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Several Ways to Meditation in the Holy Quran Part-1 कुरआन करीम में गौर व फ़िक्र के तरीके

डॉक्टर मोहम्मद वासे ज़फर

उर्दू से अनुवाद न्यू एज इस्लाम

17 जून 2022

कुरआन करीम में अक्ल और फ़िक्र की ताकत इस्तेमाल में लाने की ताकीद के पसे मंजर में कई तरह के आमाल का ज़िक्र है, जैसे फहम (understanding), इदराक (consciousness), तफ़क्कुर (thinking), तदब्बुर (deliberation), तज़किरा (refreshing), दरायत (reasoning) और तफक्कोह (comprehension) आदि। लेकिन कुरआन ने सबसे अधिक शब्द तफ़क्कुरका ही इस्तेमाल किया है, अर्थात गौर व फ़िक्र करना। इसी तरह कुरआन ने कई जगह गौर व फ़िक्र को प्रायोगिक अवलोकन (empirical observation) से जोड़ कर बयान किया है, जैसे सुरह यूनुस:101, अल आराफ:185 और अल तारिक:5 आदि आयतों में। सबसे अहम बात यह है कि कुरआन हकीम ने गौर व फ़िक्र के विभिन्न तरीके बताए हैं, जिनसे इंसान को न केवल यह समझ में आ सकता है कि उसे अपनी फ़िक्र और अक्ल की ताकत का इस्तेमाल कहाँ कहाँ करना चाहिए, बल्कि इनसे फहम व शऊर की बहुत सी नई राहें खुलती हैं और नए शोबों की तरफ रहनुमाई हासिल होती है।

कुरआन हकीम के जरिये बताए गए तरीकों को निम्नलिखित शीर्षकों के तहत बयान किया जा सकता है:

तफ़क्कुर फिल कुरआन (Pondering on the Quran)

कुरआन करीम की कई आयतों में अल्लाह पाक ने अपनी किताब के अंदर गौर व फ़िक्र की दावत दी है। जैसे इरशाद है:

(ऐ रसूल) किताब (कुरान) जो हमने तुम्हारे पास नाज़िल की है (बड़ी) बरकत वाली है ताकि लोग इसकी आयतों में ग़ौर करें और ताकि अक्ल वाले नसीहत हासिल करें (साद:29)

एक जगह कुरआन हकीम में गौर व फ़िक्र करने वालों की इस तरह निंदा की है: तो क्या लोग क़ुरान में (ज़रा भी) ग़ौर नहीं करते या (उनके) दिलों पर ताले लगे हुए हैं?” (मोहम्मद:24)

इस लेख की और भी आयतें हैं जैसे अल बकरा: 219, अल निसा: 82 आदि। इन aayton से yah patachअलता है कि कुरआन हकीम के नुज़ूल का मकसद यह है कि इसकी आयतों में गौर व फ़िक्र किया जाए और इनसे नसीहत हासिल की जाए, और यह कि कुरआन हकीम से सहीह इस्तेफ़ादा अक्लमंद लोग ही कर सकते हैं। सुरह अल निसा की आयत 82/ विशेष तौर पर स्पष्ट करती है कि जो लोग कुरआन हकीम में गौर व फ़िक्र नहीं करते, वह अक्सर शक और शुबहात का शिकार रहते हैं। इसके विपरीत कुरआन हकीम मेंगौर व फ़िक्र करने वालों पर हक़ बतदरीज स्पष्ट होता जाता है और वह ईमान व यकीन की मंजिलें तय करते रहते हैं और आखिर में हिदायत और कामयाबी के आला मुकाम पर फायज होते हैं।

कुरआन हकीम में गौर व फ़िक्र के लिए अरबी अदब, इल्मुल लुगत, इल्मुल तजवीद और इल्मे तफसीर का एक ख़ास मुकाम है। इनके अलावा सीरते पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम, इल्मे हदीस और इल्मे फिकह की भी जरूरत होती है।

तफ़क्कुर फिल आफाक (Pondering over the Universe)

गौर व फ़िक्र से संबंधित दूसरी किस्म की वाय्तें वह हैं, जिनमें अल्लाह पाक ने कायनात, उसके मोहकम निज़ाम और उसमें बिखरी हुई अपनी मख्लुकात में गौर करने की दावत दी है जैसे इरशाद है:

