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Hindi Section ( 11 Apr 2012, NewAgeIslam.Com)

I will Like to See Many Changes: Saudi Princess Hamsa कई बदलाव देखना चाहूंगी: सऊदी राजकुमारी बिस्मह


बीबीसी उर्दू

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

सऊदी शाही परिवार से संबंध रखने वाली राजकुमारी बिस्मह बिन्ते सऊद बिन अब्दुल अज़ीज़ ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि वह अपने देश सऊदी अरब में कई बदलाव देखना चाहती हैं लेकिन अभी वो समय नहीं आया कि महिलाओं को गाड़ी चलाने की इजाज़त दी जाए।

मैं सऊदी अरब के पूर्व राजा शाह सऊद की बेटी की हैसियत से बात कर रही हूँ। मेरे पिता ने महिलाओं की पहली युनिवर्सिटी की स्थापना की,  गुलामी को वर्जित किया और एक संवैधानिक राजा बनाने की कोशिश की जिसमें राजा और प्रधानमंत्री के पदों में अंतर स्पष्ट हो। लेकिन मुझे अफ़सोस है कि मेरे प्यारे वतन में ऐसा हो न सका।

मुझे अपनी पुरवक़ार और फरागदिली से भरपूर तहज़ीब पर फख्र है लेकिन हमारे पास समाज के नियमन के लिए सिविल कानून नहीं हैं और हमें उनकी सख्त जरूरत है।

एक बेटी,  बहन,  पूर्व पत्नी,  मां,  व्यावसायिक महिला और एक पत्रकार के रूप में, मैं निम्नलिखित परिवर्तन अपने देश में देखना चाहती हूँ।

संविधान

मैं एक पूरा संविधान देखना पसंद करूंगी जो सभी मर्दों और औरतों के साथ कानूनी तौर पर बराबरी का बर्ताव करे और साथ में हमारे नागरिक कानून और राजनीतिक संस्कृति का भी खयाल रखे।

मिसाल के लिए इस समय सऊदी अदालतों में सभी फैसले जजों की कुरान करीम की व्यक्तिगत व्याख्या पर किए जाते हैं। यह वैश्विक रूप से सहमत सिद्धांतों या लिखित संविधान के बजाय उनके निजी मान्यताओं पर आधारित होता है।

मैं ये नहीं कह रही कि पश्चिमी प्रणाली को अपना लिया जाए, लेकिन हमें इस प्रणाली की ऐसा शैली ज़रूर लानी चाहिए जो हमारी आवश्यकताओं और संस्कृति के मुताबिक हो। इसलिए हमारा संविधान कुरान के दर्शन पर बनना चाहिए जिसके नियम पत्थर पर लकीर हों और जजों के स्वभाव पर निर्भर न हो।

विशेष रूप से संविधान को समुदाय,  लिंग या सामाजिक रूप से अलग होकर प्रत्येक नागरिक के बुनियादी मानव अधिकारों की रक्षा करना चाहिए। कानून की नज़र में हर किसी को बराबर होना चाहिए।

तलाक़ के क़ानून

मेरा मानना ​​है कि तलाक के कानून बुहत अधिक रूप से ज़ालिमाना हैं।

इस वक्त अगर सऊदी अरब में किसी औरत को तलाक चाहिए तो केवल 'खाली या दहाली के तहत ही ले सकती है। इसका मतलब है कि या तो उसको एक बड़ी रकम अदा करनी होगी या फिर उसे तलाक मांगने के कारणों पर किसी को गवाह बनाकर पेश करना होगा। इस दूसरी शर्त को पूरा करना तो लगभग असंभव है क्योंकि अक्सर ये कारण शादी की चार दीवारी के पीछे ही छिपे होते हैं।

महिलाओं के लिए तलाक को मुश्किल बनाने का एक और तरीका ये है कि तलाक के किसी भी मौके पर छह साल से ऊपर के किसी भी बच्चे को खुद ही बाप के हवाले कर दिया जाता है।

कुरान करीम (जिस पर ये सारे कानून आधारित होने चाहिए हैं) इसके बिल्कुल विरुद्ध है। कुरआन  ने महिलाओं को सिर्फ गंभीर मतभेद के कारण भी तलाक लेने का पूरा अधिकार दिया है।

शिक्षा प्रणाली की नये सिरे से स्थापना

सऊदी अरब में महिलाओं के साथ व्यवहार हमारे बच्चों को स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा का नतीजा हैं।

हमारे पाठ्यक्रम की सामग्री बहुत ख़तरनाक है। सबसे पहले तो हमारे बच्चों को सिखाया जाता है कि महिलाओं की समाज में स्थिति कमतर है। उनका काम सिर्फ़ अपने परिवार की सेवा करना और बच्चे पालना है। उन्हें पढ़ाया जाता है कि उन्हें खुदा के अलावा किसी और की इबादत करनी पड़े तो वो उनका शौहर होना चाहिए। उन्हें पढ़ाया जाता है कि अगर महिलाएं अपने पतियों की आज्ञाकारिता नहीं करेंगी तो फरिश्ते उन पर लानत भेजेंगे। ये सब कुरान की गलत तशरीह (व्याख्या) का परिणाम है। मैं इन विश्वासों को बुनियादी तौर पर ज़ालिमाना समझती हूँ।

इसके अलावा हमारी शिक्षा प्रणाली का ध्यान धार्मिक विषयों जैसे हदीस,  फ़िक़्ह, तफ्सीर और कुरान पर केंद्रित है। वहाँ सोच ये है कि धर्म के अलावा कुछ भी पढ़ने से आपको जन्नत में जाने के लिए मदद नहीं मिलेगी तो अपना वक्त बर्बाद न किया जाये। मेरे खयाल में दीनी तालीम सिर्फ कुरान और सुन्नत तक सीमित होनी चाहिए जहां इस्लाम की मूल नैतिकताएं हैं। बाकी सब कुछ सिर्फ बिना समझे केवल हाफिजे पर आधारित ज्ञान है जो बहुत खतरनाक है। उसने हमारे नौजवानों को कट्टरपंथ और आतंकवाद की ओर धकेल दिया है।

