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Hindi Section ( 28 March 2014, NewAgeIslam.Com)

Rationality in Islam इस्लाम में तार्किकता

 

 

 

 

 

डॉ. ए. क्यू. खान

24 मार्च, 2014

पश्चिमी देशों में इस्लाम के बारे में एक गलत धारणा है कि इस्लाम नफरत, युद्ध, भेदभाव और हिंसा (विशेष रूप से औरतों के प्रति) आदि पैदा करता है जबकि सच्चाई से इसका कोई वास्ता नहीं है। ये फैसला उन गुमराह मुसलमानों के कामों पर आधारित हैं जो ऐसे कामों में लिप्त हैं और जो इस्लाम के लिए बदनामी का कारण है।

हाल ही में मेरे दोस्त, पूर्व राजदूत और पूर्व विदेश मंत्री रियाज़ एम. खान ने इस ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया। इसके बाद मैंने इस विषय पर एक और अच्छे दोस्त और धार्मिक विद्वान प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद अलग़ज़ाली के साथ चर्चा की और इसके नतीजे में जो विचार सामने आये वो निम्नलिखित हैं।

सबसे पहले हम ये निर्धारित करें कि इस्लाम में तर्कसंगत, तर्काधार और तार्किकता का क्या मतलब है। शब्दकोश के अनुसार तर्कसंगत का अर्थ तर्क पर आधारित, तर्काधार का मतलब तर्कों का समूह या किसी काम या किसी विशेष विश्वास के लिए तार्किक आधार और तार्किकता, तर्कसंगत का व्युत्पन्न (संज्ञा) है और इसमें भी वही अर्थ शामिल हैं।

इस्लाम में सभी काम कारण, तर्क और दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखने पर आधारित होने चाहिए। और इसका स्रोत कुरान में स्पष्ट और ज़ोरदार निर्देश (17: 89) है। पश्चिमी देशों में बुद्धिवाद धार्मिक प्रतिष्ठानों में बड़े पैमाने पर सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलनों के मद्देनज़र आया, इस तरह धर्मिक ज्ञान के विकल्प के रूप में तर्क को इस्तेमाल किया गया। तार्किकता का जन्म इसलिए हुआ क्योंकि चर्च ने समाज पर पूर्ण वर्चस्व स्थापित कर लिया था और मानव सोच और व्यवहार को खुदा के नाम पर धार्मिक विद्वानों ने स्थापित अपनी निरंकुश सत्ता की ज़ंजीरों में जकड़ दिया था।

इसके विपरीत कुरान (57: 27) में स्पष्ट रूप से अल्लाह अपने बंदों को किसी भी तरह की पुरोहिताई का हुक्म नहीं देता है और यहाँ तक कि अल्लाह ने ऐसे धार्मिक लोगों की निंदा की है जो अपने भौतिक लाभ के लिए उसके बंदों की धार्मिक भावनाओं का शोषण करते हैं (9: 34)। इस्लामी इतिहास के किसी भी हिस्से में पुजारियों के किसी भी वर्ग को कभी भी मुस्लिम समाज में कोई स्थान नहीं मिला ऐसा इस कारण से है कि इंसान और खुदा के बीच कोई कोई मध्यस्थ नहीं हो सकता। हर आदमी बिना किसी दूसरे आदमी के खुदा तक पहुंच सकता है। लेकिन कुरान में अल्लाह ने तो यहां तक ​​कहा है कि, "और हम उससे उसकी गरदन की रग से भी अधिक निकट हैं" (50: 16)

मुसलमान हमेशा तर्कसंगत जाँच के लिए आज़ाद थे। कुरान पर उनके विश्वास ने उन्हें ऐसा करने से नहीं रोका और इसकी वजह ये है कि खुद कुरान अक्सर मुसलमानों को सच की तलाश में बुद्धि और इन्द्रियों के उपयोग करने का हुक्म देता है। कुरान ने अंधे-अनुकरण की अवधारणा को पूरी तरह खारिज किया है और मन को अंधविश्वास से आज़ादी दी है। कुरान लोगों को वाह्य एवं आन्तरिक वास्तविकताओं पर सोच विचार करने की तरफ बुलाता है। कुरान ने ऐसे लोगों की निंदा की है, "उनके पास दिल है जिनसे वो समझते नहीं, उनके पास आँखें है जिनसे वो देखते नहीं; उनके पास कान है जिनसे वो सुनते नहीं।" (7: 179)

इसके अलावा लोगों को अपनी क्षमताओं के इस्तेमाल पर स्पष्ट ईनाम को बताते हुए कुरान लोगों को ऐसे शाश्वत सत्य की खोज करने और अपने आसपास के वातावरण पर गहन चिंतन करने के लिए आमंत्रित करता है, जिसके प्रकाश में मनुष्य दोनों दुनिया (इस दुनिया और परलोक) में सफलता और खुशियों से भरे बेहतर जीवन की दिशा में तरक्की को हासिल कर सकता है। इस्लाम का वैश्विक दृष्टिकोण दोनों दुनिया की वास्तविकताओं पर आधारित है। इस्लाम वर्तमान दुनिया को एक अस्थायी और विश्राम की जगह के रूप में देखता है। यहाँ जो कुछ भी नेमतें खुदा की मर्ज़ी के रूप में प्रदान की गई हैं वो मनुष्यों के लिए हैं ताकि वो उनको खोजें और उनसे फायदा हासिल कर सकें।

