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Hindi Section ( 1 Apr 2014, NewAgeIslam.Com)

Islamic Views on Animal Slaughtering and Non-Vegetarianism जीव-हत्या, पशु-बलि और मांसाहार:इस्लाम की नज़र में

 

 

 

 

अभिजीत, न्यु एज इस्लाम

2 अप्रैल, 2014

आज जब पूरी दुनिया तेजी से मांसाहार त्याग कर शाकाहार की तरफ बढ़ रही है और पशु-हत्या तथा पशु-बलि जैसे जालिमाना कृत्यों पर सवाल उठ रहे हैं तब ये सवाल उठना लाजिमी है कि लगभग 2 अरब अनुयायियों वाले मजहब इस्लाम (जिसके नाम का अर्थ ही सलामती है ) के सिद्धांतों का इस बारे में क्या कहना है!अक्सर उलेमाओं में किसी जानवर या पक्षी के हलाल और हराम होने को लेकर बहस होती रहती है पर कभी इस बात को लेकर चर्चा नहीं होती कि हर साल बकरीद के अवसर पर और अन्य दूसरे दिन हो रहे पशुओं का वध और कुर्बानी क्या जायज भी है ? महज अपना पेट भरने के लिए मासूम पशु-पक्षियों का क़त्ल क्या उचित है? इस्लाम की तालीमात इस बारे में क्या हुक्म देती है? निरीह प्राणियों का क़त्ल क्या उस रहमान का अपमान नहीं है जिसने हम इंसानों के साथ-साथ इनकी भी रचना की है और उनके रहमत के साये में ये भी हैं?

सब उसी की रचना है:-

कुरान में अल्लाह तआला के 99 नाम बताए गयें हैं जो उनके गुणों के आधार पर है। इन्हीं नामों में उनका एक नाम खालिकभी है जिसका अर्थ है बनाने वाला। ये तमाम कायनात,  इंसान, तारे, ग्रह,  जीव-जंतु सब उसी की रचना है। कुरान में कई जगहों पर इस बारे में कहा गया है:-

- “और वही है जिसने यह जमीन फैला रखी है,  इसमें पहाड़ों के खूंटे गाड़ रखें हैं और नदियाँ बहा दी है। उसी ने हर तरह के फलों के जोड़े पैदा कियें हैं और वही दिन को रात से छिपाता है। इन सारी चीजों में बड़ी निशानियां है उनलोगों के लिये जो सोच-विचार से काम लेतें हैं। और देखो जमीन में अलग-2 भूभाग पाये जाते हैं जो एक-दूसरे से मिले हुये अवस्थित हैं। अंगूर के बाग हैं,  खेतियां हैं, खजूर के पेड़ है जिनमें से कुछ इकहरे और कुछ दोहरे। सबको एक ही पानी सिंचित करता है मगर स्वाद में हम किसी को अच्छा बना देतें हैं और किसी को उससे कम। इन सब चीजों में बहुत सी निशानियां है उन लोगों के लिये जो बुद्धि से काम लेतें हैं। (सूरह रअद, आयत-3, 4)

- ‘आसमानों और जमीनों का पैदा करना इंसान को पैदा करने की अपेक्षा यकीनन अधिक बड़ा काम है, मगर ज्यादातर लोग जानतें नहीं है। (कुरान, 40:157)

ये धरती सबके लिये

यहाँ यह बात भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि अल्लाह ने ये दुनिया और ये धरती केवल हमारे लिये ही नहीं बनाई है बल्कि ये उसके पैदा की गई तमाम मख्लूकों के लिये है। कुरान में आता है:-

-जमीन को उसने सब खिलकत के लिये बनाया है। (कुरान, सूरह रहमान, आयत-10)

-जमीन में चलने वाले किसी जानवर और हवा में पंख से उड़नेवाले किसी पक्षी को देख लो, ये सब तुम्हारी ही तरह की जातियां हैं हमने उनके भाग्य के लेख में कोई कमी नहीं छोड़ी है और ये सबके सब अपने रब की तरफ समेटे जातें हैं। (कुरान, सूरह अनआम, आयत-38)

हर कोई उसकी इबादत कर रहा है: -

इंसान ये गुमान भी न करे की खुदा की इबादत करने वाला अकेला वही है ! कुरान और हदीस ये स्पष्ट करता है कि खुदा की हर एक कृति उसकी इबादत और तस्बीह (तस्बीह का अर्थ है खुदा की पवित्रता और महिमा का हर प्रकार के शिर्क से रहित होकर वर्णन करना) में मशगूल है ! कुरान की आयतें है:- -

आकाशों और धरती में जो कोई भी है, स्वेच्छापूर्वक अथवा अनिच्छापूर्वक उसी को सजदा कर रहा है, और उसके साए भी प्रातः काल और संध्या के समयों में!” (सूरह रअद, आयत-15)

- “सातों आकाशों और धरती और जो कोई उनके बीच है सब उसकी तस्बीह करते हैं, और कोई चीज़ नहीं जो उसकी प्रशंसा के साथ तस्बीह न करती हो; परन्तु तुम उसकी तस्बीह को समझते नहीं ! (सूरह इसरा, 44)