क्या उन लोगों ने आसमान व ज़मीन की हुकूमत और ख़ुदा की पैदा की हुई चीज़ों में ग़ौर नहीं किया और न इस बात में कि यायद उनकी मौत क़रीब आ गई हो फिर इतना समझाने के बाद (भला) किस बात पर ईमान लाएंगें (अल आराफ: 185)

दूसरी जगह इरशाद है: “(ऐ रसूल) तुम कहा दो कि ज़रा देखों तो सही कि आसमानों और ज़मीन में (ख़ुदा की निशानियाँ क्या) क्या कुछ हैं (मगर सच तो ये है) और जो लोग ईमान नहीं क़ुबूल करते उनको हमारी निशानियाँ और डरावे कुछ भी मुफीद नहीं। (यूनुस: 101)

एक जगह इस तरह फरमाया: बेशक आसमान व ज़मीन की पैदाइश और रात दिन के रद्दो बदल में और क़श्तियों जहाज़ों में जो लोगों के नफे क़ी चीज़े (माले तिजारत वगैरह दरिया) में ले कर चलते हैं और पानी में जो ख़ुदा ने आसमान से बरसाया फिर उस से ज़मीन को मुर्दा (बेकार) होने के बाद जिला दिया (शादाब कर दिया) और उस में हर क़िस्म के जानवर फैला दिये और हवाओं के चलाने में और अब्र में जो आसमान व ज़मीन के दरमियान ख़ुदा के हुक्म से घिरा रहता है (इन सब बातों में) अक्ल वालों के लिए बड़ी बड़ी निशानियाँ हैं (अल बकरा: 164)

इस विषय की और भी बहुत सी आयतें हैं जैसे: अल अनआम: 95-99, अल नहल: 10-17, 65-69, 78-81, अल अनकबूत: 20, यासीन: 32-44, अल गाशिया: 17-20, फातिर: 27-28, अल रूम 25-19, अल जासिया: 5 आदि। एक जगह अल्लाह पाक ने ऐसे बन्दों की तारीफ़ की है जो ज़मीन व आसमान की तखलीक और कायनात के दुसरे असरार व रमूज़ पर गौर करते हैं और उन्हें कायनात की हकीकत का इदराक और उसके खालिक की मारफत हासिल हो जाती है।

इन आयतों में अल्लाह पाक ने इंसान को कायनात, उसके विभिन्न मज़ाहिर और आसार में रोनुमा होने वाले विभिन्न हादसात और तगय्युरात की तरफ आकर्षित किया है। जो लोग इनमें इमानदारी के साथ गौर व फ़िक्र करते हैं वह अल्लाह की कुदरत, उसकी हिकमत और सनाई के कायल हुए बिना नहीं रहते। उन्हें कायनात में अल्लाह पाक की वहदानियत के दलील मिल जाते हैं। इस तरह उन्हें अल्लाह के अहकाम के सामने सरे तस्लीम ख़म करने की हिदायत नसीब होती है।

अब ज़रा आप भी इन आयतों पर गौर कीजिये, क्या इनमें इल्मे कायनात (Cosmology), खगोल विज्ञान (Astronomy), भौतिकी (Physics) विशेष रूप से खगोल भौतिकी (Astrophysics), भूगोल(Geography), समुद्र विज्ञान (Oceanography) और पृथ्वी विज्ञान (Earth Science) जैसे विज्ञान प्राप्त करने की तरगीब नहीं है?

जीवों पर विचार (Pondering over the Creatures)

गौर व फ़िक्र का तीसरा मनहज अल्लाह पाक की मखलुकात में गौर व फ़िक्र है। कुरआन करीम में बहुत सी आयतें ऐसी हैं, जिनमें अल्लाह पाक ने अपनी मख्लुकात विशेषतः आलमे हैवानात और नबातात की तरफ इंसान को आकर्षित किया है उनकी साख्त, रहने सहने के अंदाज़ और उनसे हासिल होने वाले फायदे पर गौर व फ़िक्र करें और अल्लाह की कुदरत और हिकमत को पहचानें। जैसे फरमाया:

