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Hindi Section ( 18 Nov 2013, NewAgeIslam.Com)

Killings is Not Jihad क़त्ल और खून का बाज़र गर्म करना जिहाद नहीं

 

असफ़र फ़रीदी

31 अक्टूबर, 2013

जिहाद क्या है, इस्लाम में इसका क्या महत्व है और ये कब ज़रूरी होता है? इन जैसे सवालों पर बहस का सिलसिला नया नहीं है। ये बात भी सही है कि इसको परिभाषित करने में वो लोग आगे रहे हैं जिन्हें इस्लामी न्यायशास्त्र और परम्पराओं का कम ही ज्ञान रहा है। जबकि वास्तविकता ये है कि इसके सक्षम पहले और आज भी धार्मिक उलमा ही हैं।  इसलिए मैं भी जानबूझ कर इस बहस से खुद को अलग करता हूं कि जिहाद क्या है और ये कब ज़रूरी है? इसके बावजूद ये कहने में कोई गुरेज़ नहीं कि जिहाद के नाम पर जो कुछ हमारे सामने पेश किया जा रहा है, अगर वास्तव में वही जिहाद है तो वो जिहाद गलत ठहरेगा, जो पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम और चारों ख़लीफ़ाओं ने किये।

आज जिहाद के नाम पर जिस तरह अलग अलग टोलियां बनाकर दुनिया के विभिन्न भागों में क़त्ल और खून का बाज़ार गर्म किया जा रहा है, उससे तो साफ पता चलता है कि ये तथाकथित 'मुजाहिदीन' कुछ भी हों, इस्लाम के सिपाही नहीं हो सकते। कई समूहों की हरकतों और उनके बयान तो साफ पता देते हैं कि वो दूसरों के ज़रख़रीद ग़ुलाम हैं और इस्लाम का नाम बदनाम करने के लिए खून खराबा कर रहे हैं। कुछ तो ऐसे मालूम होते हैं कि जिन्हें पता ही नहीं कि वो आखिर कर क्या रहे हैं?

शुरुआत अपने घर हिंदुस्तान से करते हैं। यहां हर एक बम धमाके या आतंकवादी कार्रवाई के बाद 'इंडियन मुजाहिदीन' नामक संगठन का नाम उछाला जाता है। 27 अक्टूबर, 2013 को पटना में हुए बम धमाकों के बाद भी इसी संगठन का नाम लिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि उसने पटना में मुज़फ़्फ़र नगर दंगों का बदला लेने के लिए बम धमाके किए हैं। सवाल ये है कि अगर ये संगठन वास्तव में मौजूद है और मुल्क के मुसलमानों के हित में सशस्त्र कार्रवाई को ज़रूरी मानती है तो फिर जिस वक्त मुज़फ्फ़र नगर ​​में खून की होली खेली जा रही थी, उस दौरान ही ये अपने तथाकथित लाओ लश्कर के साथ वहां क्यों नहीं पहुंच गया? लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि इंडियन मुजाहिदीन का पहले तो अस्तित्व ही नहीं है और दूसरे अगर कोई अस्तित्व है भी तो उसका मकसद वो नहीं है जो हमें बताने की कोशिश की जाती है। इसी के साथ इस बात से भी इंकार मुश्किल है कि जिहाद के नाम पर कोई मुसलमान आतंकवादी कार्रवाई में शामिल नहीं होता। आम मुसलमान भी इससे इंकार करने वाले नज़र नहीं आते, लेकिन वो निश्चित रूप से ये समझते हैं कि जितने बड़े पैमाने पर मुसलमानों को आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त बताया जाता है वो सच नहीं है।

इसीलिए वो ऐसे सभी मामलों की ईमानदाराना जांच की मांग करते रहे हैं। उनकी मांगों को पूरा नहीं किया जाना भी इस बात की दलील है कि जो लोग तथाकथित 'जिहाद' के नाम पर खून खराबा कर रहे हैं वो वास्तव में इस्लामी विचारधारा के विपरीत काम कर रहे हैं। हिंदुस्तान में तो अभी तक इस बीमारी ने महामारी का रूप अख्तियार नहीं किया है लेकिन दुनिया के दूसरे देशों में स्थिति बहुत अधिक चिंताजनक है। इसमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक और सीरिया जैसे देश शामिल हैं। इन देशों में जिस तरह जिहाद के नाम पर धड़ल्ले से हत्या, मारधाड़ का बाज़ार गर्म है, इसको किसी भी स्थिति में इस्लामी नहीं कहा जा सकता। इसकी वजह ये है कि इन देशों में सशस्त्र कार्रवाई करने वाले निजी समूह इस्लाम या मुसलमानों के हित में नहीं बल्कि अपने और अपने 'मालिक' के एजेंडे पर काम करते हैं। वो दिखावे के लिए नाम तो इस्लाम और मुसलमानों का लेते हैं लेकिन जो काम करते हैं, उसका सबसे बड़ा शिकार मुसलमान ही होते हैं। इस्लाम बदनाम होता है और मुसलमान मारे जाते हैं, सताए जाते हैं। इसी के साथ मुसलमानों के वो आंदोलन भी कमज़ोर पड़ते हैं जो अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए चलाए जा रहे हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण आंदोलन फिलिस्तीन का है।

