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Hindi Section ( 8 Apr 2012, NewAgeIslam.Com)

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Islam, Muslims, Media इस्लाम, मुसलमान, मीडिया


असग़र अली इंजीनियर

(अंग्रेजी से अनुवादः समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

1-15 अप्रैल, 2012

मुसलमान अक्सर शिकायत करते हैं कि मीडिया इस्लाम और मुसलमानों की दुश्मन है, और उनकी बुरी छवि को अक्सर पेश करती है। विशेष रूप से पश्चिमी मीडिया 9/11 की भयानक घटना के बाद से बहुत विरोधी रहा है। लेकिन इससे पहले भी इस्लाम और मुसलमानों का दुश्मन नहीं था तो बहुत दोस्ताना भी नहीं था। हर वक्त मीडिया की बुराई करने के बजाय इसके कुछ जटिल कारण हैं जिन्हें ठीक से मुसलमानों को समझना चाहिए। निंदा करना आसान है लेकिन समझना मुश्किल है।

हम यहाँ इस लेख में इन कारणों का विश्लेषण करने का प्रस्ताव पेश करते हैं और इसके निराकरण का उपाय हमारी समझ पर निर्भर है। शुरू करने के साथ हमें ज़हन नशीं रखना चाहिए कि ये दुश्मनी धार्मिक से अधिक राजनीतिक है, हालांकि यह धार्मिक नजर आती है। इस्लाम और ईसाई दोनों विश्व धर्म हैं और इन दोनों धार्मिक वर्गों से संबंध रखने वाले शासकों की आपसी दुश्मनी रही है और एक दूसरे की कीमत पर अपनी सल्तनतों को बनाने की कोशिश की है।

इस्लाम और ईसाई मज़हब धार्मिक आधार पर एक दुसरे के विरोधी नहीं रहे लेकिन राजनीतिक शासक एक दूसरे के विरोधी ज़रूर थे और दोनों धर्मों ने एक दूसरे के खिलाफ लड़ाईयां लड़ीं और जिसने संबंधित धर्मों के अनुयाईयों के मन में भारी पूर्वाग्रह पैदा किए। सलीबी जंग सबसे ज़्यादा जोश के साथ लड़ी गई थी और सलीबी जंगों ने उनके मन पर गहरा असर छोड़ा था। तुर्की दुनिया की सबसे बड़ी सल्तनतों में से एक बन गया और मध्य यूरोप तक पहुँच गया था। उसने भी यूरोपियों की यादों पर ज़ख्म छोड़ा।

मुसलमान मध्यकाल से ही प्रमुख शक्ति थे और ये यूरोप था, जो पुनर्जागरण के बाद एक शक्ति के रूप में उभर कर सामने आया। उसने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारी तरक्की की और जल्द ही एशियाई और अफ़्रीकी देशों को अपनी कॉलोनी बनाना शुरू कर दिया। इन देशों में उसे मुसलमान शासकों का सामना करना पड़ा। भारत में ब्रिटिश सरकार को सत्ता पर कब्जा करने के लिए पतन की ओर जा रहे मुगल साम्राज्य को पराजित करना पड़ा।

इसे कहने की जरूरत नहीं है कि शक्ति और वर्चस्व हासिल करने के लिए हुए इस संघर्ष ने इस्लाम और मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त पूर्वाग्रह पैदा किए। अक्सर इन शासकों ने मिशनरियों को आक्रामक रूप से ईसाई धर्म के प्रचार के लिए इस्तेमाल किया और मुसलमानों ने भी अपने अंदर एकता बनाए रखने के लिए या आदिवासियों को इस्लाम में दाखिल कराने के लिए विरोधी धर्म प्रचारकों के रूप में काम किया। इस तरह के दृष्टिकोण ने पूरे संघर्ष को राजनीतिक के बजाय धार्मिक ज़ाहिर होने दिया।

