
अभिजीत, न्यु एज इस्लाम
10 अप्रैल, 2014
2011 की शुरुआत! जहाँ एक तरफ पूरी दुनिया में अमन और खुशहाली से भरे नये साल के सपने संजोए जा रहे थे, लोग अपने मित्रों, रिश्तेदारों और हितचिंतकों को ये शुभकामनायें दे रहे थे कि ये बर्ष उनके लिये सुख, समृद्धि, तरक्की और अमन का साल हो वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान में मध्ययुगीन संस्कृति का नंगा नाच चल रहा था।
एक तरफ वहां के एकमात्र ईसाई मंत्री और अल्पसंख्यकों के हक में आवाज बुलंद करने वाले शहबाज भट्टी की कट्टरपंथियों ने हत्या कर दी थी वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गर्वनर सलमान तासीर को कोहसार बाजार में उनके अंगरक्षक मलिक हुसैन कादरी ने गोलियों से भून डाला था ।
वो भी महज इसलिये कि मशहूर शायर फैज अहमद फैज के भतीजे सलमान उस इस्लाम का प्रतिनिधित्व करने की कोशिश कर रहे थे जो कट्टरपंथियों की नजर में कुफ्र है। इस्लाम के उदारवादी स्वरुप के इस प्रतिनिधि को अपनी शहादत इसलिये देनी पड़ी क्योंकि उन्होंनें पाकिस्तान के 'हुदुद अध्यादेश' के तहत अपराध करने वाली ईसाई महिला असिया बीबी के समर्थन में कुछ शब्द कहे थे और उसके प्रति अपनी सहानुभूति दर्शाई थी। वहीँ शहबाज का कसूर ये था कि एक इस्लामी मुल्क में गैर- मुस्लिम होते हुये भी उन्होंनें अपने समुदाय वालों के साथ-साथ एवम् पाकिस्तान के बाकी अल्पसंख्यकों और स्वयम् मुसलमानों के लिये परेशानी और जिल्लत का सबब बने ईशनिंदा कानून की मुखालफत करने की जुर्रत की थी।
इस मजहबी बहशत और पागलपन का शिकार होने वाले सलमान और शहबाज अकेले नहीं है। इतिहास गवाह है कि हजरत मोहम्मद (सल्ल) के द्वारा लाये अमन के इस मजहब को बदनाम करने वाले कट्टरपंथियों ने अतीत में भी इस्लाह (सुधार) की कोशिश में उठने वाली ऐसी कई आवाजों को हमेशा के लिये खामोश किया है। जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर औरंगजेब के सलाहकार और दिल्ली के नगर काजी मुल्ला कवि की दरिंदगी का शिकार होने वाले सरमद हाला, वेदांत और इस्लाम में समन्वय की चेष्टा करने वाले दारा शिकोह, कालवह्य हो चुके शरीयत कानून को बदलने की मांग करने वाले सूडान समेत अन्य दूसरे इस्लामी देशों के कई मुस्लिम बुद्धिजीवी और हाल में शहबाज और सलमान तासीर के साथ हुई हैवानियत में फर्क है तो सिर्फ वक्त का।
सलमान की हत्या करने वाले, उस हत्यारे को उकसाने वाले और उनके हत्यारे पर फूल बरसाने वाले किस इस्लाम का प्रतिनिधित्व कर रहे थे ? उस इस्लाम का तो कतई नहीं जिसे हजरत मोहम्मद (सल्ल0) लेकर आये थे। ये लोग इस्लाम की मनमानी व्याख्या करने, जहरीला भाषण देने और लोगों की भावनाओं को भड़काने के अलावे कुछ भी नहीं जानते। अगर जानते होते तो सलमान के साथ कतई वो नहीं करते जो उनके साथ हुआ। अगर जानते होते तो सलमान के मामले में वो तरीका अपनाते जो रसूल (सल्ल0) का था। रसूल (सल्ल0) ने कभी भी अपने विरोधियों और आलोचकों के साथ वो नहीं किया जैसा ये लोग रसूल (सल्ल0) का तथाकथित प्रतिनिधि बन कर करते रहें हैं। रसूल (सल्ल0) की सीरत इस बात की गवाह है।
सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम से रिवायत है , अबू-हुरैरह रजि़यल्लाहु अन्हु कहते हैं:- तुफैल बिन अम्र दौसी और उनके साथी पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आए और उन्होंने कहा, ऐ अल्लाह के पैग़म्बर! क़बीला दौस वालों ने अवहेलना और इन्कार किया है, आप उनके लिये बद्दुआ करें। उनके लिये बद्दुआ करने की बजाए रसूल (सल्ल0) ने फरमाया "ऐ अल्लाह तू दौस वालों को हिदायत दे और उन्हें लेकर आ।’’ रसूल (सल्ल0) तो दुश्मनों के लिये भी हिदायत और बेहतरी की दुआ करने वाले थे। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बीबी आईशा (रजि़यल्लाहु अन्हा) कहती हैं, मैने पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम) से पूछा कि क्या आप पर कोई ऐसा दिन भी आया है जो उहुद के दिन से भी अधिक कठिन रहा हो? आप सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम ने फरमाया, आएशा ! "वो दिन मेरी जिंदगी का सबसे सख्ततरीन दिन था जब मक्के वालों ने मुझे ठुकरा दिया और उससे भी सख्ततरीन दिन वो था जब मुझे ताएफ वालों ने भी ठुकरा दिया।"
ताएफ वालों ने नबी (सल्ल0) और उनके मुँहबोले बेटे जैद (रजि0) को ताएफ से खदेड़ दिया था, उन्होनें कुत्तों को अपने साथ लिया अपने झोले पथ्थरों से भर लिए और बेदर्दी से रसूल (सल्ल0) पर पथ्थरों की बारिश शुरु कर दी। नबी (सल्ल0) लहुलूहान हो गये और उनके जूते खून से भर गये। इसपर भी ताएफ के लोगों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। भागते-भागते नबी (सल्ल0) शहर से कई मील दूर निकल गये। जब थक कर चूर हो गये तो एक पेड़ के नीचे बैठ गये और कहा, या अल्लाह! तेरे दीन की तब्लीग करने का यही सिला मिलता है क्या ? फौरन बादलों के बीच से अल्लाह के फरिश्ते जिब्रील (अलैहे0) नाजिल हुये और नबी (सल्ल0) से फरमाया कि ऐ अल्लाह के रसूल (सल्ल0)! खुदा ने कहा है कि पूछो मेरे नबी (सल्ल0) से कि अगर वो बहुत धबरा गयें हैं तो फिर हम तो इस बात पर भी राजी हैं कि अभी पहाड़ों के फरिश्ते हीबाल को हुक्म दे कि वो इन दोनों पहाड़ों को मिला दे और ताएफ वालों को पिसल कर रख दे। (ताएफ शहर दो पहाडि़यों के बीच में बसा हुआ था) नबी (सल्ल0) के जेहन में फौरन वो आयत आ गई जो अल्लाह ने उनके लिये उतारी थी-"हम ने आप को सारे संसार के लिए रहमत और करूणा बनाकर भेजा है।" (सूरतुल अम्बियाःआयत-107)
रसूल (सल्ल0) ने फरमाया- "मैनें इन्हें माफ किया क्योंकि मुझे अल्लाह ने सारे आलम के लिये रहमत बना कर भेजा है अजाब बना कर तो नहीं भेजा। ये लोग (ताएफ वाले) मुसलमान न बने कोई बात नहीं पर हो सकता है इनकी आने वाली नस्लों के लोग इस्लाम ले आये।"
ये था नबी (सल्ल0) का तरीका और अपने दुश्मनों के प्रति व्यवहार। इस्लाम का तो अर्थ ही है अमन और सलामती। नबी (सल्ल0) की पूरी जिंदगी इसी को तो प्रतिबिंबित करती है। ये लोग शायद दूसरे खलीफा हजरत उमर (रजि0) के इस्लाम लाने की धटना को भूल गये हैं। एक जमाने में हजरत उमर(रजि0) इस्लाम के सबसे बड़े मुखालिफ थे। इतने बड़े मुखालिफ कि उन्होनें मोहम्मद (सल्ल0) की नुबुब्बत के दावों से चिढ़कर एक बार उनकी हत्या करने का इरादा कर लिया था। अपने इरादे को अंजाम देने के लिये उन्होनें तलवार उठाई और नबी (सल्ल0) की खोज में निकल गये कि आज उनका कत्ल करके ये किस्सा हमेशा के लिये खत्म कर दूंगा। हजरत उमर के मन में रसूल (सल्ल0) के प्रति कितनी नफरत थी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि रास्ते में हजरत उमर (रजि0) को उनका कोई साथी मिल गया। हजरत उमर(रजि0) को इतने गुस्से में देखकर उसने पूछा, तुम तलवारें लिये हुये इतने गुस्से में कहाँ जा रहे हो?
