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Hindi Section ( 2 Sept 2012, NewAgeIslam.Com)

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Mindlessness On The March दीवानगी का रक्स (नृत्य) है और हम हैं दोस्तो


अयाज़ अमीर

1 सितम्बर, 2012

(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

आसमान गवाह है कि खुद तकलीफ पहुंचाने की हमारी क्षमता का इस धरती पर कोई मुकाबला नहीं है। हम रॉ, सीआईए या मोसाद की साजिशों के मोहताज नहीं हैं। ये बेचारी एजेंसियां ​​तो इस खराबी का दस्वाँ हिस्सा भी नहीं सोच सकतीं जिसके लिए हम अपने लिए खुद भूमिका बाँधते रहते हैं। अभी ईशनिंदा के कानूनों  की बहस खत्म नहीं हुई थी कि एक और केस ने सिर उठा लिया। तरस आता है इन विदेशियों पर जो हमारे छोटे से मामले पर आग बबूला हो जाने की बीमारी के कारण तलाश करने की कोशिश करते हैं और अगर वो लोग युवा ईसाई लड़की के मामले का जायज़ा ले, तो ये सच उनके सामने आ जायेगा कि हमारी बीमारी नाकाबिले इलाज ही नहीं बल्कि समझ में भी नहीं आने वाली है।

ये मामला है क्या? इसका जवाब तलाश करने के लिए इस्लामाबाद के उपनगरीय क्षेत्र मोहरा जाफर, जहाँ  ये घटना हुई है, मैं वहाँ की बलखाती हुई गलियों में गया और वहाँ मेरी मुलाकात अहमद से हुई, जो इस मामले में मुद्दई है। मैं अपने मन में ये कल्पना लिए हुए था कि मेरी मुलाकात एक मजहबी जुनूनी शख्स से होगी मगर मुझे ये देखकर आश्चर्य हुआ कि अहमद बहुत दोस्ताना तरीके से मुझसे मिला, बल्कि वो इतनी अहमियत मिलने पर कुछ घबराया हुआ सा था। मैंने उसकी शिक्षा के बारे में पूछा तो उसने कहा वो पांचवीं जमात तक पढ़ा है। वो कुछ पढ़ सकता था मगर लिखना नहीं जानता था। वह G-11 मार्केट में सीएनजी फिटिंग की वर्कशाप चलाता है। इस वर्कशाप की ऊपरी मंजिल के एक कमरे में वो मेरे साथ बैठा। वहाँ कुछ और मोटर मैकेनिक भी थे। मैंने उससे कुछ सवाल पूछे। अहमद ने कहा कि उसने देखा कि रमशा कुछ जले हुए कागज़ों को एक प्लास्टिक के बैग में लिये हुए थी। देखने पर पता चला कि वो '' नूरानी क़ायदे' के पन्ने हैं। और सभी मुसलमान जानते हैं कि ये कलामे इलाही नहीं अरबी के अक्षर और उनका उच्चारण सिखाने वाला एक बुनियादी क़ायदा है लेकिन एक अर्धशिक्षित व्यक्ति उसे कुरान समझ बैठा।

मैंने अहमद से पूछा कि एक क्षण के लिए उसे भूल जाएं कि उसने क्या जलाया था, क्या उस छोटी सी लड़की का इस्लाम से कोई झगड़ा है? उसने कहा कि ऐसा नहीं है और वहां मौजूद अन्य लोगों ने भी इसकी पुष्टि की। मैंने पूछा कि कुछ पन्नों को आग लग जाने से इस्लाम की महिमा को क्या खतरा है तो इसका उनके पास कोई जवाब नहीं था। क्या रमशा किसी की धार्मिक भावना को आहत करना चाहती थी? इस पर फिर वो चुप रहे। अहमद समझदार नज़र आता था मगर इन सवालों का उसके पास कोई जवाब नहीं था।

रमशा का छोटा सा घर, जो अब खुला पड़ा है, अहमद के पड़ोस में है और ये एक गंदा सा इलाका है जहां नाली का काला पानी फैला हुआ था और गली में जिस ऊंची जगह पर गंदा पानी नहीं जा सकता था, वहाँ गंदी घास उगी हुई थी, कचरा और प्लास्टिक बैग बिखरा हुए थे .... इस्लामाबाद की रौशनियाँ और खूबसूरती यहाँ से 'सात समंदर पार' हैं। इस गली के दोनों ओर एक एक कमरे वाले छोटे छोटे घर हैं। इससे कुछ आगे मोहल्ला बोवैल की मस्जिद है। मैंने कुछ घरों पर दस्तक दी तो पता चला कि यहां टोबा टेक सिंह, फ़ैसलाबाद और सरगोधा के मजदूर पेशे वाले लोग रहते हैं। आसपास फैली हुई गंदगी और बदबू से मेरा दिमाग फटा जा रहा था..... और ये थी वो जगह जहां से ईशनिंदा के इस मामले ने सिर उठाया था। वहाँ एक युवा लड़की महरीन नूर ने बताया कि वो जले हुए कागज़ों को लेकर इमाम मस्जिद के पास गई थी। जब महरीन ने मेरे चेहरे पर सवालिया भाव देखे तो उसने कहा .... '' जब मैंने उन जले हुए कागज़ों को देखा तो मेरा कलेजा फट गया और मैं सकते में आ गई।''  इस लड़की की उम्र दस या ग्यारह साल है।

