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Hindi Section ( 21 Jun 2012, NewAgeIslam.Com)

Muslims Must Shun Their Religiosity मुसलमानों को मज़हबी जुनून से बचना चाहिए

 

ऐमन रियाज़, न्यु एज इस्लाम

16 जून, 2012

(अंग्रेज़ी से तर्जुमा- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

पूरी दुनिया के मुसलमानों की अक्सरीयत के बारे में तसव्वुर किया जाता है कि वो बहुत ज़्यादा मज़हब की तरफ़ माइल होते हैं;  इन्हें मुस्बत के साथ साथ मनफ़ी दोनों मानों में बुनियाद परस्त कहा जाता है। मुस्बत मानी में एक बुनियाद परस्त मुसलमान वो है जो हर रोज़ पांचों वक़्त की नमाज़ पढ़ता है, रमज़ान के महीने में रोज़ा रखता है, ज़कात देता है और अगर मुम्किन हो तो हज के लिए भी जाता है, वग़ैरा। मनफ़ी मानी में एक बुनियाद परस्त मुसलमान वो है जो काफ़िरों को मारने और मरने के लिए तैय्यार है और जो पूरी दुनिया को दारुल इस्लाम में तब्दील करना चाहता है।

दोनों में से किसी भी मानों में मुसलमानों को एक ऐसा तब्क़ा माना जाता है जो उसी पर सख़्ती से अमल करता है जिसे वो इस्लामी तालीमात मानता है और इसकी फ़िक्र नहीं करता है कि तालिमात सही हैं या उनकी ग़लत तशरीह की गई है। इस सख़्त रवैय्ये ने मुस्लिम दुनिया को दीगर तब्क़ात से अलग कर दिया है। मुसलमान एक ख़ोल में रहना चाहते हैं, और ये उम्मीद और ख़्वाहिश रखते हैं कि इस्लाम के सुनहरी दिन वापिस आयेंगे। वो एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां कोई हक़ीक़त नहीं है। जब भी एक आम मुसलमान मर्द बहस मैं हारता हुआ महसूस करता है, तो वो अक्सर कहता है, ज़रा इंतिज़ार करो, इस्लाम की फ़तह एक हक़ीक़त है और ये अनक़रीब आएगी। अगर एक इंतेहापसंद ऐसी हालत को पहुंचता है तो वो कुछ नहीं बोलता है, और अगर उन्हें मार नहीं सकता है तो वो उनको नुक़्सान पहुंचाने के लिए मंसूबा बंदी करता है। हम 21वीं सदी में रह रहे हैं लेकिन हम 7वीं सदी में ही रहना चाहते हैं।

मज़हब को एक नज़रिया या अक़ीदे के निज़ाम और मज़हबी शनाख़्त के नज़रिये में तमीज़ किया जाना ज़रूरी है, जो कि फ़िरक़ापरस्ती है। एक नज़रिया के तौर पर मज़हब कहता है कि ये उस मज़हब के उसूल हैं और एक अच्छा इंसान इस पर अमल करेगा; जबकि मज़हबी शनाख़्त का नज़रिया कहता है कि किसी ख़ास तब्क़े को इस अंदाज़ में अमल करना चाहीए ताकि अपने मज़हब और दीगर मज़ाहिब के दरमियान बुनियादी फ़र्क़ वाज़ेह हो जाय, और उनका मज़हबी तशख़्ख़ुस दीगर मज़ाहिब के मज़हबी तशख़्ख़ुस के साथ दुश्मनी से मुख़्तलिफ़ है। मज़हब ना तो फ़िऱापरस्ती का सबब है और ना ही उस की इंतेहा है, ये सिर्फ इसका एक ज़रीया है।

मज़हबी इख़्तेलाफ़ अक्सर ग़ैर मज़हबी समाजी ज़रूरियात, आरज़ू और तनाज़ेआत का रूप अख़्तियार कर लेते हैं जो मुआशरे या समाजी माहौल में ताक़तों के अमल मुतक़ाबिल के सबब सामने आते हैं। इस तरह उनकी तरफ़ से पेश किए गए दलाएल इस तरह होते हैं: पहले, मुस्लिम मफ़ादात ख़तरे में हैं, अब इस्लाम ख़तरे में है, पहले मुसलमानों को जब्र का सामना करना पड़ रहा है, अब इस्लाम के वजूद को ख़तरा लाहक़ है, वग़ैरा

जबकि मज़हब फ़िरक़ापरस्ती की इब्तेदा और तरक़्क़ी के लिए ज़िम्मेदार नहीं है, लेकिन मज़हबी जुनून इसमें एक अहम मुआविन अंसर है। मज़हबीयत को मज़हबी मुआमलात में गहरे और शदीद जज़्बाती वाबस्तगी और ज़िंदगी के ग़ैर मज़हबी या ग़ैर रुहानी शोबों में और फ़र्द की निजी ज़िंदगी से बाहर मज़हब और मज़हबी जज़्बात के दख़ल देने और मज़हब को सियासत, मआशियात और समाजी ज़िंदगी से अलैहदा करने से इंकार के रुझान के तौर पर इसकी तारीफ़ की जा सकती है। इसका मतलब हद से ज़्यादा मज़हबी होना या किसी की ज़िंदगी में बहुत ज़्यादा दीन होने से है।