हजरत उमर(रजि0) ने कहा, मैं चाहता हूँ कि मोहम्मद (सल्ल0) को कत्ल कर दूँ और हमेशा-हमेशा के लिये ये किस्सा खत्म कर दूँ। उस आदमी ने कहा, तुम क्या सोचते हो कि मोहम्मद (सल्ल0) का तुम कत्ल कर दोगे और कुरैश तुम्हें छोड़ देंगें? हजरत उमर(रजि0) ने कहा- हाँ ! मैनें इस बारे में भी सोचा है पर मैनें निश्चय करके निकला हूँ कि भले कुरैश मेरा कत्ल कर दे पर मैं आज मोहम्मद को नहीं छोड़ूँगा। तब उस आदमी ने (जो दिन में इस्लाम ला चुका था) ने सोचा कि किसी तरह मैं हजरत उमर (रजि0) का रुख दूसरी तरफ फेर दूँ ताकि ये रसूल (सल्ल0) तक न पहुँच सके। उसने कहा- उमर ! तुम तो रसूल (सल्ल0) को मिटाने चल दिये पर जरा अपने घर की खबर भी ले लो, जहाँ तेरे बहन और बहनोई इस्लाम ला चुकें हैं। हजरत उमर (रजि0) गुस्से में पैर पटकते हुये अपने बहनोई के धर की तरफ चल दिये। दरवाजे पर पहुँचे तो अंदर से कुछ पढ़ने की आवाज आ रही थी। हजरत उमर(रजि0) ने दरवाजे से आवाज दी ।
अंदर हजरत ख्बबाब (रजि0) कुरान पढ़ा रहे थे। दरवाजे से हजरत उमर (रजि0) की आवाज सुन कर हजरत ख्बबाब(रजि0) छिप गये और उनकी बहन ने कुरान के पन्नों को छिपा दिया क्योंकि उन्हें पता था कि हजरत उमर (रजि0) बहुत गुस्सैल हैं और इस्लाम के सबसे सख्त मुखालिफ हैं। दरवाजा खुलते ही हजरत उमर ने पूछा तुमलोग क्या पढ़ रहे थे? बहन-बहनोई ने छिपा लिया तो हजरत उमर (रजि0) आग-बबूला हो गये और दोनों को मारना शुरु कर दिया। हजरत उमर (रजि0) की बहन ने मार खाते हुये कहा हाँ, ये सच है कि मैनें इस्लाम कबूल कर लिया है पर तुम्हारे डर से मैं इस दीन को नहीं छोड़ सकती। अब हजरत उमर (रजि0) का दिल कुछ पसीजा और कहा, क्या तुम मुझे भी वो सुना सकती हो जो चीज तुमलोग पढ़ रहे थे? बहन ने कहा , पहले आप स्नान करके पाक हों तभी मैं आपको वो सुना सकती हूँ। हजरत उमर(रजि0) ने स्नान किया और उनकी बहन ने उन्हें सूरह ताहा की आयतें पढ़ कर सुनाई। कुरान को सुनते ही उनके मुँह से निकला-ये तो अद्भुत और पाक कलाम है।
तब हजरत ख्बबाब (रजि0) भी बाहर आ गये और हजरत उमर (रजि0) से कहा-पता है उमर जब तुम तलवार लिये नबी (सल्ल0) के कत्ल के इरादे से निकले थे तो उस समय रसूल (सल्ल0) खुदा से ये दुआ कर रहे थे कि "या अल्लाह! अगर तू इस्लाम की बेहतरी चाहता है तो दो उमर में से एक को मुसलमान कर दे। (उस समय मक्का में इस्लाम के दो जर्बदस्त मुखालिफ थे और दोनों का ही नाम उमर था। एक थे उमर बिन खत्ताब और दूसरे उमर बिन हश्शाम) अपने दुश्मन को हिदायत देने की दुआ करने वाले रसूल (सल्ल0) के उम्मती तो ये लोग कदापि नहीं है।
भस्मासुर बना कट्टरपंथ
पाकिस्तान का जन्म मजहब के नाम पर हुआ था इसलिये इसके परवरिश के लिये जो भी शासक आया उसने इस मुल्क की जड़ों में सिर्फ कट्टरपंथ का मट्ठा डाला। तानाशाह शासक जनरल जिया-उल-हक ने तो ये तक कह दिया था कि अब तुम्हारा कानून तुम्हें इजाजत देता है कि इस्लाम पर कायम रहने के लिये जो मर्जी आये करो। परिणाम ये हुआ कि धीरे-2 सारा मुल्क कट्टरपंथियों के पंजे में फंसता चला गया और अल्पसंख्यकों के लिये हर आने वाला दिन बद से बदतर होता चला गया। और इसी बीच ईशनिंदा कानून भी आ गया यानि अब रसूल (सल्ल0) की तौहीन बर्दाश्त नहीं की जायेगी। ये कानून तो वहां के अल्पसंख्यकों के लिये लाया गया था पर इस कानून ने मुसलमानों को भी उसी हद तक पीड़ित किया है। आपस की लड़ाईयों में इस कानून को बीच में लाया जाता है और रसूल (सल्ल0) के अपमान की झूठी शिकायत कर दूसरे पक्ष को फंसा दिया जाता है।
