ऐमन रियाज़, न्यु एज इस्लाम
18 अगस्त, 2012
(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)
उर्दू के मशहूर अखबार में प्रकाशित एक लेख में दिल्ली के कुछ मुस्लिम नौजवानों ने कथित तौर पर बौद्ध धर्म के अनुयाईयों की दुकानों के बहिष्कार और दिल्ली में मजनूं का टीला स्थित बौद्ध मोनास्ट्री मार्केट से कुछ भी ख़रीदारी न करने की अपील की है। इस अभियान को वो लोग एक दूसरे को एसएमएस और ई-मेल के द्वारा चला रहे हैं (सहाफत, दिल्ली, 16 अगस्त, 2012)। इन लोगों का मानना है कि बोद्ध धर्म को मानने वाली होने के कारण म्यांमार की सरकार मुसलमानों की स्थिति बेहतर करने के लिए जानबूझ कर कोई कार्रवाई नहीं कर रही है।
एक अन्य समाचार जिसे हम लोगों ने पढ़ा कि लखनऊ और इलाहाबाद में लोग सड़कों पर निकल आए और उनका विरोध हिंसक हो गया। इन लोगों ने वाहनों को नुक्सान पहुंचाया, लोगों से मारपीट की और मीडिया वालों के कैमरे तोड़ दिए। लखनऊ में बुधवार पार्क में लगी बुद्ध की मूर्ति इन शरारती तत्वों का निशाना बनी, जो स्वयं को मुसलमान कहते हैं। उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं कि महात्मा बुद्ध इस दुनिया में अल्लाह की ओर से भेजे गए सभी नबियों (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) में से एक हो सकते हैं, इस तरह हमारे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से किसी तरह कम नहीं हैं। इन लोगों ने मूर्ति की शक्ल बिगाड़ने की कोशिश की लेकिन वो इसमें नाकाम रहे।
इलाहाबाद और कानपुर में भी यही कहानी दोहराई गई। पुलिस की उचित रूप से कड़ी कार्रवाई के कारण हालात काबू में लाया गया।
म्यांमार के रखाईन राज्य में जून के शुरुआती दिनों में शुरू हुई ये सांप्रदायिक हिंसा न केवल इसके आस पास के क्षेत्रों को बल्कि लोगों के मन को प्रभावित कर रही है। प्रदेश के बौद्ध रखाईन बहुमत अक्सर रोहिंग्या मुसलमानों के साथ मुठभेड़ करते रहते हैं, जिन्हें बंगाली कहा जाता है और उन्हें साथी जातीय समुदाय नहीं माना जाता है।
इतिहास के पन्नों को देखें तो हमें याद आता है कि 1978 और 1991-92 में सीमा पार कर आने वाले हजारों रोहिंग्या मुसलमानों को ढाका उनके देश वापस भेजने में असफल रहा। म्यांमार ने शरणार्थियों की पहचान पर सवाल उठाकर उन्हें अपने देश में वापस लेने से बार बार इन्कार करता रहा है। म्यांमार में शरणार्थियों की स्वदेश वापसी पहचान निर्धारित करने पर ज़ोर देने के कारण धीमी रही, क्योंकि उनमें से या तो कई ने सरकार से कोई पहचान बताने वाले दस्तावेज प्राप्त नहीं किया था या अपनी जान बचाने के लिए सब कुछ छोड़कर आ गए थे। रोहिंग्या मुसलमानों को 1982 के एक कानून के तहत राज्यविहीन नादरिकों के रूप में वर्गीकृत किया जाता था और म्यांमार में उनके साथ अवैध आप्रवासियों के रूप में व्यवहार किया जाता था।
म्यांमार 60 मिलियन आबादी वाला एक बहु धार्मिक देश है। यहां के 89 प्रतिशत लोग बौद्ध धर्म के मानने वाले हैं। बाकी के लोग मुसलमान, ईसाई, हिंदू और बहाई धर्म के मानने वाले हैं। ब्रिटिश सरकार के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप से मुसलमानों की आबादी का बड़ा हिस्सा तत्कालीन बर्मा में गिरमिटियों के रूप में (आधिकारिक दस्तावेज के साथ मजदूरी करने वाले) प्रवेश किया था।
