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Hindi Section ( 9 Aug 2020, NewAgeIslam.Com)

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Why Banning The Movie ‘Muhammad - Messenger of God’ is Nonsensical आखिर क्यों फिल्म ‘मैसेंजर ऑफ़ गॉड’ पर पाबंदी करना अनुचित है


अरशद आलम, न्यू एज इस्लाम

२८ जुलाई, २०२०

लीजिये कट्टरपंथी मुस्लिमों ने ऐसा ही कर डाला। इरानी निदेशक माजिद मजीदी की दिशा निर्देश में बनी फिल्म: “मुहम्मद: मैसेंजर ऑफ़ गॉड” की रिलीज़ को रोकने के लिए उन्होंने महाराष्ट्र सरकार पर जोर दे कर निर्णायक विजय प्रप्त कर लिया है। यह फिल्म प्रस्तावित ट्राइलॉजी का पहला भाग है जिसमें मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम के बचपन से ले कर आखरी दिनों तक की ज़िन्दगी को दिखाया गया है। पहला भाग विशेषतः उस समय के सामाजिक संदर्भ पर केन्द्रित है जिस में मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम की विलादत हुई, बचपन में आपका अपनी माँ आमिना और अम्मां हलीमा (रज़ीअल्लाहु अन्हुमा) से रिश्ता, मोहब्बत, भरोसा और देख भाल जो उन्हें अपने कबीले बनी हाशिम, विशेषतः आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब और बाद में आपके चचा अबू तालिब की तरफ से हासिल हुआ।

यह फिल्म २१ जुलाई को महाराष्ट्र के एक ऑन लाइन मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर रिलीज़ होनी थी। लेकिन इससे पहले ही, मुंबई में रज़ा अकादमी की अगुवाई में मुसलमानों के एक समूह ने महाराष्ट्र सरकार से सफलता के साथ फिल्म की रीलीज़ पर प्रतिबंध लगाने की अपील की। केवल इतना ही नहीं, महारष्ट्र के आंतरिक मंत्री, अनील देशमुख ने केन्द्रीय सरकार को यह लिखने के लिए लिखा कि फिल्म की कौमी सतह पर हर तरह की स्ट्रीमिंग और दोसरे प्लेटफ़ॉर्म पर प्रतिबंध लगा है क्योंकि इससे ‘मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को हानि पहुंचेगा, और यह देश में धार्मिक तनाव का कारण बन सकता है। अब देखना यह है कि केंद्र सरकार इस मामले पर क्या निर्णय लेती है, लेकिन इस बीच, रज़ा अकादमी ने यकीनी तौर पर उन सबी मुसलमानों या दोसरों पर विजय प्रप्त कर ली है, जो फिल्म देखने के इच्छुक रहे होंगे।

रज़ा अकादमी भारत के कई बरेलवी संगठनों में से एक है। अकादमी ने सलमान रुश्दी, तस्लीमा नसरीन और यहां तक ​​कि ए आर रहमान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था,  यह सब मुस्लिमों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के नाम पर हुआ था। इसका उन लोगों पर कुछ प्रभाव होना चाहिए जो तर्क देते हैं कि बरेलवी एक वंशानुगत सहिष्णु समूह है जिसे एतेदाल पसंद इस्लाम के प्रचार के लिए काश्त कीया जानी चाहिए। बरेलवी पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम को एक आदर्श इंसान से भी बेहतर मानते हैं। उन्होंने लगातार तर्क दिया है कि पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम में ऐसे गुण हैं जो पवित्र होने का दर्जा रखते हैं। बरेलवी थिओलोजी के अनुसार, पैगंबर साया भी नहीं थी क्योंकि वह प्रकाश से बने थे, यह कि वह पूरी दुनिया को अपनी हाथ की हथेली में देख सकते थे, इस तरह वह पूरी दुनिया एक स्थान पर रहते हुए देख सकते थे।

