New Age Islam
Sat Jan 23 2021, 03:19 PM

Loading..

Hindi Section ( 13 Sept 2011, NewAgeIslam.Com)

Holy Quran: The Guarantor of Respect for Women क़ुरान करीमः महिलाओं के अधिकारों का रक्षक

प्रोफेसर अख्तरुल वासे (उर्दू से हिंदी अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम डाट काम)

इस्लाम दीने फितरत है और इंसानी फितरत के तमाम तकाज़ों का इसमें लिहाज़ रखा गया है। औरत और मर्द जो किसी भी समाज की बुनियाद और पहली इकाई हैं, उनके रिश्तों, उनकी हैसियत व मर्तबा को तय करने में भी इस्लाम ने इंसाफ की तमाम आवश्यकताओं का पूरी तरह लिहाज़ रखा है। इसीलिए क़ुरान में औरत और मर्द के बीच न्याय पर आधारित रवैय्ये को अख्तियार किया गया है। इस्लाम की नज़र में मर्द और औरत बराबर का दर्जा रखते हैं, उसूलन (सिध्दान्त के तौर पर) दोनों का दर्जा बहैसियत लिंग के बराबर है। मर्द हो या औरत हर एक अपने अमल के लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार है और हर एक को उसके अमल का पूर पूरा बदला मिलेगा। क़ुरान में हैः

जो शख्स नेक काम करेगा, चाहे वो मर्द हो या औरत बशर्ते कि वो मोमिन हो, तो ऐसे लोग जन्नत में दाखिल होंगे और उन पर ज़रा भी ज़ुल्म न होगा। (अल-निसाः124)

क़ुरान पाक की इस आयत में स्पष्ट तौर पर बताया गया है कि मर्द और औरत में से जो भी अच्छे अमल करेगा, उसको उसका बदला मिलेगा, यानि लिंग की बुनियाद पर कोई तफरीक (विभेद) नहीं होगी। मर्द और औरत दोनें के लिए खुदा का एक ही क़ानून है। औरत और मर्द के दरम्यान बहुत से रिश्ते हैं। जिसमें सबसे अहम रिश्ता शौहर और बीवी का है। शौहर और बीवी के बारे में क़ुरान पाक में इरशाद हैः वही है जिसने तुमको एक जिस्म से पैदा किया और इसके लिए खुद उसी की जिंस (लिंग) से एक जोड़ा बनाया, ताकि वो उसके पास सुकून हासिल कर सके। (ऐराफः189)

क़ुरान मजीद में अल्लाह ताला ने अहले ईमान की एक दुआ के जवाब में इस तरह इरशाद फरमाया हैः

उनके रब ने उनकी दुआ कुबूल फरमाई कि मैं तुम में से किसी का अमल ज़ाया (व्यर्थ) करने वाला नहीं, ख्वाह मर्द हो या औरत। तुम सब एक दूसरे से हो। (आलइमरानः195)

क़ुरान मजीद की इस आयत से पता चलता है कि इस्लाम ने मर्द और औरत को बराबर का दर्जा दिया है। तुम सब एक दूसरे से हो के अलफाज़ ये बताते हैं कि औरतों और मर्दों दोनों का मामल एक बराबर है। इससे ये भी पता चलता है कि इस्लाम ने औरतों और मर्दों दोनों की एखलाक़ी (नैतिक) जिम्मेदारी एक सी रखी है। यही वजह है कि इनाम और जज़ा का मामला भी दोनों के साथ बराबर होगा। इस्लाम ने मर्द और औरत दोंनों को जहाँ एक तरफ बराबर के अधिकार दिये हैं वहीं उनकी ज़िम्मेदारियाँ भी बराबर रखी हैं। क़ुरान मजीद में एक दूसरी जगह इरशाद फरमाया गया हैः

ऐ लोगों अपने रब से डरों जिसने तुमको एक जान से पैदा किया है और उससे उसका जोड़ा पैदा किया है और दोनों से बहुत से मर्द और औरतें फैला दीं, और अल्लाह से डरो जिसके वास्ते से तुम एक दूसरे से सवाल करते हो और खबरदार रहो क़राबत वालों से बेशक अल्लाह तुम्हारी निगरानी कर रहा है। (अल-निसाः1)