और इसमें शक़ नहीं कि चौपायों में भी तुम्हारे लिए (इबरत की बात) है कि उनके पेट में ख़ाक, बला, गोबर और ख़ून (जो कुछ भरा है) उसमें से हमे तुमको ख़ालिस दूध पिलाते हैं जो पीने वालों के लिए खुशगवार है (66) और इसी तरह खुरमें और अंगूर के फल से (हम तुमको शीरा पिलाते हैं) जिसकी (कभी तो) तुम शराब बना लिया करते हो और कभी अच्छी रोज़ी (सिरका वगैरह) इसमें शक नहीं कि इसमें भी समझदार लोगों के लिए (क़ुदरत ख़ुदा की) बड़ी निशानी है (67) और (ऐ रसूल) तुम्हारे परवरदिगार ने शहद की मक्खियों के दिल में ये बात डाली कि तू पहाड़ों और दरख्तों और ऊँची ऊँची ट्ट्टियाँ (और मकानात पाट कर) बनाते हैं (68) उनमें अपने छत्ते बना फिर हर तरह के फलों (के पूर से) (उनका अर्क़) चूस कर फिर अपने परवरदिगार की राहों में ताबेदारी के साथ चली मक्खियों के पेट से पीने की एक चीज़ निकलती है (शहद) जिसके मुख्तलिफ रंग होते हैं इसमें लोगों (के बीमारियों) की शिफ़ा (भी) है इसमें शक़ नहीं कि इसमें ग़ौर व फ़िक्र करने वालों के वास्ते (क़ुदरते ख़ुदा की बहुत बड़ी निशानी है) (69)” (अल नहल: 66-69)

क्या उन लोगों ने परिन्दों की तरफ ग़ौर नहीं किया जो आसमान के नीचे हवा में घिरे हुए (उड़ते रहते हैं) उनको तो बस ख़ुदा ही (गिरने से ) रोकता है बेशक इसमें भी (कुदरते ख़ुदा की) ईमानदारों के लिए बहुत सी निशानियाँ हैं (अल नहल:79)

तो क्या ये लोग ऊँट की तरह ग़ौर नहीं करते कि कैसा अजीब पैदा किया गया है (अल गाशिया: 17)

और अगर ख़ुदा चाहता तो तुम सबको मज़िले मक़सूद तक पहुँचा देता वह वही (ख़ुदा) है जिसने आसमान से पानी बरसाया जिसमें से तुम सब पीते हो और इससे दरख्त शादाब होते हैं (10) जिनमें तुम (अपने मवेशियों को) चराते हो इसी पानी से तुम्हारे वास्ते खेती और जैतून और खुरमें और अंगूर उगाता है और हर तरह के फल (पैदा करता है) इसमें शक़ नहीं कि इसमें ग़ौर करने वालो के वास्ते (कुदरते ख़ुदा की) बहुत बड़ी निशानी है (11)” (अल नहल: 10-11)

यदि इंसान जानवरों की दुनिया और पौधों की दुनिया का अध्ययन करता है, तो उसके लिए इस निष्कर्ष पर आना मुश्किल नहीं है कि यह सब न केवल जैविक विकास (organic evolution) का परिणाम है, बल्कि उनके निर्माण के पीछे एक रणनीतिक योजना और उद्देश्य भी है। ये सभी चीजें हमारे पर्यवेक्षकों को अपने निर्माता को जानने और उसकी शक्ति और ज्ञान को समझने के लिए आमंत्रित कर रही हैं। इंसान को यह भी विचार करना चाहिए कि क्या इन सभी प्राणियों को एक उद्देश्य के लिए बनाने वाले भगवान ने उसे व्यर्थ बनाया है। इन आयतों से उलूमे हैवानात, इल्मे हैवानात परवरी, विशेष रूप से पक्षी विज्ञान (Ornithology), मधुमक्खी पालन, वनस्पति विज्ञान और कृषि शिक्षा के अध्ययन की ओर ले जाते हैं।

स्वयं पर विचार (Pondering over Self)

गौर व फ़िक्र के इस चौथे मनहज की तरफ रहनुमाई इन आयतों से होती है, जिनमें अल्लाह पाक ने इंसान को अपनी ज़ात में गौर व फ़िक्र की दावत दी है। इनमें कुछ आयतें ऐसी भी हैं जिनमें अनफुस व आफाक दोनों का ही तज़किरा है, जैसे यह आयत:

