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Meditation, Not Dogma, Leads to God ज़ाहिरी परस्तिश नहीं बल्कि मुराकबा खुदा की पहचान अता करता है


डॉक्टर इरशाद रब्बानी, न्यू एज इस्लाम

१ जुलाई, २०१३

(उर्दू से अनुवादन्यू एज इस्लाम)

मुराकबा कादिरे मुतलक, हाज़िर व नाज़िर और आलिमे मुतलक खुदा के वजूद पर ईमान का खुलासा है। तमाम संतों, सूफियों और ऋषियों ने मुराकबे के माध्यम से खुदा की पहचान प्राप्त की है। इबादत के तरीके, इबादत के रस्मों और सिद्धांत व अकीदे दुसरे और केवल मुराकबा करने वालों की मज़हब से लगाव का दर्शन है। केवल मुराकबे के माध्यम ही से इंसान अल्लाह पाक का विसाल हासिल करता है और जो लोग मुराकबा नहीं करते केवल रस्मों और उसूल और अकीदे पर अमल करते हैं वह हाज़िर व नाज़िर हाकिमें मुतलक से कोई भी रूहानी तोहफा हासिल नहीं करते।

मुराकबा दिमाग और रूह की एक ऐसी तरबियत है जो चेतना को एक आम इंसान के चेतना से बहुत अधिक बुलंद कर देता है। यह एक ऐसी कैफियत है जो बेनफ्सी और जिस्मानी वजूद से ला ताल्लुकी और हकीकी दुनिया के साथ ताल्लुक का एहसास पैदा करती है।

मुराकबे की ओर आकर्षित व्यक्ति हमेशा एक खुदा पर विश्वास रखता है और उसके अपने वजूद, कायनात और इस कायनात की तमाम मख्लुकों के बारे में गौर व फ़िक्र करके उस कादिरे मुतलक की कुरबत हासिल करने की कोशिश करता है। असल में मुराकबा करने वाला यह अकीदा रखता है कि खुदा फितरत और कायनात की बातिनी हकीकत है और इस हकीकत की तलाश पर ध्यान केन्द्रित करते हुए वह हर जगह मौजूद उस पाक ज़ात के साथ खुद को एक करना चाहता है।

तमाम ऋषियों, संतों, सूफियों और नबियों ने मुराकबे को मामूल बनाया है। इसहाक अलैहिस्सलाम के बारे में यह माना जाता है वह मुरक़बा किया करते थे। इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने सच्चे खुदा के बारे में सच्चाई की तलाश करने के लिए मुराकबा किया और सूरज, चाँद, सितारों और दुसरे कुदरती मज़ाहिर और चीजों की प्रकृतिऔर वजूद पर गौर व फ़िक्र किया। मूसा अलाहिस्सलाम के बारे में कहा जाता है खुदा की तजल्ली का दीदार करने के लिए चालीस दिन के लिए कोहे तूर पर गए थे।

हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बारे में भी कहा जाता है कि नबूवत हासिल करने से पहले मक्का में “गारे हिरा” में मुराकबे करते थे। नबूवत हासिल करने से पहले नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने किसी भी धर्म की पैरवी नहीं की ना तो कुरैशे मक्का के मज़हब की और ना ही यहूदियों के मज़हब की। लेकिन वह प्राकृतिक तौर पर उस छुपे हुए खुदा की तरफ आकर्षित थे जो कायनात का मालिक है। वह कई कई दिनों तक हाकिमे मुतलक के बारे में गौर व फ़िक्र करते हुए मुराकबे में लगे रहते थे। इस मुराकबे ने उनके वजूद और शऊर को बुलंद कर दिया और इसने उनकी रूह को नबूवत के तोहफे के लिए तैयार कर दिया इसलिए कि वह रूहानी तौर पर अमीर और ज़हनी तौर पर बालिग़ हो चुके थे।

विभिन्न धर्मों में मुराकबे सहित शारीरिक आसन के विभिन्न नाम और विविध तरीके हैं लेकिन मानसिकरूप से यह तमाम धर्म में एक ही है। लगभग तमाम धर्म मुराकबे का मतलब खुदा को याद करना उसकी प्रशंसा करना और खुदा की मोहब्बत को गिज़ा प्रदान करना है जो हर जगह मौजूद है जो आसमान में बैठा हुआ नहीं है बल्कि पुरे ब्रह्मांड की सभी मौजुदात का घेराव किये हुए है। यह अकीदा मुराकबे करने वाले को खुदा की पहचान प्रदान करता है जो इस ब्रह्मांड का मालिक है और उसके आस पास मौजूद है और इसके लिए बहुत करीब है। यह मुराकबा करने वाले में एक कैफ आवर एहसास पैदा करता है जो कि अपने महबूब खुदा के बहुत अधिक करीब होने की अपरिचित ख़ुशी का एहसास है।