क़ुरान मजीद की ये आयत बहुत स्पष्ट तौर पर ये बताती है कि औरत और मर्द दोनों की असल एक है। दोनों एक मां-बाप से हैं। इस ऐतबार से दोनों के बीच सुलूक और बर्ताव में कोई फर्क नहीं बरता जाना चाहिए। जिस सुलूक का हक़दार एक मर्द हो सकता है उस सुलूक की हकदार औरत भी है। क़ुरान मजीद में औरत और मर्द की तख्लीक़ के लिए ख़लक़ा मिन्हा ज़ौजहा (और उससे उसका जोड़ा बनाया), यहाँ मिन्हा से मुराद ये है कि अल्लाह ने जिस मादा से हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को पैदा किया उसी मादा से उनके जोड़े यानि हज़रत हौव्वा अलैहिस्सलाम को पैदा किया। तख्लीक़ का ये साझापन बराबरी का सुबूत होने के साथ ही इस ओर भी इशारा करता है कि मर्द और औऱत दोनों को पूरी एकता के साथ रहना चाहिए।

क़ुरान पाक में मर्द को औरत का लिबास कहा गया है और औरत को मर्द का लिबास कहा गया है, लिबास का मकसद जहाँ एक तरफ सतर को छिपाना होता है, तो दूसरी तरफ उसका मकसद ज़ेब व जीनत (शोभा) का इज़हार भी होता है। क़ुरान ने इस जुमले (वाक्य) में औरत और मर्द दोनों की हैसियत तय कर दी, यानि दोनों एक दूसरे के लिए लिबास की तरह हैं। जो इनके लिए ज़ेब व ज़ीनत का सबब है जिससे उनके जिस्म की बाहरी असर से हिफाज़त होती है, जो उनके जिस्मानी ऐब पर पर्दा डालता है, जो उनके जिस्म का सबसे क़रीबी राज़दार होता है और जो उनके वजूद से सबसे करीब चीज़ होती है। क़ुरान मजीद में औरत और मर्द के लिए लिबास की उपमा के द्वारा न सिर्फ ये कि उनके रिश्ते को तय करती है बल्कि इस रिश्ते की आवश्यकताओं को भी एक दूसरे पर पूरी तरह स्पष्ट कर देती है। क़ुरान मजीद ने दूसरे समाजी मामलात में भी औरतों और मर्दों दोनों का बराबरी से ज़िक्र किया है। मिसाल के तौर पर बर्दाश्त के हुक़ूक़ (अधिकार) के सिलसिले में सूरे निसा आयत नम्बर 7 में इरशाद हुआ है। मां बाप और नज़दीकी लोगों की विरासत में से औरतों का भी हिस्सा है, थोड़ा हो या ज़्यादा- एक तय किया हुआ हिस्सा।

अब तक के ज्ञात इतिहास में क़ुरान मजीद में पहली बार औरतों को विरासत में हिस्सा दिया गया। सिर्फ यही नहीं कि उनके हिस्से की बात कही गयी बल्कि उसे तय कर दिया गया, जिसका औरत को दिया जाना ज़रूरी है, चाहे वो माल थोड़ा हो या ज़्यादा। कुछ लोग ये स्वीकार करते हैं कि क़ुरान मजीद ने विरासत में मर्द के मुकाबले औरत को आधा हिस्सा दिया है, लेकिन ये स्वीकरोक्ति नकारात्मक विचार पर आधारित है। पहली बात तो ये सोचनी चाहिए कि चौदह सौ साल पहले यह हिस्सा तय किया गया, जबकि आधुनिक कानूनों के बनने में सदियाँ बाकी थीं। दूसरी बात ये है कि औरत को सिर्फ बाप की विरासत में से हिस्सा नहीं मिलता बल्कि शौहर की विरासत से भी हिस्सा मिलता है। इस तरह औरत को दो घरों की विरासत मिलती है और मर्द को सिर्फ एक जगह की। इस ऐतराज़ात (आपत्तियों) की एक बड़ी वजह नावाकफियत (अनभिज्ञता) भी है, क्योंकि कुछ ऐसे मौके भी आते हैं जब औरतों को मर्दों से ज़्यादा हिस्सा विरासत में मिलता है।

क़ुरान मजीद में औरत को समाज का एक अहम और सक्रिय सदस्य बताकर पेश किया गया है। वो औरत को समाज में बेकार बना कर नहीं रखता, इसीलिए अल्लाह ताला का इरशाद हैः