अनेकों ऐसे मामले सामने आयें हैं जब मुसलमान ही इस कानून का शिकार बन गये। पाकिस्तान में 1986 से 2007 की अवधि में ईशनिंदा के कानून के तहत 647 लोगों पर मुकदमें दर्ज हुये जिसमें अधिकांश वहां के अल्पसंख्यक ईसाईयों और हिंदुओं के खिलाफ थे। इस कानून के शिकार अहमदिया भी हैं। कई बार तो महज सामान्य बातों और बेतुकी बातों को ही आधार बना कर निरपराध लोगों को शिकार बनाया जाता है। मसलन मोहम्मद मुसलमानों के बीच सर्वाधिक प्रयुक्त नाम है और अगर किसी कागज पर ये नाम लिखा है और उस कागज को कोई गलती से जला दे या फेंक दे तो उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है। ऐसी ही एक धटना अप्रैल 2007 में टोबा टेक सिंह में धटी थी जब पुलिस ने 5 ईसाईयों को गिरफ्तार कर लिया था । उनपर आरोप था कि उन्होंनें एक कागज को फेंक दिया था जिस पर मोहम्मद लिखा हुआ था। ईशनिंदा कानून के नाम पर हो रहे इन ज्यादतियों से पाकिस्तान का भी एक बड़ा तबका निराश है। जब वो यूरोप और अमेरिका के मुल्कों की यात्रा पर निकलता है तो वहां उन्हें कदम-कदम पर मानवाधिकारवादियों के सवालो-जबाब परेशान करतें हैं।
हर बात में नबी (सल्ल0) के अनुयायी होने और शरीयत के सबसे बड़े अलंबरदार होने का दंभ भरने वाले मुसलमानों को ये जरुर सोचना चाहिये कि सलमान के साथ जो हुआ क्या इस्लामी शरीयत या पवित्र कुरान इसका हुक्म देती है? रसूल (सल्ल0) निंदक के लिये मौत की सजा का कानून न तो कुरान में है और न ही हदीस में बल्कि ये कानून तो अब्बासी खलीफाओं की बनाई हुई है जिनका काल 750 ई0 के करीब था। इस वहशी कानून की पुष्टि न तो पवित्र कुरान करता है न ही कोई प्रमाणिक हदीस। पाकिस्तान में यह कानून जनरल जिया-उल-हक के समय बनाया गया। इन सब का मतलब ये है कि यह कानून ईश्वरीय नहीं है और अगर ईश्वरीय नहीं है तो बदला जा सकता है क्योंकि इस कानून के दुरुपयोग के भी कई मामले सामने आते रहे हैं। लोग अपने जातीय दुश्मनी का बदला लेने के लिये इस कानून का इस्तेमाल करतें हैं। पवित्र कुरान को भी अगर हम सामने रखते हैं तो वहां पर भी कत्ल का हुक्म केवल उनके लिये है जिन्होंने किसी का कत्ल किया हो अथवा बेबजह जमीन पर फसाद बरपा किया हो। किसी की निंदा तो जहनी सोच की मामला है इसलिये इस बात के लिये किसी का कत्ल करना तो बिलकुल जाएज नहीं है।
अगर रसूल (सल्ल0) का गुस्ताख सजा का हकदार बनता भी है तो भी उसे सजा देने का हक सिर्फ और सिर्फ हुकूमत को है ये नहीं कि कोई भी इंसान उठे और उसका कत्ल कर दे। ये होने लगे तो फिर खिलाफत या अमीर प्रथा का मतलब क्या रह जायेगा ? अगर किसी को लगता है कि रसूल (सल्ल0) की तौहीन करने वाले से बदला लेना ही चाहिये ये हुकूमत की नहीं उसकी खुद की जिम्मेदारी है तो इसके लिये भी उसे देखना चाहिये कि रसूल (सल्ल0) ने इस बारे में क्या फरमाया है- "जिसने जालिम पर बद्दुआ की मानो उसने अपना इंतकाम उससे ले लिया !" (तिर्मिजी शरीफ, जि0-5, सफा-324, हदीस-3563) रसूल (सल्ल0) ने कहा कि बहुत तकलीफ हो तो उसके लिये बद्दुआ करो न कि उसका कत्ल कर दो।
वो लोग भी कादरी जितने ही गुनहगार हैं जिन्होंने कादरी के ऊपर फूल बरसाये। ऐसा करते हुये उन्होनें संभवतः एक बार भी ये नहीं सोचा कि कादरी ने ये काम रसूल (सल्ल0) के प्रति अपनी मोहब्बत दर्शाने के लिये की है या उस ईनाम के लालच में की है जो कट्टरपंथियों ने सलमान के सर पर रखें थे ?
