
असद मुफ्ती
28 जनवरी, 2013
(उर्दू से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)
सबसे पहले ये बताता चलूँ कि इस्लामी दुनिया या उम्मत या मुस्लिम देशों में या जो भी आप कहें, सिर्फ 498 युनिवर्सिटियाँ हैं जबकि अमेरिका में 5758। हमारे पड़ोसी और 'दुश्मन' नंबर एक भारत में अमेरिका से भी ज़्यादा यानी 8500 युनिर्सिटियाँ हैं। दूसरी तरफ डेली टाइम्स के एक सर्वे के मुताबिक पाकिस्तान में 285 धार्मिक दल काम कर रहे हैं जिनमें से 28 राजनीतिक और धार्मिक दल हैं जबकि 124 ने अपना टार्गेट जिहाद बना रखा है।
मुस्लिम देशों में साक्षरता दर 25 से 28 फीसद के बीच है और कुछ देशों में तो सिर्फ दस फीसद है। उनकी संख्या 25 देशों के लगभग है। जबकि एक भी मुस्लिम देश में साक्षरता दर सौ फीसद नहीं है। एक रिपोर्ट के अनुसार और ओआईसी (OIC) में 76 मुस्लिम देश शामिल हैं और उनमें अंतरराष्ट्रीय स्तर की केवल पांच युनिर्सिटियाँ हैं यानी तीस लाख मुसलमानों के लिए एक युनिर्सिटी...... जबकि अमेरिका में 6 हजार, जापान में नौ सौ पचास, चीन में नौ सौ और भारत में 8500 निजी और सरकारी विश्वविद्यालय काम कर रहे हैं।
उधर पूरी दुनिया में यहूदियों की संख्या एक करोड़ चालीस लाख हैं और मुसलमान सवा अरब, यानी एक यहूदी सौ मुसलमानों के बराबर है, दूसरे शब्दों में एक यहूदी सौ मुसलमानों पर भारी है। पिछली एक सदी में 71 यहूदियों को अनुसंधान, विज्ञान और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवाओं के बदले नोबेल पुरस्कार मिल चुका है जबकि मुस्लिम दुनिया में सिर्फ तीन लोग ये इनाम प्राप्त कर सके हैं। यहां तक कि 'किंग फैसल इंटरनेशनल फाउंडेशन सऊदी अरब' जो एक मुस्लिम संगठन है, उसकी तरफ से दिए जाने वाले किंग फैसल पुरस्कार के लिए मेडिकल साइंस (चिकित्सा विज्ञान) और अनुसंधान और साहित्य के क्षेत्र में एक उम्मीदवार भी शर्तों पर पूरा नहीं उतरता। क्या ये नील नदी के तट से लेकर काशिगर की मिट्टी तक के मुसलमानों के लिए शर्म का करण नहीं है। डेढ़ करोड़ 'खुदा के दुतकारे हुए' यहूदी हर क्षेत्र में आगे हैं? 22 अरब देश भी मिलकर इसराइल की एक ईंट नहीं उखाड़ सके। न विज्ञान में, न रिसर्च में और न मेडिकल में और न ही सिपाही के रूप में। इसके विपरीत सवा अरब से अधिक मुसलमान मतभेद और फितना और फसाद में सबसे आगे हैं। इस्लाम की तरक्की या इस्लाम के कारगर होने, या इस्लाम के लिए कोई व्यवस्था चैलेंज न होने, दुनिया तेजी से इस्लाम के क़रीब या इस्लाम कुबूल करती जा रही है, की खुशफ़हमी, या इस्लाम की शिक्षा प्रणाली में तरक्की पाने या इस्लाम एक मोकम्मल ज़ाब्तए हयात है या तक़वा व खुदा के खौफ का ढिंढोरा पीटने वालों से मेरा सवाल है कि क्या पश्चिम के आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बिना मस्जिदिल हराम में 30 लाख लोगों के एक समय में नमाज़ें पढ़ने का अमल मुमकिन हो सकता था? हरम शरीफ में बिजली की आधुनिक व्यवस्था, आसमान को छूती इमारतें क्या ये सब इस्लामी शिक्षाओं के कारण इस दुनिया में अस्तित्व में आईं? ये सब पश्चिमी शिक्षा और ईसाई या यहूदी वैज्ञानिकों की बरकत से ही संभव हो सकता है। दर्जनों मंजिलों पर लाखों नमाज़ियों को चंद लम्हों में ले जाने वाले इस्कलेटर्स (Escalaters माफ कीजिए मेरे पास इसका उर्दू विकल्प नहीं है) जो हैं वो 'मोमिनों 'का आविष्कार नहीं है। हरम में बेहतरीन किस्म का साउण्ड सिस्टम है जिससे हरम शरीफ और आसपास के दर्जनों इमारतों में स्थित हजारों कमरों में भी इमाम की आवाज साफ सुनाई देती है। ये साउण्ड सिस्टम भी खुदा के प्यारे मुसलमानों की ईजाद नहीं है। यहाँ ये भी याद रखने लायक है कि ये वही साउण्ड सिस्टम है जिसके अविष्कार पर हरम शरीफ से 'हराम' का फतवा जारी किया गया था। अल्लाह अल्लाह ......