इस तरह विरोधी रवैय्या जारी रहा और मुसलमानों और इस्लाम के प्रति मीडिया के रुख में ये नजर आया। प्रोफेसर हन्टिंग्टन के संस्कृतियों के संघर्ष को पश्चिमी मीडिया में जो दीवानों की तरह विश्लेषण मिला वो भी कुछ और नहीं बल्कि इसी रवैये को दर्शाता था। सोवियत संघ के पतन के बाद जब अमेरिका एक बाहरी दुश्मन की तलाश कर रहा था तो यह किताब सबसे महत्वपूर्ण बन गयी थी और इस्लाम पश्चिम शक्तियों के सबसे अधिक और ऐतिहासिक विरोधी के रूप में देखा जा रहा था।

दो विश्व युद्धों में, मुख्य रूप से ईसाई शक्तियां शामिल थीं, उससे हुई तबाही के बाद एक तरह की खामोशी छाई हुई थी और खींचातानी दो धार्मिक प्रतिद्वंदियों में वर्चस्व के बजाय इस बार राष्ट्रीय वर्चस्व के लिए अधिक था। एक बार तबाह देशों के पुनर्निर्माण का काम शुरू हुआ और संयुक्त राष्ट्र संगठन (यू.एन.ओ.) अस्तित्व में आया और मानवाधिकार और मानवीय गौरव को अधिक केन्द्रियता हासिल हुई और धर्म व धार्मिक दुश्मनी पीछे रह गई।

लेकिन अब एक और पहलू,  इसराइल की स्थापना उभर कर सामने आया जो कि फिलिस्तीनी क्षेत्र में था। सलीबी जंगों द्वारा जो नहीं हासिल किया जा सका उसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसराइल के द्वारा प्राप्त किया गया। इसराइल की स्थापना, लाखों निर्दोष यहूदियों की हत्या के मुआवजे के रूप में उतनी नहीं था जितना मुस्लिम दुनिया पर दूसरे माध्यमों से वर्चस्व बनाए रखने के लिए था। किसी भी तरह अरब के लोग मासूम यहूदियों की हत्या के लिए जिम्मेदार नहीं थे इसके बावजूद अरब और विशेषकर फिलिस्तीनी थे जिन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी।

पश्चिमी शक्तियों, खासकर अमेरिका जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की जगह दूसरे सबसे शक्तिशाली देश के रूप में उभर कर सामने आया था, यहूदियत को इसके समर्थन के कारण, ये सबसे आक्रामक दक्षिण पंथी राजनीतिक विचारधारा के रूप में उभर कर सामने आया। इस तरह अमेरिका ने इसराइल के क़ब्ज़े का समर्थन किया और आज तक ऐसा करने का सिलसिला जारी रखे हुए है। इसराइल की दक्षिण पंथी विचारधारा और अमेरिका की नयी रूढ़िवादिता से, एक दूसरे को राजनीतिक सहयोगी मिल गया और दोनों एक दूसरे के करीब आए।

यही वो तत्व हैं जो अमेरिकी मीडिया के प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों माध्यमों को नियंत्रित करते हैं और इस्लाम और मुसलमानों को बदनाम कर उनके हित बखूबी सधते हैं। इन दोनों का गठबंधन यहूदियों और ईसाइयों के तौर पर नहीं था बल्कि दक्षिणपंथी राजनीतिक शक्तियों के रूप में था। इसी तरह फ़िलिस्तीन में मुसलमान अरबों और ईसाई अरब मजबूत सहयोगियों के रूप में एकजुट हैं क्योंकि दोनों यहूदी आक्रामकता के शिकार हैं। इससे ये स्पष्ट होता है कि ये मुसलमानों पर ईसाई या यहूदी हमला नहीं है बल्कि इस्लाम और मुसलमानों पर दक्षिणपंथियों का राजनीतिक हमला है।

