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Hindi Section ( 18 March 2014, NewAgeIslam.Com)

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Was Salman Farsi Iraq's Rafdy? क्या हज़रत सलमान फारसी इराक के राफ़्दी थे?

 

 

 

 

 

बासिल हेजाज़ी, न्यु एज इस्लाम

18 मार्च, 2014

सूरे माइदा की आयत 69 में आया है:

إِنَّ الَّذِينَ آمَنُوا وَالَّذِينَ هَادُوا وَالصَّابِئُونَ وَالنَّصَارَىٰ مَنْ آمَنَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَعَمِلَ صَالِحًا فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ

अनुवादः निस्संदेह वो लोग जो ईमान लाए हैं और जो यहूदी हुए हैं और साबई और ईसाई, उनमें से जो कोई भी अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाए और अच्छा कर्म करे तो ऐसे लोगों को न तो कोई डर होगा और न वो शोकाकुल होंगे।

आयत से पता चलता है चूँकि यहूदी और ईसाई अल्लाह और यौमे आखिरत (प्रलय) पर ईमान रखते हैं इसलिए इनमें से जो कोई भी अच्छा काम करेगा उन्हें किसी डर व ग़म का सामना नहीं करना पड़ेगा जिसके लिए उन्हें मुसलमान होने की भी कोई ज़रूरत नहीं, मगर साबेईन का क्या? उन्हें डर क्यों नहीं? क्या वो अहले किताब हैं जो उन्हें डर नहीं? आखिर इसके क्या तर्क हो सकते हैं? क्या साबेईन का सम्बंध फारस था? क्या वो बुत परस्त (मूर्तिपूजक) नहीं थे? इब्ने कसीर ने ऊपरोक्त आयत की व्याख्या में लिखा है कि ये आयत हज़रत सलमान फारसी के दोस्तों पर नाज़िल हुई थी, चूँकि हज़रत सलमान फारसी पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के बहुत क़रीब थे, इसलिए एक दिन हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पास बैठकर उन्हें साबेईन के बारे में बताने लगे कि वो आपके आने से पहले आप पर ईमान (विश्वास) ले आए थे जिस पर पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने कहा कि साबेईन जहन्नम (नरक) जाने वालों में से हैं, ये सुन कर हज़रत सलमान फारसी उनके लिए बहुत दुखी हुए जिस पर अल्लाह ने ये आयत नाज़िल की और बताया कि साबेईन पर कोई खौफ नहीं लेकिन न तो फारस के इतिहास और न ही खोजे गये पुरातात्विक अवशेषों से ये बात किसी तरह से साबित होती है कि साबेईन किसी आसमानी धर्म के अनुयायी थे या वो हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के आने से पहले उन पर ईमान लाए थे। इसलिए लगता है कि उपरोक्त आयत में साबेईन को यहूदी व ईसाई की सूची में जिन पर कोई खौफ नहीं हज़रत सलमान फारसी को राज़ी करने के लिए शामिल कर दिया गया क्योंकि जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने हज़रत सलमान फारसी को ये बताया था कि वो जहन्नम में जाएंगे तो वो उनके लिए बड़े दुखी हुए थे।

इब्ने कसीर लिखते हैं कि इस्लाम से पहले हज़रत सलमान फारसी का धर्म साबई था और ये कि साबेईयों का सम्बंध फारस से था, लेकिन ज़्यादातर ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार इस धर्म के मानने वालों का सम्बंध फारस से नहीं बल्कि बलाद अलराफेदीन (मेसौपोटामिया) से था ....

इब्ने अलनदीम कहते हैं कि मौजूदा धर्मों में साबेईत सबसे पुराना धर्म है और इसकी जड़ें बाबलियों के अवशेषों और उनकी खगोल विद्या और ज्योतिष शास्त्र में हैं।

ऐतिहासिक स्रोतों से पता चलता है कि हज़रत सलमान फारसी विभिन्न विज्ञानों खासकर इल्मे लाहूत की काफी गहरी जानकारी रखते थे। सच की तलाश में उन्होंने काफी यात्रा की और बहुत सारे इलाके देखे और अपने ज़माने के विभिन्न धर्मों से सम्बंधित धार्मिक विद्वानों से मुलाक़ातें की।

इतिहास के सरल अध्ययन से ही पता चल जाता है कि बलाद अलराफेदीन या जिसे आजकल आम भाषा में मेसोपोटामिया कहा जाता है, विविध धर्मों वाला क्षेत्र था, अधिकांश धर्मों खासकर आसमानी धर्मों ने इस क्षेत्र की धरती से बहुत सारे किस्से लिये या नकल किये हैं जैसे ब्रह्माण्ड की रचना की कहानी, खुदाओं और फरिश्तों के नाम आदि। फ़रास अलसवाह ने अपनी किताब मगामरतुल अक़्लुल अवला में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की है और ब्रह्माण्ड की रचना की कहानी को सुमेरियों से लेकर कुलदानियों तक यहां तक ​​कि तौरेत के इन किस्सों से उद्धरण को भी बड़े विस्तार से वर्णन किया है।

