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Hindi Section ( 29 Nov 2011, NewAgeIslam.Com)

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GANDHI, HAZARE AND FIGHT AGAINST CORRUPTION गाँधी, हज़ारे और भष्टाचार के खिलाफ आंदोलन


असग़र अली इंजीनियर (अंग्रेज़ी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

अन्ना हज़ारे दूसरे गांधी के रूप में उभर रहे हैं। यूपीए सरकार को लोकपाल बिल का मसविदा तैय्यार करने और मसविदा तैय्यार करने वाले पैनल में सिविल सोसाइटी के आठ सदस्यों को शामिल करने की मांग को मंज़ूर करवाने के कारण वो न सिर्फ सभी अखबारों में नज़र आ रहे हैं बल्कि अखबारों के सभी पेजों पर भी दिखाई दे रहे हैं। भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आने के बाद यूपीए सरकार के पास अन्ना हज़ारे की मांग को मानने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।

चूंकि यूपीए सरकार के कुछ मंत्री और कुछ सरकारी अफसर 2-जी और कामन वेल्थ गेम्स घोटाले में शामिल हैं, ऐसे में सरकार की हालत खराब थी और साथ ही सिविल सोसाइटी की ओर से अन्ना हज़ारे के ज़बरदस्त समर्थन के कारण आसानी से हज़ारे की मांग को मंज़ूर कर लिया। अगर ऐसा नहीं होता तो अन्ना हज़ारे के लिए ये आसान नहीं होता।

अन्ना हज़ारे की तारीफ आज पूरा राष्ट्र कर रहा है औऱ हज़ारों कार्यकर्ताओं के लिए वो रोड मॉडल बन गये हैं और सिविल सोसाइटी उन पर गर्व करती है। भष्टाचार के विरुद्ध उनके आंदोलन को कुछ लोगों के द्वारा आज़ादी की दूसरी लड़ाई बताया जा रहा है। ये बहुत कम समय में और भावनात्मक क्षणों में दी गयी प्रतिक्रिया है, इसलिए किसी को इस तरह भावनात्मक फैसला नहीं करना चाहिए। किसी को भी न सिर्फ इसके दीर्घकालीन प्रभाव की पड़ताल करनी चाहिए बल्कि क्या ये वाकई एक शानदार नैतिक जीत है, जैसा कि बताया जा रहा है, इसकी जांच पड़ताल करनी चाहिए।

मुझे लगता है कि हज़ारे को गांधीवादी और उनके आंदोलन के तरीके को भी गांधीवादी कहा जा रहा है, इसलिए सबसे पहले ये जान लेना आवश्यक है कि गांधीवादी मूल्य क्या है और गांधीवादी आंदोलन के लिए क्या आवश्यक शर्तें हैं। शुरुआत करने के लिए गांधीवादी संघर्ष के तीन आधारभूत तत्व हैं जिन पर कभी समझौता नहीं किया जा सकता हैः सत्य, अहिंसा और सादा जीवन। इन तीनों में से हज़ारे के आंदोलन में जो निश्चित तौर पर मौजूद था वो अहिंसा थी।

ये बहस का विषय है कि बाकी के दो तत्व मौजूद थे या नहीं। लम्बे समय में अहिंसा सम्भव है, अगर संघर्ष सिर्फ और सिर्फ सच्चाई पर आधारित हो। इसके अलावा सत्य और अहिंसा को बरकरार रखने के लिए सादा जीवन होना चाहिए, क्योंकि इसके बगैर सच्चाई को बरकरार नहीं रखा जा सकता है। इसीलिए दूसरे गांधी को पैदा करना मुश्किल रहा है।

अब अन्ना के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन पर आते हैं। स्वाभाविक रूप से भ्रष्टाचार उच्च जीवन शैली, बेइमानी, लालच और झूठ पर आधारित होता है, किसने अन्ना के आंदोलन का जवाब दिया? बुनियादी तौर पर इसके तीन तत्व हैं। मध्य वर्ग जिसका जीवन सादगी से अलग है और ये गांधी जी के सादा जीवन से अलग जीवन गुज़ारते हैं। साथ ही ये विशेष रूप से मध्य वर्ग ही है जो बड़े कारोबार से अलग अपने काम को कराने के लिए आसानी से भ्रष्टाचार का सहारा लेते हैं। ट्रेन में एक बर्थ हासिल करने के लिए बड़ी आसानी से रुपया देते हैं और अपने घर के किसी भाग को आगे बढ़ाने के लिए और अवैध निर्माण के लिए नगर निगम कार्यालय को रिश्वत देते हैं और सरकारी मुलाज़िम के तौर पर गैर-कानूनी काम और दूसरी चीज़ों के लिए रिश्वत कुबूल करते हैं।

यही मध्यवर्ग अपने बच्चों का अच्छे स्कूल और प्रोफेशनल कालेजों में दाखिला दिलवाने के लिए रिश्वत देता है। वास्तव में भ्रष्टाचार का शायद ही कोई रूप हो जिसका इस्तेमाल मध्यवर्ग ने न किया हो। इस वर्ग को भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

