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Hindi Section ( 23 March 2014, NewAgeIslam.Com)

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What Kind Of Islam Is It? ये कौन सा इस्लाम है?

 

 

 

 

 

अंसार अब्बासी

11 मार्च, 2013

अगर इस्लाम को पढ़ नहीं सकते, उस पर अमल नहीं कर सकते तो कम से कम उसकी बदनामी का कारण तो न बनें। ये कौन सा इस्लाम सिखाता है कि अगर कोई गैर मुस्लिम कथित तौर पर रसूलल्लाह का अपमान करने के जुर्म का दोषी हो तो इससे सम्बंध रखने वालों की पूरी बस्ती को आग लगा दी जाए। उनके घरों को जला कर राख कर दिया जाए। उनका जीना हराम कर दिया जाए। जुर्म एक ने किया सज़ा सबको देना, कहाँ का इस्लाम है और कहाँ का इंसाफ है। इस्लाम तो हमें इंसानियत सिखाता है मगर अपने आपको जानवरों से भी बदतर साबित कर रहें है। इस्लामी शिक्षा में कोई ऐसी मिसाल दिखा दें जहाँ ये सिखाया गया हो कि किसी एक व्यक्ति के जुर्म के बदले में पूरे मोहल्ले या बस्ती को तहस नहस कर दिया जाए।

लाहौर के बादामी बाग़ में स्थित जोज़फ़ कॉलोनी में ईसाई धर्म से सम्बंध रखने वाले एक सौ से अधिक घरों और दुकानों को जलाने वाले न जाने अपना सीना तान कर क्या समझ रहे होंगे कि उन्होंने कोई बड़ा कारनामा अंजाम दिया। वो शायद इस भूल में भी हों कि उन्होंने नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से अपनी मोहब्बत का हक़ अदा कर दिया। लेकिन काश ये जाहिल जानते कि उन्होंने अपनी हरकत से न सिर्फ अल्लाह को नाराज़ किया बल्कि हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के आदेशों की नाफरमानी की है।

एक हदीस के मुताबिक हमारे प्यारे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने तो मुसलमानों को हमेशा के लिए खबरदार कर दिया कि जो ज़िम्मियों (अल्पसंख्यकों) के साथ अन्याय करेगा, उनसे किए गए वादों को तोड़ेगा, उनकी ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करेगा, उनकी इमारतों को छीनेगा, उनके गिरजा घरों को नुकसान पहुँचाएगा, उनको इबादत करने से रोकेगा, उनके साथ कोई भी ऐसा काम करेगा जो अत्याचार की श्रेणी में आता हो, उनकी इज़्ज़त और आबरु पर हमला करेगा, तो ऐसे व्यक्ति के खिलाफ और प्रभावित ज़िम्मी के हक़ में क़यामत (प्रलय) के दिन नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम खुद मुक़दमा लड़ेगें।

नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के ज़माने में एक मुसलमान ने एक गैर मुस्लिम को क़त्ल किया तो आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने उस मुसलमान के क़त्ल का हुक्म दिया और फरमाया, ''अपने ज़िम्मी (अल्पसंख्यक नागरिक) को वफ़ा करने का सबसे ज़्यादा हक़दार मैं हूँ।'' इस्लामी शिक्षाओं के मुताबिक ज़िम्मी को ज़बान या हाथ से तकलीफ पहुँचाना, उसको गाली देना, मारना पीटना या उसकी दूसरों से बुराई करना उसी तरह नाजाएज़ है जिस तरह मुसलमान के साथ ऐसी हरकत करना नाजाएज़ है। एक इस्लामी राज्य के किसी अल्पसंख्यक नागरिक को तो ये अधिकार हासिल है वो इस राज्य को छोड़कर किसी दूसरे राज्य में जाकर बस जाए लेकिन एक बार उसके अधिकारों की रक्षा की ज़िम्मेदारी लेने के बाद इस्लामी राज्य और उसके मुसलमान नागरिक अपनी इस ज़िम्मेदारी को त्याग नहीं सकते कि उन लोगों को उस ज़िम्मी की जान व माल की सुरक्षा करना है। जोज़फ कॉलोनी पर हमला करने वालों ने नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की शिक्षाओं के एक एक शब्द की नाफरमानी करके अपने लिए आख़िरत (परलोक) में सख्त जवाबदेही का सामान पैदा कर लिया। जिस व्यक्ति ने कथिक गुस्ताख़ी की उसके खिलाफ एक दिन पहले मुक़दमा दर्ज हो चुका था तो फिर इसके बावजूद वो कौन से तत्व थे जिन्हों ने एक व्यक्ति के जुर्म की सज़ा पूरी बस्ती को देने की साज़िश की। इस दंगे में शामिल होने वालों ने आखिर क्यों नहीं सोचा कि वो क्या करने जा रहे हैं।

