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Hindi Section ( 22 Aug 2012, NewAgeIslam.Com)

Ramadan in September Forever! हमेशा के लिए सितम्बर में रमज़ान का महीना!


डॉक्टर दिस दुदरीजा, न्यु एज इस्लाम

20 जुलाई, 2012

(अंग्रेजी से अनुवाद- समीउर रहमान, न्यु एज इस्लाम)

पहले एक अस्वीकृति। निम्नलिखित में जो कुछ पेश किया जा रहा है वो इस मसले पर एक व्यापक या शैक्षित शैली की कोशिश नहीं है बल्कि ये लेखक की ओर से पेश किये जा रहे अव्यवस्थित विचार हैं।

वैश्विक धर्म होने का दावा करने वाले अन्य धर्मों के विपरीत, इस्लाम धर्म को समकालीन दुनिया में बड़ी संख्या में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें जैव नैतिकता (उदाहरण के लिए मानव क्लोनिंग) से लेकर राजनीति (धर्म, राज्य और समाज के संबंध) सामाजिक व आर्थिक विकास और शिक्षा शामिल है।

 इन मुद्दों पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है और इस पर इस लेखक सहित और भी लिखा जाता रहेगा। ये लेख उस सवाल से निपटने की कोशिश करेगा, जो इतने बुलंद मर्तेबे वाले तो नहीं है, जैसा कि उपरोक्त में वर्णित है लेकिन इन पर पर्याप्त बहस और तकरार हो चुकी है। सवाल रोज़े के मसले से संबंधित है, खासकर दुनिया के दोनों ध्रुवों के पास के भौगोलिक क्षेत्रों में रोज़ा रखने के सवाल का समाधान करने के लिए है। विशेष रूप से ऊपर में जिनका उल्लेख किया गया है, उनके मुकाबले में ये पहली नज़र में एक बहुत ही साधारण समस्या मानी जा सकती है, उम्मीद है जैसे जैसे पाठक इसे पढ़ेंगे उन पर इस समस्या और इस पर लेखक के प्रस्ताव और इस बहस के लाभ का खुलासा उन पर हो जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि कुछ कारणों से इस समस्या की जाँच आवश्यक है, क्योंकि अनुसंधान और बड़े सवालों के द्वार खोलता है, जिनका संबंध इस्लामी परंपराओं और इसके भविष्य के रूप से है।

कुछ साल पहले 1990 के दशक के अंतिम भाग में, मैंने इस समस्या पर बड़ी संख्या में मुस्लिम मंचों और वेबसाइटों पर हुए विचार विमर्श का अवलोकन किया था और जहां तक ​​मुझे जानकारी है रोज़े के संबंध में उपरोक्त में उल्लखित दुविधा के बारे में दो सुझाव पेश किये गये थे।

 1. मक्का में रोज़े के समय को मानना।

2. अगर रोज़े का महीना न हो तो जैसे आम तौर पर कोई नाश्ता और खाना खाता वैसे ही नाश्ता और खाना खाना चाहिए।

उपरोक्त में दोनों समाधानों से मुझे व्यक्तिगत रूप से किसी भी तरह की कोई समस्या नहीं है और मेरा विश्वास है कि रोज़ा रखने का सवाल एक व्यक्तिगत मामला है। निम्नलिखित विचार (कुछ अन्य लोगों ने इससे पहले भी इसे सोचा होगा लेकिन मुझे उसका पता नहीं है): क्यों नहीं सितंबर के महीने को रोज़ा रखने के महीने के रूप में तय कर देते, जब पतझड़ का मौसम होता है और रात और दिन में संतुलन पैदा हो जाता है? इससे पहले कि मैं संभावित आपत्तियों का जवाब दूँ उससे भी पहले मुझे मेरे दृष्टिकोण से पेश किये गये प्रस्ताव के लाभ को स्पष्ट कर लेने दें।

(1) अन्य दो समाधानों के विपरीत इस प्रस्ताव पर पालन करने से रोज़े की शुरुआत और अंत के दिन की अवधि कुरान की भावना के अनुसार होंगे क्योंकि कोई भी रोज़े को शुरु और खत्म सूरज के उदय और अस्त के सही समय के अनुसार कर सकता है।

(2) पूरी दुनिया में रात और दिन की अवधि में उतार चढ़ाव कम से कम होता है।

 (3) दोनों अर्द्ध गोलार्द्धों में तापमान समान होंगे जितना कि संभावित रूप से हो सकता है।