म्यांमार में हाल की अशांति की शुरू राज्य में कानून लागू करने वाली एजेंसियों की ओर से बौद्ध मत को मानने वाली एक महिला के साथ बलात्कार और उसके कत्ल के लिए तीन रोहिंग्या मर्दों को हिरासत में लेने के बाद फैली। ये खबर जंगल की आग की तरह फैल गई कि रोहिंग्या लोग ही इस अपराध के लिए जिम्मेदार हैं, बौद्ध धर्म के मानने वालों ने जवाबी कार्रवाई में 10 मुसलमानों पर हमला कर उन्हें मार दिया, जो रोहिंग्या नहीं थे। इसके बाद हुई बदले की कार्रवाई में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई, आगज़नी और लूट की कई घटनाएं हुई, इसने सरकार को अशांत क्षेत्रों में आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा करने की प्रेरणा दी।
म्यांमार की लोकतंत्र समर्थक नेता अंग सान सू की से बदले राजनीतिक परिदृश्य में मेल जोल कराने वाली भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने देश के बहुसंख्यकों से अल्पसंख्यक समूह के लोगों के प्रति सहानुभूति दिखाने पर जोर देने को कहा है। राष्ट्रपति थेन सेन देश के जातीय अल्पसंख्यकों के साथ लंबे समय से चल रहे सशस्त्र विवाद को समाप्त करने के लिए सकारात्मक कदम उठा रहे हैं।
वर्ग संघर्ष को मुसलमानों के द्वारा डर के मनोविज्ञान का प्रयोग कर सांप्रदायिक रूप दिया जा रहा है। मुस्लिम खुद को शिकार बताने की आदत है और इस तरह व्यवहार करते हैं जैसे गैर मुसलमानों की ओर से उन पर लगातार अत्याचार हो रहे हैं। इसलिए, वो तर्क देते हैं, यदि वो जवाबी कार्रवाई नहीं करते तो वो सभी देशों जहां वो अल्पसंख्यकों की तरह रह रहे हैं, वहां उन्हें अधीन बना दिया जाएगा। उनका कहना है गैर मुस्लिम बहुल देशों में उनके अधिकार का अल्लंघन किया जा रहा है, इसलिए ये उनके लिए ज़रूरी है कि वो अपने अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करें।
शायद, ये लोग यह समझने में असमर्थ हैं कि दुनिया भर में अधिकांश मुस्लिम देश गैर मुसलमानों के अधिकारों का उल्लंघन करने के कारण प्रसिद्ध हैं। बेहतरीन उदाहरण सऊदी अरब और पाकिस्तान हो सकते हैं। सऊदी अरब में केवल दो ही विकल्प दिए जाते हैं: या तो आप एक रूढ़िवादी मुसलमान बन जाओ या एक कट्टरपंथी मुसलमान बन जाओ। कोई तीसरा विकल्प नहीं है। दरअसल ये दुनिया में एकमात्र ऐसा देश है जो मस्जिद के अलावा किसी और धार्मिक इमारत के निर्माण की इजाज़त नहीं देता है। ये कुरान को भी नहीं जानते हैं जो इनकी अपनी मातृभाषा में लिखी है, जो कहता है:
”और अगर खुदा लोगों को एक दूसरे से दूर दफा न करता रहता तो गिरजे और यहूदियों के इबादत ख़ाने और मजूस के इबादतख़ाने और मस्जिद जिनमें कसरत से खुदा का नाम लिया जाता है कब के कब ढहा दिए गए होते "(22:40)।
पाकिस्तान में किसी भी उच्च पद पर कभी भी कोई गैर मुस्लिम नहीं बैठा। गैर मुसलमानों, विशेष रूप से पाकिस्तान में हिंदुओं की स्थिति बेहद निराशाजनक है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वो हिंदुस्तान में रहना चाहते हों।
हिंदुस्तान में चार मुसलमान राष्ट्रपति रह चुके हैं जो हमारे राजनीतिक व्यवस्था में सबसे उच्च सरकारी पद है। बॉलीवुड पर मुसलमानों की लगभग हुकूमत रही है। मानव प्रयास के सभी क्षेत्रों में चाहे वो खेल हो या विज्ञान और प्रौद्योगिकी, मुसलमानों ने हर क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है। बहुत से गैर मुस्लिम देशों में जहां अल्पसंख्यकों को नाकार बनाया जा रहा है, इसके विपरीत हिंदुस्तानी मुसलमानों ने केवल अपनी योग्यता के आधार पर ही ऐसा नहीं किया है बल्कि उन्हें अवसर भी प्रदान किए गए हैं।