एक तरफ अगर ये शहबाज़ शरीफ सरकार की नाकामी है कि वो जोसफ कॉलोनी के निवासियों को खतरे के मद्देनज़र एक रात पहले ही इलाके को खाली करवाने के बावजूद उनके घरों की रक्षा न कर सकी, तो दूसरी तरफ ये भी राज्य की नाकामी है जनता से किए गए अपने संवैधानिक वादों के बावजूद उसने अपने नागरिकों को इस्लामी शिक्षाओं से अवगत नहीं करवाया। संविधान में किए गए वादों के बावजूद अगर पाकिस्तान के मुसलमानों को इस्लाम नहीं पढ़ाया जाएगा, उन्हें कुरान की समझ नहीं होगी और जब वो नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की शिक्षाओं से बेखबर होंगे तो फिर बादामी बाग़ जैसी घटनाएं होती रहेंगी।

जब राज्य अपने नागरिकों को इस्लाम की शिक्षा से बेखबर रखेगी और इस्लाम के नाम को सिर्फ राजनीति और राजनीतिक नारों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा तो फिर जाहिलियत की ऐसी घटनाओं के नतीजे में दूसरे प्रकार के जाहिल भी रसूलुल्लाह के अपमान से सम्बंधित कानून को खत्म करने की बात करेंगे। पाकिस्तानी क़ौम को भी चल पढ़ा के रास्ते पर चलाने वालों को भी सोचना चाहिए कि उनके अभियान में इस्लामी शिक्षाओं का ज़ोर क्यों नहीं। वो इस बात को समझने में क्यों असमर्थ हैं कि कुरान की समझ और नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की जीवनी को पढ़ाए बिना सिर्फ दुनियावी शिक्षाओं पर ज़ोर दे कर हम अपने बच्चों को उस वास्तविक ज्ञान से दूर रख रहे है जो हमें इंसानियत का पाठ पढ़ाता है, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के अधिकारों के सम्मान का पाठ पढ़ाता है, सांप्रदायिकता से रोकता है, हमें दुनिया के बारे में जानने की प्रेरणा देता है, सिर्फ अल्लाह और उसके दीन की खातिर जिहाद की शिक्षा देता है।

एक दिन तो ये भी टीवी पर सुना कि जब इस्लामी विषयों को पढ़ा दिया जाता है तो फिर दूसरे विभागों में इस्लामी विषय को क्यों शामिल किया जाता है। इस जाहिलियत का अब कोई क्या जवाब दे। क्या इस्लाम का साइंस से सम्बंध नहीं, क्या इतिहास, अर्थशास्त्र, रक्षा, राजनीतिशास्त्र, सामाजिक विज्ञान, चिकित्सा, मानवाधिकार, कानून, अदालत, सरकार, शासन और अन्य विज्ञानों और जीवन के क्षेत्रों के बारे में इस्लाम खामोश है? हाँ अगर कोई इस्लाम और अपनी मुसलमानियत से ही शरमाए तो इसका क्या इलाज है।

11 मार्च, 2013 स्रोतः रोज़नामा जंग, कराची, पाकिस्तान

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