
बासिल हिजाज़ी, न्यू एज इस्लाम
पिछले वर्ष अक्टूबर के महीने में मिस्र के राजधानी काहेरा में हत्या की एक विशिष्ट वारदात हुई जो ना ही अपनी तरह की पहली वारदात थी और शायद ना ही आखरी, यह वारदात वहाबी दृष्टिकोण के हामिल एक व्यक्ति ने अंजाम दी, उसने समआत शहाता नामक एक किब्ती पादरी को चाकू के एक के बाद एक वार से मौत के घात उतार दिया, हत्यारा पकड़ा गया और जेल के हवाले कर दिया गया, छानबीन से पता चला कि हत्यारा अपने कट्टरपंथी वहाबी दृष्टिकोण के लिए मशहूर था, उसने मृतक के माथे पर अपने चाक़ू से क्रूस का चिन्ह बना दिया था जो ईसाईयों के लिए उसकी घृणा व्यक्त करता थाl
यह घटना कोई ख़ास नहीं, इस्लामी दुनिया के क्षेत्रफल में ऐसी घटनाएं प्रतिदिन घटित होती हैं बस कुछ ही रिपोर्ट हो पाते हैं, बहरहाल हम बात कर रहे थे मिस्र के एक केस की, तो ऐसा हुआ कि इस केस ने (एक बार फिर) धार्मिक विषयों के परिवर्तन की बहस छेड़ दी, यह एक कठिन बहस इसलिए भी है कि मिस्र के क्षेत्रफल में फैली मस्जिदों में खुतबे यहूदी व ईसाई को बुरा भला कहे बिना समाप्त ही नहीं होते, सत्तर की दशक में जब वहाबियत मिस्र व दुसरे इस्लामी दुनिया में दाखिल हुई ऐसी घटनाएँ और खुतबे आम होना प्रारम्भ हुए, सऊदी अरब ने अज़हर के शेखों की सरकारी खर्च पर मेज़बानी की, उनहें इनाम व इकराम से नवाजा, वापस जा कर उन शेखों ने अजहर के दर व दीवार को वहाबियत के ज़हर से गंदा किया और इस तरह वहाबियत फलने फूलने लगीl
आज अज़हर और मिस्र की अवकाफ मंत्रालय इस वहाबी इस्लामी बयानिये को रोकने और मिम्बर के खुत्बों के आधुनिकीकरण के लिए प्रयासरत हैं इसलिए तीन चौथाई शताब्दी गुजरने के बाद तकफीरी विचार का फैलाव इतना आम हो गया है कि इसका अंत किसी पारंपरिक तरीके से संभव दिखाई नहीं देता, मिस्र सहित अधिकतर अरब व इस्लामी देशों में लोग गैर मुस्लिमों के लिए की गई बददुआ ना केवल सुनने के आदी हो चुके हैं बल्कि इसके पीछे “आमीन” कहना अब फ़र्ज़ समझने लगे हैं, लगभग सभी मस्जिदों के मिम्बरों से यह ग़लीज़ और घृणित बददुआएं प्रतिदिन सीधे ब्राडकास्ट की जाती हैं, ऐसा करते हुए उन मस्जिदों के खुतबा एक पल के लिए भी नहीं सोचते कि वह दुनिया के साढ़े पांच अरब लोगों के मज़हब का अपमान कर रहे हैं और इस्लाम की एक कराहियत वाली शकल दुनिया को दिखा रहे हैं, केवल यही नहीं बल्कि इस्लाम के दुसरे मकातिबे फ़िक्र के खिलाफ बददुआएं भी उन बददुआओं में शामिल हो गई हैंl
यह (बद) दुआएं सीरत की किताबों में वारिद हुई हैं, यह वही किताबें हैं जिन्होंने यह भी रिवायत किया और गवाही दी कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पाक ज़ात से कभी किसी यहूदी या ईसाई के लिए बद दुआ नहीं निकली, यह ईमान का एक खुला अंतर्विरोध है मगर मुसलमान ऐसे विरोधाभास में जीने के आदी हो गए हैं या बना दिए गए हैं, इन विरोधाभास का अंत तब तक संभव नहीं जब तक इन किताबों से उन लंगड़ी विचार को निकाल बाहर नहीं किया जाता, यह फ़िक्र पहले दर्जे में ही कुरआन और सुन्नत पर अमल के लिए हानिकारक है, इसके अंत के बिना इस्लाम के नाम पर फैलती दहशतगर्दी का अंत संभव नहींl
बहरहाल वहाबी वर्ग का इसरार है कि यह दुआएं नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से “सल्फे सालेह” ने नक़ल की हैं जिनहें हर जुमे के खुतबे के आखिर में दुहराना फ़र्ज़ समझा जाता है, ऐसी ही एक (बद) दुआ का मफहूम कुछ इस प्रकार है “ ऐ अल्लाह मुशरेकीन व यहूद व नसारा की आँखों को अंधा करदे, ऐ अल्लाह उनहें बहरा कर दे, उनके अमीर को फकीर बना दे, उनकी औरतों को बेवह और बच्चों को यतीम कर दे....”l
इस खौफनाक व अनैतिक कलाम का बार बार दुहराव लोगों के ज़ेहन में गैर मुस्लिमों के लिए नफ़रत को इतना पुख्ता कर देता है कि उनहें मध्यम दृष्टिकोण की ओर लाना जुए शेरबन जाता है, वहाबियत के खतीब ऐसी बददुआओं में दुसरे इस्लामी मकातिबे फ़िक्र को भी शामिल कर देते हैं जैसे शिया, सेक्युलर, कौम परस्त, सूफी आदिl