काबिले गौर बात ये है कि पश्चिमी देश आमतौर पर धर्मनिरपेक्ष हैं और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद में विश्वास करते हैं लेकिन पूरी तरह इसराइल का समर्थन करते हैं, जो एक धार्मिक देश है जहां सभी गैर यहूदी जनता, मुसलमानों के साथ ही ईसाई भी दूसरे दर्जे के नागरिक हैं। इस तरह मुसलमान और ईसाई अरबों के साथ दूसरे दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार किया जा रहा है। लेकिन चूंकि इसराइल पश्चिमी देशों के हितों को पूरा करता है इसलिए ये एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में स्वीकार्य है, चाहे वो धार्मिक राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर ही बनाया गया हो। कोई भी अन्य देश, यदि धार्मिक आधार पर बनाया गया हो, तो उसे प्रतिक्रियावादी कहकर निंदा की जाएगी।

इस्लाम और मुसलमानों के प्रति ये दुश्मनी जिसका ऐतिहासिक आधार है,  9/11 की घटना के साथ और अधिक गंभीर हो गई। ये इस्लाम और मुसलमानों के ख़िलाफ़ खुली लड़ाई थी। उसे पश्चिमी मीडिया में इस तरह पेश किया गया था। ये मुसलमानों के लिए गहराई से विचार करने का है कि ऐसी आतंकवादी कार्रवाइयों से कुछ नहीं होता है बल्कि इसकी बजाय ये इस्लाम को बदनाम करती हैं। ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में मुट्ठी भर अलकायदा के लोगों ने इस्लाम को भारी नुकसान पहुंचाया है और पश्चिमी मीडिया की बदौलत अब यह विश्व भर की मान्यता बनती जा रही है कि इस्लाम हिंसक धर्म है।

इसमें शक नहीं कि अल कायदा को मुसलमानों के बहुमत का समर्थन कभी नहीं थी; उसे एक छोटे से आक्रामक अल्पसंख्यकों का समर्थन हासिल था जैसा कि आमतौर पर दूसरे समुदायों में भी होता है। पी.ई.डब्ल्यू. जैसी कई विभिन्न एजेंसियों द्वारा किए गए सर्वेक्षण में यह स्पष्ट रूप से सामने आया है कि अल्जीरिया से लेकर इंडोनेशिया तक एक छोटी जनसंख्या 9/11 जैसी घटनाओं का समर्थन करती है, इसके बावजूद केंद्रीय धारा का पश्चिमी मीडिया ऐसी खबरें प्रमुखता से कभी प्रकाशित नहीं करता है जबकि कोई भी हिंसक हमला प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है।

मुसलमानों को न केवल शांतिपूर्ण रूप से रहने बल्कि कई तरीकों से नज़र आने की भी आवश्यकता है ताकि मीडिया इस तरह की भी खबरें दिखाने के लिए मजबूर हो। यदि ऐसा नहीं करेंगें तो जैसा कि हम देख रहे हैं कि कुछ मुसलमानों द्वारा की गई हिंसा को इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे सभी मुसलमान इसके पीछे हों। इसके अलावा भी इस्लाम और मुसलमानों को गलत रूप में प्रस्तुत करने के अन्य कारण भी हैं और हम मुसलमानों को इस पर गहराई से विचार करना होगा और अपने समाज में परिवर्तन लाना होगा।

उन्हें अधिकांश मुस्लिम देशों में स्वतंत्रता की कमी और तानाशाहियाँ नजर आती हैं। उसकी गहरी छानबीन के बजाय वो इस्लाम को इसकी मूल वजह मानते हैं। इस्लाम लोकतंत्र की इजाज़त नहीं देता और निरंकुश शासन को बढ़ावा देता है। दक्षिणपंथी विचारों से जुड़े कई मुस्लिम युवा इस्लाम के प्रारंभिक काल की खिलाफ़त प्रणाली को एकमात्र समाधान के रूप में पेश करते हैं और उसके बाद मीडिया इस पर अपनी खबरें बनाता है।