और तुम ऐसी चीज़ की तमन्ना करो जिसमें अल्लाह ने तुम में से एक दूसरे पर बड़ाई दी है। मर्दों के लिए हिस्सा है अपनी कमाई का और औरतों के लिए हिस्सा अपनी कमाई का और अल्लाह से उसका फज़ल मांगो। बेशक अल्लाह हर चीज़ का इल्म रखता है। (अल-निसा-32)

क़ुरान मजीद की इस आयत में जहाँ एक तरफ ये बताया गया है कि मर्द और औरते अपनी सलाहियत के ऐतबार से अलग हैं। कुछ मामलात में औरत मर्द से आगे जा सकती है। कुछ में मर्दों को औरतों पर श्रेष्ठता हो सकती है। और ऐसा सिर्फ मर्द और औरत में ही नहीं बल्कि दो मर्दों में जिस तरह फर्क हो सकता है उसी तरह औरत और मर्द में भी ऐसा होना ताज्जुब की बात नहीं।

क़ुरान मजीद में एक जगह इरशाद फरमाया गया हैः

और मोमिन मर्द और मोमिन औरतें एक दूसरे के मददगार है और बुराई से रोकते हैं और नमाज़ कायम करते हैं और ज़कात देते हैं और अल्लाह और उसके रसूल की फरमाबरदारी करते हैं। यही लोग हैं जिन पर अल्लाह रहम करेगा, बेशक अल्लाह ज़बर्दस्त है, हिकमत वाला है। मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों से अल्लाह का वादा है, बाग़ों का, कि जिनके नीचे से नहरें जारी होंगी, उनमें वो हमेशा रहेंगे। (अल-तौबाः71-72)

इस आयत में मर्द और औरत की उसूली हैसियत तय कर दी है। क़ुरान मजीद के मुताबिक मर्द और औरत एक दूसरे के मददगार हैं। रही पति और पत्नी के सम्बंध में नज़र आने वाली गैर-बराबरी तो ये भी एकतरफा विचार है। पति और पत्नी  के मामले में असल अहमियत सम्बंधों की मज़बूती की है। औरत बहैसियत माँ अपनी औलाद की निगराँ होती है, जिसमें बेटे और बेटी दोनों शामिल हैं।

खुलासा (सारांश) ये कि क़ुरान मजीद ने आज से चौदह सौ साल पहले औरत और मर्द को बुनियादी तौर पर बराबरी के दर्जे का हकदार बताया है। औरत को वही मुकाम दिया जो मर्द का था। दोनों के लिए एक समान उसूल रखे। मर्द को उसके आमाल का बदला मिलेगा, औरत को उसके आमाल का बदला मिलेगा, दोनों को एक दूसरे का मददगार करार दिया। दोनों को एक दूसरे के लिए सुकून और राहत हासिल करने का ज़रिया बताया। दोनों को एक दूसरे का लिबास क़रार दिया। विरासत में दोनों के हिस्से तय किये, और दोनों को समाजी ज़िंदगी में अपना अपना किरदार अदा करने की आज़ादी बख्शी। औरत को ये अख्तियार दिया कि वो अपने लिए शौहर का इंतेखाब खुद करे और मर्दों को पाबंद किया कि वो किसी औरत पर ज़बर्दस्ती अपनी मर्ज़ी का शौहर थोपने की कोशिश न करें।

इस तरह इंसानों के इतिहास में पहली बार औरत को न सिर्फ उसका जायज़ हक़ बल्कि उसे हासिल आधिकारों को क़ानूनी सहारा भी मिला। ये इस दुनिया के इंसानों पर क़ुरान मजीद का बहुत बड़ा एहसान है।

(प्रोफेसर अख्तरुल वासे जामिया मिल्लिया इस्लामिया में इस्लामिक स्टडीज़ विभाग के अध्यक्ष हैं।)

URL for English and Urdu article:

http://www.newageislam.com/urdu-section/holy-quran--the-guarantor-of-respect-for-women--نسائی-عزو-وقار-کی-ضامن-قرآن-کریم/d/3525

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/holy-quran--the-guarantor-of-respect-for-women--क़ुरान-करीमः-महिलाओं-के-अधिकारों-का-रक्षक/d/5474


Loading..

Loading..