कुरान फरिश्तों के इबादत के बारे में फरमाता है, “और (हे नबी!) तुम फरिश्तों को देखोगे कि वे सिंहासन के चारों ओर घेरा बांधे अपने रब का गुणगान कर रहे हैं ! (सूरह अज़-जुमर, आयत-75)

बादलों के द्वारा तस्बीह के बारे में कुरान कहता है, “और (बादलों की) गरज और फ़रिश्ते उसके भय के कारण उस की प्रशंसा के साथ तस्बीहकरते हैं !  (सूरह रअद, आयत-13)

खुदा की तस्बीह में पहाड़ भी पीछे नहीं है, सूरह साद की 18वीं आयत में आता है, “हमने पहाड़ों को उसके साथ लगा दिया था कि संध्या समय और प्रातःकाल तस्बीहकरते रहें !

पाक-परवरदिगार की तस्बीह परिंदे और दूसरे जानवर भी करते हैं, “क्या तुमने देखा नहीं कि जो कोई आकाशों और धरती में है, अल्लाह की तस्बीह करता है, और पंख फैलाये हुए पक्षी भी (उसी की तस्बीह करते हैं) ? हर एक अपनी नमाज़ और अपनी तस्बीह से परिचित है; और अल्लाह जानता है जो कुछ वो करते हैं ! (सूरह अन-नूर, 41)

- और जानदार जो आकाशों में हैं और जो धरती में हैं सब अल्लाह को सजदा करते हैं, और फ़रिश्ते भी, और वो अपने को बड़ा नहीं समझते!अपने रबसे जो उनके ऊपर हैं डरते रहते हैं, और उन्हें जो हुक्म दिया जाता है करते हैं ! (सूरह नहल, आयत-49-50)

- और हमारे बन्दे दाऊद को याद कीजिये जो बड़ी कुव्वत (और हिम्मत वाले) थे ! वह (खुदा की तरफ) बहुत रुजू होने वाले थे ! हमने पहाड़ों को हुक्म कर रखा था की इनके साथ शाम और सुबह तस्बीह किया करें ! और इसी तरह परिंदों को (जो तस्बीह के वक़्त उसके पास) जमा हो जाते थे, सब उनकी (तस्बीह की) वजह से जिक्र में मशगूल रहते ! (सूरह साद, आयत: 18-19)

इब्ने-कसीर ने इस आयत की तफ्सीर में लिखा है, परिंदे दाऊद (अलैहे0) की आवाज़ सुनकर आपके साथ खुदा की पाकी बयान करने लग जाते ! उड़ते हुए परिंदे पास से गुजरते और आप तौरात पढ़ते होते तो आपके साथ ही वो भी तिलावत में मशगूल हो जाते और उड़ना छोड़ कर बैठ जाते !

सूरह सबा की 10 वीं आयत में आता है, “और हमने दाऊद को अपनी तरफ से बड़ी नेमत दी थी ; (और हमने हुक्म दिया): हे पहाड़ों ! पक्षियों समेत उसके साथ (रुजू की) तस्बीहमें गुंजित हो ! इब्ने-कसीर ने इस आयत की तफ्सीर में लिखा है, दाऊद (अलैहे0) पर दुनिया और आखिरत की रहमत नाजिल फरमाई ! नुबुब्बत भी दी, बादशाहत भी, लाव और लश्कर भी दिए ! ताकत और कुव्वत भी दी, परिंदों को भी वज्द आ गया ! पहाड़ों ने आवाज़ में आवाज़ मिलाकर खुदा की तारीफ़ खुदा की तारीफ व सना शुरू की , परिंदों ने पंख हिलाने छोड़ दिए और अपनी तरह-तरह की प्यारी बोलियों में रब की वहदानियत के गीत गाने लगे ! हजरत दाऊद (अलैहे0) को जो नगमा दिया गया था वो बेनजीर था ! खुदा की किताब पढ़ने बैठते, आवाज़ निकलते ही चरिंद-परिन्द, जंगल के जानवर, पहाड़, कंकड़ सब वज्द में आ जाते और हर चीज़ सब्र और सुकून के साथ बेखुदी के आलम में आपकी अवाज़ से मुतास्सिर होकर किताबे-खुदा में मशगूल हो जातें!

