डॉक्टर एम एजाज़ अली, न्यू एज इस्लाम
14 सितंबर 2022
जुमा का दिन, जुमे की नमाज़ और जुमा का खुतबा, इसका असल मकसद क्या है यह वही समझ सकता है जिसमें समाज को गंभीर नज़रों से देखने की समझ हो। इस दिन ईद की तरह तैयारी किया जाना, मस्जिदों की तरफ झुण्ड का झुण्ड जाना, वापसी में घर पर पुलाव या बिरयानी के इंतज़ाम का रहना यह तो इस्लामी देशों ख़ास कर भारत में एक रस्म की तरह देखा जाता है। मुसलमानों की बड़ी आबादी (जिसे अकबर अलाहाबादी ने जुम्मन मियाँ का खिताब दिया) तो यही समझती है कि हफ्ते में यही तो एक दिन है जिसे अल्लाह की इबादत में दे दिया जाए तो हफ्ता भर का गुनाह माफ़ हो जाए। (जबकि ऐसा नहीं है) इससे बड़ी बात यह भी सुनने को मिलती है कि अगर कोई तीन जुमा लगातार इस नमाज़ से गैर हाज़िर रहा तो फिर वह मुन्किरों के गिरोह में शामिल माना जाएगा। कुल मिला कर यह नतीजा निकलता है कि जुमे के दिन का एहतेराम और एहतेमाम दोनों आवश्यक है।
निजी तौर पर गौर करने से लगता है कि इस्लामी दुनिया में जुमें का एहतेराम व एहतेमाम के पीछे एक बड़ा प्लान है जिस पर बुद्धिजीवी लोगों को गंभीरता से गौर करने की आवश्यकता है और इस मुहिम को सकारात्मक व मजबूत तरीके से जारी रखने में ही अल्लाह की खुशनूदी है। अंदीना के चार रिकात फर्ज़ नमाज़ की जगह पर दो रिकात फर्ज़ का अदा किया जाना और साथ में खुतबे का वाजिब होना यह खुतबे की अहमियत की तरफ इशारा करता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस दिन अच्छा या बुरा, ज़ालिम हो या कमज़ोर, शराबी हो या कबाबी, जुवाड़ी हो या ज़िनाकार, चोर हो या डकैत, सभी जुमे के दिन मस्जिद में हाजरी अवश्य देते हैं। गौर करें तो मुसलमान मेहनत कश वर्ग (जुम्मन मियाँ) इसे एक रस्म (हफ्ता वारी) की तरफ लेता चला आ रहा है और बखूबी निभाता चला आ रहा है भले ही उसे इमाम के खुतबे से कुछ सबक मिले या नहीं मिले। इस मौके पर असल बारी तो इमाम हज़रात और खतीबों की आती है जिन्हें अपने रोल के मकसद को गंभीरता से समझना होगा। अपनी समाजी तहरीक के दौरान हमें कई मस्जिदों में जुमे की नमाज़ अदा करने का मौक़ा मिला। हमने पाया कि अधिकतर इमामों के खुतबात तो सर के उपर से ही गुज़र जाते है। ज़ोरदार आवाज़ में चिल्ला चिल्ला कर खिताब करना और नामों के साथ लम्बे लम्बे अलकाब के अलावा तो कुछ सुनाई नहीं देता है। ज़हन में फ़ौरन यह बात आने लगती है कि हमारे जैसा “समझदार मुसलमान” ही जब इमाम के खुतबे का मतलब नहीं समझ सका तो फिर “जुम्मन मियाँ” को क्या समझ में आती होगी। वह तो हमारी ही तरह खाली हाथ घर वापस चला जाता होगा।
हमारी समझ से हर जुमे की नमाज़ में दरअसल “किरदार साज़ी” को केंद्र बना कर खुतबा होना चाहिए और वह भी हालाते हाज़रा को सामने रख कर। आज मानव
समाज जितनी गुमराही का शिकार हो चुका है, उसे केवल “हुक्मे इलाही” के नजरिये से ही राहे रास्त पर लाया जा सकता है। और
इसका सबसे आसान रास्ता यह है कि इस्लाम के पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम व खुलफा
ए राशेदीन से संबंधित सबक देने वाले घटना इस जम्मे गफीर के सामने पेश कर के उसे कायदे
से समझाया जाए ताकि जुम्मनों के ज़हन में बैठ जाए और उस पर अमल करना उसकी ज़हनी मज़बूरी
बन जाए। समाज को अगर यह बताया जाए कि मां बाप की इताअत करो, रिश्तेदारों से लगाव रखो, पड़ोसियों व मुहाजिरों की मदद व दिलजुई करो, नाप तोल ठीक रखो, किसी का माल न हड़पो, वादा खिलाफी न करो, नशा, जिना, फहश व उर्यानियत गुनाह है। जान व माल, आमाल तीनों अल्लाह की अमानत है।
