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Hindi Section ( 27 May 2015, NewAgeIslam.Com)

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'Secularism is a Complex Word एक जटिल शब्द है ‘धर्मनिरपेक्ष’


आकार पटेल

5 मई 2015

हम ऐसे समुदाय नहीं हैं, जिनका इतिहास लगातार परस्पर युद्धों का रहा है और बीच-बीच में शांति के चरण आये हों. स्थिति बिल्कुल इसके उलट है, और उसमें भी युद्ध शब्द का प्रयोग सही नहीं है, क्योंकि हिंसा की घटनाएं कुछ भौगोलिक क्षेत्रों तक ही सीमित रही हैं.

 क्या बॉलीवुड के तीन खान (शाहरुख, सलमान और आमिर) की जोरदार सफलता यह संकेत करती है कि भारतीय मूलत: धर्मनिरपेक्ष होते हैं, अगर वे राजनीतिक स्वार्थ से वशीभूत न हों या उन्हें कुछ उलटा करने के लिए भड़काया न जाये?’ एक महिला ने यह सवाल एक साप्ताहिक पॉडकास्ट में किया, जो मैंने ऑडियोमैटिक डॉट इन वेबसाइट पर शुरू किया है. इस मसले पर मैंने भी अकसर यह विचार किया है, लेकिन कभी किसी निर्णय पर नहीं पहुंच सका हूं.

 ऐसे ही सवाल मुझसे पाकिस्तान में, खासकर वहां के पंजाब सूबे में, पूछे जाते हैं, जहां हिंदुओं के बारे में जानकारी कम है. संपादक, क्रिकेट प्रशासक और राजनेता नजम सेठी ने कभी टिप्पणी दी थी कि बॉलीवुड की प्रेम कहानियों में अगर हिंदू-मुसलिम तत्व शामिल होता है, तो नायक हमेशा ही हिंदू होता है और नायिका मुसलिम होती है, जैसा कि मणिरत्नम की फिल्म बॉम्बेमें देखा जा सकता है. अगर मुङो ठीक से याद है, तो इस बयान में सेठी यह कहना चाहते हैं कि भारतीय इसके विपरीत प्रस्तुति (मुसलिम लड़के और हिंदू लड़की का प्यार) को स्वीकार करने में संकोच करेंगे.

 क्या यह सच है? मेरा कहना है कि नहीं, ऐसा नहीं है. यह भले ही बिल्कुल सही बात हो कि बॉलीवुड के कुछ निर्देशकों और लेखकों के विचार ऐसे हों और वे वैसी ही फिल्में बनाते और लिखते हों, परंतु हमें असलियत की ओर देखना चाहिए. सच्चाई यह है कि तीनों खान-शाहरुख, सलमान और आमिर-की शादी या प्रेम संबंध हिंदुओं से है.

 शाहरुख खान ने गौरी से तथा आमिर ने पहले रीना से और फिर किरण राव से शादी की है. सलमान खान की अनेक हिंदू प्रेमिकाएं रही हैं, उन सभी के नाम यहां दे पाना संभव नहीं है.

 और हम खानों की सूची में चौथे खान, अपेक्षाकृत कम सफल सैफ अली खान को भी जोड़ सकते हैं, जिन्होंने करीना कपूर से शादी की है.

 इन सबसे उनके प्रशंसकों या सिनेमा दर्शकों को कोई समस्या नहीं है, और अगर है भी, तो वह भी बहुत मामूली है. इस स्थिति को हम फिल्मी परदे पर रखते हुए मान सकते हैं कि मुसलिम लड़के और हिंदू लड़की के प्रेम-प्रसंग से दर्शकों को कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा.

 इसका दूसरा पहलू बॉलीवुड की विषय-वस्तु और स्टार सिस्टम से जुड़ा है. बड़े बजट की फिल्मों के साथ अधिकतर फिल्मों में नायक का चरित्र जटिल नहीं होता, वह सरल एवं द्विआयामीय होता है. सलमान खान अपनी भूमिकाएं एक ही तरह से निभाते हैं, और उसे ही सलमान खान के व्यक्तित्व का भी असली तौर-तरीका मान लिया जाता है. इससे यह पता चलता है कि दर्शक नायक की तरफ आकर्षित होता है, न कि परदे के उसके चरित्र की ओर.