खुदा के यहाँ हर जीव की अहमियत समान है:-

कुरान, हदीसे-नबबी और इस्लामी तलीमात को सामने रखें तो पता चलता है हमारी नज़रों में भले ही ये चरिंद-परिन्द कुछ भी न हो पर खुदा के यहाँ इनका मर्तबा उतना ही है जितना हम इंसानों का है ! उनके तकदीर का फैसला भी खुदा ही करता है और वही उन्हें रिज्क भी देता है ! कुरान में आता है: -

- “धरती में चलने वाला कोई ऐसा जीवधारी नहीं है जिसकी रोज़ी अल्लाह के जिम्मे न हो और जिसके रहने की जगह और जिसके सौंपे जाने की जगह वह न जानता हो ! सब कुछ एक स्पष्ट किताब में में है !” (सूरह हूद, 6)

- “ और धरती में चलने वाला कोई भी जीवधारी , और अपने दो परों से उड़ने वाला कोई भी पक्षी हो, इन सबके तुम्हारे जैसे ही गिरोह है ! हमने किताब में कोई चीज़ नहीं छोड़ी है ! फिर वो अपने रब की ओर इकट्ठे किये जायेंगे ! (सूरह अल-अनआम, 38)

- इब्ने-अबी हातिम में है कि एक मर्तबा हजरत सुलेमान (अलैहे0) बारिश की दुआ मांगने निकले तो देखा एक चीटीं उल्टा लेटकर अपने पैर आसमान की तरफ उठाई हुई है और दुआ कर रही हैं खुदाया ! हम भी तेरी मखलूक हैं, पानी बरसने की जरूरत हमें भी है ! अगर पानी न बरसा तो हम हलाक हो जायेंगे ! चीटीं की यह दुआ सुनकर हजरत सुलेमान (अलैहे0) ने एलान कर दिया, लौट चलो ! किसी और ही की दुआ में तुम पानी पिलाये गए ! एक हदीस में नबी-करीम (सल्ल0) फरमाते हैं, नबियों में से किसी नबी (रिवायतों में आता है की वो हजरत मूसा (अलैहे0) थे) को एक बार एक चींटीं ने काट लिया ! गुस्से में उन्होंने चीटियों के सुराख में आग लगाने का हुक्म दे दिया, उसी वक़्त खुदा तआला की तरफ से वह्य आई, “सिर्फ एक चींटी के गुनाह पर तूने गिरोह के गिरोह को जो हमारी तस्बीह करने वाला था, हलाक कर दिया हालाँकि तुझे बदला ही लेना था तो एक से ही लेता जिसने तुझे काटा था !

चरिंद-परिन्द : अंबिया के मददगार

इस धरती पर जितने मखलूक हैं वो सब खुदा की इबादत करने वालें तो हैं है साथ ही साथ वो नबी-करीम (सल्ल0) की रिसालत की गवाही देने वाले भी रहे हैं और हर दौर में उतारे गए अंबिया के मददगार भी रहें है ! इसके कुछ उदाहरण हैं:-

अबाबील : ये वो परिंदे हैं जिन्होंने यमन के बादशाह अबरहा के हमले से खाना-ए-काबा को बचाया था ! अबरहा काबा को ढ़हाने की नीयत से हाथियों के झुण्ड लेकर मक्के की तरफ आ रहा था तभी अबाबील परिंदे अपने परों में कंकड़ लेकर आ गए और हाथियों पर बरसाने लगे, जिससे हाथियों में भगदड़ मच गई और खुदा का घर सुरक्षित रहा !

अल-हुदहुद : ये हजरत सुलेमान(अलैहे0) के हुक्म के अधीन था ! उनकी फौज के लश्कर के लिए ये पानी तलाशता था ! हजरत सुलेमान(अलैहे0) की तरफ से सबा की रानी बिलकिस के पास तौहीद का सन्देश लेकर भी यही गया था!

अज्जुबाब: इनसे मुराद शहद की मक्खियाँ हैं, रिवायतों में इनके बारे में आता है की ये दरूद पढ़कर शहद तैयार करतीं हैं जिसके प्रभाव से शहद का स्वाद मीठा होता !

अल-अनकबूत- इससे मुराद मकड़ी है ! नबी करीम (सल्ल0) के हिजरत के वक़्त जब वो गारे-सौर में अपने साथी हजरत अबू-बकर (रजि0) कियाम कर रहे थे और काफिर उन्हें ढूंढते हुए वहां तक आ गए थे तब मकड़ियों ने गुफा के मुंह पर जाला बन दिया था, जिससे काफिर धोखा खा गए थे और वापस लौट गए थे!

कबूतर- इनका ताल्लुक भी गारे-सौर से है ! जब काफ़िर नबी (सल्ल0) को खोजते हुए गुफा के पास आ गए थे तब कबूतर ने गुफा के मुंह पर अंडे दे दिए थे! इस मंज़र को देखकर काफ़िर चक्कर में पड़ गए थे कि क्यूंकि कबूतर के ताज़े अंडे देखकर उन्हें गुफा में किसी इंसान का होना हैरतनाक लगा और वो वापस हो गए !

मच्छर : यह हजरत इब्राहीम (अलैहे0) को अजाब देने वाले बादशाह नमरूद के नाक के जरिये उसके दिमाग में घुस गया था जो बाद में उसकी मौत का कारण बना!

इन चरिंद-परिंदों के अंबिया के मददगार होने की और भी कई वाकिये हैं ! जैसे : -

- जब हजरत इब्राहीम (अलैहे0) अपनी बीबी हाजरा और नवजात बच्चे इस्माइल (अलैहे0) को मक्का की वादियों में छोड़ कर आ गए थे, उस वक़्त वहां कोई इंसान आबाद नहीं था! रिवायतों में आता है कि उस वक़्त तमाम वहशी जानवर चारों तरफ जमा होकर उन दोनों की हिफाजत किया करते थे !

