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Hindi Section ( 5 Jan 2012, NewAgeIslam.Com)

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From Jihad to Ijtihad जिहाद से इज्तेहाद की ओर


असगर अली इंजीनियर (अंग्रेज़ी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

9/11 को अमेरिका के ट्विन टॉवर पर आतंकवादियों के हमले के बाद से पश्चिमी देशों के लोगों के मन में जिहाद का गलत अर्थ बिठा दिया गया है और ये एक बदनामी पैदा करने वाला शब्द बन गया है। आतंकवाद की पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईराक समेत मुस्लिम दुनिया के बड़े हिस्से पर मौजूदगी है। अक्सर यहाँ पर आतंकवादी हिंसा काबू से बाहर नज़र आती है और मुसलमान खुद इन आतंकवादियों के निशाने पर होते हैं।

उलमा ने कई बार आत्मघाती हमलों और आतंकवाद की निंदा की है और इसे गैर इस्लामी अमल करार दिया है। हिंसा के लिए इस्लाम में कोई जगह नहीं है इसे स्पष्ट करने के लिए उलमा की कई विचार सभाएं और कांफ्रेंसें दुनिया के विभिन्न हिस्सों में हुई हैं। पिछले माह सेनेगल से लेकर इण्डोनेशिया तक के मशहूर उलमा तुर्की के शहर मारदीन में इकट्ठा हुए और मध्यकाल के फतवे जिसे मारदीन फतवा के नाम से जाना जाता है और जिसे इब्ने तैमियह ने जारी किया था, उसे सर्वसम्मति से खारिज किया गया। औऱ कहा गया कि इस फतवे के लिए वर्तमान समय की ग्लोब्लाइज़्ड दुनिया में कोई जगह नहीं है, जहाँ सभी विश्वासों और नागरिक अधिकारों का आदर किया जाता है।

मारदीन फतवा को ओसामा बिन लादेन ने अपने आतंकवादी हमलों के औचित्य के रूप में पेश किया था। मारदीन में उलमा के कांफ्रेंस के बाद 12 अप्रैल को सऊदी अरब के सर्वोच्च धार्मिक संस्था ने भी आतंकवाद की निंदा की। इस संस्था ने एक फतवा जारी किया जिसमें आतंकवादी कार्रवाईयों की निंदा की गयी और इसकी आर्थिक मदद को जुर्म करार दिया गया। फतवे के मुताबिक जो भी इन कार्रवाईयों के लिए आर्थिक मदद मुहैय्या कराते हैं वो भी जुर्म में बराबर के हिस्सेदार हैं। इस तरह आतंकवाद के समर्थन की बुनियादों को खत्म कर दिया गया। इसके बावजूद कोई इस तरह के फतवे का आतंकवादियों पर अपेक्षित असर की कम ही आशा कर सकता है। हालांकि इस तरह का फतवा उन मुसलमानों को बड़ी मुश्किल से ही आतंकवादियों से अलग कर पायेगा, जो अपने धर्म की बुनियादों पर इस तरह के हमलों का औचित्य पेश करते हैं। इसके बावजूद ये मामूली कामयाबी नहीं है।

हमारी तवज्जोह अब जिहाद से इज्तेहाद पर होनी चाहिए, जिसका अर्थ इस्लामी दुनिया के सामने जो समस्याएं आयें उन्हें बुद्धि के आधार पर समझने की कोशिश करना और कुरान में दर्ज बुनियादी सिद्धांतों और मूल्यों के मुताबिक उनके हल तलाश करना है। इज्तेहाद को अल्लामा इकबाल समेत बहुत से उलमा ने इस्लाम और इस्लामी कानून की सक्रिय आत्मा कहा है।

इस्लाम के प्रारम्भिक दौर में इज्तेहाद को अमल में लाया जाता था। बाद में इसके दरवाज़े बंद हो गये।1258 में मंगोल फौज के द्वारा बगदाद को तबाह करने के बाद भी बहुत से उलमा ने इस पर अमल जारी रखा था। विडम्बना ये है कि इसकी आधी सदी बाद इब्ने तैमियह ने अपने खुद के हम्बली विचारधारा की परिभाषा पेश की और जिहाद पर अपना फतवा जारी किया। इस तरह इज्तेहाद का दरवाज़ा बंद हो गया और आक्रामक जिहाद का दरवाज़ा खुल गया।