क्या उन लोगों ने अपने दिल में (इतना भी) ग़ौर नहीं किया कि ख़ुदा ने सारे आसमान और ज़मीन को और जो चीजे उन दोनों के दरमेयान में हैं बस बिल्कुल ठीक और एक मुक़र्रर मियाद के वास्ते पैदा किया है और कुछ शक नहीं कि बहुतेरे लोग तो अपने परवरदिगार की (बारगाह) के हुज़ूर में (क़यामत) ही को किसी तरह नहीं मानते (अल रूम:8)

एक और जगह अल्लाह का इरशाद है:

हम अनक़रीब ही अपनी (क़ुदरत) की निशानियाँ अतराफ (आलम) में और ख़़ुद उनमें भी दिखा देगें यहाँ तक कि उन पर ज़ाहिर हो जाएगा कि वही यक़ीनन हक़ है क्या तुम्हारा परवरदिगार इसके लिए काफी नहीं कि वह हर चीज़ पर क़ाबू रखता है (हा मीम सजदह: 53)

एक जगह इंसान को अपनी तखलीक पर गौर करने को इस तरह मुतवज्जोह फरमाया:

तो इन्सान को देखना चाहिए कि वह किस चीज़ से पैदा हुआ हैं (5) वह उछलते हुए पानी (मनी) से पैदा हुआ है (6) जो पीठ और सीने की हड्डियों के बीच में से निकलता है (7)” (अल तारिक़: 5-7)

इतना ही नहीं बल्कि अल्लाह पाक ने कुरआन पाक की कुछ आयतों में इंसान की तखलीक व पैदाइश और उसकी ज़िन्दगी के मरहलों को स्पष्ट तौर पर बयान भी कर दिया है ताकि इंसान उन पर गौर व फ़िक्र करे और अपने खालिक को पहचाने और फिर उसके अहकाम पर ईमान ले आए।

जैसे, सुरह अल हज में देखें:

लोगों अगर तुमको (मरने के बाद) दोबारा जी उठने में किसी तरह का शक है तो इसमें शक नहीं कि हमने तुम्हें शुरू-शुरू मिट्टी से उसके बाद नुत्फे से उसके बाद जमे हुए ख़ून से फिर उस लोथड़े से जो पूरा (सूडौल हो) या अधूरा हो पैदा किया ताकि तुम पर (अपनी कुदरत) ज़ाहिर करें (फिर तुम्हारा दोबारा ज़िन्दा) करना क्या मुश्किल है और हम औरतों के पेट में जिस (नुत्फे) को चाहते हैं एक मुद्दत मुअय्यन तक ठहरा रखते हैं फिर तुमको बच्चा बनाकर निकालते हैं फिर (तुम्हें पालते हैं) ताकि तुम अपनी जवानी को पहुँचो और तुममें से कुछ लोग तो ऐसे हैं जो (क़ब्ल बुढ़ापे के) मर जाते हैं और तुम में से कुछ लोग ऐसे हैं जो नाकारा ज़िन्दगी बुढ़ापे तक फेर लाए हैं जातें ताकि समझने के बाद सठिया के कुछ भी (ख़ाक) न समझ सके और तो ज़मीन को मुर्दा (बेकार उफ़तादा) देख रहा है फिर जब हम उस पर पानी बरसा देते हैं तो लहलहाने और उभरने लगती है और हर तरह की ख़ुशनुमा चीज़ें उगती है तो ये क़ुदरत के तमाशे इसलिए दिखाते हैं ताकि तुम जानो (5)कि बेशक खुदा बरहक़ है और (ये भी कि) बेशक वही मुर्दों को जिलाता है और वह यक़ीनन हर चीज़ पर क़ादिर है (6)” (अल हज: 5-6)

Urdu Article: Several Ways to Meditation in the Holy Quran قرآن کریم میں غور و فکر کے طریقے

English Article: What Does The Quran Teach Us About Meditation, Thinking, And Reasoning?

URL: https://newageislam.com/hindi-section/quran-meditation-thinking-reasoning-part-1/d/127320

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