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Hindi Section ( 20 Jul 2018, NewAgeIslam.Com)

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Darul Qazas or Sharia Courts: Why both must be Opposed? दारुल क़ज़ा या शरई अदालतों का विरोध आवश्यक क्यों?

 

 

 

अरशद आलम, न्यू एज इस्लाम

13 जुलाई 2018

प्रत्येक जिले में दारुल क़ज़ा स्थापित करने के आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की वर्तमान ‘इच्छा’ का विरोध बजा तौर पर केवल विभिन्न राजनीतिक दलों की ही ओर से नहीं बल्कि स्वयं मुस्लिम बिरादरी के अन्दर भी की गईl तथापि यह ख़याल रखना आवश्यक है कि इसे शरई अदालत के बराबर कोई संस्था करार देना स्पष्ट रूप से गलत हैl अदालतों के पास मामलों में निर्णय सुनाने का ‘विकल्प’ होता है; दारुल क़ज़ा के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं होगी और इसकी हैसियत एक मध्यस्थता परिषद की होगीl

जहां तक ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बात है तो इस तरह के नीम अदालती इदारे दुसरे बिरादरियों में भी मौजूद हैं, जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में खाप पंचायत का निजाम देख लिया जाएl कुछ आदिवासी क्षेत्रों में इन संस्थाओं को कानूनी हैसियत भी प्राप्त हैl इसलिए हो सकता है कि दारुल क़ज़ा की स्थापना कानून के दायरे में होl दारुल क़ज़ा पर पाबंदी की मांग करना और खाप पंचायत पर चुप रहना स्पष्ट रूप से पाखण्ड हैl

हमें यह भी समझ लेना चाहिए दारुल क़ज़ा इस देश में 1972 से अपना कार्य कर रही हैl और अगर इन परिषदों का विरोध करना है तो पुरे देश में दारुल क़ज़ा स्थापित करने के लिए ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से हाल के प्रयास के आधार पर नहीं बल्कि संगठित तौर पर उनका विरोध किया जाना चाहिएl

आलोचकों का कहना है कि अगर इन नीम अदालतों के पास अपने फैसलों को लागू करने का विकल्प नहीं है तो फिर उन्हें स्थापित ही क्यों किया जाए? यह इस प्रशन को गलत तरीके से पेश करना हैl इसलिए कि मान लें अगर इस शरई अदालतों को अपने निर्णय लागू करने की शक्ति प्राप्त हो तो क्या इसका अर्थ यह है कि देश में शरई अदालतें ठीक हैं? हमें यह समझने की आवश्यकता है कि आधुनिक कानूनी प्रणाली का एक लंबा इतिहास रहा है और उस ज़माने में इसका आधार मानवाधिकार और कानून की नज़र में समानता के पवित्र अवधारणा पर रखी गई हैl

शरीअत जैसा निज़ाम कि जिसके आसमानी होने का दावा किया जाता हैl जमूद एवं तात्तुल (ठहराव) का शिकार है, और इसकी बुनियाद अब भी सदियों पुराने अवधारणा और सिद्धांतों पर कायम है, और इसमें आधुनिक तक़ाज़ों और मांग को नफ़रत और कराहत की (बुरी) नज़र से देखा जाता हैl शरई कानून के अन्दर अब भी मर्दों और औरतों के बीच कानूनी असमानता का प्रभुत्व है और इसके अन्दर बहुत सारे मामलों में औरत को मर्द की मिल्कियत समझा जाता हैl वैकल्पिक कामुकता के बारे में इस्लाम के स्टैंड की जितनी कम बात की जाए उतना ही बेहतर होगाl क्या हम शरई कानून के इस फैसले को मान लें कि समलैंगिक को मौत दे दी जाए?

इस तरह के दलीलों का हकीकत से कोई वास्ता नहीं है कि शरई कानून आसमानी हैं इसी लिए इंसानों के बनाए कानून से बेहतर हैं, जैसा कि कुछ इस्लाम पसंद अक्सर यह बात करते हैंl हमें यह मान लेना चाहिए कि सेकुलर कानून किसी भी आसमानी कानून से अधिक विकसित है क्योंकि इसमें पदोन्नति पाने और परिवर्तन स्वीकार करने की क्षमता मौजूद हैl