- नबी करीम (सल्ल0) जब हिजरत करके मक्का से मदीने गए थे तब पूरा मदीना ये चाहता था की नबी (सल्ल0) उसके घर में रुकें! पूछा गया, हुज़ूर (सल्ल0) आप कहाँ उतरेंगे? इरशाद फ़रमाया, मेरी ऊँटनी खुदा की तरफ से मामूर है ! मेरी ऊँटनी जहाँ बैठ जाएगी वही मेरी कियामगाह है !

- सूरह नम्न की आयत में आता है की सुलेमान (अलै0) को पक्षियों की बोली समझने की तौफीक अता की गई थी! कहा जाता है कि जब मलकुल-मौत ने हजरत दाऊद(अलै0) की रूह कब्ज़ ली थी तब उस वक़्त हजरत सुलेमान (अलैहे0) ने पक्षियों को हुक्म दिया था कि वो हजरत दाऊद(अलै0) पर साया करें ! उन्होंने अपने पंख खोलकर ऐसी गहरी छांह कर दी थी की जमीन पर अँधेरा सा छा गया ! फिर सुलेमान (अलै0) ने उन पक्षियों को हुक्म दिया कि एक-एक कर अपने पंख समेट लो !

दीने-इस्लाम की तबलीग करने वाला भेड़िया-

इतना ही नहीं खुदा की इबादत और अंबिया की मदद के अलावा ये जानवर दीने-इस्लाम की तबलीग करने वाले भी थे और नबी-करीम (सल्ल0) के रिसालत की गवाही देने वाले भी थे: -

- हजरत अबू हुरैरा फर्मातें हैं की एक भेड़िये ने एक बकरी को पकड़ लिया! लेकिन बकरी के चरवाहे ने भेड़िया पर हमला कर उससे अपनी बकरी छुड़ा ली! भेड़िया भाग कर एक टीले पर जाकर बैठ गया और कहने लगा ऐ चरवाहे ! अल्लाह ने मुझको रिज्क दिया था मगर तूने उसको मुझसे छीन लिया ! उसे ऐसा बोलता देख चरवाहा हतप्रभ रह गया और कहा, खुदा की कसम ! मैंने आज से ज्यादा कभी कोई हैरतअंगेज़ और ताज्जुब-खेज मंज़र नहीं देखा एक भेड़िया अरबी जुबान में मुझसे कलाम करता है ! भेड़िया कहने लगा ऐ चरवाहे ! इससे भी ज्यादा अजीब बात तो यह है की तू यहाँ बकरियां चरा रहा है और तू उस नबी को छोड़े और उससे मुंह मोड़े बैठा है जिनसे ज्यादा बुजुर्ग और बुलन्द मर्तबे वाला कोई नबी नहीं आया ! इस वक़्त जन्नत के तमाम दरवाजे खुले हुए हैं और तमाम अहले-जन्नत उस नबी के साथियों की शाने-जिहाद का मंजर देख देख रहे हैं और तेरे और उस नबी (सल्ल0) के दौरान सिर्फ इस घाटी का फासला है काश तू भी उस नबी (सल्ल0) की खिदमत में हाज़िर होकर अल्लाह के लश्करों का एक सिपाही बन जाता ! चरवाहे ने इस गुफ्तगू से मुत्तासिर होकर कहा कि अगर मैं यहाँ से चला गया तो मेरी बकरियों की हिफाजत कौन करेगा? भेड़िया ने जबाब दिया, तेरे लौटने तक मैं खुद तेरी बकरियों की हिफाज़त करूँगा ! चुनांचे उस चरवाहे ने अपनी बकरियों को उस भेड़िया के हवाले किया और बारगाहे रिसालत में हाज़िर होकर मुसलमान हो गया ! जब नबी (सल्ल0) से उसने ये पूरा मंजर कह सुनाया तो नबी करीम (सल्ल0) ने फ़रमाया, तुम जाओ, वहां अपनी सब बकरियों को जिन्दा और सलामत पाओगे ! चुनांचे चरवाहा जब लौटा तो यह मंजर देखकर हैरान हो गया कि वो भेड़िया उसके तमाम बकरियों की हिफाज़त कर रहा है और किसी भी बकरी को उसने कोई नुकसान नहीं पहुँचाया है ! (जुर्कानी, जिल्द-5, सफा-135)

