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Hindi Section ( 17 Apr 2014, NewAgeIslam.Com)

Human Rights in Islam मानवाधिकार और इस्लाम

 

रोज़नामा क़ौमी सलामती

21 जून, 2013

इस्लाम ने अपने मानने वालों को मानवाधिकार की सिर्फ प्रेरणा ही नहीं दी बल्कि उन पर मानवाधिकार निर्धारित भी कर दिए। मानवाधिकार से सम्बंधित इस्लामी शिक्षा बताती है कि माँ बाप के औलाद पर, औलाद के माँ बाप पर, पति के पत्नी पर, पत्नी के पति पर, पड़ोसियों पर पड़ोसियों के अधिकार निर्धारित हैं। यही नहीं बल्कि मुसलमानों पर गैरमुस्लिमों के बहुत से अधिकार निर्धारित किए गए हैं। अब जो व्यक्ति इन अधिकारों को पूरा करेगा वो अल्लाह के यहाँ ज़बरदस्त ईनाम का हकदार होगा और जो अधिकारों को पूरा करने में कोई कोताही से काम लेगा उसकी क़यामत के दिन सख्त पकड़ होगी।

इस्लाम ने हर स्तर पर अधिकारों के संरक्षण के लिए मामूली मामूली बातों पर ध्यान दिया है ताकि आगे चल कर वो बातें खतरनाक रुप न ले लें और किसी के साथ ज़्यादती और नाइंसाफी का कारण न बन जाएं। जैसे इंसान के अन्दर जो गुण रखे हैं उनमें एक गुण 'एहसास' है। यानि इंसान के अन्दर एहसास का माद्दा पूरे तौर पर रखा गया है। जिसके आधार पर अगर कोई व्यक्ति किसी के साथ गाली गलौज करता है, तो दूसरे व्यक्ति को उससे बहुत तकलीफ पहुँती है या कोई ऐसी बात कभी कभी इंसान को बहुत ही दुख देती है, जो उसकी भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली होती हैं। कहावत मशहूर है, ''तलवार का ज़ख्म भर जाता है, मगर बात का ज़ख्म नहीं भरता''। इसलिए किसी को बुरा भला कहने, उपेक्षित समझने, किसी पर इल्ज़ाम लगाने, संदेह करने, बलात्कार और चुग़ल ख़ोरी से परहेज़ करना चाहिए। क्योंकि ये सब बातें मानवाधिकारों के खिलाफ हैं।

इस्लाम ने आरोप लगाने को नापसंद किया है। इससे इंसान का व्यक्तित्व आहत होता है और समाज में उसके लिए जीना मुश्किल हो जाता है। अगर एक बार किसी महिला की बदनामी हो जाती है, तो जीवन भर उसे परिशानियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए अल्लाह इरशाद फरमाता है, ''निस्संदेह जो लोग शरीफ़, पाकदामन, भोली-भाली बेख़बर ईमानवाली स्त्रियों पर तोहमत लगाते है उन पर दुनिया और आख़िरत में फिटकार है। और उनके लिए एक बड़ी यातना है, जिस दिन कि उनकी ज़बानें और उनके हाथ और उनके पाँव उनके विरुद्ध उसकी गवाही देंगे, जो कुछ वे करते रहे थे, (कुरान 24: 23- 24) इस्लाम ने औरत को जो स्थान दिया है, उस पर झूठा आरोप लगाना, उसके मक़ाम के खिलाफ काम करना है। महिला को अपमानित करने के लिए आरोप लगाने पर क़यामत के दिन सख़्त पकड़ होगी।

बदगुमानी (संदेह) से भी इस्लाम ने रोका है। क्योंकि कई बार ये बदगुमानी (संदेह) अपने परिणाम के मामले में बड़ी खतरनाक साबित होती है। इसके प्रमाण हम समाज में आए दिन देखते हैं। अगर पति पत्नि के बीच संदेह पैदा होता है, तो उनका विवाहित जीवन कठिन हो जाता है और स्थिति काफी आगे तक पहुँच जाती है। इसी तरह की बदगुमानियाँ कभी पति की तरफ से होती हैं और कभी पत्नी की तरफ से। बिना जाँच और सुबूत के दूसरे के बारे में संदेह करना उसके अधिकारों का हनन है।