बरेलवी जमात बाब ए नबूवत में ऐसा अकीदा रखते हैं जिसकी तरक्की निश्चित रूप से देवबंद जैसे उन गिरोहों के खिलाफ रही है जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम की ऐसी गैर मामूली ताकतों में तख्फीफ़ का अकीदा रखते हैं। पैगम्बर अलैहीस्सलाम के संबंध में इस दर्जे की मार्फत रखने का अर्थ यह है कि बरेलवी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम की शख्सियत पर किसी भी तरह का विवाद हो तो सबसे आगे रहें गे। इसलिए यह अचम्भे की बात नहीं है कि ब्रेड फोर्ड में बरेलवी संगठन की और से “सैटेनिक वर्सेज़” पर प्रतिबंध का मुतालबा सबसे पहले किया गया था।

तथापि रज़ा अकादमी निश्चित रूप से भारत में बरेलवी फ़िक्र की पुर्णतः प्रतिनिधित्व नहीं करती है। और यह कि बरेलवी मकतब ए फ़िक्र में बहुत साड़ी सूफी संगठने मौजूद हैं जिन्होंने विभिन्न मौकों पर रज़ा अकादमी की राजनीति करने और अतिवाद में लिप्त रहने के कारण उसकी निंदा कर चुके हैं। महाराष्ट्र सरकार ने फिल्म की पाबंदी के लिए अकादमी की अपील को जिस रफ़्तार से स्वीकार किया इससे केवल यह साबित होता है कि राज्य मुसलमानों को बतौर रुढ़िवादी और अतिवादी पेश करने में सरमायाकारी करती है।

मुसलमानों को अपने भले की खातिर रजा अकादमी के इस मांग का विरोध करना चाहिए। बहर हाल, एक अल्पसंख्यक होने के नाते, इन पर पाबंदी लगाने के बजाए लोकतांत्रिक अधिकारों और अजादाना तकरीर को आगे बढ़ाना चाहिए। अपनी खुफिया राजनीति के माध्यम से, वह हिन्दुओं की दक्षिणपंथी राजनीतिक वार्तालाप को जैसे औचित्य प्रदान करते हैं कि उनकी राजनीति का कोई भी आलोचना हिन्दू धर्म पर आलोचना करने के बराबर है। अगर मामले इसी तरह चलते रहे तो बहुत जल्द हिन्दू और मुस्लिम फिरका वारीयत इस देश में शायद ही कोई उदारवादी लिबरल के लिए खुला छोड़े।

तथापि धार्मिक दृष्टिकोण से भी इस फिल्म पर पाबंदी का मुतालबा गैर माकूल है, और इसके कई अन्य कारण हैं। विचारणीय फिल्म में मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम के बचपन की ज़िन्दगी को दिखाया गया है। इसमें मज़हबी एकमतता है कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम ने चालीस वर्ष की आयु में नबूवत का एलान किया था। अगर तर्क यह है कि नबी सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम को तस्वीरों में पेश नहीं किया जाना चाहिए, तो निश्चित रूप से इस सिद्धांत का इतलाक आपके नबूवत मिलने से पहले नहीं किया जाना चाहिए।

मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नी तस्वीर कुशी में कभी कभी तस्वीर में चेहरे पर नकाब डाल कर या रौशनी डाल कर पेश किया जाता है। फिल्म के अंदर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम के बचपन का चेहरा नहीं दिखाया गया है और इसी वजह से यह सुन्नी मकतब ए फ़िक्र के सिद्धांत पर भी अमल पैरा है। इसलिए रजा एकेडमी का एतिराज़ राजनीतिक तौर पर या धार्मिक सिद्धांतों के लिहाज़ से भी कोई अर्थ नहीं रखता।

मुस्लिम समाज में इस्लाम के पैगम्बर की नुमाइंदगी करना हमेशा निषिद्ध रहा है। हमें निश्चित रूप से १५ वीं शताब्दी तक इस बात का प्रमाण मिलता है कि आपके इस्केचेज़ पूरी दुनिया में प्रयोग किये जाते थे, कभी कभी तो धार्मिक रस्मों पर भी तवज्जोह में सहायक के तौर पर इन स्केचेज़ का प्रयोग किया जाता था। तथापि इसका अर्थ यह नहीं है कि यह अमल बड़े पैमाने पर था। यह केवल चने हुए मज़हबी और सयासी हलकों में प्रयोग होता था। शिया बेशक भिन्न तरीकों से पैगम्बर की नुमाइंदगी पेश करते रहे हैं जिनमें तस्वीरें भी शामिल हैं और निश्चित रूप से यह उनकी इस्लाम की तर्जुमानी में हर्ज नहीं है।

