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Hindi Section ( 21 Nov 2013, NewAgeIslam.Com)

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Or Name the Place Where There is No Terror या वो जगह बता जहां आतंक न हो

 

 

 

असद मुफ्ती

21 नवंबर, 2013

ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर का कहना है कि दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा कट्टरपंथी (उग्रवादी) इस्लाम है। दो साल पहले टोनी ब्लेयर की आत्मकथा प्रकाशित हुई है जिसमें उन्होंने इस धारणा को खारिज कर दिया है कि पश्चिमी देशों की असंतुलित नीतियां उग्रवाद को बढ़ावा दे रही हैं। अपनी आत्मकथा के प्रकाशन के मौक़े पर बीबीसी को इंटरव्यू देते हुए पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री जिन्होंने सद्दाम हुसैन के पास परमाणु हथियारों की भारी खेप है, कहकर इराक पर चढ़ाई की थी। उन्होंने बीबीसी को बताया है कि चरमपंथी अपने इस्लाम को साम्यवाद से जोड़ते हैं। वो अपने विचारों को आधार बनाकर हर कार्यवाही को सही समझते हैं। उनके अनुसार उनके लिए परिवर्तन का क्षण अमेरिका में ग्यारह सितंबर दो हज़ार एक का हमला था।

टोनी ब्लेयर ने कहा कि मेरे लिए इसका जवाब बहुत आसान था। धार्मिक नज़रिए के आधार पर न्यूयॉर्क की गलियों में एक दिन में तीन हज़ार लोग मार दिए गए। मेरे लिए अहम बात ये थी कि अगर उन्हें तीस हज़ार या तीन लाख लोग मारने पड़ते तो वो मार देते, इसलिए मुझे महसूस हुआ कि विदेश नीति की पूरी तरह से समीक्षा का समय आ गया है, क्योंकि हमें एक नए और दूसरी तरह के खतरे का सामना था।

इसमें कोई शक की गुंजाइश नहीं कि ब्रिटेन को घरेलू सतह पर बेहद जोशीले उग्रवादियों की तरफ से हमलों का खतरा है,  जो न केवल अलकायदा के तरीके में परिवर्तन और जेलों में कैद मुसलमानों में बढ़ते हुए अतिवादी विचारधारा का नतीजा है। बल्कि असंतुलित विदेश नीति का नतीजा है। टोनी ब्लेयर इस बारे में कहते हैं कि मुझे गलत कहें या सही लेकिन मुझे यही लगा कि ग्यारह सितंबर के बाद खतरे के पैमाने में बदलाव आ गया है और आज भी यही स्थिति है। मेरा अब भी यही मानना है कि चरमपंथी और उनके अतिवादी आंदोलन और उनकी तरफ से परमाणु, रासायनिक और जैविक हथियारों से हमलों की प्रतिबद्धता हमारे लिए सबसे बड़े खतरे हैं।

टोनी ने लिखा है कि उग्रवादी अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए कोई भी कदम उठाने से परहेज़ नहीं करेंगे। उन्होंने इराक और अफगानिस्तान में ब्रिटिश सैनिकों की उपस्थिति का औचित्य और अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि फ़िलिस्तीन, चेचन्या, कश्मीर, इराक और अफगानिस्तान में उग्रवाद सहन करने लायक नहीं है।  हक़ीक़त ये है कि अगर ये लोग आतंकवादी अभियान न चलाते तो विदेशी सेना कब की इराक और अफगानिस्तान छोड़ चुकी होतीं। इसलिए आतंकवादियों का ये औचित्य कि वो विदेशी कब्जे के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं, बिलकुल व्यर्थ है। उन्होंने ये भी कहा कि ''अमेरिकी सैनिक इराक छोड़ चुके हैं लेकिन उग्रवादी अभी तक बगदाद में कार धमाके कर रहे हैं, इससे साफ़ जाहिर है कि इनका मकसद इराक से अमेरिकी सैनिकों को निकालना नहीं बल्कि वहां सरकार को गिराना है, जिसे जनता ने चुना है।

पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने ये स्वीकार किया है कि वो अभी तक ये नहीं समझ सके कि उग्रवादी इस्लामी विचारधारा से पूरी तरह से छुटकारा कैसे पाया जाए। लेकिन उन्होंने इस सिलसिले में एक बात स्पष्ट रूप से कही है कि ईरान कट्टरपंथी इस्लाम का समर्थन करने वाला सबसे बड़ा देश है और इसलिए आवश्यक है कि किसी भी तरह से उसे परमाणु हथियार बनाने से रोका जाए।