अन्ना हज़ारे के आंदोलन को जिन अन्य तत्वों ने समर्थन किया उनमें वो राजनीतिक वर्ग (हालांकि कूटनीति के कारण ये वर्ग पर्दे के पीछे ही रहा) सिविल सोसाइटी के अपने कार्यकर्ताओं के द्वारा छिप कर यूपीए सरकार को कमज़ोर करने के लिए सक्रिय था, जो कि शुद्ध उद्देश्य नहीं है। और तीसरा वर्ग वो था जो वास्तव में सिद्धांतों के आधार पर भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करना चाहता था और इस वर्ग को कहा जा सकता है कि ये गांधीवादी दर्शन और मूल्यों के बहुत करीब था। ये वर्ग तीनों में सबसे छोटा था।

ये समझना ज़रूरी है कि अन्ना हज़ारे और गांधी में क्या फर्क है। अन्ना गांधीवादी हैं, लेकिन गांधी नहीं है। उन्होंने गांधीवादी विचार को अपनाया न उससे कुछ कम और न ही कुछ उससे ज़्यादा। गांधी वास्तव में विचारक थे और उनकी समझ गहरी थी इससे भी बढ़कर वो अपने इरादों में ईमानदार थे और हमेशा अपने अन्तरात्मा की आवाज़ सुना करते थे। वही लोग जो अपने इरादों में ईमानदार होते हैं, अपनी अन्तरात्मा की आवाज़ सुन सकते हैं। इस सम्बंध में अन्ना हज़ारे की तुलना गांधी जी से नहीं की जा सकती है। वो गहरी समझ, और विशाल बुद्धिमत्ता भी नहीं रखते हैं और उससे भी कम ईरादों में ईमानदारी नहीं रखते हैं।

अन्ना ने कभी साम्प्रदायिक दंगों की निंदा नहीं की। वो गुजरात दंगों के दौरान खामोश रहे हैं। गुजरात में नरसंहार पूरे देश के लिए शर्म की बात थी। अगर गांधी ज़िंदा होते तो उन्होंने तुरंत आमरण अनशन किया होता, इस पर सिविल सोसाइटी की ओर से समर्थन मिलता या नहीं। गांधी जी के लिए हिंसा सिद्धांतों का मामला था न कि केवल रणनीति।

यही नहीं अन्ना ने मोदी के विकास मॉडल की तारीफ की। क्या विकास के माडल को हिंसा से अलग किया जा सकता है, और ऐसा, माडल जो समाज में हिंसा पैदा कर रहा हो? क्या विकास ही सब कुछ है? अगर ये समाज के कमज़ोर वर्ग की मदद नहीं करता, तो इस माडल की ज़रूरत क्या है। गांधी जी चाहते थे कि विकास का फायदा सबसे कमज़ोर वर्ग को भी मिले और मोदी का विकास माडल सिर्फ ताकतवर और उच्च वर्ग रिलायंस, टाटा औऱ दूसरों को फायदा पहुँचाता है। इसलिए बड़े उद्योगपति मोदी में प्रधानमंत्री के गुण पाते हैं।

इससे भी बुरा क्या होगा जब उनसे गुजरात दंगों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कुछ भी कहने से मना कर दिया और अपने साथी के इशारा करने पर कहा कि वो धार्मिक सद्भाव के लिए काम करते हैं और उनके आंदोलन में सभी वर्गों के साथ मुसलमान भी उसका हिस्सा है। ये सब कुछ सोचने के बाद और अपने साथी की सलाह पर किया, जो अन्ना हज़ारे के मुकाबले ज़्यादा सेकुलर हैं।

इसके अलावा सिविल सोसाइटी की ओर से ज़बरदस्त समर्थन, आरएसएस ,बीजेपी और दक्षिणपंथी विचारधारा वाले धार्मिक नेतृत्व जैसे बाबा रामदेव की साज़िश का हिस्सा है, जो इस बात पर नाराज़ थे कि उन्हें मसविदा कमेटी में शामिल क्यों नहीं किया गया। दक्षिणपंथी राजनीतिक विचारधारा वाला ये समर्थन देश के सेकुलर सेहत के लिए ठीक नहीं है। ये बहुत ही नुक्सानदेह हो सकता है। हम जानते हैं कि जयप्रकाश नारायण के आंदोलन का परिणाम क्या हुआ, जिसकी पैदावार नरेन्द्र मोदी हैं, हालांकि जय प्रकाश नारायण का अन्ना हज़ारे से स्थान ऊँचा है।

जय प्रकाश नारायण के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद वीपी सिंह के भ्रष्टाचार विरोधी आंदेलन का परिणाम कुछ खास नहीं रहा। हमसे इस तरह के आंदोलन का फिर से सामना नहीं किया जायेगा। ये दोनों महान लीडर अन्ना हज़ारे से बड़े थे। इसलिए अन्ना हज़ारे की कामयाबी को आज़ादी की दूसरी जंग का आंदोलन मान कर खुशी मनाने की ज़रूरत नहीं है। हज़ारे और उनके आंदोलन को कामयाब बनाने में मीडिया का अपना मकसद है।