नबी (सल्ल0) के रिसालत की गवाही देने वाला ऊँट:-

एक अंसार का ऊँट बहुत बिगड़ गया था और किसी भी तरह से काबू में नहीं आ रहा था बल्कि लोगों को काटने के लिए हमले किया करता था ! लोगों ने नबी (सल्ल0) को इस बारे में बताया, आप उसके पास जाने लगे तो आपको रोका गया, या रसूलल्लाह (सल्ल0) ! यह ऊँट लोगों को दौड़कर कुत्ते की तरह काट खाता है ! आप (सल्ल0) ने इरशाद फ़रमाया मुझे इसका कोई खौफ नहीं हैइतना कहकर आप (सल्ल0) आगे बढ़े तो ऊँट आपके सामने आकर गर्दन झुका हो गया और आपको सजदा किया !आपने उसके ऊपर अपना हाथ फेरा तो वह बिलकुल नर्म पड़ गया ! फिर आपने उसे उसके मालिक के हवाले कर दिया ! फिर आपने इरशाद फ़रमाया, खुदा की हर मखलूक जानती और मानती है की मैं अल्लाह का रसूल हूँ लेकिन जिन्नों और इंसानों में जो कुफ्फ़ार हैं वो मेरे नुबुव्व्त का इकरार नहीं करते ! (जुर्कानी, जिल्द-5, सफा-140 )

गोह का नबी (सल्ल0) के रिसालत की गवाही-

हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर से रिवायत है कि कबीला-ए-बनी-सुलैम का एक अरबी नागहाँ हुज़ूरे-अक्दस की महफ़िल के पास से गुजरा! आप अपने सहाबा के दरम्यान कुछ बयान कर रहे थे ! ये आराबी जंगल से गोह पकड़ कर ला रहा था! आराबी ने आपके बारे में लोगों से सवाल किया, ये कौन है? लोगों ने बताया कि यह अल्लाह के नबी हैं ! यह बात सुनकर वह नबी (सल्ल0) के करीब आया और कहने लगा, मुझे लात और उज्जा की कसम है मैं उस वक़्त तक ईमान नहीं लाऊँगा जब तक मेरी यह गोह आपके रिसालत की गवाही न दे दे ! यह कहकर उसने इस गोह को लोगों के सामने कर दिया ! आपने गोह को पुकारा तो उसने लब्बैका व सादैकाइतनी बुलंद आवाज़ से कहा कि वहां बैठे तमाम लोगों ने उसे सुन लिया ! फिर आपने उस गोह से पूछा, तेरा माबूद कौन है? उसने जबाब दिया, मेरा माबूद वही है जिसका अर्श आसमान में है और बादशाही जमीन में है, रहमत जन्नत में है और अजाब जहन्नम में है ! फिर आपने पूछा, ऐ गोह ! यह बता कि मैं कौन हूँ? गोह ने बुलंद आवाज़ में कहा, आप रब्बुल-आलमीन के रसूल हैं और नबियों के समापक हैं ! जिसने आपको सच्चा माना वह कामयाब हो गया और जिसने आपको झुठलाया वह नामुराद हो गया ! यह मंजर देखकर वह आराबी फ़ौरन ईमान ले आया ! (जुर्कानी, जिल्द-5, सफा-148)

शेर का ईमान

बैहिकी ने हजरत सफीना से रिवायत की है, वह कहते हैं कि मैं एक समुद्र में सफ़र कर रहा था, अचानक जहाज टूट गया और मैं एक तख्ते पर बैठा-बैठा निस्तान की एक झाड़ी में पहुंचा ! वहां एक शेर मुझे मिला ! जब वह मेरी तरफ बढ़ा तो मैंने कहा, मैं अल्लाह के रसूल का आजाद किया हुआ गुलाम हूँ ! यह सुनते ने शेर ने मेरी तरफ बढ़ कर अपना कंधा मेरे बदन से मिला लिया और मेरे साथ हो गया ! जब चलते-चलते एक रास्ते पर पहुँच गए तो शेर ने मुझे ठहरा दिया और बारीक आवाज़ में कुछ कहने लगा और फिर मेरे हाथ से अपनी दुम छिपा दी ! मैंने समझ लिया कि अब रास्ते पर पहुंचा कर मुझे रुख्सत कर रहा है !

हिरणी का कलमा पढ़ना

तबरानी और बैहकी ने उम्मे-सलमा (रजि0) से रिवायत की है कि नबी करीम (सल्ल0) एक जंगल में थे, अचानक एक हिरणी ने पुकारा कि ऐ अल्लाह के रसूल (सल्ल0)’ ! आपने पलट कर देखा तो एक हिरणी बंधी हुई है और उसके करीब ही एक देहाती सोया हुआ है ! आपने हिरणी  से पूछा, तू क्या कहना चाहती है? उसने कहा कि इस देहाती ने मुझे शिकार कर लिया है और इस पहाड़ी के अंदर मेरे दो छोटे-छोटे बच्चे हैं ! आप मुझे छोड़ दे उनको दूध पिलाकर मैं वापस आ जाऊँगी ! आपने पूछा, क्या वाकई तू वापस आएगी, उसने कहा, हाँ ! चुनांचे आपने उसे खोल दिया और वह बच्चे को दूध पिलाकर वापस आ गई ! इसके बाद देहाती जागा तो प्यारे नबी (सल्ल0) को वहां देखकर पूछा, क्या आपका कुछ इरशाद है? आपने फ़रमाया, तू इस हिरणी को छोड़ दे ! उसने उस हिरणी को छोड़ दिया और वो हिरणी कलमा पढ़ती हुयी वहां से चली गई ! (इब्ने-हज़र ने इस रिवायत को सहीह करार दिया है )