इस्लाम में मुराकबे के दो प्रकार पर अमल किया जाता है बल्कि निर्धारित हैं। एक ज़िक्र है और दुसरा फ़िक्र है। ज़िक्र का अर्थ खुदा के नाम का विर्द करना और फ़िक्र का अर्थ खुदा के वजूद और ताकत के एक मज़हर के तौर पर खुदा की मखलूक में गौर व फ़िक्र करना है। सोच और गौर व फ़िक्र और खुदा की अजमत की तारीफ़ के माध्यम से इंसान खुदा की पहचान हासिल करता है।

सिख धर्म में, जो एक निराकार और सर्वव्यापी ईश्वर की पूजा का उपदेश करता है, ज़िक्र या सिमरन मुराकबे की विधि है। बुद्धिष्ट और हिन्दू धर्म में मुराकबे केलिए ध्यान और समाधि के इस्तेलाह हैं।

भक्ति मूवमेंट के कई संतों ने आत्मा और नफ़्स के आध्यात्मिक तप को प्राप्त करने के लिए मुराकबे का अभ्यास किया। सूफीवाद में, मुस्लिम सूफियों ने कुरआन के माध्यम से स्मरण और चिंतन की अवधारणा का अधिग्रहण किया, लेकिन भक्ति संप्रदाय में, ध्यान का विचार प्राचीन धार्मिक परंपराओं और धर्मशास्त्रों के माध्यम से प्राप्त किया गया जो एकेश्वरवाद का प्रचार करते हैं। सूफीवाद के प्रचार के माध्यम से एकेश्वरवाद की अवधारणा को भारत में गैर-मुस्लिमों के बीच नवीनीकृत किया गया था। इसलिए, मुराकबे की इस प्रथा ने इस्लाम और हिंदू धर्म दोनों के बीच एक संगम बनाया।

इसलिए, हम पाते हैं कि आध्यात्मिक रूप से, मुस्लिम सूफी और हिंदू भक्त दोनों ने उच्चस्तरीय मुराकबे और चिंतन के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना के परिणामस्वरूप समान विचार, भावना और दार्शनिक विचार व्यक्त किए हैं। मुस्लिम और हिंदू सूफ़ियों का वास्तविक संदेश एक ही है:

१)      खुदा पर ईमान रखना और इसकी मोहब्बत

२)      अल्लाह पाक की ज़ात पर अकीदा और धर्म से परे इंसानों की मोहब्बत

३)      खुदा की वहदानियत का एहसास

४)      खुदा की रहमत के हुसूल का इज़हार

५)      दुनियावी ज़िन्दगी के फना होने और मौत की याद

६)      अमन और अहिंसा में विश्वास

, खुदा मैं हमेशा तेरी मोहब्बत में रहना चाहता हूँ

अगर मैं तेरे कुदरत तले धुल बन जाऊं तो मैं ज़िंदा रहूंगा

मैं दोनों जहानों में तेरी ही गुलामी की ख्वाहिश करता हूँ;

मैं तुम्हारे लिए ज़िंदा रहूँगा और तेरे लिए मर जाऊँगा

उन्होंने मज़ीद कहा,

मैं अपनी नौजवानी के मर जाने से नहीं डरता

अगर उसके साथ मेरे रब की मोहब्बत ना मरे तो

बहुत सारे नौजवान उसकी मोहब्बत के बिना ही मर गए

इसी तरह, कबीर का भी कहना है कि,

मैं उस ज़ात में डूब गया हूँ और खुद वह एक तमाम में ज़ाहिर है।

कि इस इलाही वहदानियत में दोई का एहसास महव हो गया।

इस प्रकार कबीर ने उन मुस्लिम सूफियों की भाषा बोली जो मुराकबा या ज़िक्र और चिंतन के माध्यम से खुदा के विसाल को प्राप्त करते हैं। ऐसे अन्य आध्यात्मिक नेता हैं जिन्होंने आध्यात्मिक ऊंचाइयों को प्राप्त किया है और आंतरिक प्रकाश और आवाज की बात की है।

इसलिए, मुराकबा मनुष्य को निरपेक्ष शासक, अल्लाह, ब्रह्मा या सतगुरु का ज्ञान प्रदान करता है जो मनुष्यों और प्रत्येक व्यक्ति के दिलों में रहता है और इसे हर सांस में और उसके होने की स्थिति में याद रखता है। जब वह सोचता है। , वह आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष प्राप्त करता है, और उस इलाही ज्ञान को प्राप्त करता है जो सत्य की ओर ले जाता है।

URL for English article: http://www.newageislam.com/spiritual-meditations/dr-irshad-rabbani,-new-age-islam/meditation,-not-dogma,-leads-to-god/d/12393

URL for Urdu translation: http://www.newageislam.com/urdu-section/dr-irshad-rabbani,-new-age-islam/meditation,-not-dogma,-leads-to-god--ظاہری-پرستش-نہیں-بلکہ-مراقبہ-خدا-کی-معرفت-عطا-کرتا-ہے/d/12586

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