इसी तरह किसी को उपेक्षित और अपमानित समझना भी मानवाधिकारों का हनन करने के बराबर है। क्योंकि अल्लाह के अनुसार तो सभी इंसान सम्मान के योग्य हैं। जन्म के लिहाज़ से कोई किसी से छोटा या बड़ा नहीं। रंग, नस्ल और जाति के आधार पर किसी को किसी पर कोई श्रेष्ठता नहीं मिलती। जहाँ तक श्रेष्ठता की बात है तो अल्लाह के मुताबिक़ इंसानों में श्रेष्ठ वो है, जो नेक और परहेज़गार है। अल्लाह का फरमान है, ''बेशक तुम में अल्लाह के नज़दीक सबसे इज़्ज़त वाला वो है, जो अधिक नेक है' मगर आश्चर्यजनक बात है कि आज आम तौर से छोटे बड़े होने का पैमाना इस्लाम के निर्धारित किए गए पैमाना से अलग समझा जाता है। माल और दौलत, बिरादरी और ज़ात को श्रेष्ठता का पैमाना माना जाता है, जो कि ग़लत है धार्मिक लिहाज़ से भी और इंसानी लिहाज़ से भी। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के हदीस से मालूम होता है कि वंश, जाति, समुदाय, दौलत, रंग आदि पर कोई श्रेष्ठता नहीं। ग़ौर करने लायक है कि अगर कोई व्यक्ति जाति और समुदाय के आधार पर किसी को अपमानित व उपेक्षित समझ रहा है, जबकि वो अपने कार्यों और चरित्र के आधार पर उससे बेहतर हो सकता है। दूसरे ये कि जिसे अपमानित व उपेक्षित समझा जा रहा है, उसे ये बात तकलीफ पहुँचाने वाली हो सकती है। अल्लाह ने किसी भी बंदे को हरगिज़ इस बात का अधिकार नहीं दिया है कि वो दूसरे को छोटा समझे और अपने ऊपर घमंड करे। अल्लाह का इरशाद है कि ''(अहंकार में) लोगों से गाल न फुलाओ'' (लुक़मान, 18)

किसी पर इल्ज़ाम लगाना और तरह तरह के नाम रखना भी तकलीफ देने वाला काम है और मानवाधिकारों के खिलाफ है, और इसलिए इस्लाम ने ऐसा करने से भी मना किया है, अगर वो ऐब उसके अन्दर मौजूद हो तब भी उसको उस ऐब के के साथ पुकारना गलत है। क्योंकि चाहे वो बात भले ही सही हो, मगर उससे उस व्यक्ति को तकलीफ पहुँचती है। जैसे कोई आखों से अन्धा है, उसे अन्धा कहना, उसे और ज़्यादा तकलीफ पहुँचाता है, ऐसे ही अगर किसी के पांव नहीं है, उसे लंगड़ा कह कर पुकारना भी गलत है। क्योंकि ये बात भी तकलीफ पहुँचाती है और अगर किसी में ऐब न हों, फिर उस पर ऐब लगाना आरोप लगाना है, जो बिल्कुल नाजायज़ है। इसलिए इस तरह की बातों से इस्लाम ने अपने मानने वालों को सख्ती से रोका है। अल्लाह का इरशाद है ''ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो! न पुरुषों का कोई गिरोह दूसरे पुरुषों की हँसी उड़ाए, सम्भव है वो उनसे अच्छे हों'' (अलहुजरात, 11)

मानवाधिकारों का जिस तरह भी उल्लंघन हो, इस्लाम के खिलाफ है। क़यामत के दिन इसकी सख्त पूछ ताछ होगी। कुछ बातें ऐसी होती है जो बाहर से नज़र नहीं आती हैं, मगर वो भी किसी के अधिकारों के हनन और दिल को तकलीफ पहुँचाने का कराण बनती हैं। जैसे किसी की टोह में लग जाना। अल्लाह का फरमान है ''और किसी के टोह में न पड़ो'' (अलहुजरात,12) एक और जगह अधिक स्पष्ट रूप से फरमाया गया है, ''और जिस चीज़ का तुम्हें ज्ञान न हो उसके पीछे न लगो। निस्संदेह कान और आँख और दिल इनमें से प्रत्येक के विषय में पूछा जाएगा'' ( बनी इसराईल, 36) किसी की पीठ पीछे बुराई करना शरीयत की नज़र में बहुत ही बुरा काम है, । अल्लाह का इरशाद है ''तुम में से कोई किसी की पीठ पीछे निन्दा न करे- क्या तुम में से कोई इसको पसन्द करेगा कि वो मरे हुए भाई का मांस खाए? वो तो तुम्हें अप्रिय होगा ही।''(अलहुजरात,12)

इस्लाम ने 'आदमियत' के सम्मान की जो अवधारणा पेश की है वो वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा करने वाला है। चूंकि आदमियत में सभी इंसान आ जाते हैं चाहे वो किसी भी धर्म से सम्बंध रखते हों। अल्लाह फ़रमाता है, ''और हमने औलादे आदम को आदरणीय बनाया' (कुरान) ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस्लाम पूरी मानवता के लिए कितनी सहानुभूति रखता है और वो नहीं चाहता कि किसी पर ज़ुल्म हो और कोई किसी के अधिकारों का हनन करे।

21 जून, 2013 स्रोतः रोज़नामा क़ौमी सलामती, नई दिल्ली

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