इतिहास की अधिकांश किताबें इस बात पर सहमत हैं कि इस धर्म के मानने वाले बलाद अलराफेदीन या मेसोपोटामिया में रहे हैं। सलीम मतर अपनी किताब अलज़ात अलजरीहतः में लिखते हैं कि राफेदीन की कुछ आबादी ने अरब विजेताओं को गुस्सा दिलाने के लिए, जिन्होंने किसानों का शोषण किया था और उन पर जज़िया लागू किया था, फ़ारसी वंश का दावा किया ... एक जगह लिखते हैं कि वास्तव में फारस के लोग इराकी धर्मों से प्रभावित थे न कि इसके उलट  जैसा कि समझा जाता है यानी फारस के धर्मों में वास्तव में इराकी धर्मों का प्रभाव था।

सलीम मतर साबेईयों के बारे में आगे लिखते हैं कि उनकी मूल भाषा आरामी थी कि आम तौर पर इस क्षेत्र यानी मेसोपोटामिया की भाषा थी और ये कि मानी जो कि मानवी धर्म का संस्थापक था, ने भी कुछ समय तक साबेईयत को अपनाया था। इसके अलावा इमामे आज़म अबु हनीफा उनसे शादी के औचित्य का फतवा दिया और उन्हें मौहिद (एकेश्वरवादी) करार दिया ...!?

अज़ीज़ सबाही अपनी किताब उसूल अलसाबतः अलमन्दाईन में लिखते हैं कि साबई साहित्य छह भागों में विभाजित है। इसमें पहले स्थान पर काहिनों (भविष्यवक्ताओं) के गुप्त ग्रंथों आते हैं जिन्हें दीवान कहा जाता है, दूसरे स्थान पर इबादत  (पूजा) की व्याख्या के ग्रंथ आते हैं जबकि तीसरे नंबर पर नातें (प्रशंसा गीत) आती हैं जो पूजा के समय पढ़ी जाती हैं, इन्हें नैनानी कहा जाता है, चौथे नंबर पर ब्रह्माण्ड रचना का किस्सा और अच्छाई व बुराई की अनन्त लड़ाई का बयान है जिसमें इनकी मशहूर किताब कनज़रबा और दराशा देहिया यानी याह्या की किताब आती हैं। पांचवें नंबर पर खगोल विद्या जबकि छठे नंबर पर तावीज़ और दुआएं है।

साबई साहित्य के पाठक को इसमें तौरेत से काफी समानता नज़र आएगी। रफीक अलनमरी अलरिसालात अलसमावियः में लिखते हैं कि यहूदियों ने बाबुली गुलामी से आज़ादी के बाद अपने वतन लौट कर तौरेत लिखी जिसमें उन्होंने मेसोपोटामिया वालों का न केवल ब्रह्माण्ड रचना का सिद्धांत बल्कि अब्राम सोमरी और उसकी बहन साराई के किस्से को भी पैगम्बर इब्राहिम और सारा से बदल कर तौरेत में शामिल कर दिया।

अब्दुल रज़्ज़ाक अलहसनी अपनी किताब अलसाबेअतः क़दीमन् व हदीसन् में लिखते हैं कि ये धर्म दुनिया के सबसे पुराने धर्मों में से एक है जो अब तक बाकी है। इसमें न सिर्फ ग्रहों और तारों की पूजा की जाती है बल्कि साबेईयों ने बहुत पहले अल्लाह और फरिश्ते मालूम कर लिए थे। पेज 24 पर वो लिखते हैं कि हाल के साबेईयों के इतिहास से पता चलता है जो प्राचीन साबेईन से बहुत मिलते जुलते हैं कि ये लोग दजला और फरात के किनारे रहा करते थे। इस धर्म के विकास के चरणों पर प्रकाश डालते हुए वो लिखते हैं कि शुरुआत में उन्होंने भौतिक शक्तियों और सितारों और ग्रहों की पूजा, दूसरे चरण में ग्रहों और सितारों की तज्सीद करते हुए मूर्तियों की पूजा की गई जिसके बाद ये धर्म किताबों और सफरनामों के चरण में प्रवेश किया जो इसके विकास का तीसरा चरण था।

उपरोक्त हवालों से ये बात स्पष्ट हो जाती है कि इस धर्म के मानने वाले बलाद अलराफेदीन यानी मेसोपोटामिया के क्षेत्र में रहा करते थे, यहां तक ​​कि शब्द सलमान खुद एक आरामी शब्द या नाम है, फ़ारसी नहीं।

न्यु एज इस्लाम के स्तम्भकार बासिल हेजाज़ी पाकिस्तान के रहने वाले हैं। स्वतंत्र पत्रकार हैं, धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन और इतिहास इनके खास विषय हैं। सऊदी अरब में इस्लामिक स्टडीज़ की पढ़ाई की, अरब राजनीति पर गहरी नज़र रखते हैं, उदार और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के ज़बरदस्त समर्थक हैं। इस्लाम में ठहराव का सख्ती से विरोध करते हैं, इनका कहना है कि इस्लाम में लचीलापन मौजूद है जो परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता रखता है। ठहराव को बढ़ावा देने वाले उलमाए इस्लाम के सख्त रुख के कारण वर्तमान समय में इस्लाम एक धर्म से ज़्यादा वैश्विक विवाद बन कर रह गया है। वो समझते हैं कि आधुनिक विचारधारा को इस्लामी सांचे में ढाले बिना मुसलमानों की स्थिति में परिवर्तन सम्भव नहीं।

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