टोनी ब्लेयर के विचार के समर्थन में रॉयल युनाईटेड सर्विसेज़ इंस्टिट्यूट ने अपनी एक रिपोर्ट में भी यही कहा है कि हालात बताते हैं कि हमलों का एक सिलसिला किसी भी समय शुरू हो सकता है जिसमें अलकायदा के कई हमलों में व्यक्तिगत भूमिकाएं सामने आएंगी। ये हक़ीक़त है कि ब्रिटिश विश्लेषक, ब्रिटेन पर हमलों से चिंतित हैं। उनके विश्लेषण के अनुसार जहां तक देश के भीतर फैलते हुए आतंकवाद का सम्बंध है ब्रिटेन के किसी भी दूसरे पश्चिमी देश से अधिक खतरा है।  2000 से अब तक ब्रिटेन के खिलाफ 40 आतंकवाद की साज़िशें की गईं, जिनमें से केवल एक सफल रही और वो थी जुलाई के महीने में लंदन में चार पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश नागरिकों ने धमाका करके 52 लोगों को मार दिया था। इन हमलों की साजिश के इल्ज़ाम में 230 से अधिक लोगों को जेलों में डाला गया लेकिन जेल में कैद मुसलमानों में उग्रवादी विचारधारा के फैलने से सरकार की चिंता और बढ़ गई है।

कहा जाता है कि अगले पांच साल में लगभग 800 संभावित उग्रवादी तत्व जेल से रिहाई के बाद सामने आ सकते हैं। इनमें एक बड़ा नाम आलम अनवर अवलाई के शागिर्दों का है। ये एक सक्रिय अमेरिकी था जिसका सम्बंध अमेरिका की साईकेयरिस्ट समुदाय से है। इसने 2001 में 13 सैनिकों की गोली मार कर हत्या कर दी थी। ये भी कहा जाता है कि अवलाई के चेले अब व्यक्तिगत रूप से लोगों को आतंकवाद के लिए तैयार कर रहे हैं ताकि वो खेलों के बड़े बड़े टूर्नामेंट्स, होटलों और सार्वजनिक स्थानों को निशाना बना सकें, इसके अलावा आतंकवादी व्यक्तिगत रूप से महत्वपूर्ण और लोकप्रिय और व्यस्त लोगों को अपने निशाने पर रख सकते हैं और ये कहने में कोई चीज़ रुकावट नहीं कि ऐसी कोशिशों में से कोई एक कोशिश बड़े पैमाने पर कामयाब हो सकती है। वो चाहे मुसलमान कट्टरपंथियों के हाथों हो या किसी और के। हमें सावधान और सतर्क रहना होगा कि मुसलमानों की कमज़ोरियाँ, गलतियों, और बदनसीबियां अमेरिका की ईजाद की हुई नहीं, वो सिर्फ इसे इस्तेमाल करने और फायदा उठाने के दोषी हैं। हमें ये जानना ज़रूरी है कि हमारा दुश्मन कौन है और ये जानना भी उतना ही ज़रूरी है कि कौन दुश्मन नहीं है।

दूसरी तरफ अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट ने अपने नागरिकों को एक बार फिर खबरदार किया है कि वो यूरोप के दौरे से बचें, क्योंकि यूरोपीय देशों में आतंकवादी हमलो का खतरा है। अमेरिका की खुफिया ने आशंका जताई है कि पाकिस्तान और उत्तरी अफ्रीका कुछ आतंकवादियों की ओर से यूरोप पर हमला किया जा सकता है। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली उनके खास निशाने पर होंगे। यूरोप के अखबारों की रिपोर्टों में विश्लेषकों ने कहा है कि यूरोपीय शहरों में मुंबई शैली के हमले की साजिश तैयार वाले आतंकवादियों की नज़रें एफ़िल टॉवर, नोटर्डेम का कैथरटेल, बर्लिन का सेंट्रल स्टेशन आदि शामिल हैं। ये वो स्थान हैं जहां हर साल लाखों लोग इनकी यात्रा पर आते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि आतंकवादियों को पाकिस्तान के क़बायली इलाक़ों में अलकायदा के शिविरों में ट्रेनिंग दी जा रही है। आपको याद होगा एक पाकिस्तानी मूल के जर्मन नागरिक को हिरासत में लिया गया था जिसने लक्ष्यों की सूची पेश की। इससे अफगानिस्तान के बगराम हवाई अड्डे पर गिरफ्तारी के बाद और पूछ ताछ की गई थी। इधर जापान के विदेश मंत्रालय ने भी यूरोप की यात्रा करने वाले या वहाँ रहने वाले जापानी नागरिकों को सतर्क रहने की हिदायत दी है और उन्हें चेतावनी दी है कि अलकायदा और उससे जुड़े संगठनों की तरफ से आतंकवाद की काली बिल्ली को अंधेरे कमरे में तलाश जा रहा है जो वहाँ नहीं है।

21 नवंबर, 2013 स्रोत: रोज़नामा सहाफत, मुंबई

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