वैश्विक स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में मुसलमानों का अनुपात 6.3 फीसदी है और इसी विश्व स्तर पर मुसलमान दूसरी क़ौमों से 85 साल पीछे हैं। जब सातवीं सदी में तातारियों ने हमला किया तो हम से एक भयानक गलती हो गई, हमने दीनी इल्म को समकालीन और आधुनिक ज्ञान के सामने ला खड़ा किया। वहीं से इल्म दोस्ती जाती रही और आज हम 700 साल पीछे चले गए। चारों खलीफा (खुल्फाए राशिदीन) के दौर में सिवाय क़ुरान के और कोई इल्म प्रचलित नही था, यहां तक कि हदीसों का संकलन भी नहीं किया गया था। यहां सवाल उठता है कि फिर हमारे 'स्वर्णिम काल’ में क्या था? जवाब है गुलाम थे, लौंडियाँ थीं, हाथ काटने की सज़ा थी, संगसार (मौत तक पत्थरों से मारने की सज़ा) था, माले ग़नीमत था, मोता था, साजिशों का अंबार था, क़बायली परंपरा थी, अलोकतांत्रिक सत्ता थी, तीन खलीफाओं की शहादत थी। क्या नहीं था? तो क्या हमें उनकी तारीफ के पुल बांधने चाहिए? क्या यही पूर्ण और व्यापक राजनीतिक और धार्मिक शासन था? स्पेन में मुसलमानों के आठ सौ साल के शासन के बावजूद आज ग्रानाडा कोर्डोबा के खंडहरों, अलहुमरा के अवशेषों के अलावा इस्लाम के पैरोकारों और इस्लामी संस्कृति के अवशेष का कोई निशान नहीं मिलता। यही हाल सोने की चिड़िया हिंदुस्तान का है। यहां भी आगरा का ताज महल, दिल्ली का लाल किला और लाहौर की जामा मस्जिद आदि के सिवा मुसलमानों के हजार साल के शासन और संस्कृति का कोई निशान नहीं मिलेगा।
शिक्षा क्षेत्र में मुसलमानों का पतन 1350 के बाद तेज़ी से हुआ। मुस्लिम सुल्तानों और शहंशाहों में एक बड़ी कमी ये थी कि उन्होंने शिक्षा केंद्रों की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया और न ही इतने मदरसे, स्कूल, विश्वविद्यालय और अनुसंधान केंद्र बनाये जैसे कि दूसरी क़ौमों ने और न ही शिक्षा को वो महत्व दिया जो दिया जाना चाहिए था। दूसरी तरफ ईसाई, यूनानी और तोरानी आदि लोग इल्म से फायदा उठाते रहे और यहीं बाद में उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के अनुसंधान केंद्र भी बनवाए जिन्हें 'शमिया' के नाम से जाना जाता था। मुसलमानों ने जो ज्ञान विशेषकर विज्ञान के प्रति बेरूखी बरती वो आज भी बरकरार है। शासन चाहे हिंदुस्तानी मुग़लों का हो, ईरानी सफवी शासकों का हो, उस्मानी तुर्कों का हो या दूसरे सुल्तानों का हो। सवाल ये है कि इस्लामी दुनिया में वैज्ञानिक ज्ञान का अध्ययन क्यों खत्म हो गया और मुसलमान उस ज्ञान के विकास से क्यों लाभांवित न हो सके! लंबी और कड़वी सच्चाईयों के विवरण में जाए बिना मेरे हिसाब से जो इल्म के दरवाज़े पर दस्तक देगा उसी के लिए दरवाज़ा खुलेगा। यही वजह है कि इल्म का दर तो है लेकिन मुसलमानों के लिए नहीं, जिन्होंने दस्तक दी उनके लिए ......
ज़ालिम हैं मज़लूम भी हम हर शर से मंसूब हैं हम
ऐसा हाल हुआ क्यों अपना मैं भी सोचूँ तू भी सोच
28 जनवरी, 2013 स्रोत: रोज़नामा सहाफत, मुंबई
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