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Hindi Section ( 31 Aug 2011, NewAgeIslam.Com)

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Quran and the Rights of Women in Modern Age क़ुरान और आधुनिक समय में महिलाओं के अधिकार

अतिया सिद्दीक़ा

अल्लाह ताला ने कायनात में बेशुमार मख़लूक़ात पैदा की, इनमें अशरफुल मखलूकात इंसान को बनाया। और इंसान में दो सिन्फ, मर्द व औरत बनाये। सूरे निसा में अल्लाह ताला इरशाद फरमाते हैः या अय्योहन्नासुत्तक़ु रब्बोकोमुल्लज़ी खलाककुम मिन नफ्से वाहिदते खलका मिन्हा ज़ौजहा वबस्सा मिन्होमा रेजालन कसीरन वनेसाआ (सूरे निसाः1)। "ऐ लोगों अपने रब से डरो जिसने तुम्हें एक जान से पैदा किया और उसी से उसका जोड़ा बनाया और दोनों से बहुत से मर्द और औरतें फैला दीं।"

 ये इस बात का ऐलान था कि एक इंसान और दूसरे इंसान के बीच जो झूठे इम्तियाज़ात दुनिया ने बनाये हैं, वो सब बातिल हैं, गलत हैं। सारे इंसान लफ्ज़े वाहिद से पैदा हुए हैं। पैदाइशी तौर पर न कोई अफज़ल है और न हक़ीर सब बराबर और मसावी हैसियत के मालिक हैं। औरत और मर्द के दरम्यान कदीम ज़माना से जो फर्क़ इम्तियाज़ात चला आ रहा था उसकी तरदीद की गयी उसमें ये हकीकत वाज़ेह की गयी कि इंसाने अव्वल का जोड़ा किसी और नू से नहीं था बल्कि उसी की नू से था और उसमें अव्वलीन जोड़े से बेशुमार मर्द और औरतें पैदा हुईं। उनके बीच रिश्ते और ताल्लुकात कायम हुए और पूरी नस्ले इंसानी फैली। इसलिए दोनों के दरम्यान फर्क व इम्तियाज़ नू इंसानी के एक बाज़ू और दूसरे बाज़ू के दरम्यान फर्क व इम्तियाज़ है। एक कुल के दो एजज़ा के दरम्यान फरीक है।

अल्लाह ताला ने मर्द और औऱत के दायरे कार अलग अलग रखे हैं और इस ऐतबार से उन्हें जिस्मानी व ज़हनी सलाहियतें अता फरमाई हैं। मर्द के ज़िम्मे ये काम दिया गया कि वो बाहर के कामकाज संभाले, मेहनत मज़दूरी करके कमा कर लाए, मोआशी जद्दोजहद करे और अपने अहलो अयाल की ज़रूरियात को पूरी करे। औरत के ज़िम्मे ये काम दिया कि  उसका असल मैदाने कार घर है। औलाद की तरबियत है और उस ऐतबार से उसका मिज़ाज, रुझान और नफ्सियात बनाई है। औरत के अंदर मोहब्बत, दिलदारी, हमदर्दी व ग़मख्वारी, ऐसार व क़ुर्बानी, सब्र व तहम्मुल और खिदमत के जज़्बात मर्द से ज्यादा रखे हैं। इनकी वजह से वो अपने माहौल को मुसर्रत, खुशी, राहत और सुकून और दिलजोई व मोहब्बत से भर सकती है।

