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Hindi Section ( 23 Dec 2011, NewAgeIslam.Com)

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Defending the ideology पाकिस्तानी विचारधारा का बचाव


आयशा सिद्दीका (अंग्रेज़ी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

हाल ही में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसुफ रज़ा गीलानी ने फौज को न सिर्फ राष्ट्रीय सीमाओं बल्कि विचारधारा की सीमाओं की रक्षा करने का काम दिया। प्रधानमंत्री का ये बयान पिछले 60 बरसों के उस तकलीफदेह दौर को याद दिलाता है जिस दौरान फौज मुल्क की सरहदों और उसके नज़रिये की हिफाज़त करती रही है।

फौज के एक रिटायर्ड एयरमार्शल की हैसियत से असगर खान ने सही कहा कि ये राजनीतिक तब्के की एहसासे कमतरी (हीन भावना) को ज़ाहिर करती है, जब वो विचारधारा पर फौज के साथ बहस करते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि फौज को विचारधार की सीमाओं की रक्षा का काम सौंपना भी गलत है। मसला सिर्फ फौज को ये काम देने के बारे में नहीं है बल्कि इसमें भी है कि फौज से किस चीज़ की रक्षा की आशा की जा रही है।

हम अब भी इस सवाल से जूझ रहे हैं कि आखिर देश की विचारधारा क्या है? क्या ये भारतीय प्रायद्वीप के मुसलमानों के लिए बनाया गया एक देश है और उन्हें रहने के लिए जगह देने के मकसद से बनाया गया है, या इस्लाम के ऐसे किले का निर्माण है जो दक्षिण एशिया में दूसरी अन्य ताकतों को संतुलित कर सके। ये दो अलग तरह के विचार हैं।

पहले खयाल के मुताबिक प्रयद्वीप के मुसलमानों ने ये सोचा कि इनके पास संसाधनों के उचित बंटवारे को लागू करने का मौका नहीं था इसलिए इन लोगों को दूसरा देश बनाना पड़ा। क्योंकि ये समस्या सामाजिक और आर्थिक थी इसलिए इसे प्राकृतिक रूप से उस तरह का देश ही अंजाम दे सकता था जो विभिन्न जातीय और धार्मिक समुदायों में संसाधनों के उचित बंटवारे को अंजाम दे सके। हालांकि ये नहीं हुआ। 60 बरसों के अपने वजूद के बाद हम पाते हैं कि समाज नस्ल, धर्म और साम्प्रदायिकता के आधार पर बंटा हुआ है।

पाकिस्तानी प्रशासन अक्सर इस बात पर हैरान होता है कि पाकिस्तानी अपनी समस्याओं पर देश से बाहर बहस कर रहे हैं। ऐसे इसलिए है कि देश की विचारधारा में इतना विस्तार नहीं हैं कि लोग इसमें रहते हुए अपनी समस्याओं को उठा सकें। इसलिए वो लगातार गैरजानिबदार (तटस्थ) पैरोकारों की तलाश करते रहते हैं।

क्या ये विचारधारा बलोचियों, सिंधियों, पख्तून और अन्य जातीय अल्पसंख्यकों की आशाओं और अपेक्षाओं को शामिल रखता है, जो इसका हिस्सा बनना चाहते हैं? नहीं, बल्कि इसके बजाय ये लोग वंचित होने का एहसास करते हैं या क्या ये कि इस विचाराधारा की रक्षा में हमेशा बंदूक की गोली ही आज़मायेंगें जैसा कि 1970 के दशक में पूर्वी पाकिस्तान और बलोचिस्तान में हुआ या 1980 और 1990 के दशक में सिंध और हाल ही में बलोचिस्तान में हुआ?

देश की नौकरशाही को विचारधारा की रक्षा की ज़िम्मेदारी में समस्या ये है कि नौकरशाही फिर अपने अंदाज़ में विचारधारा को इस तरह परिभाषित करने की कोशिश करती है जिसकी आसानी से कल्पना की जा सके और उस पर आसानी से अमल भी किया जा सके। कौम मुसलमानों के लिए एक देश से व्यापक धार्मिक नज़रिये की रक्षा करने वाले देश में परिवर्तित हुआ है। इस तरह की कल्पना कौम और हथियारबंद फौजियों दोनों के लिए दुगनी परेशानी का कारण बन जाते हैं और फौज को कई सालों से विशाल विचारधारा की रक्षा के काम में लगाया गया है।

देश के संस्थापकों ने इसकी विचारधारा को परिभाषा को स्पष्ट नहीं किया और देश की परेशान हाल राजनीति ने इस समस्या को और बढ़ा दिया और देश खुद को इस्लाम के एक किले के तौर पर पेश करने के रास्ते पर बढ़ चला। ताकत के लिए औचित्य के रूप में धर्म का इस्तेमाल होने लगा। यहाँ तक की सेकुलर माने जाने वाले लीडरों जनरल अय्यूब खान, यह्या खान और ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने भी इस रणनीति का इस्तेमाल जनता का समर्थन हासिल करने के लिए किया।

अय्यूब खान के दौर में पाकिस्तान को आबादी के अनुसार दुनिया के सबसे बड़े देश के रूप में पेश किया जाता था जिसने कई मुस्लिम देशों जैसे मिस्र को नाराज़ कर दिया। बाद में ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने  पाकिस्तान को मुस्लिम दुनिया का लीडर कहना शुरु कर दिया। हर एक लीडर ने इस पैमाने को और ऊपर किया और इसने प्राकृतिक रूप से फौज की सोच को भी प्रभावित किया।