बहुत ज़्यादा मज़हबी जुनून दुनियावी उमूर में मज़हबी अंसर को असर रखने के काबिल बनाता है और फ़िरक़ापरस्तों के ज़रिए अल्लाह और मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के नाम पर लोगों को जज़्बाती अपील के असर को क़बूल करने वाला बनाता है। मज़ीद बराँ, मज़हबी जुनून की कोई वाज़ेह हदूद नहीं हैं इसलिए ये अक्सर क़ाबू से बाहर हो जाता है। मज़हबी जुनून के बगै़र मज़हबी जज़्बात को पैदा नहीं किया जा सकता है और बगै़र मज़हबी जज़्बात के फ़िरक़ापरस्ती इज्तेमाई तहरीक की शक्ल अख़्तियार नहीं कर सकती है।

हमला करो या आप को मार दिया जाएगा, के ख़ौफ़ के नफ़्सियात की वजह से हालिया बरसों में मज़हबी जुनून में इज़ाफ़ा हुआ है। जहां कहीं भी हम जाते हैं, हम ख़ौफ़ के इस नफ़्सियात को जंगल की आग की तरह फैलता हुआ पाते हैं: मसाजिद में इमाम कहते हैं कि यहूदी और ईसाई मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िशें कर रहे हैं, अमेरीका इस्लाम को तबाह करने पर तुला हुआ है, वग़ैरा। इंटरनेट हर हम मुताद्दिद साईट्स पाते हैं जो नफ़रत और अदम रवादारी को फैला रही हैं। ज़्यादा तर इन वेबसाईट्स पर अमरीकियों या ईसराईलियों के ज़रिए (नऊज़ो बिल्लाह) क़ुरान को नज़रे आतिश करने वाले वीडियो दिखाये जाते हैं, और इस अंदाज़ में पेश किये जाते हैं जैसे पूरी दुनिया के ग़ैर मुस्लिम ऐसा ही करना चाहते हैं। फ़िरक़ापरस्त अपने मज़हबी तब्क़े के दिलों में ख़ौफ़ फैलाते हैं और ये इंतेक़ामी कार्रवाई, यानी, नाम निहाद काफ़िरों के ख़िलाफ़ तशद्दुद की तरफ़ ले जाता है।

जब गहरे और शदीद जज़्बात पैदा होते हैं तो आम तौर पर अक़्ल खो जाती है। जितना ज़्यादा कोई महसूस करता है उतना ही कम वो ग़ौर करता है। ऐसा ही मुसलमानों के साथ होता है, उन्होंने कुछ नया देखने से अपनी नज़र फेर ली है और कुछ भी नया सुनने से ख़ुद को महफ़ूज़ कर रखा है। मुख़्तसर में मुसलमान हिसार वाली ज़िंदगी जीना चाहते हैं, और ना तो कोई नई चीज़ सुनना चाहते हैं और ना ही देखना चाहते हैं, क्योंकि ये क़ुरान और सुन्नत के ख़िलाफ़ हो सकता है। वो बार बार एक ही मौलाना को सुनना चाहते हैं और उसी टीवी चैनल को बार बार देखना चाहते हैं।

मुसलमानों को मज़हबी जुनून से बचना चाहिए। अव़्वल, तो वो लोग माली, इक़्तेसादी और तालीमी ऐतबार से पसमांदा हैं (मैं सिर्फ ख़लीज के ममालिक के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ, जहां कुछ हुक्मरान अशराफ़िया तब्क़े के पास पैसा है, मेरी तवज्जो आम मुसलमानों पर है जो सिर्फ जानवरों के एक झुंड के तौर पर पैरवी करते हैं)। अपनी अलैहदगी और मजमूई तौर पर पसमांदगी के लिए ख़ुद को क़ुसूरवार बताने के बजाय वो दीगर तब्क़ात को ज़िम्मेदार ठहराते हैं। वो 7वीं सदी की ज़िंदगी भी जीना चाहते हैं और साथ ही हर मैदान में पेशक़दमी भी करना चाहते हैं। ये मुम्किन नहीं है।

मज़हबी जुनून उस वक़्त तक अच्छा है जब तक कि ये मज़हब और रूहानियत तक महदूद है, ये ग़ैर मज़हबी या सेकुलर सरगर्मियों के दायरे में जैसे ही दाख़िल होता है ये बरहम करने वाले और बुराई में तब्दील हो जाता है। मिसाल के तौर पर दफ़्तर में नमाज़ पढ़ना अच्छा है लेकिन ये बरहम करने वाला बन जाता है जब आप दूसरों को काम बंद करने और साथ साथ नमाज़ पढ़ने के लिए कहते हैं।

किसी भी चीज़ की इंतेहा ख़राब है, मज़हब एक ज़ाती मुआमला है, और ग़ैर मज़हबी मुआमलात में मज़हब को मुदाख़िलत नहीं करना चाहिए। मज़हबी जुनून से बाहर निकलने का रास्ता ये है कि इसके ख़िलाफ़ नज़रियाती जंग छेड़ी जाय, ये सिर्फ एक नज़रिया है, और ग़लत या कमज़ोर ख़यालात को सिर्फ सही या एक आला ख़याल से ही ख़ारिज किया जा सकता है।

URL for English article:

http://www.newageislam.com/islamic-society/muslims-must-shun-their-religiosity/d/7640

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