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Hindi Section ( 5 Feb 2012, NewAgeIslam.Com)

Islam, Family and Modernity इस्लाम, परिवार और आधुनिकता


असग़र अली इंजीनियर (अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

कुछ दिनों पहले परिवार पर एक अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस के लिए तुर्की जाने का मेरा इत्तेफाक हुआ। मैंने तुर्की यात्रा के बारे में लिखा था लेकिन यहाँ मैं इस कांफ्रेंस में अपने प्रज़ेंटेशन (पेशकश) के बारे में बात करना चाहता हूँ। ये एक शानदार अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस थी जिसमें दुनिया भर के 50 देशों के 300 उलमा, सामाजिक वैज्ञानिकों और कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। इस अवसर पर परिवार के विभिन्न पहलुओं पर पर्चे पढ़े गए और उन पर विचार विमर्श किया गया। कांफ्रेंस के दौरान आम चिंता यह थी कि परिवार की संस्था कमजोर हो रही है और हमारी संस्कृति के आधार रहे परिवार को टूटने से बचाना चाहिए।

कांफ्रेंस में मुझे इस्लाम और परिवार की संस्था के बारे में बोलने के लिए कहा गया। वास्तव में पैगम्बर मुहम्मद (स.अ.व.) ने कुछ हालात के सिवाय कुंवारेपन वाली जिंदगी को पसंद नहीं किया है। आप (स.अ.व.) ने रहबानियत को नापसंद किया है और आप (स.अ.व.) ने दुनिया में रहने और सभी परिस्थितियों का सामना करने की प्राथमिकता को पसंद किया है। कुरान के मुख्तलिफ ऐलानात परिवारिक जीवन, शादी, तलाक और बच्चों से संबंधित हैं। कुरान ये भी कहता है कि अगर आपके पास शादी करने और जीवन यापन के लिए संसाधन नहीं तब तक नेक जीवन गुजारें जब तक कि अल्लाह आपको आवश्यक संसाधन अता न कर दे। इसके अलावा, कुरान अवैध संबंध, हराम कारी, व्यभिचार और बदकारी के लिए सजा तय करता है।

इस्लामी तालीमात के मुताबिक, सेक्स केवल शादी के भीतर जायज़ है और सिर्फ आनंद के लिए सेक्स जायज़ नहीं है। सेक्स मुख्य रूप से परिवार को बढ़ाने के लिए है। पश्चिमी देशों में आज लोग परिवार बढ़ाने की जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहते हैं बल्कि आनंद के लिए शारीरिक संबंध स्थापित करते हैं और इसलिए 'लिन इन' (Live in) रिलेशनशिप मौजूदा दौर का फैशन बन गया है और लिव इन '(Live in) रिलेशनशिप के विचार ने परिवार की संस्था को काफी नुकसान पहुँचाया है। इस तरह के संबंध में दोनों मर्द और औरत जब चाहें अलग हो सकते हैं।

इस तरह बुनियादी तसव्वुर ये है कि एक दूसरे के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है, बच्चों की तो बात ही छोड़िए। वास्तव में सभी प्रयास बच्चों के पैदा होने से बचने के लिए है और यदि बच्चे पैदा हो जाते हैं, तो पूरी जिम्मेदारी माँ बाप में किसी एक पर और विशेष रूप से मां पर आ जाएगी। पुरुष सेक्स का आनंद लेने के लिए एक से अधिक जोड़ीदार बनाने की कोशिश करता है और नतीजे में बच्चों की जिम्मेदारी महिलाओं पर आ जाती है और उन्हें मनोवैज्ञानिक परेशानियों और तनाव का सामना करना पड़ता है।

शारीरिक संबंध स्वयं मंजिल नहीं हो सकता है जैसा कि 'लिन इन' (Live in) रिलेशनशिप में होता है। कुरान के मुताबिक शादी के दो मकसद हैं - परिवार बढ़ाना और एक दूसरे का हमसफर बनना है। शादी का बुनियादी फलसफा प्रेम और साझेदारी पर आधारित है। कुरान कहता है, और उसी के निशानात (और तसर्रुफ़ात) में से है कि उसने तुम्हारे लिए तुम्हारी ही जिंस की औरतें पैदा कीं ताकि उनकी तरफ (माएल हो कर) आराम हासिल करो और तुम में मोहब्बत औऱ मेहरबानी पैदा कर दी जो लोग ग़ौर करते हैं उनके लिए इन बातों में (बहुत सी) निशानियाँ हैं (30:21)