खयानत न हो, झूट मूट और फूट से बचो, फुजूल खर्ची और हद से अधिक कंजूसी दोनों शैतानियत है, यतीमी ख़त्म होने तक यतीमों की मदद करो, गुरुर घमंड से दूर रहो आदि। इस
तरह की छोटी लेकिन बुनियादी हिदायतों को एक के बाद एक बार बार पेश करने और ख़ास कर इस्लाम
के पयाम्बरों के हवाले से रखने पर काफी असर होगा शर्त यह है कि उसे आम व आसान शब्दों
में ऐसा रखा जाए कि जम्मे गफीर के ज़हन में दाखिल हो जाए। इन बातों को पेश करने में
हमारे ज़हन में आस पड़ोस के लोगों का ख़याल रखना भी आवश्यक है। ऐसा नहीं है कि मस्जिदों
से निकली हुई आवाज़ का असर केवल एक विशेष समाज पर पड़ता है अगर खुतबात को ठीक से पेश
किया जाए और भारतीय भाषा में पेश किया जाए तो आस पास की आबादी पर भी उसके असर करने
की गुंजाइश रहती है। कौन अच्छी बातें सुनना, सीखना और उस पर अमल करना नहीं चाहता है। जुमा और जुमे
के खुतबे का इस्तेमाल असल में इसी मकसद से होना चाहिए। फिर अगर मस्जिदों के दरवाज़े
से बिना भेद भाव प्यासों को सारा दिन पानी मिले। फकीरों और भीक मांगने वालों को माली
मदद मिले, लंगरों से भूकों को खाना
मिले, कमजोरों को शिक्षा मिले,
तो पांच वक्त नामज़ के साथ इससे
बेहतर और क्या हो सकता है। इन बदलाव के लाने से हर ख़ास व आम में मस्जिदों की इमेज सकारात्मक
होगी। वरना मुट्ठी भर चालाक और मफाद परस्त लोगों के जरिये जिस तरह जुमा, जुमा मस्जिद और जुम्मन मियाँ
का इस्तेमाल टकराव की राजनीति के लिए होता चला आ रहा है, यह किसी भी हिसाब से अब सहीह नहीं है। मुसलमानों की
रिवायती लीडरशिप जानती है कि जुमे के अलावा दुसरे दिन मुसलमानों का जम्मे गफीर आसानी
से तो मिलने वाला नहीं है और मौका बमौका जुमे के खुतबे को भी यह किरदार साज़ी के बजाए
राजनीतिक इस्तेमाल के मकसद से इस्तेमाल करना खूब जानते हैं। उन्हें जानकारी है कि जुमें
में भीड़ (जुम्मन मियाओं) की ही लगती है जिन्हें मज़हब के नाम पर आसानी से गुमराह कर
के इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्हें मालुम है कि पढ़ा लिखा और साहबे हैसियत वर्ग उनके
झांसे में नहीं आने वाला है और उनसे भीड़ लगने वाली भी नहीं है। इस लेख के जरिये हम
तो बुद्धिजीवी लोगों से यह अपील करेंगे कि अब वह जुमा, जुमा मस्जिद और जुम्मन मियाँ को बचाएं और उन्हें राजनीतिक
टकराव में, राजनीतिक उद्देश्यों
के लिए मस्जिदों, मज़हबी खुतबों को छोड़ कर और भी बहुत से दिनी प्लेटफ़ॉर्म हैं उसका इस्तेमाल करें।
वरना आज मस्जिदों, अजानों और नमाज़ अदा करने की जगह को ले कर जिस तरह आवाज़ उठने लगी है यह और लम्बी
न हो जाए। हर बात के लिए हम दूसरों पर ठीकरा
क्यों फोड़ें। बुरा समय आने से पहले ही हम इन सारी निकात पर हर संभव बदलाव ले आएं ताकि
गुमराही के शिकार गिरोह को विरोध में मुहिम चलाने का मौक़ा ही न मिले। समय की आवश्यकता
तो यह है कि हर साथ पर टकराव के बजाए बिरादराने वतन के दिलों को जीतने की मुहिम चाली
जाए।
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डॉक्टर एम एजाज अली पूर्व राज्यसभा सांसद
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Urdu Article: Friday,
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مسجد اور جمّن میاں
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