(4) और ज़्यादा लोग रोज़ा रखने के लिए तैय्यार होंगे।

(5) सूर्य पंचांग (कैलेंडर) में रोज़ा रखने का महीने उसी महीने में आएगा जैसा कि चंद्र पंचांग में आता है (नवां महीना- रमज़ान)

दूसरा और तीसरा बिंदु विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि हम में से जिन्होंने रोज़ा रखा है वो समझ सकते हैं कि रोज़ा शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों तरह से काफी असामान्य मेहनत वाला काम हो सकता है, और अक्सर दैनिक दायित्वों और कर्तव्यों को पूरा करने की क्षमता पर ये असर डाल सकता है। (मुझे याद है कई साल पहले ऑस्ट्रेलिया में गर्मियों में रोज़ा रखना, जब तापमान लगातार 35 डिग्री से अधिक और 45 डिग्री से कम होता था और प्रतिदिन रोज़ा रखने की अवधि 16 घंटे से अधिक हुआ करती थी। सौभाग्य से उस समय मैं छात्र था इसलिए किसी विशेष समस्या के बिना रोज़े पूरा कर लेता था लेकिन उन लोगों के बारे में विचार करें जो मौसम के रहमो करम पर थे और उसकी मार बर्दाश्त करते थे!)। इससे काम के स्थान पर एक व्यक्ति के प्रदर्शन पर और मुस्लिम बहुल देशों के मामले में उस देश का आर्थिक प्रदर्शन प्रभावित होता है। (कृपया ऐसा न सोचें कि मैं खुद रोज़ा न रखने लिए एक कारण के रूप में या रोज़ा रखने को अपने लिए आसान बनाने के लिए ऐसा लिख ​​रहा हूं। विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता के रूप में मैं मौसम की सख्ती के मामले में अन्य लोगों के मुकाबले बहुत ही कम प्रभावित होता हूँ, हालांकि मैं स्वीकार करता हूँ कि इन दिनों में मेरा प्रदर्शन थोड़ा कम हो जाता है)। इसका संभावित रूप से किसी के भी स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। उदाहरण के लिए कई दीनदार और परहेज़गार मुसलमान ऐसी स्थिति में रोज़ा रखते हैं जब उनका स्वास्थ्य इसकी इजाज़त नहीं देता है लेकिन अपने परवरदिगार का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए अपने स्वास्थ्य को खतरे में डालते हैं।

मेरे सुझाव काफी हद तक रोज़े के लंबे दिनों और सख्त मौसम के असर को कम करने में मदद कर सकते हैं जो लोगों के सामूहिक और व्यक्तिगत दोनों प्रदर्शनों और उनके कल्याण को भी प्रभावित करेगा।

फिर मैं ज़ोर देना चाहूंगा कि इस प्रस्ताव को हालात से 'निपटने'  के माध्यम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि सितंबर के महीने में रोज़े की हालत में भी निश्चित रूप से वास्तविक जीवन की कई मांगें हो सकती हैं।

 मैं ये भी सलाह नहीं दे रहा हूँ कि खाने और पीने से परहेज़ करना ही रोज़ा है, जैसा कि हमें लगातार खुत्बों (भाषणों) और बयानों में याद दिलाया जाता है, फिर भी ये इसका महत्वपूर्ण हिस्सा हैं!

अब संभावित आपत्तियाँ

शायद सबसे पहले चंद्र पंचांग से सूर्य पंचांग के परिवर्तन की ओर इशारा किया जाएगा। अब अगर कोई विचार करे कि इस्लाम से पहले के कई हेजाज़ी तरीकों और संस्कार व रिवाजों को कुरान के विचार और पैग़म्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की सुन्नत में शामिल कर लिए गए थे, ये लैंगिक संबंध, शर्म और हया गुणों से संबंधित कानून (उदाहरण के लिए केवल पुरुषों को एकतरफ़ा तौर पर तलाक देने का अधिकार), युद्ध (महिलाएं और बच्चे जंग के माले गनीमत, लड़ाई के लिए निषिद्ध महीना) और सामाजिक प्रक्रिया (जैसे गुलामी और सप्ताह में सामुदायिक सभा का दिन, 'यौमल जुमा उस दिन आता था जिस दिन पारंपरिक तौर पर लोग बाजार में जमा होते थे और यहां तक ​​कि खुद चंद्र पंचागं के महीने का अरबी नाम) तक था, जिसे अक्सर (गलती) से मज़हबी और कानूनी व्यवस्था के लिए इस्लाम के अनिवार्य हिस्से के रूप में माना जाता था। मुझे उम्मीद है कि प्रस्तावित परिवर्तन एक नई रौशनी में देखा जाएगा और इस तरह अधिक स्वीकार्य होगा।

