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Hindi Section ( 20 Sept 2013, NewAgeIslam.Com)

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Tolerance in Islam इस्लाम में सहिष्णुता

 

आतिफ नूर खान

13 सितंबर, 2013

दुनिया में आज असहिष्णुता अपने चरम पर है जिसकी वजह से मौत, नरसंहार, हिंसा, धार्मिक उत्पीड़न और साथ ही विभिन्न स्तरों पर टकराव बढ़ रहा है। कभी कभी ये नस्लीय और कभी कभी ये धार्मिक और वैचारिक होता है और कभी ये राजनीतिक और सामाजिक होता है। हर स्थिति में ये बुरा और दर्दनाक है। कैसे हम असहिष्णुता की समस्या को हल कर सकते हैं? हम दूसरों के प्रति असहिष्णु हुए बिना कैसे अपने विश्वासों और स्थितियों का दावा कर सकते हैं? कैसे आज हम दुनिया में सहिष्णुता पैदा कर सकते हैं?

सहिष्णुता इस्लाम का मूल सिद्धांत है। ये एक धार्मिक नैतिक जिम्मेदारी है। इसका मतलब "रिआयत, विनम्रता या विलासिता नहीं है। "इसका मतलब सिद्धांतों का अभाव नहीं है या किसी के अपने सिद्धांतों के प्रति गंभीरता की कमी नहीं है। कभी कभी ये कहा जाता है कि "लोग उन चीजों के प्रति सहिष्णु हैं जिनकी उन्हें कोई परवाह नहीं है" लेकिन इस्लाम में ऐसा नहीं है। इस्लाम के अनुसार सहिष्णुता का मतलब ये नहीं होता कि हम सभी धर्मों को एक मानते हैं। इसका मतलब ये नहीं है कि हम अन्य धर्मों और विचारों पर इस्लाम की सर्वोच्चता में विश्वास नहीं करते। इसका मतलब ये नहीं है कि हम दूसरों को इस्लाम का पैग़ाम नहीं पहँचाते हैं और उनके मुसलमान बन जाने की इच्छा नहीं रखते हैं। कुरान मानवता की बुनियादी गरिमा के बारे में हमें बताता है। पैग़म्बर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने सभी इंसानों की उनकी नस्ल, रंग, भाषा और जातीय पृष्ठभूमि पर ध्यान दिये बिना समानता की बात की है। शरीयत सभी इंसानों के जीवन, संपत्ति, परिवार, सम्मान और विवेक के अधिकार को स्वीकार करती है। इस्लाम समानता और न्याय की स्थापना पर जोर देता है। ये दोनों मूल्य बिना सहिष्णुता के स्थापित नहीं किये जा सकते हैं। इस्लाम ने शुरू से ही विश्वास की स्वतंत्रता या धर्म की स्वतंत्रता के सिद्धांत को स्वीकार किया है। इसने बहुत स्पष्ट रूप से ये बताया है कि विश्वास और आस्था के मामले में किसी भी तरह की ज़बरदस्ती की इजाज़त नहीं है। कुरान का फरमान है "धर्म में कोई ज़बरदस्ती नहीं है। (अलबकराः 256)

मुसलमान किसी के साथ ज़बरदस्ती नहीं करते हैं। उन्हें लोगों के सामने इस्लाम के पैग़ाम को बहुत प्रभावशाली और स्पष्ट अंदाज़ में पेश करना चाहिए, उन्हें लोगों को सच्चाई की तरफ बुलाना चाहिए और इंसानियत के लिए खुदा के पैग़ाम को पेश करने और पहुंचाने में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करना चाहिए, लेकिन ये लोगों पर है कि वो इसे स्वीकार करें या अस्वीकार करे दें। अल्लाह फरमाता है, "और फरमा दीजिए कि हक़ आपके रब की जानिब से है, लिहाज़ा जो चाहे ईमान लाए और जो चाहे वो इंकार करे।" (अलनहलः 29) इसलिए अब सवाल ये उठता है कि अगर अल्लाह ने ईमान लाने या न लाने का विकल्प दिया है तो उसने क़ौमे नूह, आद, समूद, लूत, शोएब और फिरऔन और उसके पैरौकारों को सज़ा क्यों दी? जवाब कुरान में ही है। इन लोगों को सिर्फ इनके कुफ्र की वजह से सज़ा नहीं दी गयी थी।

उन्हें सजा इसलिए दी गई थी कि वो ज़ालिम बन गये थे। उन्होंने अल्लाह के नेक बंदों के खिलाफ आक्रामकता का व्यवहार किया और अल्लाह के बताए रास्ते पर चलने से रोका था। दुनिया में ऐसे कई लोग मौजूद थे जिन्होंने अल्लाह के होने से इंकार किया था, लेकिन अल्लाह ने हर एक को सज़ा नहीं दी। एक महान मुस्लिम विद्वान इब्ने तैमिया ने कहा, "राज्य अपने नागरिकों के कुफ्र के बावजूद काफी लम्बे समय तक बरकरार रह सकता है, लेकिन अगर लोग ज़ालिम हो जाएं तो वो अधिक दिनों तक बाकी नहीं रह सकता है।" एक और सवाल जिहाद के बारे में उठाया जाता है। कुछ लोगों का कहना है कि ''क्या जिहाद करना मुसलमानों की ज़िम्मेदारी नहीं है?'' लेकिन जिहाद का मकसद लोगों को इस्लाम में दाखिल करना नहीं है।

इस्लाम व्यक्तिगत, सामूहिक और राज्य- हर स्तर पर सहिष्णुता की शिक्षा देता है। ये राजनीतिक और कानूनी तौर पर ज़रूरी होना चाहिए। सहिष्णुता एक ऐसा तंत्र है जो मानवाधिकार, बहुलवाद (सांस्कृतिक विविधता सहित) और कानून के शासन का समर्थन करता है। पवित्र कुरान बहुत स्पष्ट रूप से कहता है ''हमने हर एक उम्मत के लिए एक शरीअत मोक़र्रर कर दी है जिस पर वो चलते हैं तो ये लोग तुमसे इस अमर (मामले) में झगड़ा न करें और तुम (लोगों को) अपने परवरदिगार की तरफ बुलाते रहो। बेशक तुम सीधे रास्ते पर हो, और अगर ये तुमसे झगड़ा करें तो कह दो कि जो अमल तुम करते हो खुदा उनसे खूब वाकिफ़ (परिचित) है। जिन बातों में तुम इख्तेलाफ (मतभेद) करते हो खुदा तुम में क़यामत के रोज़ उनका फैसला कर देगा। (69- 76)

स्रोत: http://pakobserver.net/detailnews.asp?id=217947

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