अगर कोई नबी (सल्ल0) के बारे में कुछ भी गलत बोलता है तो कुरान और हदीस की रौशनी में मुसललानों के पास जो रास्ते बचतें हैं वो हैं-
1. तथ्य बतातें हैं कि पिछले 150 सालों में नबी (सल्ल0) के खिलाफ 50 हजार से भी ज्यादा किताबें लिखी गई हैं। इसलिये अगर कोई नबी (सल्ल0) के बारे में कुछ बोलता या लिखता है तो हो सकता है कि उसने इनमें से ही किसी किताब को पढ़ा हो जिस कारण नबी (सल्ल0) के बारे में उसके मन में गलत धारणा बन गई है। अतः जिस शख्स ने नबी (सल्ल0) की शान में कोई गुस्ताखी की है उसके सामने मुसलमानों को रसूल (सल्ल0) की सही सीरत रखनी चाहिये और बतानी चाहिये कि तुमने रसूल (सल्ल0) के बारे में गलत पढ़ा है उनकी वास्तविक सीरत ये है।
2. इसके बाबजूद भी अगर वो नहीं मानता तो फिर उसकी बदबख्ती उसके सिर आएगी क्योंकि पवित्र कुरान कहता है "जो लोग तुमसे किसी बात पर इख्तलाफ करतें हैं तो फिर तुमसे न उलझो, अल्लाह कियामत के दिन विभेद की तमाम बातों का फैसला कर देगा।" जब अल्लाह ने अपने सबसे बरगुजीदा पैगंबर (सल्ल0) को ये निर्देश दिया कि:ऐ मोहम्मद (सल्ल0)! आप लोगों को सिर्फ दीन के बारे में बताईये , आपका काम सिर्फ लोगो को बताना है क्योंकि आप उनपर निगहबान नहीं है।‘ (कुरान, 88:21,22)
3. तीसरा रास्ता कुरान बतलाता है। कुरान की आयत है "आप किसी से उतना ही बदला लो जितना आपको नुकसान पहुँचाया गया है ।" मान लो किसी ने रसूल (सल्ल0) की शान में कोई गुस्ताखी की तो इस आयत के हवाले से मुसलमानों के पास ये रास्ता बचता है कि वो भी उसके आराध्य के बारे में ऐसा ही कुछ कह दे जिससे उसके मन को भी उतनी ही तकलीफ पहुँचे। (हालाँकि कुरान में ऐसा करने से भी मना फरमाया गया है। सूरह अनआम, आयत सं0 108)
4. अगर किसी पर रसूल (सल्ल0) की शान में गुस्ताखी का इल्जाम लगता है तो ये नहीं की बिना उसकी दलील सुने उसका मुकद्दर तय कर दिया जाये । अगर किसी पर रसूल (सल्ल0) का गुस्ताख होने का आरोप लगा है तो उसे अपनी सफाई का मौका जरुर मिलना चाहिये कि वास्तव में उसने हुजुरे-पाक (सल्ल) की शान में कोई गुस्ताखी की है अथवा उसकी बातों का गलत मतलब निकाला गया है या किसी ने उससे अपनी जातीय दुश्मनी निकालने के लिये उसपर ये आरोप चस्पा कर दिया है। नबी (सल्ल0) की एक हदीस है जिसमें उन्होंनें फरमाया था कि "किसी काजी के पास अगर कोई आदमी फरियाद लेकर आता है कि फ्लां आदमी ने मेरी एक आँख निकाल ली है तो काजी को जोश में आकर आरोपित आदमी को सजा नहीं सुना देनी चाहिये। उसे उस आदमी को भी बुलाना चाहिये जिसपर ये आरोप लगाया गया है, खुदा जाने इस फरियादी ने उसकी दोनों आँखें निकाल ली हों।"