होना तो यह चाहिए था कि खुतबा गैर मुस्लिमों के लिए हिदायत व फलाह की दुआ करते जैसा कि सुरह मुमतहेना की आयत नंबर 8 में फरमाया गया है कि “لَا یَنۡہٰىکُمُ اللّٰہُ عَنِ الَّذِیۡنَ لَمۡ یُقَاتِلُوۡکُمۡ فِی الدِّیۡنِ وَ لَمۡ یُخۡرِجُوۡکُمۡ مِّنۡ دِیَارِکُمۡ اَنۡ تَبَرُّوۡہُمۡ وَ تُقۡسِطُوۡۤا اِلَیۡہِمۡ ؕ اِنَّ اللّٰہَ یُحِبُّ الۡمُقۡسِطِیۡنَ” (जिन लोगों ने तुमसे दीन के बारे में जंग नहीं की और ना तुमको तुम्हारे घरों से निकाला उनके साथ भलाई और इन्साफ का सुलूक करने से अल्लाह तुमको मना नहीं करताl अल्लाह तो इंसाफ करने वालों को दोस्त रखता हैl) आयत से स्पष्ट है कि जो कोई भी गैर मुस्लिम मुसलामानों के खिलाफ किसी जंग में शामिल नहीं उसके साथ अच्छा सुलूक व बर्ताव मनो आदेश का दर्जा रखता है वरना इसका उल्लेख ही क्यों किया जाता, अब कहाँ यह आफाकी संदेश और कहां यह अनैतिकता कि मिम्बरे रसूल पर बैठ कर बदतरीन व अनैतिक बददुआएं उगल कर अपनी वैचारिक गिरावट तो दिखाई ही जाए साथ ही इस्लाम की बदनामी का कारण भी बना जाएl
इस परकार की बाददुआएं कतई तौर पर इस्लाम के आफाकी संदेश से मेल नहीं खातीं, इस्लाम का जौहर प्रेम अमन और भाईचारा है, इसमें ताकत के दौर में घमंड के लिए कोई जगह नहीं, नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सदैव विरोधियों के लिए हिदायत की दुआ की, सीरत की किताबों में ही उल्लेख है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अहले ताईफ से पत्थर खाने के बाद भी यही कहा कि “اللہم اہد ثقیفاً” (ऐ अल्लाह सकीफ को हिदायत दे) आखरी हज के खुतबे में भी यह कह कर कि “یا ایہا الناس ان ربکم واحد” (ऐ लोगों तुम्हारा खुदा एक है) मुस्लिम व गैर मुस्लिम का अंतर ही समाप्त कर दिया वरना वह “یا ایہا الناس” (ऐ लोगों) के बजाए “یا ایہا المؤمنین” (ऐ मोमिनों) कह सकते थे, मगर उनहें इन बारीकियों का खयाल था, कुरआन में भी अल्लाह पाक ने दुसरे धर्मों के मानने वालों के अच्छे कामों का ज़िक्र करके उनहें क्रेडिट दिया है: “لَيْسُواْ سَوَاء مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ أُمَّةٌ قَائِمَةٌ يَتْلُونَ آيَاتِ اللَّهِ آنَاء اللَّيْلِ وَهُمْ يَسْجُدُونَ . يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الآخِرِ وَيَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنكَرِ وَيُسَارِعُونَ فِي الْخَيْرَاتِ وَأُولَئِكَ مِنَ الصَّالِحِينَ. وَمَا يَفْعَلُواْ مِنْ خَيْرٍ فَلَن يُكْفَرُوهُ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالْمُتَّقِينَ” (यह भी सब एक जैसे नहीं हैंl उन अहले किताब में कुछ अच्छे लोग भी हैंl जो रात के समय अल्लाह की आयतें पढ़ते और उसके आगे सजदे करते हैंl वह अल्लाह पर और आखिरत के दिन पर ईमान रखते और अच्छे काम करने को कहते और बुरी बातों से मना करते और नेकियों पर लपकते हैं और यही लोग नेको कार हैंl और यह जिस प्रकार की नेकी करेंगे उसकी नाकद्री नहीं की जाएगी और अल्लाह परहेज़गारों को खूब जानता हैl) आले इमरान 113,114, 115
उद्देश्य यह है कि इस हवाले से लम्बी दलीलें पेश की जा सकती हैं कि अल्लाह पाक कभी मुसलमानों से यह नहीं चाहेगा कि वह गैरमुस्लिमों के खिलाफ यह गली गलौज करें, अगर इस बात को थोड़ी देर के लिए मां लें तो क्या होगा, इस्तेताअत होने पर मुसलमान गैरमुस्लिमों का क़त्लेआम शुरू कर देंगे और इतिहास में एक और मर्गे अम्बोह रकम कर डालेंगे, गैरमुस्लिमों के अधिकार सुरक्षित नहीं रहेंगे चाहे ज़ालिम मुसलमान ही क्यों ना हो, आइएसआइएस भी तो यही कर रही है, अगर यही इस्लाम है तो फिर क्या हम यह कहने में हक़बजानिब होंगे कि मुसलामानों की बहुलता केवल दिखावटी तौर पर आइएसआइएस जैसी आतंकवादी संगठन की निंदा करती है जबकि दिल में वह उसे सपोर्ट करते हैं, अगर कोई यह समझता है कि इस तरह की निर्दयी सोच ले कर वह अल्लाह और उसके रसूल का कुर्ब हासिल कर लेगा तो यह असंभव है, इस्लाम दुनिया को बर्बाद करने नहीं इसे आबाद करनें आया है, अपने अंदर के आइएसआइएस को तलाश करें और उसे निकाल बाहर करें, याद रखें कि किसी को मुशर्रफ बा इस्लाम करने का अजर हासिल करने के लिए आपको एक “काफिर” की ज़रूरत पड़ेगीl
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