इसके बाद इमाम साहब ने आपातस्थिति के आधार पर पूरे क्षेत्र की बैठक बुलाई और रमशा के परिवार को एक घंटे के भीतर इलाका छोड़ देने का हुक्म दिया। इस घटना की पुलिस को भी सूचना दी गई। सौभाग्य से मस्जिद के लाउडस्पीकर से कोई ऐलान नही किया गया लेकिन ये मामला उस समय बिगड़ गया जब ये खबर नजदीकी बाजार में पहुंची। इससे एक हंगामा खड़ा हो गया और इसमें कराची से आए हुए एक उर्दू बोलने वाले साहब आगे आगे रहे, जो बाजार में एक जनरल स्टोर चलाते हैंَ स्थानीय मस्जिद से ऐलान के बाद एक भीड़ जमा हो गई और सड़क जाम कर दी गयी। इसके बाद ये भीड़ रमना पुलिस स्टेशन पहुंची और अहमद की तरफ से रमशा के खिलाफ ईशनिंदा ​​की रिपोर्ट लिखवाई और लड़की को गिरफ्तार कर लिया गया। किसी पुलिस अधिकारी ने ये पता करने की ज़हमत नहीं  की असल घटना क्या हुई थी और क्या इतनी छोटी लड़की किसी तरह के ईशनिंदा के मामले में लिप्त हो सकती है या नहीं। पुलिस ने उग्र भीड़ को शांत करने के बजाए रिपोर्ट दर्ज कर ली। अब इस मामले में रमशा की उम्र को ध्यान में रखते हुए उसके साथ रिआयत बरतने की मांग सामने आ रही है और ये मूर्खता है क्योंकि इस मामले में उम्र का कोई मुद्दा नहीं है। सोचने की बात ये है कि क्या नूरानी क़ायदा इल्हामी किताब है और अगर कोई व्यक्ति, चाहे वह छोटी उम्र का हो या बड़ी उम्र का, अनजाने में इसके पन्नों को नष्ट करे तो क्या ये ईशनिंदा की श्रेणी में आता है? शेखुपुरा की आसिया का कमोबेश ऐसा ही मामला था। वो अभी तक जेल में है। बहावलपुर में एक मलंग पर पवित्र किताब के पन्नों को आग लगाने का इल्ज़ाम था, इसलिए उग्र भीड़ ने उसे पुलिस हिरासत से छीना और कत्ल कर दिया। विडम्बना ये है कि ऐसी घटनाएं गरीब इलाकों में पेश आती हैं। इन घटनाओं की शुरूआत चाहे कितने ही मामूली क्यों न हो अंजाम गंभीर होते हैं।

रमशा के घर के करीब के बाजार में मैंने लोगों के एक समूह से कहा कि मेरे घर में रोज़ाना छः या सात अखबार आते हैं। उर्दू अखबारों में धार्मिक परिशष्ट होते हैं, पवित्र स्थानों की तस्वीरें होती हैं, लेकिन जब ये अखबार पुराने हो जाते हैं तो उन्हें नष्ट कर दिया जाता है या रद्दी में बेच दिया जाता है तो क्या इसका ये मतलब लिया जाये कि मैं या मेरे घर वाले ईशनिंदा के दोषी हैं? इन लोगों का कहना था कि ये  ईशनिंदा नहीं है क्योंकि सभी अखबार पढ़ने वाले ऐसा ही करते हैं। फिर रमशा ने कैसी ईशनिंदा की।

इस्लामाबाद पुलिस ने पहले दिन ही अपनी जिम्मेदारी से इंकार किया और अब भी वो इस बोझ को न्यायपालिका के कंधों पर डाल रही है, हालांकि जांच करना उसका काम है। उसे चाहिए कि हौसले से काम लेते हुए इस घटना की जाँच करती और ये स्पष्ट कर देती कि इस छोटी लड़की से कोई ईशनिंदा हुई या नहीं। अगर पुलिस पारंपरिक उदासीनता का प्रदर्शन कर रही है तो न्यायाधीशों को तो कम से कम इस युवा लड़की का तो खयाल रखना चाहिए था। एक और बात, पाकिस्तान का नाम पूरी दुनिया में बदनाम करने पर 'पाकिस्तान के अपमान' का कोई केस नहीं बनना चाहिए?

1 सितम्बर, 2012 सधन्यवाद: जंग, पाकिस्तान

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