैतिक और सांस्कृतिक कर्तव्य है। लेकिन आज हम देख रहे हैं कि पत्रकारिता से जुड़े बहुत से लोग सच्चाई दिखाने के बजाय सत्ता में बैठे लोगों को ख़ुश करने में लगे हुए हैं। यह केवल पत्रकारिता की नैतिक गिरावट नहीं है, बल्कि यह बौद्धिक और नैतिक पतन का भी स्पष्ट प्रमाण है। निजी लाभ या लालच के कारण सच्चाई से मुँह मोड़ना, झूठी ख़बरें फैलाना या किसी समुदाय के ख़िलाफ़ प्रचार करना समाज में अशांति फैलाने के बराबर है। मीडिया से जुड़े लोगों को अपने व्यवहार का गंभीरता से आत्ममंथन करना चाहिए।

पत्रकारिता की दूसरी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी यह है कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य, नैतिकता और सामाजिक बुराइयों के बारे में जनता में जागरूकता पैदा करे। यदि सरकार कोई ऐसी योजना शुरू करती है जिससे जनता को लाभ हो, तो मीडिया को उसकी जानकारी लोगों तक पहुँचानी चाहिए। दूसरी ओर, यदि सरकार कोई ऐसी नीति लाती है जो जनता या मानवता के ख़िलाफ़ हो, तो मीडिया को उसका निष्पक्ष रूप से विश्लेषण करके लोगों को उसके प्रभाव के बारे में बताना चाहिए। लेकिन आज मीडिया में अक्सर पक्षपात दिखाई देता है। यदि सरकार कोई योजना लाती है तो मीडिया उसकी खूब प्रशंसा करता है, लेकिन यदि कोई योजना जनता के हित में नहीं होती तो उसे दबा दिया जाता है या उसके बारे में चर्चा नहीं होती। मीडिया का यह रवैया सही नहीं है। मुद्दे जैसे भी हों, उन्हें ईमानदारी से जनता तक पहुँचाना मीडिया का नैतिक कर्तव्य है।

पत्रकारिता की यह भी ज़िम्मेदारी है कि वह जनता और सरकार के बीच अच्छे संबंध बनाए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यदि सरकार गलत दिशा में काम कर रही हो, तब भी मीडिया उसकी छवि सुधारने की कोशिश करे। बल्कि जब सरकार के काम सही हों और जनता नाराज़ हो, तब मीडिया को दोनों के बीच विश्वास बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। आज के समय में, खासकर इंडिया जैसे लोकतांत्रिक देश में, मीडिया की भूमिका काफ़ी  चिंताजनक दिखाई देती है। जनता और सरकार के रिश्तों को बेहतर बनाने का मतलब यह नहीं है कि सरकार के हर काम को सही साबित किया जाए।

मीडिया को ऐसी ख़बरों, बहसों और कार्यक्रमों से बचना चाहिए जिनसे समाज में नफ़रत फैलने का ख़तरा हो। यह मीडिया की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारियों में से एक है। लेकिन आजकल कई मीडिया संस्थान केवल टीआरपी बढ़ाने के लिए सनसनीख़ेज़ ख़बरों और बहसों को बढ़ावा देते हैं, ख़ासकर वे जो मुस्लिम समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाती हैं। मुसलमानों की देशभक्ति पर सवाल उठाना, मुस्लिम पर्सनल लॉ में दख़ल देना, और लव जिहाद, “लैंड जिहाद, “थूक जिहाद, “कोरोना जिहादऔर कॉरपोरेट जिहादजैसे शब्दों पर बहस करना समाज में नफ़रत बढ़ाने का कारण बनता है। कई वर्षों से राष्ट्रीय समाचार चैनलों पर ऐसी नफ़रत भरी चर्चाएँ देखी जा रही हैं। मीडिया का यह रवैया समाज में शांति और सौहार्द लाने में मदद नहीं कर सकता। भाईचारे, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और मानवता के सम्मान के लिए ज़रूरी है कि इस तरह़ की बातों से पूरी तरह़ बचा जाए। ईमानदार पत्रकारिता का तकाज़ा है कि वह शांति, एकता और अच्छे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय संबंधों को बढ़ावा दे। यदि किसी धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश में मीडिया अपने छोटे-छोटे फ़ायदे के लिए अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ नकारात्मक प्रचार करे, तो इससे केवल पत्रकारिता ही नहीं बल्कि धर्मनिरपेक्ष समाज की सुंदरता भी प्रभावित होती है। दुख की बात यह है कि हम लगभग रोज़ ऐसे नफ़रत भरे परोगिराम देखते हैं। मीडिया को इस विषय पर गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है।

पत्रकारिता का एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत निष्पक्षता है। निष्पक्षता समाज में शांति और ख़ुशह़ाली लाती है। इससे जनता का सरकार पर भरोसा बढ़ता है और राजनीतिक, सामाजिक तथा वैचारिक भ्रष्टाचार कम होता है। लेकिन अफ़सोस की बात है कि आज मीडिया का बड़ा हिस्सा पक्षपात का शिकार हो चुका है। सरकार के हर काम में उसे देशभक्ति दिखाई देती है, जबकि सरकार की आलोचना को देश विरोधी गतिविधि माना जाने लगा है। पत्रकारिता की नैतिक ज़िम्मेदारी यह थी कि वह अपने निर्णय तथ्यों और आँकड़ों के आधार पर ले, न कि सरकार का समर्थन करना ही अपना मुख्य उद्देश्य बना ले, जैसा कि आज देखने को मिल रहा है।

मीडिया का पक्षपातपूर्ण रवैया निश्चित रूप से सवालों के घेरे में है। जनता के हितों को नज़रअंदाज़ करके केवल अपने फ़ायदे के लिए सरकार की हर बात को सही ठहराना उचित नहीं है।

अंत में यह कहा जा सकता है कि हम एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश में रहते हैं, जहाँ अलग-अलग धर्मों और विचारों के लोग साथ रहते हैं। सभी के अधिकार समान हैं और सभी बराबर के नागरिक हैं। इसलिए मीडिया को लोकतांत्रिक मूल्यों और जनता के हितों का सम्मान करते हुए काम करना चाहिए। साथ ही उसे सरकार की अच्छी और जनकल्याणकारी योजनाओं की सराहना भी करनी चाहिए और ज़रूरी सवाल भी पूछने चाहिए, ताकि लोकतंत्र मजूबूत  बन सके।

डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी इस्लामिक इसकोलर, मुसन्निफ़ और न्यु ऐज इस्लाम के मुसतक़िल कालम निगार हैं।

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URL:  https://newageislam.com/hindi-section/ethical-values-journalism/d/140071

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