मगर सुन्नी दुनिया में नबी अलैहिस्सलाम की जो भी छोटी से तस्वीर कुशी की जाती थी वह धीरे धीरे एक स्थान पर समाप्त हो गई यहाँ तक कि लोग भूल गए कि इस तरह का कार्य भी कभी मौजूद था। यह सुन्नी मकतब ए फ़िक्र ही है जिसने नबी अलैहिस्सलाम की किसी तरह की भी तस्वीर कुशी को शिया धर्म से जोड़ा हुआ है। यह अजीब मसला है। रज़ा अकादमी की मुखालिफत की एक वजह यह है कि इस फिल्म के हिदायतकार शिया हैं।

सूफियों सहित मुस्लिम धर्म विशेषग्यने हमेशा यह तर्क दिया है कि हालांकि ऊँचे वर्ग के लिए कुछ चीजें जायज हो सकती हैं, लेकिन आम लोगों को इसके लिए अनुमति नहीं दी जा सकती। तौहीद के नजरिये को ठीक इसी तरह समझने के लिए जिस तरह इस्लाम मुतालबा करता है मुस्लिम अवाम की सलाहियत में यह शक हमेशा रहा है। इसलिए कभी कभी नबी करीम अलैहिस्सलाम की तस्वीर कुशी को बर्दाश्त किया गया और कभी कभी मुस्लिम अश्राफिये में भी इजाज़त दी गई, लेकिन अवाम के लिए यह अमल पुर्णतः निषेध था। तस्वीरों के बारे में यह ख्याल किया जाता था कि उनके अंदर तौहीद के बुनियादी सिद्धांतों को खराब करने और उन्हें शिर्क में दोबारा मिल जाने की तरफ रागिब करने की सलाहियत है।

अवाम का यह खौफ बिलकुल निराधार है। कई सदियों के बाद भी मुस्लिम अवाम ने इस्लाम का भिन्न तरीकों से तजरिबा करने के बावजूद, तौहीद की उम्दा तफहीम पेश की है और वह अपने धर्म पर कायम हैं। चलती फिरती तस्वीर वाले जमाने में भी रहते हुए मुसलमान इस्लाम पर अमल पैरा हैं। अगर बालीवुड और हालीवुड की साझा ताकत मुसलमानों को गुमराह करने में कामयाब नहीं हो सकी तो नबी अलैहिस्सलाम की हयात पर आधारित फिल्म उनके ईमान व अकीदे को क्योंकर कमज़ोर कर सकती है?

यह यकीन करने की कोई उचित वजह नहीं हैकि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम की तस्वीर कुशी का प्रयोग किसी भी तरह से मुसलमानों के एतिकाद को कम कर देगा। इसके उलट यह एक शिक्षित अनुभव हो सकता है जिसमें उनकी ज़िन्दगी और उन क्षणों के बारे में जाना जा सकता है जिनमें उनका मज़हब सामने आया था और यह भी कि पैगम्बर अलैहिस्सलाम ने अपने लोगों को इस्लाम लाने के लिए किस तरह सामाजिक चिलेंजों को नेविगेट किया था। जैसा कि यह स्पष्ट है कि मुसलमान ख़ास तौर पर सुन्नी मकतब ए फ़िक्र के मुसलमान अपने मज़हब की तारीख के बारे में बहुत कम जातने हैं। फिल्म शायद इस सिलसिले में उनके लिए कुछ अच्छा कर सकती है। इसी तरह सुन्नी मुसलमानों के हित में है कि वह रज़ा अकादमी की निंदा करें और फिल्म की रिलीज़ का मुतालबा करें।

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