इस कारखानए हयात में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने कोई चीज़ बेकार नहीं पैदा फरमाई है। जैसे किसी मशीन के पुर्ज़े की साख्त और काम मुख्तलिफ होते हैं, लेकिन हर एक अपनी जगह निहायत अहम होता है। हर पुर्ज़े का काम मुतईय्यन होता है। मशीन को उसकी मुतईय्यन जगह पर फिट करते हैं, तभी वो मशीन मतलूबा काम अंजाम देती है, लेकिन अगर हम किसी पुर्ज़े को उसकी मुकर्रर जगह फिट न करें या किसी दूसरी जगह फिट कर दें तो वो मशीन या तो चल ही नहीं सकती या फिर मतलूबा काम अंजाम नहीं दे सकती। ठीक इसी तरह कायनात के इस कारखाने में अल्लाह ताला ने जिस मखलूक़ का जो काम और जो जगह मुकर्र की है, उस पर क़ायम रहे तभी जाकर काम ठीक तौर पर अंजाम पाता है। मर्द व औरत के ज़िम्मे क़ुरान जो दायरए कार मुतअय्यन किये हैं, वो इसकी फितरत के ऐन मुताबिक है किसी के काम और मुकाम को हक़ीर नहीं समझना चाहिए।

दौरे जदीद में नाम निहाद तरक्की के नाम पर मल्टीनेशनल कम्पनियों ने औरत को उसके घरेलू कामकाज, खानदान और खानदानी ज़िंदगी की अहमियत को घटा कर पेश किया है। इसलिए कि उन्हें कम क़ीमत पर मुलाज़िमीन की फौज दरकार थी। इसलिए उन्होंने औरत के घरेलू कामकाज को हक़ीर बनाकर अपने मफाद के लिए मोआशी जद्दोजहद पर उभारा, जबकि इस्लाम ने मोआशी ज़िम्मेदारी मर्द पर डाली है और औरत को घर का इंतेज़ाम संभालने की। इसलिए कि दोनों मिल जुल कर बाहमी तआवुन से खानदान का नेज़ाम चलाए।

इसका मतलब ये नहीं कि इस्लाम ने औरत के लिए मोआशी जद्दोजहद को बिल्कुल ममनू करार दिया है बल्कि इस्लाम ने अपनी और दूसरों की मोआशी फिक्र से आज़ाद रखा है, इसके बावजूद अगर मोआशी सरगर्मियों में हिस्सा लेना चाहे तो ज़रूर हिस्सा ले सकती है, अलबत्ता इस पर बाज़ पाबंदिया आयद होती हैं। इन पाबंदियों के दो मकासद हैं, एक ये कि खानदान के नेज़ाम में जो औरत की बुनियादी ज़िम्मेदारी है उसमें कोई खलल और इंतेशार न पैदा हो और उसके इस्तेहकाम में फर्क न आये। दूसरे ये कि औरत बाइफ्फत ज़िंदगी गुज़ार सके और उसे ऐसे हालात में न डाला जाए कि उसके लिए एख्लाकी हुदूद में क़ायम रहना दुश्वार हो जाए, अगर इन हुदूद और क़य्यूद का पास व लिहाज़ न रखा जाए तो समाज में बिगाड़ पैदा होगा, जिसका खमियाज़ा सभी को भुगतना होगा। मौजूदा दौर नज़रियाती दौर है। अब हथियारों और खुले मैदान में जंग नहीं लड़ी जा रही है बल्कि नज़रियात व ख्यालात को बदला जा रहा है। लोगों के माइंड सेट को बदलने में मीडिया बहुत बड़ा रोल अदा कर रहा है। प्रिण्ट मीडिया और इलेक्ट्रनिक मीडिया के ज़रिए बाज़ बुराईयों की तश्हीर इस बड़े पैमाने पर की जा रही है कि लोग बुराईयों को अच्छा और मोहज़्ज़ब समझ कर कुबूल कर रहे हैं। मगरिबी मुल्कों ने औरत को जो बेक़ैद आज़ादी दी है और जिसकी वजह से खानदान जो समाज की बुनियादी इकाई हातो है, वो बिखर गया है। समाजी निज़ाम पूरी तरह से दरहम बरहम हो गया। अब इसी राह पर पूर्वी देश भी चलना चाहते हैं, जिसके भयानक नताएज बग़ैर शादी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप और बगैर शादी के जिंसी ज़िंदगी (Casual Sex) और होमो-सेक्सुआलिटी जैसे रिवाज फरोग़ पा रहे हैं।