एक बुजुर्ग ने नआते-पाक में इन तमाम बातों को जमा करते हुए लिखा है:-

 अपने मौला की है बस शान अज़ीम, जानवर भी करें जिनकी ताज़ीम,

संग करते हैं अदब से तस्लीम, पेड़ सजदे में गिरा करते हैं,

हाँ यही करती है चिड़िया फ़रियाद, हाँ यही चाहती है चिड़ियाँ दाद,

इसी डर पर शुत्राने नाशाद, गिला-ए-रंग व इना करते हैं !

तमाम चरिंद-परिन्द मोमिन हैं!

कुरान, हदीस और इस्लामी रिवायतों की दूसरी किताबों में दर्ज ये तमाम बातें साबित कर देती हैं की इंसान भले ही खुदा की इबादत न करे या मुहम्मद (सल्ल0) के लाये दीन और उनकी रिसालत का इनकारी हो पर तमाम पशु, पक्षी हर वक़्त खुदा की इबादत में मशगूल हैं और ये मानते हैं कि मुहम्मद (सल्ल0) खुदा के भेजे हुए सबसे बरगुजीदा पैगम्बर थे ! हर दौर के अंबिया की मदद में भी वो हमेशा आगे ही रहें ! और जब ऐसा है तो फिर इनके मोमिन होने में कोई सुब्हे की गुंजाईश नही है !

मोमिन और मुस्लिम में फर्क है:- मोमिन का दर्जा ऊँचा

कुरान शरीफ का अध्ययन यह स्पष्ट कर देता है मुसलमान और मोमिन में फर्क है ! अल्लाह की नजर में हर मुसलमान मोमिन नहीं है परन्तु मोमिन वो है जो सिर्फ और सिर्फ एक अल्लाह की इबादत करे और उसके साथ किसी को भी शरीक न करे, नमाज़ी हो, खुदा का डर रखता हो और गुनाहों से पाक हो ! मोमिन और मुस्लिम का ये अंतर बहुत महत्वपूर्ण है क्यूंकि खुदा की नजर में एक कामिल मोमिन होना निहायत एक कठिन परीक्षा है ! अपने दिल में खुदा के अलावा किसी को शरीक करने का ख्याल भी न लाये, दीन के तमाम अहकामों को भी पूरा करे और और गुनाहों से भी पाक हो, ये ऐसी कठिन परीक्षा है जिसमें या तो अल्लाह के भेजे अंबिया या वलीउल्लाह ही साबित कदम ठहर सकते है या फिर खुदा की बनाई वो मख्लूकें जो पूरी तरह उसके हुक्म के ताबेअ है, और अपनी मर्ज़ी से कुछ करने का कोई हक उसे हासिल नहीं है ! इन मख्लूकों में खुदा के फ़रिश्ते हैं, इंसान भी, तमाम ग्रह, नक्षत्रों समेत जानवर और पक्षी भी हैं ! ये सब के सब खुदा के हुक्म के पूर्णतया ताबेअ हैं, इनमें किसी को ये अख्तियार नहीं की वो हुक्मे-इलाही की नाफ़रमानी करें ! इसके अलावा इनकी एक और खासियत है और वो ये है की ये भी खुदा के इबादातगार हैं ! हर घड़ी ये जिक्रे-इलाही में मशगूल रहते हैं, उसकी हम्दो-सना करते हैं और उसके तरफ से भेजे गए आख़िरी नबी मुहम्मद मुस्तफा (सल्ल0) की रिसालत के मानने वालें भी हैं ! अगर मोमिन की उपरोक्त परिभाषा को आधार मान लिया जाये तो फिर मोमिन की श्रेणी में हमें तमाम जानवरों और परिंदों को भी शामिल मानना पड़ेगा!

मोमिनों के दर्ज़ात और मोमिनों के साथ सूलूक

हम इंसानों की हिदायत के लिए तो खुदा हर दौर में, हर कौम में, अलग-अलग भाषा बोलने वालों की बीच उनकी भाषा में नबी भेजता है पर इन चरिंद-परिंदों के बीच में तो उसने नबी नहीं रखे, उन्हें किसी हिदायत देने वाले से महरूम रखा, न ही उनके लिए कोई किताब भेजी, न ही उनके बीच किसी तबलीग करने वाले को भेजा ! बाबजूद इसके वो उन तमाम अहकामों को पूरी पुख्तगी के साथ पूरा करते हैं जो हम इंसान तमाम नबियों, रसूलों, वलियों और किताबों के भेजे जाने के बाबजूद पूरा नहीं कर पाते ! कुरान ने इंसानों को कई दफा सख्त ताकीद की है कि अल्लाह की वहदानियत में किसी को शरीक न करना पर पशु-पक्षियों को लेकर उसे ऐसा कोई अंदेशा नहीं है कि वो उसके साथ शिर्क करेंगे ! उनकी तरफ से ये निश्चिन्तता है वो खुदा की इबादत में किसी को शरीक नहीं करने वाले और न ही उनके लिए तय किसी अहकाम को छोड़ने वालें हैं ! उनके मोमिन होने की दर्जे की बुलंदी इस बात से भी साबित है वो इंसानों से इतर गुनाहों से पूर्णतया पाक है (क्यूंकि खुदा ने उनके कर्म करने के लिए स्वतंत्र नहीं रख छोड़ा है) और अगर ये मोमिन है तो फिर इनके हक़ में फैसला नबी-ए-पाक की हदीस करेगी जो कहती है कि किसी मुसलमान के लिये यह हराम है ठहरा दिया गया है कि वह किसी मुसलमान को तकलीफ दे। हदीसों में आता है:-

