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Hindi Section ( 25 Aug 2011, NewAgeIslam.Com)

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Anna Team and Muslims of the Country टीम अन्ना और देश के मुसलमान


असगर वजाहत

देश में लोकतंत्र होने का पूरा लाभ देश के अल्पसंख्यकों को मिलता है, इसलिए अल्पसंख्यकों का फर्ज है कि वे देश में लोकतांत्रिक और विकास केंद्रित आंदोलनों में शामिल हों।

 

 

अण्णा हजारे के कहने पर उनकी टीम के अरविन्द केजरीवाल और किरण बेदी प्रमुख मुस्लिम नेताओं से समर्थन प्राप्त करने के लिए दिल्ली की जमा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी, जमाते इस्लामी हिंद, ऑल इंडिया इमाम आर्गेनाइजेशन,दारुल उलूम देवबंद के नेताओं से मिले जिन्होंने विभिन्ना कारणों से भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा आंदोलन को समर्थन देने से मना कर दिया।

 

महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि अण्णा के समर्थकों ने मुस्लिम जनता का समर्थन प्राप्त करने के लिए धार्मिक नेताओं से ही संबंध क्यों स्थापित किया? क्या टीम अण्णा यह मानती है कि धार्मिक नेता या संस्थाएँ ही मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करती हैं? क्या इसका कारण यह है कि धार्मिक मुसलमान नेताओं के कहने पर ही मुसलमान किसी राजनीतिक दल को वोट देते हैं? अगर इस आधार पर टीम अण्णा ने मुस्लिम नेताओं को चिह्नित किया तो यह लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों के विरुद्ध है।

 

यही नहीं, ऐसा करके टीम अण्णा ने उन तमाम मुसलमानों के मुंह पर तमाचा भी मारा है जो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में रचनात्मक काम कर रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन, व्यापार, उद्योग, विज्ञान, मनोरंजन आदि क्षेत्रों में लाखों मुसलमान देश और समाज के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं। उनकी संस्थाएं भी हैं, अखबार भी हैं और मंच भी हैं। लेकिन टीम अण्णा को वह सब कुछ नजर नहीं आया, यह बहुत दुःखद है।

 

टीम अण्णा को मुस्लिम नेताओं ने जो उत्तर दिए या जिन आधारों पर समर्थन देने की बात कही उन पर चर्चा करने से पहले यह रेखांकित करना जरूरी है कि भारतीय राजनीतिक दलों और यहां तक कि टीम अण्णा को भारतीय मुसलमानों के बारे में अपनी राय बदलने की जरूरत है। इतिहास साक्षी है कि मुसलमानों ने विभिन्न समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों को वोट दिए हैं। यदि मुस्लिम वोट एक जगह पड़ता होता, किसी एक धार्मिक व्यक्ति के कहने से मुसलमान वोट देते हों तो मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने आजतक एक राजनीतिक दल बना लिया होता। यह कोरा भ्रम है, जिसे कुछ लोग मुस्लिम समुदाय को सीमित और बदनाम करने के लिए फैला रहे हैं कि कुछ धार्मिक लोग मुस्लिम मतों के ठेकेदार हैं।

 

सच्चर कमीशन ने यह तय कर दिया है कि मुसलमान भारतीय समाज के दबे-कुचले तबकों में से एक हैं। भ्रष्टाचार की सबसे अधिक मार दबे-कुचले तबकों पर ही पड़ती है। इसलिए मुसलमानों को तो सबसे आगे आकर अण्णा का समर्थन करना चाहिए। अण्णा के साथ आरएसएस है या बीजेपी है, इससे डरने की आवश्यकता नहीं बल्कि जूझने की आवश्यकता है। मुसलमानों को इसी देश में अपना भविष्य बनाना है, इसलिए वे राष्ट्रीय समस्याओं से मुँह मोड़ कर नहीं बैठ सकते। मान लें अगर आरएसएस अण्णा के साथ है और इस कारण मुसलमान नहीं आते तो फायदा आरएसएस का होगा। घाटा मुसलमानों का होगा।

 

मुसलमानों के हितों की बात करने वाले तथाकथित मुस्लिम नेता यह नहीं सोचते कि क्या उन्होंने मुसलमानों के अधिकारों के लिए कोई आंदोलन किया है? क्या उन्होंने आमरण अनशन किया था कि नरेन्द्र मोदी को गिरफ्तार किया जाए? क्या उन्होंने आरएसएस के विरुद्ध खड़ी शक्तियों को कभी समर्थन दिया है? मुस्लिम समाज की बड़ी समस्याओं सांप्रदायिकता, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के लिए धार्मिक नेता कभी आगे आए हैं? ऐसे नेताओं को सोचना चाहिए कि उनके इस रवैये से मुसलमानों को फायदा हुआ है या घाटा उठाना पड़ा है।

 

किसी बड़े आंदोलन में जाने से मुसलमानों को रोकना मुसलमानों के लिए बहुत घातक सिद्ध हो सकता है। देश में लोकतंत्र होने का पूरा लाभ देश के अल्पसंख्यकों को मिलता है, इसलिए उनका फर्ज है कि वे देश में लोकतांत्रिक और विकास केंद्रित आंदोलनों में शामिल हों। धार्मिक नेताओं के प्रति बड़ी संख्या में लोग श्रद्धा रखते हैं लेकिन इस्लाम दीन के साथ दुनिया पर भी बल देता है। यह ध्यान में रखना चाहिए।

स्रोतः हिंदी वेबदुनिया

URL: https://newageislam.com/hindi-section/anna-team-and-muslims-of-the-country--टीम-अन्ना-और-देश-के-मुसलमान/d/5333



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