हज़ारे, मोदी की तरह के विकास माडल के समर्थक हैं और मीडिया का नियंत्रण बड़े उद्योगपतियों के हाथों में है और वो हज़ारे को अपना मददगार पाते हैं। गांधी के नाम के जैसा कोई काम नहीं कर सकता है, इसलिए वो हज़ारे को दूसरे गांधी को रूप में पेश कर रहे हैं। गुजरात के मशहूर गांधीवादी चुन्नी भाई वैद्य ने मोदी के ग्रामीण विकास के बारे में अन्ना हज़ारे के बयान की आलोचना की है। वो पूछते हैं कि कहाँ हुआ है ग्रामीण विकास? अगर ग्रामीण इलाकों में विकास हुआ होता तो 10 फीसद आबादी शहरों की ओर प्रवास न की होती। गांधीवादी चुन्नी भाई वैद्य का ये बयान 2011 की जनगणना पर आधारित है। वो पूछते हैं कि ग्रामीण विकास के ऐसे हालत में मोदी की तारीफ करने के लिए क्या है?

मल्लिका साराभाई ने भी मोदी की तारीफ के लिए अन्ना हज़ारे की आलोचना की है। उनका कहना है कि मोदी के शासन में ग्रामीण इलाकों में बहुत कम विकास हुआ है। साराभाई का कहना है कि वास्तव में गाँव में जानवरों के लिए चारा उगाने वाली ज़मीन और कृषि योग्य भूमि को भी मोदी सरकार ने चोरी से उद्योगपतियों को कौड़ियों के दाम में दे दिया है। साराभाई के अनुसार मोदी के शासन में ग्रामीण इलाके के लोगों को बहुत मुश्किलों से गुज़रना पड़ रहा है।

साराभाई का कहना है कि मोदी के शासन में सबसे ज़्यादा भ्रष्टाचार हुआ है, जैसे 100 करोड़ रूपयों का सुजलाम सुफलाम पानी बचाओ घोटाला, 100 करोड़ रूपयों का बोरीबंद चेक बांध घोटाला और 600 करोड़ रूपये का मत्स्य पालन घोटाला। मल्लिका साराभाई का कहना है कि राज्य कर्ज़ में डूब गया है, क्योंकि उद्योगपतियों को मोदी ने विशेष रियायत दी है।

गुजरात के दूसरे सक्रिय कार्यकर्ता जो मानवाधिकार संगठनों से सम्बंध रखते हैं जैसे जोज़ार बंदूकवाला, प्रजापति और अन्य ने गुजरात की वास्तविकता बताने वाली सच्चाईयों का रहस्योद्घघाटन किया है और हज़ारे के द्वारा मोदी की तारीफ को चैलेंज किया है। गांधी जी का बुनियादी ज़ोर ग्रामीण विकास पर था लेकिन हज़ारे न सिर्फ उसकी तारीफ कर रहे हैं जिसने धार्मिक अल्पसंख्यकों के नरसंहार की इजाज़त दी बल्कि ग्रामीण इलाकों के विकास की कीमत पर अद्योगपतियों की मदद कर रहा है। इसके अलावा गांधीजी समाज के सबसे कमज़ोर व्यक्ति के भी सम्मान पर ज़ोर देते थे लेकिन मोदी के गुजरात में दलित और शोषितों की कोई इज़्ज़त नहीं है। मोदी के गुजरात में दोपहर के भोजन के समय दलित छात्र को अलग बैठना होता है, यहाँ तक कि ऐसा सरकारी स्कूलों में भी होता है और अगर कोई अध्यापक उन्हें साथ बिठाने की कोशिश करता है तो तुरंत उसका स्थानान्तरण कर दिया जाता है। शायद अन्ना हज़ारे इन कड़वी सच्चाईयों से परिचित नहीं हैं।

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हज़ारे का संघर्ष स्वागत योग्य है और साथ ही उनकी तारीफ भी होनी चाहिए और अगर वो ये संघर्ष आगे भी जारी रखना चाहते हैं, तो वो लोग जो कई तरह के भ्रष्टाचार के लिए ज़िम्मेदार हैं, तो वो उन्हें अपने साथ रहने की इजाज़त नहीं दे सकते हैं। गांधीजी चुनौतीपूर्ण संघर्ष के लिए ईमानदारी को आवश्यक मानते थे।

मशहूर इस्लामी विद्वान और सामाजिक कार्यकर्ता असगर अली इंजीनियर मुम्बई स्थित इंस्टीट्यूट आफ इस्लामिक स्टडीज़ और सेंटर फार दि स्टडी आफ सेकुलरिज़्म एण्ड सोसाइटी के प्रमुख हैं।

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