इंसान को अल्लाह ने अशरफुल मख्लुक़ात बनाया वो अपनी अक्ल से काम लेकर समझ सकता है कि जिस राह पर चलकर पश्चिमी देश तबाह व बर्बाद हुए हैं, उस राह पर मुझे नहीं चलना चाहिए, लेकिन उसकी आंख पर 'हल मन मज़ीद' की पट्टी बंधी है। उसे कुछ सुझाई नहीं देता सिवाए अंधाधुंध तकलीद के और उसी को तहज़ीब और मसावात का नाम देता है।

दौरे कदीम ने जिहालत की बिना पर और दौरे जदीद ने नामनिहाद तरक्की के नाम पर औरत के असल मुकाम के तअय्युन में हमेशा गलती की है। अफरात व तफरीत का शिकार हुआ है, लेकिन अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहू अलैहे वसल्लम की तालिमात से हमें जो रहनुमाई मिलती है, उसके मुताबिक अगर हम औरत को असल मुकाम देंगे, अपने मुआशरे और समाज की तश्कील करेंगे, तभी ये समाज अमन व सुकून का गहवारा बन सकता है। इसलिए कि इस्लाम ऐतेदाल की राह बताता है और ऐतेदाल ही सिराते मुस्तकीम है। अल्लाह तबारक व तआला के नज़दीक औरत व मर्द की कामयाबी ईमान व अमले स्वालेह से वाबिस्ता है। उसके नज़दीक मर्द और औरत दोनों बराबर हैं। मर्द और औऱत में से जो भी ईमान और हुस्ने अमल से आरास्ता होगा वो दुनिया और आखिरत में कामयाब होगा और जिसका दामन इन औसाफ़ से खाली होगा वो दोनों ही जगह नाकाम व नामुराद होगा।

मन अमेला स्वालेहन मिन ज़कारिंव अव उन्सा वहोवा मोमेनुन फलानोहयियन्नहो तैय्येबता वला नजज़ियन्नहुम अजरहुम बेअहसने माकानू यामलून (सुरे अन्नहेलः97) "जो शख्स भी नेक अमल करेगा चाहे वो मर्द हो या औरत अगर वो मोमिन है तो हम (इस दुनिया में) उसे पाकीज़ा ज़िन्दगी बसर करायेंगे और (आखिरत में) ऐसे लोगों को ज़रूर उनके अच्छे कामों का अज्र अता करेंगे"

आखिरत के दिन जब हिसाब व किताब कायम होगा, इंसान की किस्मत का फैसला उसकी जिंस की बुनियाद पर नहीं बल्कि ईमान और अमल की असास पर होता है। जिस किसी के दामन में ईमान और हुस्ने अमल की दौलत होगी इस दुनिया में उसेहयाते तैय्येबा अता होगी। वो किसी मरहले में सिराते मुस्तकीम से नहीं भटकेगा और गलत राह पर गामज़न नहीं होगा। अल्लाह ताला उसे रिज़्के हलाल अता करेंगे, मुश्किलात में सब्र व क़नाअत देगा। क़यामत के रोज़ जन्नत के दरवाज़े उसके लिए खोलेंगे और वहां की अब्दी नेमतों का वो हक़दार होगा। ये एक कायेदा कुल्लिया है इसमें मर्द और औरत के दरम्यान फर्क नहीं है। अल्लाह ताला हमें दुनिया व आखिरत में कामयाबी अता फरमाये और उस के हुदूद का पास व लिहाज़ करने की तौफीक अता फरमाये(आमीन)।

(उर्दू से हिंदी अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

URL for English and Urdu Article:

http://www.newageislam.com/urdu-section/quran-and-the-rights-of-women-in-modern-age--دور-حاضر-کے-تناظر-میں-قرآن-اور-حقوق-نسواں/d/3555

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/quran-and-the-rights-of-women-in-modern-age--क़ुरान-और-आधुनिक-समय-में-महिलाओं-के-अधिकार/d/5378


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