बोद्ध लोगों की दुकानों के बायकाट करने की बात करने वाले मुसलमानों के "तर्क" अगर इसी "तर्क" को भारतीय हिंदू मुस्लिम भाइयों पर पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ दुर्व्यवहार के विरोध के रूप में लागू करें तो कल्पना कीजिए कि क्या होगा। अगर इन्हीं मुसलमानों की "दलील" का इस्तेमाल करें तो इन लोगों को ऐसा करने का शायद 'अधिकार' है। ये निजी पसंद का मामला है। हिंदुस्तान में अगर हमारे हिंदू भाई मुसलमानों की दुकानों या बाजारों से कुछ भी नहीं लेना चाहें तो हम उन्हें न तो ऐसा न करने के लिए मजबूर कर सकते हैं और न ही इसे गैरकानूनी कह सकते हैं। केवल एक ही चीज़ है जो हम कर सकते हैं और ऐसे अवसरों या बगैर किसी अवसर के ये दावा करते रहे हैं, इस दुनिया से इस्लाम को ख़त्म करने की ये काफिरों की एक साजिश है।
हमें वास्तविक अर्थ प्राप्त करने के लिए किसी तस्वीर को विभिन्न पहलुओं से देखने की जरूरत होती है। अधिकार सबके लिए हैं, हम अधिकार को खानों में नहीं बांट सकते हैं और ये नहीं कह सकते हैं कि विशेष रूप ये सिर्फ मुसलमानों के लिए है। हम सिर्फ समान अधिकार की बात करते हैं लेकिन शायद ही कभी हम इस पर अमल करते हैं। मुसलमान, म्यांमार में मुसलमानों के साथ दुर्व्यवहार के खिलाफ विरोध कर रहे हैं, लेकिन मुस्लिम देशों, खासकर पाकिस्तान में हिंदू भाइयों के साथ दुर्व्यवहार के खिलाफ क्यों विरोध नहीं कर रहे हैं?
मुसलमानों को तस्वीर का सिर्फ आधा हिस्सा यानी तस्वीर का सिर्फ अपनी ओर का हिस्सा देखने का पाबंद बनाया जा रहा है। हम मुनाफिक हैं, हम लोगों के बीच भेदभाव उनके आस्था के आधार पर करते हैं। हम तभी तक अपने अधिकारों की मांग करने का अधिकार रखते हैं जब तक कि हम दूसरों को उनके अधिकार देते हैं। धार्मिक स्वतंत्रता की हमारी बातों का कोई फायदा नहीं है जब तक कि हम दूसरों को धर्म की स्वतंत्रता नहीं देते हैं। मैं कुरान की एक आयत का हवाला देकर अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा: लकुम दीनोकुम वले यदीन (सो) तुम्हारा धर्म तुम्हारे लिए और मेरा धर्म मेरे लिए है"। लेकिन विडंबना ये है कि बहुत से मुसलमान इसे कुरान के सही या वैध हिस्से के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। न्यु एज इस्लाम पर अक्सर कमेंट करने वाले मोहम्मद यूनुस (न्यु एज इस्लाम के लेखक और कुरान की व्याख्या पर एक प्रसिद्ध किताब के सह-लेखक मोहम्मद यूनुस नहीं) ने हाल ही में एक पोस्ट में कहा कि "आप और जनाब यूनुस साहब (1) और अन्य कुछ दूसरे लोग जो कुछ भी व्यक्त कर रहे हैं वो मक्की आयतों पर आधारित है। दुर्भाग्य से मक्की आयतों को मदनी आयतों ने रद्द किया है। लकुम दीनोकुम वले यदीन काबिले कुबूल नहीं है क्योंकि बाद की आयतों का कहना है कि अल्लाह की नज़रों में सिर्फ काबिले कुबूल दीन इस्लाम है।
इस दुनिया में ये विचार रखने वाला मैं अकेला नहीं हूँ। मुसलमानों के अनुसार कुरान हर स्थान और समय के लिए है। इसी तरह मदनी आयतें भी हैं।"
इस तरह आप समझ सकते हैं कि हम मुसलमानों को बहुत बड़ी संख्या में समस्याओं को हल करने के लिए काफी संघर्ष करना होगा। जैसा कि इस वेबसाइट के संपादक सुल्तान शाहीन ने एक बार संयुक्त राष्ट्र के प्रतिष्ठित मंच से मुस्लिम दुनिया को बताया था, मैं उसकी व्याख्या कर रहा हूँ: "हम मुसलमानों ने लगभग एक हजार वर्षों से अपना काम नहीं किया है, हमें जरूरत है कि इस काम में हम अच्छी तरह से पूरी गंभीरता के साथ तुरंत इसमें लग जाएं।"
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