New Age Islam
Tue May 12 2026, 12:46 AM

Hindi Section ( 23 Apr 2026, NewAgeIslam.Com)

Comment | Comment

Environmental Pollution in Islam-Part-3 इस्लाम में पर्यावरण प्रदूषण का तसव्वुर

डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी, न्यू ऐज इस्लाम

(भाग-3)

23 अप्रैल, 2026

पर्यावरण प्रदूषण का एक बड़ा कारण असंतुलन है। हम रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में इसके कई उदाहरण देखते हैं।

ज़रा सोचिए: अल्लाह ने इंसान को अक़्ल दी, और उसे सीखने व खोज करने की क्षमता दी। इसी वजह से समाज में इल्म का फ़रोग़  हुआ, जिनमें विज्ञान और तकनीक भी शामिल हैं। लेकिन जब विज्ञान और आविष्कारों का इस्तेमाल संतुलन से हटकर केवल ताक़त और  बालादसती के लिए किया जाने लगता है, तो वह इंसानियत के लिए फ़ायदेमंद होने के बजाय नुक़सान देह बन जाता है। इससे पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित जाता है। ऐसे प्रदूषण के असर समाज पर बहुत गंभीर होते हैं और उन्हें ठीक करना मुश्किल होता है।

यह बात मानी जा सकती है कि विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ पर्यावरण संकट भी बढ़ा है। आज के दौर में थोड़े समय में जो नुक़सान होता है, वह पहले हज़ारों सालों में भी नहीं होता था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि विज्ञान ख़ुद दोषी है। असल में विज्ञान अल्लाह की एक नेमत है, जिसने हमें क़ुदरत को समझना और उससे फ़ायदा उठाना आसान बना दिया है।

असल समस्या यह है कि आधुनिक विज्ञान पर मटेरियलिज़्म और ख़ुदा से दूर रहने का असर रहा है, ख़ासकर पश्चिमी दुनिया में। इसी वजह से यह नैतिक मूल्यों से कटा हुआ नज़र आता है। इसका मुख्य लक्ष्य केवल माद्दी तरक्की बन गया है, जो पर्यावरण के संतुलन को बिगाड़ देता है। अगर इसमें आध्यात्मिकता और लोगों के भले को ज़्यादा महत्व दिया जाता, तो इसके नतीजे कहीं बेहतर होते।

कोई भी ज्ञान जो ख़ुदा और आख़िरत के विश्वास से ख़ाली हो, वह इंसानियत के लिए सही मायनों में लाभदायक नहीं हो सकता। जब ईमान नहीं होता, तो इंसान में स्वार्थ, लालच और शोषण पैदा हो जाता है। ये चीज़ें इंसान को आरामपसंदी, ऐशो-आराम और बेकाबू इच्छाओं की तरूफ ले जाती हैं। इसलिए अगर विज्ञान में संतुलन रखा जाए और उसमें नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों को शामिल किया जाए, तो यह पूरी इंसानियत के लिए बहुत फायदेमंद बन सकता है।

इतिहास गवाह है कि जब भी आधुनिक साधनों का इस्तेमाल विनाश के लिए हुआ है, उसके नतीजे हमेशा बुरे ही रहे हैं। इसलिए धर्म और आस्था से जुड़ाव इंसान को ज़िम्मेदार बनाता है और पर्यावरण की रक्षा में मदद करता है।

आज इंसान ने बहुत माद्दी तरक्की कर ली है, लेकिन जब से उसकी ज़िन्दगी से धर्म और आध्यात्मिकता दूर हुई है, तब से नकारात्मक असर सामने आ रहे हैं।

क्रेसी मॉरिसन ने अपनी किताब “Man Does Not Stand Alone” में लिखा है कि सम्मान, उदारता, अच्छा चरित्र और ऊँचे विचार नास्तिकता से पैदा नहीं हो सकते। नास्तिकता एक तरह की खुदपरस्ती है, जिसमें इंसान खुद को ही सबसे ऊपर मानने लगता है। अगर ईमान नहीं होगा, तो सभ्यता टूट जाएगी, व्यवस्था बिगड़ जाएगी, सेल्फ कन्ट्रोल ख़त्म हो जाएगा और बुराई फैल जाएगी। इसलिए ज़रूरी है कि हम ख़ुदा पर अपने विश्वास को मज़बूत करें।

मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान ने अपनी किताब मज़हब और जदीद चैलेंजमें बताया है कि आख़िरत पर विश्वास एक ज़िम्मेदार और संतुलित इंसान और समाज बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है। धर्म हमें सही रास्ता दिखाता है, कानून की मज़बूत बुनियाद देता है, और ज़िन्दगी को सही तरीक़े से चलाने के सिद्धांत सिखाता है। यह समाज में ऐसा माहौल भी पैदा करता है, जो क़ानून के पालन के लिए ज़रूरी होता है।

यह साफ़ है कि जो समाज धर्म और आस्था से ख़ाली होता है, उसमें संतुलन नहीं रह सकता। जब इंसान धर्म का पालन करता है, तो वह उसी के अनुसार जीवन जीता है, और इससे पर्यावरण की रक्षा होती है। इस तरह़ आस्था पर्यावरण प्रदूषण को कम करने का एक प्रभावी तरीका है।

जब इंसान धर्म को मानता है, तो वह आख़िरत पर भी विश्वास करता है। यह विश्वास उसे फ़ितरत से प्रेम करना सिखाता है। फ़ितरत को नुक़सान पहुँचाना इंसान और पूरी दुनिया के भविष्य को ख़तरे में डाल देता है।

हर इंसान एक सुंदर वातावरण, सुख, शांति और ख़ुशी चाहता है। लेकिन यह दुनिया इन सभी इच्छाओं को पूरी तरह पूरा नहीं कर सकती। इसलिए धर्म जन्नत (स्वर्ग) का विचार देता है, जहाँ इंसान की हर इच्छा पूरी होगी।

इंसान की सच्ची संतुष्टि तभी मिल सकती है जब वह आख़िरत पर विश्वास करे। इंसान चाहता है कि उसे दुनिया और आख़िरत दोनों में सफलता मिले। यह तभी संभव है जब वह धर्म के अनुसार जीवन जिए।

आख़िरत पर विश्वास इंसान में ज़िम्मेदारी पैदा करता है, जिससे पर्यावरण में संतुलन आता है। इसके विपरीत, जिन समाजों में धर्म नहीं होता, वहाँ अक्सर अशांति, भ्रष्टाचार और नैतिक गिरावट देखने को मिलती है, क्योंकि उनमें जवाबदेही का एहसास नहीं होता।

पर्यावरण इतिहास के एक विद्वान ने अपनी किताब “Interpreting Nature: Cultural Constructions of the Environment” में लिखा है कि इंसान को यह समझना चाहिए कि धरती एक अस्थायी ठिकाना है, और उसे अपने कर्मों को ईमान और ज़िम्मेदारी के साथ करना चाहिए।

इन सभी बातों से यह नतीजा निकलता है कि धर्म और आस्था पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब इंसान बिना किसी सीमा के अपनी इच्छाओं को पूरा करने की कोशिश करता है और प्रकृति के नियमों से छेड़छाड़ करता है, तो वह पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाता है।

इसलिए पर्यावरण प्रदूषण का एक बड़ा कारण धर्म से दूरी है। पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए इंसान को अपने धर्म से मज़बूत जुड़ाव रखना होगा।

डॉ. ज़फ़र दारिक क़ासमी इस्लामिक इसकोलर, मुसन्निफ़ और न्यु ऐज इस्लाम के मुसतक़िल कालम निगार हैं।

----------

Part-1: Environmental Pollution in Islam-Part-1 इस्लाम में पर्यावरण प्रदूषण का व्यापक तसव्वुर

Part-2: Environmental Pollution in Islam-Part-2 इस्लाम में पर्यावरण प्रदूषण का तसव्वुर

URL:  https://newageislam.com/hindi-section/environmental-pollution-islam-part-3/d/139759

New Age IslamIslam OnlineIslamic WebsiteAfrican Muslim NewsArab World NewsSouth Asia NewsIndian Muslim NewsWorld Muslim NewsWomen in IslamIslamic FeminismArab WomenWomen In ArabIslamophobia in AmericaMuslim Women in WestIslam Women and Feminism

 

Loading..

Loading..