कादरी जैसे गुमराह और नासमझ लोगों को ये जरुर सोचना चाहिये कि जिन लोगों ने सलमान तासीर के सर पर ईनाम रखे और खुद को रसूल (सल्ल0) से मोहब्बत करने वाला साबित किया उन्होनें खुद ही ये काम क्यों नहीं किया अगर वास्तव में उन्हें इस बात (हुजूर के शान में की गई गुस्ताखी) से इतनी तक्लीफ थी ? ऐसे लोगों और फतवों का मतलब सिर्फ उनकी जातीय होता है, उन्हें किसी बहाने मीडिया में नाम चाहिये और राजनीति में रसूख। कादरी जैसे नासमझ इनके बहकाबे में आ जातें हैं।
इस धटना पर प्रख्यात इस्लामी विद्वान मौलाना वहीउद्दीन खान ने कहा था "अगर कोई पैगंबर (सल्ल0) या इस्लाम के बारे में कोई टिप्पणी करता है तो ये उसकी निजी सोच का मसला है इसलिये उसपर कोई कानूनी कारवाई नहीं की जा सकती। ऐसे धृणित कामों के लिये उसे सिर्फ अल्लाह माफी या सजा दे सकता है इंसान नहीं।" इसके आगे उन्होनें कुरान का हवाला देते हुये कहा कि "पवित्र कुरान कहता है कि किसी भी मसले के पीछे के कारणों को खोजकर लोगों को समझाने की कोशिश होनी चाहिये। इस्लाम में हत्या का प्रावधान सिर्फ कत्ल के मामले में है।" पैगंबर (सल्ल0) के सीरत से एक हवाला देते हुये उन्होंने कहा कि पैगंबर (सल्ल0) जब राह से गुजरते थे तो उनके मुखालिफ उनके ऊपर गलत टिप्पणी करते थे। जब सहाबा उनकी इस गुस्ताखी पर कुछ करने को होते तो रसूल (सल्ल0) उन्हें ये कहते हुये उन्हें रोक देते की इनमें समझ
की कमी है और अल्लाह इन्हें समझ देगा।
सलमान तासीर की हत्या सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं पूरे मुस्लिम विश्व के लिये आत्मचिंतन का मौका दे गया था कि क्या वो उस इस्लाम का प्रतिनिधित्व करेंगे जो रसूल (सल्ल0) का था या उस इस्लाम का जिसे कट्टरपंथियों ने गढ़ रखा है? क्या वो ईशनिंदा जैसे मसलों पर हिदायत के लिए कुरान या हदीस की ओर देखेंगे या राजनीतिक इस्लाम के अलंबरदारों की तरफ ?
इस्लाम जिसका अर्थ ही सलामती है, उसे सार्थक साबित करने हेतु प्रयास हो, कट्टरपंथ और नफरत की विचारधारा को तिलांजलि दी जाये, यही सलमान को सच्ची शहादत होगी और इस घटना से हासिल कुछ सार्थक सबक!
अभिजीत मुज़फ्फरपुर (बिहार) में जन्मे और परवरिश पाये और स्थानीय लंगट सिंह महाविद्यालय से गणित विषय में स्नातक हैं। ज्योतिष-शास्त्र, ग़ज़ल, समाज-सेवा और विभिन्न धर्मों के धर्मग्रंथों का अध्ययन, उनकी तुलना तथा उनके विशलेषण में रूचि रखते हैं! कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में ज्योतिष विषयों पर इनके आलेख प्रकाशित और कई ज्योतिष संस्थाओं के द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकता की कोशिशों के लिए कटिबद्ध हैं तथा ऐसे विषयों पर आलेख 'कांति' आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। इस्लामी समाज के अंदर के तथा भारत में हिन्दू- मुस्लिम रिश्तों के ज्वलंत सवालों का समाधान क़ुरान और हदीस की रौशनी में तलाशने में रूचि रखते हैं।
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