'जिहाद' के नाम पर पिछली एक चौथाई सदी से जो कुछ अफगानिस्तान से लेकर अमेरिका और दूसरे देशों में किया गया, उसका एक सरसरी जायज़ा (समीक्षा) भी ये बताने के लिए काफी है कि इसका सबसे ज्यादा फायदा अमेरिका को हुआ है।  अफ़गानिस्तान में पूर्व सोवियत संघ की रेड आर्मी और उसके अफगान समर्थक शासकों के खिलाफ जिहाद के नाम से सशस्त्र आंदोलन छेड़े गये। इसमें बहुत से लोग तो ये सोचकर शामिल हुए थे कि वो इस्लाम के लिए और अफगानिस्तान के लिए लड़ रहे हैं लेकिन वो इस बात से परिचित हैं कि उनकी डोर उन लोगों के हाथ में है जिनका दूर दूर तक इस्लाम और मुसलमानों के हितों से कोई वास्ता नहीं है। अफगानिस्तान की धरती पर सोवियत संघ की रेड आर्मी से लड़ने वालों का इस तरह से मन बनाया गया कि उन्हें पता नहीं चल सका कि वो अमेरिका की रणनीति के अनुसार काम कर रहे हैं। तथाकथित 'जिहाद' या आतंकवादी गतिविधियों और उनके परिणामों पर नज़र रखने वाले जानते हैं कि ग्यारह सितंबर के हादसे से लेकर अफगानिस्तान, इराक और लीबिया पर हमले और बलपूर्वक सरकारों को बदलने का सबसे ज्यादा फायदा किस को हुआ?

इस संदर्भ में सऊदी अरब के मुफ्तिए आज़म अलशेख अब्दुल अज़ीज़ आल शेख के द्वारा तथाकथित जेहादियों और खासकर उनका मन बनाने वालों की कड़ी आलोचना करना, एक सराहनीय काम है। उन्होंने सही तौर पर ये सवाल उठाया है कि जो लोग जिहाद के नाम पर दूसरों के बच्चों को जंग के मैदान में भेज रहे हैं वो अपने बच्चों को इस फ़र्ज़  से क्यों 'वंचित' रख रहे हैं? साथ ही इसी के साथ ये भी मानना ​​पड़ेगा कि जिस तरह विभिन्न आतंकवादी समूह खुद को इस्लाम और मुसलमानों का सिपाही करार देकर लोगों को उकसाते हैं इसी तरह दुर्भाग्यवश उलमा भी कुरान और सुन्नत की बजाय अपने अपने शासकों की मंशा के अनुसार उसका पालन और व्याख्या करते हैं। यही कारण है कि एक ओर जहां संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संगठन आतंकवाद को परिभाषित करने में नाकाम रहे, उसी तरह इस्लामी उलमा भी जिहाद के बारे में आम लोगों को समझाने में नाकाम रहे हैं। इसलिए हालात बद से बदतर होते गए लेकिन बदले हुए हालात में इस बात की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है कि जिहाद को परिभाषित किया जाए और उसके नाम पर जो दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में खून खराबे का बाज़ार गर्म है, उसका खात्मा किया जाए।

सऊदी अरब के मुफ्तिए आज़म ने अपने व्यक्तिगत दृष्टिकोण के लिए जिहाद का नारा लगाने वालों के बारे में जो बातें कही हैं, उन्हें इसकी भूमिका मानकर आगे बढ़ा जा सकता है। कहीं ये त्याग जान और माल का होगा तो कहीं पद और सम्मान और महिमा की भी हो सकता है। लेकिन इस्लाम और उसके नाम को बदनाम करने की साज़िशों के साथ ही हज़ारों लाखों निर्दोषों की हत्या और हत्या के कारण को रोकने के लिए ऐसे त्याग अनिवार्य हैं। इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत इसलिए है क्योंकि इस्लाम ने हमेशा ही युद्ध को अंतिम रणनीति करार दिया है। इसी के साथ इसने जंग के भी नियम निर्धारित किए गए हैं जिसमें बेगुनाहों, बूढ़ों, महिलाओं और बच्चों की हत्या करने से मना किया गया है। इसी के साथ इस्लाम ने हर एक को जिहाद का ऐलान करने का अधिकार नहीं दिया है। इसलिए जिहाद और जिहाद के नाम पर धंधे में फ़र्क़ करना ज़रूरी है और इससे भी अधिक जनता को ये बात समझाना ज़रूरी है।

31 अक्टूबर, 2013 स्रोत: इंक़लाब, नई दिल्ली

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