बजाय इसके कि हम अपने युवाओं की प्रतिभाओं को ऐसे शब्दों को याद करने पर लगायें जिनकी असलियत पर शक है,  हमें चाहिए कि हम उन्हें स्वतंत्र और अभिनव सोच पर मजबूर करें और उन्हें अपने समाज की बेहतरी के लिए इस्तेमाल करें। इस्लाम धर्म के शुरुआत के दिन बड़े रचनात्मक थे। उलेमा विज्ञान और साहित्य में शानदार प्रदर्शन किया करते थे। हमारा धर्म वो ढाल नहीं होनी चाहिए जिसके पीछे हम दुनिया से छिपें बल्कि ये वो ताक़त होनी चाहिए जो हमें अपने आसपास के माहौल को बेहतर और अभिनव पसंद बनाने में मदद करे। यही इस्लाम की मूल आत्मा है।

समाज सेवा का पूरी तरह सुधार

सामाजिक मामलों के मंत्रालय,  महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने के बजाय उन पर होने वाले अत्याचार को अनदेखा कर रहे हैं। मज़लूम महिलाएं जिन पनाहगाहों में जा सकती हैं, वहां उनको बार बार कहा जाता है कि पनाह मांग कर उन्होंने अपने परिवारों का अपमान कराया है।

अगर वो किसी प्रभावशाली परिवार से संबंध रखती है, तो उन्हें एक शक्तिशाली मर्द के खौफ से तुरंत वापस भेज दिया जाता है। नतीजे के तौर पर हमारे सामने ऐसी कई मिसालें हैं जहां पढ़ी लिखी महिलाओं को उन पर अत्याचार करने वालों के पास वापस भेजा गया और उन्होंने खुद कुशी कर ली।

हमें स्वतंत्र महिलाओं की पनाह गाहें बनानी होंगी, जहां उनके अधिकारों को परिवारिक परंपराओं से ज़्यादा ताक़तवर कानूनों का संरक्षण हासिल हो।

मंत्रालय न सिर्फ महिलाओं के अधिकारों का हनन करती है बल्कि देश में बढ़ती हुई गरीबी की भी एक वजह है। ये एक बेईमान व्यवस्था है और इसमें पारदर्शिता की कमी के कारण हमारी लगभग आधी आबादी गरीब है, हालांकि हम विश्व के अमीर देशों में से एक हैं।

महरम का किरदार

सऊदी अरब में महिलाएं महरम के बिना कहीं आ जा नहीं सकती हैं।

नबी (स.अ.व.) के ज़माने में महिलाओं के साथ पुरुष को भेजा जाता था लेकिन उस वक्त का अरब एक लुटेरों से भरे हुए मैदान से कम नहीं था।

आज की दुनिया में इस कानून का मकसद सिर्फ महिलाओं के एक जगह से दूसरी जगह आने जाने को को सीमित करना है। इससे न सिर्फ महिलाओं की सोच आगे नहीं बढ़ पाती है बल्कि पुरुषों पर भी वो बे वजह बोझ बनती हैं।

इस वक्त सऊदी अरब में महिलाओं को गाड़ी चलाने की इजाज़त नहीं है।

पश्चिमी पर्यवेक्षकों के लिए सबसे अधिक चिंता की बात यही है लेकिन अभी दूसरे महत्वपूर्ण अधिकार हैं जिन तक उनकी पहुँच होना जरूरी है।

मैं निश्चित तौर पर महिलाओं के गाड़ी चलाने के पक्ष में हूँ लेकिन मेरा मानना ​​है कि इस कानून के हनन का ये सही समय नहीं है। मौजूदा हालात में अगर कोई महिला गाड़ी चलाएगी तो उसको सबक़ सिखाने के लिए बेवजह रोका या मारा भी जा सकता है।

यही वजह है कि मैं तब तक महिलाओं के गाड़ी चलाने के खिलाफ हूँ जब तक हम इतने पढ़े लिखे न हों और जब तक हमारे पास इस तरह के पागलपन से हिफाज़त के लिए ज़रूरी कानून न हों। वरना तो यह बिल्कुल उसके बराबर है कि चरमपंथी लोगों को इजाज़त दे दी जाए कि वह हमें और ज्यादा तंग करें। अगर महिलाओं के गाड़ी चलाने पर उन्हें तंग किया गया तो वो इस्लामी दुनिया से कहेंगे कि देखा महिलाओं के गाड़ी चलाने से क्या होता है,  उन्हें छेड़ा और तंग किया जाता है। इसके बाद महिलाओं को काबू में करने के लिए कड़े नियमों की मांग आ जाएगी और वो चीज़ है जिसे हम इस वक्त बर्दाश्त नहीं कर सकते। इसलिए इस कदम से पहले कानून और नियमों की नज़र में महिलाओं के बारे में बुनियादी बदलाव जरूरी हैं।

बुनियादी तौर पर सऊदी अरब में सभी नागरिकों के अधिकार महत्वपूर्ण हैं और उनमें से ही महिलाओं के अधिकार ज़ाहिर होंगे।

स्रोतः बीबीसी उर्दू

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/i-will-like-to-see-many-changes--saudi-princess-hamsa--بہت-سی-تبدیلیاں-دیکھنا-چاہوں-گی---سعودی-شہزادی-بسمہ/d/7037

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