धर्म को आक्रामक फौजी रणनीति के लिए भी इस्तेमाल किया गया। इस सिलसिले में सिर्फ जनरल ज़ियाउल हक़ के दौर एक्तेदार को ही नहीं बल्कि उनसे पहले की नस्लों के कई जनरलों का हवाला दिया जा सकता है। इस्लाम का पहली बार इस्तेमाल 1947-48 में हिंदुस्तान के साथ जंग में किया गया ताकि उत्तरी कबायलियों का समर्थन हासिल किया जा सके। ये रणनीति 1965 की जंग में दोबार इस्तेमाल की गयी।

एक बार फिर फौज और धार्मिक संगठनों जैसे जमाते इस्लामी के बीच रणनीति के तहत सम्बंध कायम हुए ताकि अल-शम्स और अल-बदर जैसे उप-संगठन बनाये जा सके जो पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति वाहिनी से जंग कर सकें। हालांकि ये रिश्ता पाकिस्तान की कोई खास मदद नहीं कर सका, लेकिन धार्मिक संगठनों और सेकुलर मानी जाने वाली फौज के सम्बंध जारी रहे और ये रिश्ता जनरल ज़ियाउल हक और उनके बाद के जमाने में और मज़बूत हुए।

फौज और आतंकवादियों के बीच सम्बंध बताता है कि देश की नौकरशाही विचाराधारा को किस तरह परिभाषित करती है। और आतंकवादी परम्परागत और परमाणु युद्ध के बीच की कमी को पूरा करने के लिए इस्तेमाल किये जाते है। ये समस्या अब आत्मघाती बमबारों और आतंकवाद की शक्ल में हमारे सामने आ रही है।

फौज और आतंकवादियों के बीच सम्बंध, फौज को विचारधारा को परिभाषित करने और फिर उसकी रक्षा करने की इजाज़त देने का नतीजा है। और ये सम्बंध फौज की औपनिवेशिक काल के बाद की मानसिकता के कारण और भी गहरा हुआ है। आला अफसरों ने धर्म का इस्तेमाल बिना इस डर के किया कि इसका असर फौज के रैंक और फाइल पर क्या होगा, जिस फौज से उम्मीद की जाती है कि वो अपने सीनियरों का आदेश मानेगी।

चूंकि आतंकवादियों और फौज के बीच बातचीत कुछ तब्के तक ही सीमित थी लेकिन फौज का बड़ा हिस्सा इससे प्रभावित नहीं हुआ। किसी भी सूरत में देश के सामाजिक व आर्थिक हालात में लोगों का बड़ा हिस्सा आला लोगों के आदेशों पर अमल करता है, यहाँ तक कि अगर वो उनके आदेशों को वैचारिक रूप से स्वीकार नहीं करते हैं तब भी।

ये समस्या का सिर्फ एक हिस्सा है। दूसरे का सम्बंध राज्य से प्रेम के कारण इस एहसास से है जिसके तहत ये अफसर लाखों लोगों के विरोध और देश के लिए खतरा माने जाने के बावजूद खुद के सही होने का एहसास रखते हैं। नागरिकों (निश्चित तौर पर राजनीतिज्ञों) के बहुसंख्यक को राष्ट्रीय हिस से मोहब्बत न रखने वाले के तौर पर देखा जाता है। विडम्बना ये है कि वर्दीधारी ये लोग आम नागरिकों (यहाँ तक कि जो भ्रष्ट नहीं हैं) के बारे में फैसला आम नागरिकों के जीवन का बहुत कम तजुर्बा और उनके संगठन (फौज) ने किस विचारधारा से उनकी ट्रेनिंग की है, के आधार पर करते हैं।

मिसाल के तौर पर सभी कारोबारियों को शक की नजर से देखा जाता है, क्योंकि ये पाया जाता है कि वो जब पब्लिक सेक्टर और फौज के कंट्रोल वाले रक्षा संस्थानों के साथ कारोबार करते हैं तब भी वो मुनाफा कमाने की कोशिश करते हैं। अक्सर एक कारोबारी व्यक्ति के लाभ कमाने की ज़रूरत को नहीं समझा जाता है।

देश को फौजी और नागरिक संस्थाओं के बीच असंतुलन का सामना करना पड़ रहा है। ये दो प्रजातियाँ है जिनका वजूद बराबरी के ताल्लुकात की झलक के बावजूद पाया जाता है। ऐसे हालात में ज़्याद ताकतवर धड़े को विचारधारा की सीमाओं को परिभाषित करने और उनकी रक्षा करने की ज़िम्मेदारी सौंपना सही नहीं है। इससे जो एक पेचीद समस्या पैदा होगी वो है कभी न खत्म होने वाली दुश्मनी।

60 बरसों के बाद भी अब भी देर नहीं हुई है कि विचारधारा पर बहस की जाये और विभिन्न हित रखने वाले अलग अलग लोगों के साथ बातचीत कर इस पर सहमति कायम की जाये। बाकी पाकिस्तान को जिस एक चीज़ की सख्त ज़रूरत है वो है मुल्क का मालिक होने का एहसास।

लेखिका स्वतंत्र रणनीतिक औऱ राजनीतिक विश्लेषक हैं (Email: Ayesha.ibd@gmail.com)

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