जिहाद के नये अवतार आतंकवाद की इस्लामी दुनिया के सभी मशहूर उलमा ने निंदा कर दी है और ये वक्त है कि इज्तेहाद पर अमल नये सिरे से शुरु किया जाये ताकि आज मुस्लिम समाज के सामने आ रही कानूनी और सामाजिक समस्याओं को हल किया जा सके। इस्लामी कानून के लिए बिना सोचे समझे पालन (अंध-विश्वास) और ठहराव एक मुसीबत बन गया है, जबकि हमारे आसपास की दुनिया में बहुत कुछ बदल रहा है लेकिन हम 1258 के पहले के फिकह का धार्मिक और कानूनी मामलों में पालन कर रहे हैं।

हम नये सिरे से सोचने और कुरान से निर्देश लेने में नाकाम रहे हैं। हम कुछ इमामों और मध्यकाल के कुछ उलमा का नाम बतौर हवाला देते रहे हैं और ये हमारे लिए कुरान से भी ज़्यादा मुकद्द्स बन गये हैं। मैं एक नई रणनीति और इज्तेहाद के दरवाज़े को खोलने के लिए कुछ बुनियादी कदमों का प्रस्ताव यहाँ पेश कर रहा हूँ।

पहला, कुध उलमा और मुस्लिम बुद्धीजीवि (ऐसे बहुत से हैं जिन्होंने परम्परागत इस्लामी तफ्सीर, हदीस और फिकह की तरबियत हासिल की है और जो परिवर्तन की ज़रूरत को महसूस करते हैं) को कम से कम हिम्मत दिखानी चाहिए और नई रणनीति बनाने के लिए, निजी हितों से मुकाबला करने और धार्मिक संस्थाओं को  वापस उनकी स्थिति में मज़बूत करने के लिए आगे आना चाहिए।

दूसरे, सभी विचारधारा से ऊपर हमें एक मुत्तहिद विचारधारा को तैय्यार करने की ज़रूरत है जो सभी मुसलमानों पर लागू हो। ये इस्लामी इत्तेहाद के खोखले नारे को भी और व्यापक अर्थ प्रदान करेगा। ये कोशिश वर्तमान समय की सभी विचारधाराओं को खारिज करने की नहीं है बल्कि सभी विचारधारा में कुरानी सिद्धातों और मूल्यों के लिहाज़ से जो सबसे बेहतर हो उसका चुनाव करना चाहिए।

तीसरे, हमारे ज़माने और वक्त की विशेष समस्याओं पर एक नई इज्मा (सहमति) कायम की जानी चाहिए। अगर इस्लाम की पहली तीन सदियों में उलमा ने इसे कर दिखाया था तो आज हम क्यों नहीं कर सकते हैं? पिछले ज़माने के उलमा का इज्मा अपनी विचारधारा तक ही सीमित था। आज ग्लोब्लाइज़्ड दुनिया में सभी विचारधारओं के बीच व्यापक सहमति को कायम करना होगा। सूचना और संचार की तकनीक के आधुनिक उपकरणों ने इसे आसान कर दिया है।

मध्यकाल में इस्लामी फिकह में कियास और इज्मा को इस्तेमाल किया जाता था। ये दोनों कानूनी समस्याओं के हल के लिए बुद्धिमान लोगों की मदद किया करते थे। हम आज विश्व स्तर पर इससे मुशाबहत (मिलती जुलती) रखने वाली बुनियादों को क्यों नहीं तैय्यार कर सकते हैं? शरई कानून में जिसे खुदादाद कहा जाता है वो कुछ और नहीं बल्कि अरब और फारस की संस्कृति में रचे बसे स्थानीय स्तर के कारक और रस्मों के अलावा कुछ और नहीं है, जो सदियो पहले मौजूद थे।

हमें अपने ज़माने के लिए शरई कानून को बनाते समय कुरान की ही तरह ऐसे सभी तत्वों से ऊपर एर विश्व-व्यापी दृष्टिकोण को तैय्यार करना होगा। हालांकि शरीअत का स्रोत बदल नहीं सकता है, लेकिन शरई कानून को इज्तेहाद और इज्मा की बुनियाद पर तब्दील किया जाना चाहिए, जो वर्तमान समय के मुसलमानों की समस्याओं को हल करने वाला हो।

लेखक इस्लामी विद्वान और सेंटर फार स्टडी आफ सोसाइटी एण्ड सेकुलरिज़्म, मुमबई के प्रमुख हैं।

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http://www.newageislam.com/ijtihad,-rethinking-islam/from-jihad-to-ijtihad/d/2821

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