इस तरह कुरान के मुताबिक परिवार की संस्था जिंदगी के उच्च और अच्छे मूल्यों पर आधारित होना चाहिए। केवल यौन इच्छाओं की संतुष्टि कभी भी आला तहज़ीब की जानिब नहीं ले जा सकती और न ही किसी के जीवन में स्थिरता ला सकती है। रहम और मोहब्बत इंसानी तहज़ीब की बुनियादें हैं और परिवार तहज़ीबों को बनाने का अहम अदारा (संस्था) हैं। जहां तक ​​संभव हो परिवार नहीं टूटने चाहिए और नबी करीम (स.अ.व.) की हदीस के मुताबिक तलाक, जायज़ चीज़ों में सबसे ज़्यादा नापसंद चीज़ है इसके अलावा एक और हदीस के अनुसार जब मर्द तलाक शब्द अपनी ज़बान से अदा करता है तो ये आस्मानों को हिला देता है, क्योंकि तलाक परिवार की संस्था को धक्का पहुँचाता है।

आज की दुनिया में परिवार की संस्था तेजी से कमज़ोर हो रही है और ये आधुनिकता के कारण हमारे जीवन में पैदा होने वाले कुछ तज़ाद (विरोधाभास) के कारण है। वर्तमान समय में औरतें भी काम करती हैं और काफी हद तक स्वावलम्बी हो जाती हैं और इसी वजह से अपने जोड़ीदार की इच्छाओं के आगे झुकने से इन्कार कर देती हैं। अतीत में महिलाएं आर्थिक रूप से मर्दों पर निर्भर रहा करती थीं और इसलिए मर्दों की इच्छाओं के आगे झुकने में अधिक सुरक्षित महसूस करती थीं। पति को उसका मालिक और उसके सिर का ताज माना जाता था। आज मध्यम वर्ग की महिलाऐं उच्च शिक्षा प्राप्त हैं और काफी मोटे वेतन पर काम करती हैं और इसलिए वह अपने पतियों के सामने झुकने से इनकार करती हैं।

बड़ी संख्या में रूढ़िवादी मुसलमानों को ये लगता है कि ऐसा महिलाओं के शिक्षित होने और अपने लिए कमाई के कारण है। यह परिवारों को अस्थिर कर रहा है। ये नतीजा निकालना गलत है क्योंकि हममें पुरुष प्रधान समाज की व्यवस्थाएं सरायत (सन्निहित) कर गई हैं। वास्तव में अगर औरतें वकार वाली और गैरतमंद हैं तो ऐसी महिलाओं को पति के आगे समर्पण के लिए नहीं कहा जाना चाहिए। कोई भी संस्था जो उच्च मूल्यों के बजाय अथारिटी (प्राधिकरण)  के आधार पर होगी वो स्थिर नहीं हो सकती है और न ही उच्च संस्कृति की ओर ले जाने वाली हो सकती है। कुरान महिलाओं को जहां कमाने और संपत्ति प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करता है, वहीं उसे वकार औक खुद्दारी भी बराबर अता करता है और ये स्पष्ट है कि परिवार पति की अथारिटी (प्राधिकरण) पर आधारित नहीं होना चाहिए बल्कि एक दूसरे के लिए मोहब्बत और हमदिली पर आधारित होना चाहिए।

अगर इन मूल्यों पर एहतेयात के साथ अमल किया जाये तो शौहर और बीवी दोनों एक दूसरे का सम्मान करेंगे और कोई महत्वपूर्ण फैसला लेने से पहले एक दूसरे से सलाह करेंगे। महिलों की शिक्षा और कमाई परिवार को बहुत अधिक स्थिर और समृद्ध बना देगी। यदि हमारी संस्कृति पुरुष प्रधान व्यवस्था वाली वाली रहती है और शौहर की अथारिटी (प्राधिकरण) सबसे ऊपर रहती है तो ऐसे परिवार जिनमें महिलाएं उच्च शिक्षित और अपने आत्मासम्मान की परवाह करती हैं तो उन परिवारों में तनाव आ सकता है और परिवार टूट सकते हैं। यहां तक ​​कि सबसे आधुनिक समाज में भी महिलाओं को महत्वपूर्ण मामलों पर फैसला करने में कोई भूमिका नहीं है और इसी वजह से परिवार के जीवन में भारी तनाव आता है और तलाक का प्रतिशत बढ़ जाता है क्योंकि महिलाओं झुकने से इनकार कर देती हैं।

इस तरह समाधान परिवार की संस्था को छोड़ने और लिव इन (Live in)रिलेशनशिप स्थापित करने में नहीं है। ऐसे में वास्तविक प्यार और दया नहीं रहेगी। समाधान महिलाओं को बराबर सम्मान और निर्णय में बराबर की भूमिका देने में है। यही केवल परिवार की संस्था को मजबूत करेगा। इस तरह अगर कुरान के ऐलान किये गये परिवार के फलसफे पर अमल किया जाए तो परिवार की संस्था टूट नहीं सकती है बल्कि इसके बजाय और मज़बूत होगा।

लेखक इस्लामी विद्वान और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसायटी एंड सेकुलरिज़्म, मुंबई के प्रमुख हैं।

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