शायद चंद्र पंचांग पर आधारित हिजरी कैलेंडर के बारे में भी उचित तरीके से विचार किया जाना चाहिए। हिजरी कैलेंडर को दूसरे खलीफा हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हू ने परिचित और स्थापित किया था, इस तरह इसे क़ुरान या सुन्न्त के अनुसार अमल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इस तरह इसका पालन करना विचारधारा या आस्था का सवाल नहीं है।

दूसरी आपत्ति पहचान के नुकसान और पश्चिम के अनुकरण के संबंध में होगी। अब जबकि इसमें निश्चित रूप से कुछ लाभ हैं तो इसकी व्यापक परिप्रेक्ष्य में समीक्षा की जानी चाहिए। पहला, चाहे हम इसे पसंद करें या नहीं, आम सूर्य- जार्जियाई कैलेंडर, पश्चिम के आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक वर्चस्व पर आधारित है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसे स्वीकार किया जाता है और जिसके द्वारा अधिकांश मुसलमान अपने जीवन का संचालन करते हैं। इसका फायदा ये होगा कि गैर मुसलमान (साथ ही साथ मुसलमान भी) ये जान जाएंगे कि कब रोज़े का महीना शुरू हो रहा है और कब खत्म (जैसे क्रिसमस) हो रहा है। और ग्रीटिंग कार्डस आदि के आपस में लेन देन से अंतरधार्मिक संवेदनशीलता को बल मिलेगा। मैं इसमे ये भी शामिल करना चाहूंगा कि मुसलमान अंतरधार्मिक सद्भावना को बढ़ावा देने के लिए ईसा मसीह के जन्म दिन को धार्मिक आधार पर स्वीकार्य तरीके से अपने ईसाई मित्रों और पड़ोसियों के साथ (या नए साल को अपने धर्मनिरपेक्ष दोस्तों और पड़ोसियों के साथ मनाएं। अधिकांश स्थानों पर नए साल के आयोजन को मनाने में शामिल धार्मिक महत्व खत्म हो चुका है) मनाने को एक परंपरा बना सकते हैं। (यहाँ एक संभावित आपत्ति एक अनजान हदीस से हो सकती है और इसलिए कानूनी और सांस्कृतिक रूप से अनिवार्य हदीसों से नहीं जो मुसलमानों के रस्मों और रिवाजों, त्योहारों और लिबास के संबंध में विशिष्टता पर जोर देती हैं और जिसका संकीर्ण और आधा ज्ञान रखने वाले मुसलमानों ने दुरुपयोग किया और जिसकी ग़लती से बिना ऐतिहासिक संदर्भ के सार्वभौमिक रूप से व्याख्या की गयी। जैसा कि मैंने कहीं और इस विषय पर अधिक शौक्षिक अंदाज में कहा है कि ये और इस तरह की हदीसों का कुरान और सुन्नत की शिक्षाओं के व्यापक और संगठित तरीके से की जाने वाली व्याख्या में कोई स्थान नहीं है।)

अंत में आख़री बिंदु से संबंधित प्रस्ताव, छोटे लेकिन महत्वपूर्ण तरीके से हमें आपसी विरोधी पहचान के निर्माण और इतिहास से दूर करेगी जो प्रचलित रह चुकी है और कुछ मामलों में मुसलमानों और पश्चिमी संस्कृति के बीच अब भी मौजूद है (जो मूल रूप से वास्तविक ऐतिहासिक स्थिति के बजाय खुद की और दूसरों की बनाई हुई हैं और जो दोग़लेपन और आंतरिक संपर्क की दिशा की ओर पुख्ता तौर पर इशारा करती हैं)

मैं अपने प्रस्तावों पर पालन को लेकर नकारात्मक सोच रखता हूँ लेकिन मैं अपना लक्ष्य हासिल कर लूंगा यदि पाठक को कम से कम अपने प्रस्ताव और उपरोक्त में उल्लेख किए गए व्यापक इस्लामी परंपराओं से संबंधित प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करने के लिए राज़ी कर सका।

डॉक्टर अदिस दुदरीजा मेलबर्न विश्वविद्यालय के इस्लामिक स्टडीज़ विभाग में रिसर्च एसोसिएट हैं और वो न्यु एज इस्लाम के लिए नियमित रूप से कॉलम लिखते हैं।

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