- हजरत अब्दुल्ला रिवायत करतें हैं कि रसूल (सल्ल0) ने इर्शाद फरमाया, मुसलमान को गाली देना बेदीनी तथा कत्ल करना कुफ्र है। (बुखारी) मजाहिरे-हक में इस हदीस की व्याख्या करते हुये कहा गया है, 'जो मुसलमान किसी मुसलमान को कत्ल करता है वह अपने इस्लाम के कामिल होने की नफी करता है और मुम्किन है कि कत्ल करना कुफ्र पर मरने का भी सबब बन जाये।' - हजरत अबू मूसा रिवायत करतें कि सहाबा ने अर्ज किया: या रसूल (सल्ल0) ! कौन से मुसलमान का इस्लाम अफ्जल है? इर्शाद फरमाया,  जिस मुसलमान की जबान तथा हाथ से दूसरे मुसलमान महफूज रहे। (बुखारी)

- हजरत अबू हुरैरा से रिवायत है कि 'अबुल कासिम मुहम्मद ने इर्शाद फरमाया, जो शख्स अपने मुसलमान भाई की तरफ लोहे यानि हथियार वगैरह से इशारा करता है, उसपर फरिश्ते उस वक्त तक लानत करतें हैं जब तक कि वह इशारा करना छोड़ नहीं देता।' (मुस्लिम शरीफ) इसका मतलब किसी मुसलमान को इशारातन भी दूसरे मुसलमान पर हथियार उठाने से सख्ती से मना करना है।

- हजरत बुरैदा रिवायत करतें हैं कि 'मोमिन का कत्ल किया जाना अल्लाह के नजदीक सारी दुनिया के खत्म हो जाने से भी ज्यादा बड़ी बात है।' (नसाई शरीफ)

- हजरत उबादा बिन सामित से रिवायत है कि रसूल (सल्ल0) ने इर्शाद फरमाया कि 'जिस शख्स ने किसी मोमिन का कत्ल किया और फिर उसके कत्ल पर खुशियां मनाई तो फिर अल्लाह न तो उसकी फर्ज कबूल करेंगें और न ही नफ्ल!' (अबूदाऊद)

- हजरत अबू सईद खुदरी तथा अबू हुरैरा रिवायत करतें हैं कि 'आसमान और जमीन वाले सबके सब किसी मोमिन के कत्ल में शरीक हो जाये तो भी अल्लाह इन सबको औंधे मुंह जहन्नम में डाल देंगें।' (तिरमिजी) क्या रसूलल्लाह (सल्ल0) का दिल उस वक्त नहीं दुखता होगा जब खुदा की हम्दो-सना करने वाली उनकी मख्लूकों को मारकर उनकी उम्मती जश्न मनाते हैं और उसके मांस पर दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ दावत उड़ाते हैं? क्या ये हुज़ूर (सल्ल0) के उन उम्मतियों को जन्नत दिलाएगी जो खुदा की नज़रों में नापसंदीदा इन कामों को करते हैं ? खुदा के एक बरगुजीदा पैगम्बर दाऊद(अलै0) के साथ हमकलाम होकर तौरात की तिलावत करने वाले परिंदों को मारकर खाने में कौन सा सबाब है?

नबी की रहमत सबके लिए-

कुरान ने नबी करीम के लिए सूरह अंबिया में फ़रमाया, हमने आपको पूरी आलम के लिए रहमत बना कर भेजा है ! इसका अर्थ ये है नबी के रहमत के आगोश में तमाम इंसानों से लेकर जिन्नात, चरिंद, परिन्द और हर मख्लूक शामिल हैं !इन सबमें से चरिंद-परिन्द  न सिर्फ उसकी रहमत में  शामिल हैं बल्कि उन्हें ये तक एतमाद है कि मुहम्मद (सल्ल0) खुदा के रसूल हैं ! इन जानवरों और परिंदों को लेकर नबी (सल्ल0) की दया इतनी ज्यादा थी कि एक बिल्ली को तकलीफ देने वाली एक महिला के बारे में आप (सल्ल0) ने फरमाया था कि यह औरत इस बिल्ली के कारण नरक में दाखिल होगी, जिसने इसे बांध दिया और न ही उसे छोड़ा ताकि वह जमीन के कीड़े-मकोड़े खा सके!’ (ये हदीस सही है और अब्दुल्ला बिन उमर से रिवायत है)