इंसान को इन नेमतों का संरक्षक बनाया गया है और उससे दुनिया के व्यापक संसाधनों और अपनी ज़बरदस्त क्षमताओं का सबसे अच्छा उपयोग करने का आग्रह किया जाता है। मनुष्य पापों के बोझ के साथ पैदा नहीं हुआ है और न ही ये दुनिया कोई शैतानी साज़िश है जो उसके आध्यात्मिक विकास से अंसगत हो।

अल्लाह के 99 नामों में से एक अलहकीम भी है (अर्थ- सबकुछ जानने वाला)। अगर खुदा बड़ी हिकमतों वाला है तो उसने जो कुछ भी बनाया है, उसे एक निश्चित उद्देश्य के साथ बनाया है। कोई भी चीज व्यर्थ नहीं बनाई गई है (3: 191)। मनुष्य की रचना के उद्देश्य को कुरान में विस्तार से बताया गया है और इसकी व्याख्या नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की सुन्नत में कर दी गई है।

सभी चीज़ों के उद्देश्य को मानव मस्तिष्क के द्वारा विचार, अवलोकन और तर्क का उपयोग कर खोजा जा सकता है। यही कारण है कि इस्लामी संस्कृति और इतिहास में प्रगति तर्कसंगत जाँच और विज्ञान में एक साथ प्रगति हुई। इस तथ्य को गिबन से लोकर एच. जी. वेल्स और अर्नोल्ड टोयनबी तक सभी इतिहासकारों ने स्वीकार किया है। इस सम्बंध में बहुत स्पष्ट बयान रॉबर्ट ब्रिफॉल्ट की किताब ''दि मेकिंग आफ ह्युमानिटी (The Making of Humanity)'' में देखा जा सकता है।

ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ गुमराह कट्टरपंथियों की गतिविधियों की रौशनी में पश्चिमी देश मुसलमानों को आतंकवादी, जातिवादी, धार्मिक कट्टरपंथी और रूढ़िवादियों के रूप में पेश करते हैं। अगर इन लोगों को कुरान का अधिक ज्ञान होता तो इन्हें इस बात का एहसास होता कि जीवन और व्यवहार के बारे में अल्लाह के सभी सुनहरे आदेश कुरान में हैं।

लोगों को ये आदेश दिया गया है कि वो विनम्रपूर्वक जीवन गुज़ारें और दूसरों के साथ विनम्रपूर्वक व्यवहार करें, दूसरों के प्रति सहिष्णुता दिखाएं,  सभी के अधिकारों की रक्षा करें और शील का पालन करें। ये सभी निर्देश साफ और स्पष्ट शब्दों में दिए गए हैं। सभी सूरतों काहवाला पेश करना असम्भव है जिनमें तर्क, दर्शन, मानव जाति के मनोविज्ञान, परम्पराएं, आदत आदि हों और जिनमें दान, धैर्य, ब्रह्मांड के रहस्य, प्रकृति के नियम, मनोविज्ञान और मानव प्रकृति, ज्ञान का महत्व, सामाजिक और पारिवारिक आचरण, सामान्य रूप से लोगों के अधिकार, गैर मुस्लिमों के अधिकार, नैतिकता, शिष्टाचार, सदाचार, सामाजिक बुराईयां, अर्थशास्त्र, ईमानदारी, क्रूरता और उत्पीड़न से बचाव, शांति और उसकी समझ, आपसी समझौते, ईसाइयों और यहूदियों के साथ सम्बंध और आधुनिक ज्ञान की प्राप्ति आदि भी शामिल हो।

मानव मनोविज्ञान की रौशनी में नैतिकता, संयम, उदारता और समझदारी पर काफ़ी ज़ोर दिया गया है। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति को मार दिया जाता है तो उसके रिश्तेदारों को बदले (विशुद्ध रूप से मानवीय प्रतिक्रिया) की मांग करने का अधिकार है लेकिन एक और जीवन के नुकसान से बचने के लिए माफ करने को बेहतर माना जाता है। अहंकारी होने, चिल्लाने या ज़ोर से बात करने को कड़ाई से मना किया गया है।

जीवन के सभी पहलुओं पर ऐसे स्पष्ट निर्देशों के बावजूद मुसलमानों को आमतौर पर बहुत बुरा माना जाता है। ऐसा हमारे व्यवहार और अपनी बनायी गयी मिसालों के कारण है। आज किसी भी चीज़ पर उस तरह अमल नहीं किया जा रहा है जैसा अल्लाह ने निर्धारित किया है। हमने खुदा के आदेशों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया है और हम सभी प्रकार के गलत कामों में लिप्त हैं। हमें उन गंभीर अनुशासनात्मक सज़ाओं को नहीं भूलना चाहिए जिसे अल्लहा ने गलत काम करने वालों के लिए निर्धारित किया है!

स्रोत: http://www.thenews.com.pk/Todays-News-9-239962-Rationality-in-Islam

URL for English article:

http://www.newageislam.com/islam-and-spiritualism/dr-aq-khan/rationality-in-islam/d/66242

URL for Urdu article:

http://www.newageislam.com/urdu-section/dr-a-q-khan,-tr-new-age-islam/rationality-in-islam-اسلام-میں-عقلیت-پسندی/d/66291

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http://www.newageislam.com/hindi-section/dr-a-q-khan,-tr-new-age-islam/rationality-in-islam-इस्लाम-में-तार्किकता/d/66319

 

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