आवश्यक नहीं कि नियमों का कार्यान्वयन केवल कानूनी माध्यम से ही किया जाएl सामाजिक दबाव भी एक चीज है जो किसी भी समाज में सिद्धांतों और मूल्यों को जन्म देती है और साधारणतः उन्हें एक ज़माने के बाद कानूनी हैसियत हासिल हो जाती हैl चूँकि उनमें से अधिकतर सिद्धांत धर्म से प्राप्त किए गए हैं इसी लिए धार्मिक मामलों में दक्षता रखने वालों को सामान्यतः सिद्धांतों और मूल्यों के रक्षक की हैसियत हासिल हो जाती हैl इसलिए इससे यह बहस करने में कोई मदद नहीं मिलती कि क्या दारुल क़ज़ा की कोई कानूनी हैसियत होगी या नहींl अगर यह दारुल क़ज़ा इसी प्रकार चलते रहे तो उन्हें विभिन्न तरीकों जैसे अलगाव और सामाजिक बाईकाट आदि के माध्यम से अपने फैसलों को लागू करने का विकल्प प्राप्त हो जाएगाl

ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बिलकुल यही करने की कोशिश में है, बोर्ड एक counter-hegemonic (काउंटर हेजीमोनी) बयाना पैदा करने का प्रयास कर रहा है जो कि भारतीय संविधान की आधुनिक सेकुलर तर्क से परस्पर विरोधी हैl इन दारुल क़ज़ा के माध्यम से ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड यह चाहता है कि मुसलमान केवल कानून पर अमल करें और वह (ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड) उस कानून का एक अकेला तर्जुमान बन जाएl हमें यह भी समझना आवश्यक है कि ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से तीन तलाक को मनसूख करार दिए जाने के बाद यह कदम उठाया है जिसकी वजह से मुस्लिम मर्दों को उनकी औरतों पर बेलगाम प्रभुत्व प्राप्त थाl

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट में ऐसी अर्जियां भी विचाराधीन हैं जिनके माध्यम से मुसलमान औरतें निकाह हलाला जैसे घिनावने काम को समाप्त करने और बहु विवाह को चैलेंज करने की कोशिश कर रही हैंl ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को अच्छी तरह पता है कि अदालतों में इसका मुकदमा कमज़ोर हैl तीन तलाक पर उनका बचाव हास्यास्पद था और उनकी इस दलील को अतार्किक माना जा रहा है कि शरीअत एक आकाशीय नियम है इसलिए इसमें कोई परिवर्तन नहीं की जा सकतीl चूँकि वह सेकुलर अदालतों के माध्यम से अपने हितों की रक्षा नहीं कर सकते, इसी लिए वह एक मध्यम निज़ाम कायम करने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें वही इस्लामी कानून के रक्षक होंगेl इसके लिए किसी तंबीह की आवश्यकता नहीं है और कोई भी साधारणतः यह समझ सकता है कि ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पीठ पीछे सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को ख़ारिज करार देते हुए तीन तलाक और निकाह हलाला की परंपरा जारी रखना चाहता हैl

इससे मुसलामानों का अस्तित्व धीरे धीरे राज्य के इतिहास से मिट जाएगा और वह स्वयं अपनी दुनिया में खो कर रह जाएँगे जो कि एक भयावह बात है, इसलिए कि अगर मुसलमान अल्पसंख्यक के रूप में अपने अस्तित्व को बाक़ी रखना चाहते हैं तो उन्हें सरकार के साथ अपनी दूरीयों को समाप्त करने की आवश्यकता हैl लेकिन ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को इस प्रकार के परिणाम से बहुत खुशी होगी इसलिए कि उनका अंतिम उद्देश्य मुसलामानों को मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक तौर पर देश से अलग रखना हैl

इसलिए स्वयं को ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की फूट डालने वाली राजनीति से अलग रखना मुसलामानों के हित में है और उन्हें यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि भारतीय मुसलामानों का नेतृत्व करने का उन्हें क्या अधिकार हैl क्या वह एक चयनित संगठन है? अगर नहीं, तो फिर किसने उन्हें भारतीय मुसलमानों का प्रतिनिधि आवाज बनने का अधिकार दिया है? क्या वह भारतीय मुसलामानों के विविधता का उपयुक्त तरीके से नेतृत्व करते हैं? इस बोर्ड में कितने शिया और कितनी महिलाएं सम्मीलित हैं? या हमें यह मान लेना चाहिए कि केवल कुछ मौलाना पुरी मुस्लिम बिरादरी की किस्मत का फैसला कर सकते हैं? अब समय आ चुका है कि स्वयं ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को ही रद्द कर दिया जाना चाहिएl और ऐसा करने में स्वयं मुसलमान को ही पहल करनी चाहिएl

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