 इसका मतलब यह हुआ कि जो उस आदमी की खूबियां और खामियां दशकों से मीडिया में पेश की जाती रही हैं, वे सब सही हैं. यह इस बात का सूचक भी है कि दर्शक उन्हें उनकी छवि के कारण ही पसंद करते हैं, और उन्हें मुसलिम चरित्र में एक हिंदू लड़की के साथ रोमांस करते दिखाये जाने से दर्शकों को कोई दिक्कत नहीं होगी.

 इस संदर्भ में बॉलीवुड के सावधान रहने का मसला बहुत पुराना है, जब दिलीप कुमार जैसे मुसलिम अभिनेता को हिंदू नाम रखना पड़ता था. उन्हें ऐसा लगता था कि ऐसा करने से ही वे दर्शकों द्वारा स्वीकार किये जायेंगे. क्या उनकी यह सावधानी उचित थी?

वर्तमान समय में महान खानों के अपने अनुभव के आधार पर हम कह सकते हैं कि यह सावधानी ठीक नहीं थी, क्योंकि दुनिया के इस हिस्से के हमारे समाजों में कुछ ही दशकों में इतना बदलाव नहीं होता है. 1950 के दशक के बॉलीवुड के दर्शक छह दशकों के बाद के मौजूदा दर्शकों से बहुत अलग नहीं थे.

 मैं यह स्वीकार करता हूं कि बॉलीवुड महज एक संकेतक है, हालांकि, उसकी पहुंच को देखते हुए यह बहुत ही अच्छा है, और दोनों समुदायों के परस्पर संबंध बहुत उतार-चढ़ाव से भरे रहे हैं.

 अतिशय हिंसा की अनेक घटनाएं घटित हुई हैं, भले ही ऐसा कभी-कभी होता है और पिछले कुछ दशकों से इनमें कमी आयी है. समुदाय अलग-अलग बस्तियों में रहते हैं, खासकर अहमदाबाद और बड़ौदाजैसे अपेक्षाकृत रूढ़िवादी शहरों में.

 इन शहरों में अलगाव पूरी तरह हो चुका है और इसे अशांत क्षेत्र कानून जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से राज्य भी बढ़ावा देता है, जिसमें संपत्ति बेचने पर पाबंदी होती है और किसी मोहल्ले की रूपरेखा को बनाये रखा जाता है.

 और यह भी सही है कि हमारे महानगरों में ऐसी इमारतें हैं, जिनमें कुछ धर्म के लोगों को जगह नहीं दी जाती है. लेकिन, क्या यह सब हमारी खुली सोच के प्रतिनिधि हैं या फिर, जैसा कि सवाल पूछनेवाले ने कहा है, हम तभी तक धर्मनिरपेक्ष हैं, जब तक हमें अतीत के वास्तविक या काल्पनिक दर्द का अहसास नहीं कराया जाता है.

 मेरी दृष्टि में सभी धर्मो के माननेवाले भारतीय सहिष्णु हैं. धर्मनिरपेक्ष एक जटिल शब्द है और मुङो नहीं पता है कि इस संदर्भ में मैं इसका प्रयोग कर सकता हूं या नहीं. भारतीय उपमहाद्वीप में सहिष्णुता एक सहज मूल्य है. यह तर्क दिया जा सकता है कि ऐसा हिंदू धर्म के विभिन्न रूपों के कारण है और इसका असर यहां के अन्य धर्मो पर भी पड़ा है. मैं मानता हूं कि यह संभव है.

 लेकिन, इससे एक दिलचस्प पहलू निकलता है और यह सवाल पूछनेवाली वह महिला भी समझती है. सबूत यह संकेत करते हैं कि हम ऐसे समुदाय नहीं हैं, जिनका इतिहास लगातार परस्पर युद्धों का रहा है और बीच-बीच में शांति के चरण आये हों. स्थिति बिल्कुल इसके उलट है, और उसमें भी युद्ध शब्द का प्रयोग सही नहीं है, क्योंकि हिंसा की घटनाएं कुछ भौगोलिक क्षेत्रों तक ही सीमित रही हैं.

 इसलिए, मैं प्रश्नकर्ता से सहमत हूं. भारतीय मूल रूप से सहिष्णु/ धर्मनिरपेक्ष हैं, अगर हमें बरगलाया और भड़काया न जाये. इस विचार से मुङो भली अनुभूति हुई.

Source:http://www.prabhatkhabar.com/news/columns/story/421811.html

URL: https://newageislam.com/hindi-section/akar-patel/-secularism-is-a-complex-word--एक-जटिल-शब्द-है-‘धर्मनिरपेक्ष’/d/103207

 

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