जैसे ही कोई लेख या कार्टून, इस्लाम या नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम या किसी भी अन्य आदर के लायक व्यक्ति के लिए अपमानजनक फोटो पश्चिमी मीडिया में आती है, तो हिंसक प्रदर्शनों या उस व्यक्ति के लिए जिसने लेख लिखा है या कार्टून बनाया है, उसे मारने के लिए भी धमकी दी जाने लगती है और इसका नतीजा ये निकाला जाता है कि इस्लाम और मुस्लिम समाज में सहिष्णुता और स्वतंत्रता  की पूरी तरह कमी है, क्योंकि पश्चिमी संस्कृति बिल्कुल अलग है।

वो भूल जाते हैं कि कल तक पश्चिमी समाज में भी कोई फर्क नहीं था और वो भी मुस्लिम समाज की तरह प्राचीन विचारों वाले और पुरुष प्रधान समाज वाले थे। पत्रकारों की युवा पीढ़ी बहुत ही अलग संस्कृति और माहौल में पली है और दक्षिणपंथी प्रोपगंडे (दुष्प्रचार) को ध्यान में रखते हुए उनको लगता है कि ये मानवाधिकार का गंभीर उल्लंघन है और इसके खिलाफ सख्ती से लिखते हैं। उनका सोचना है कि केवल पश्चिमी संस्कृति स्वतंत्रता की गारंटी देती है और वहीं लोकतांत्रिक समाज है जबकि इस्लामी समाज अत्यधिक असहिष्णु और निरकुंश शासन वाले हैं।

पत्रकारों की वर्तमान पीढ़ी पत्रकारिता के सबसे वाणिज्यिक प्रकृति में पली है और पुरानी पीढ़ी के जांच और विश्लेषण के मूल्यों की उनमें कमी है। ये जल्दबाज़ी में अधूरे सबूत के आधार पर और घटनाओं के दबाव में मोटी वेतन प्राप्त करने के तहत तुरंत परिणाम निकालते हैं। ये आधुनिक दौर की पत्रकारिता की जांच की सच्चाई है।

इससे भी बुरा ये है कि पश्चिमी मीडिया में जो कुछ भी लिखा जाता है या पश्चिम के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जो कुछ बोला या जिस पर चर्चा की जाती है उसे तीसरी दुनिया का मीडिया बाइबिल की तरह सच मानता है और अपने मीडिया में पेश करता है। इस तरह यह वैश्विक आयाम हासिल कर लेता है। भारतीय भी इससे अलग नहीं हैं। हालांकि यहाँ मीडिया स्वतंत्र है लेकिन खुद पश्चिमी मीडिया की नकल करने में गर्व महसूस करता है। और हिंदुस्तान में भी इसके अपने दक्षिणपंथी दल और और विचारधाराएं हैं जो क्षेत्रीय भाषा के मीडिया में विशेष रूप से जो परिलक्षित होते हैं।

मीडिया लोकतांत्रिक कामकाज के एक महत्वपूर्ण भाग के रूप में माना जाता है जो जनता की राय को प्रशस्त करता है, लेकिन आलोचनात्मक राय बनाने के बजाय यह मौजूद पूर्वाग्रहों को बढ़ाता है और इस तरह यथास्थिति को बनाए रखता है और इस तरह बहुमत का दृष्टिकोण मजबूत होता है। मुस्लिम देशों के मीडिया के बारे में भी यही सच है। ये भी बहुमत के दृष्टिकोण को दर्शाता है और अल्पसंख्यक विरोधी और दक्षिणपंथी विचारों का ध्यान रखता है। इससे भी बुरा ये है कि, सिवाय कुछ मामलों को छोड़कर मुस्लिम देशों में मीडिया शायद ही स्वतंत्र है। इस तरह निष्पक्ष मीडिया हर जगह मुश्किल से ही है।

असग़र अली इंजीनियर इस्लामी विद्वान हैं और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सेकुलरिज़्म एण्ड सोसाइटी, मुंबई के प्रमुख हैं।

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