नबी की  सीरत में ऐसी एक नहीं हजारों मिसालें है जो तमाम मख्लूकों के प्रति नबी (सल्ल0) की रहमत का बयान करती है। एक बार एक सहाबी नबी (सल्ल0) की खिदमत में हाजिर हुये, उनके हाथ में किसी परिंदे के बच्चे थे जो बेचैनी से चीख रहे थे। नबी (सल्ल0) ने पूछा, ये बच्चे कैसे हैं? सहाबी ने फरमाया, मैं एक झाड़ी के पास से गुजरा तो इन बच्चों की आवाज आ रही थी, तो मैं इनको निकाल लाया। इतनी देर में इन परिंदों की मां भी आकर सहाबी के सर के ऊपर बेचैनी से मंडराने लगी। नबी उस सहाबी पर नाराज हो गये और हुक्म दिया कि जाओ और जाकर अभी इन बच्चों को उस जगह पर छोड़ आओ जहां से लाये हो। यह हदीस अबू दाऊद शरीफ में आई है। इसी तरह अबू दाऊद शरीफ में ही एक और हदीस आई है जो हजरत अब्दुर्रहमान बिन अब्दुल्ला से रिवायत है। वो फरमातें हैं कि हम लोग एक बार नबी (सल्ल0) के साथ सफर में थे। इस बीच नबी (सल्ल0) हाजत के लिये गये तब तक हम एक चिड़ियाँ देखी जो अपने दो बच्चों के साथ थी। हमने उसके चूजों को पकड़ लिया तो उसकी मां जमीन पर आकर तड़पने लगी, इसी बीच रसूल (सल्ल0) आ गये और फरमाया, किसने इस चिडि़या के बच्चों को तकलीफ दी है? इसके बच्चे को अभी वापस लौटाओ। एक बार कुछ सहाबियों ने चींटियों के एक बिल को जला दिया, यह खबर सुनकर नबी (सल्ल0) बहुत नाराज हुये और गुस्से में फरमाया, किसने इन चीटिंयों को ऐसी तकलीफ दी है? सहाबियों ने कहा, ये हरकत हमसे हुई है। नबी (सल्ल0) ने गुस्से में फरमाया, आग के साथ सिवाए रब्बुल आलमीन के किसी को ये अख्तियार नहीं को वो किसी को आग में जलाये या उन्हें अजाब दे। (अबू दाऊद)

जिस अरब में लोग इंसान के जिंदा रहने के हक को गवारा नहीं करते थे , उस अरब में मोहम्मद साहब (सल्ल0) ने जानवरों और पशु-पक्षियों के जिंदगी का हक निर्धारित किया। उन्होनें फरमाया, जो कोई व्यक्ति बगैर किसी अपराध के किसी गौरैया या उससे बड़े जानवर को मारता है, तो अल्लाह तआला उससे कियामत के दिन इस बारे में उससे सवाल करेगा। (नसाई शरीफ) क्या यह बात समझने की नहीं है जो रसूल (सल्ल0) बिल्ली और गौरैया जैसे अदने जीव के (जिससे इंसानों के लिये कोई बिशेष फायदा भी नहीं है) जिंदा रहने के अधिकार को लेकर इतने फिक्रमंद थे वो गाय, ऊँट जैसे अन्य दूसरे बहुपयोगी जीवों  के कत्ल पर दुःखी नहीं होतें होगें ?

इस्लामी के इतिहास में ऐसी कई मिसालें हैं जिसमें जीवों पर रहम करने की बात कही गई है। राबिया का तारीखे-इस्लाम में एक बुजुर्ग आबिदा के रुप में बहुत ऊँचा मुकाम है। इन्हीं राबिया के कालखंड में एक और महान संत हुये जिनका नाम संत हसन बसरी था। उन दिनों राबिया ने जंगल को अपना इबादतगाह  बनाया हुआ था और एक दिन संत हसन उनसे मिलने आये। दूर से देखा कि जंगल के जानवर और परिंदों राबिया के पास इत्मीनान से बैठें हैं। हसन जब करीब आये तो सारे जानवर और परिंदें वहां से भाग गये। हसन को बड़ा ताज्जुब हुआ और वो राबिया से पूछ बैठे कि मुझे देख कर ये सब भाग क्यों गये? राबिया ने प्रतिप्रश्न किया, आज आपने खाया क्या था?  हसन ने कहा, गोश्त। राबिया ने कहा वो मासूम जानवर उस इंसान से नफरत न करें तो और क्या करें जो उन्हें मार के खाना पसंद करता है। इस धटना के बाद हसन ने मांसाहार छोड़ दिया। इस्लाम के चौथे खलीफा और नबी-करीम (सल्ल0) के दामाद हजरत अली (रजि0) ने फ़रमाया था अपने पेट को पशु-पक्षियों की कब्रगाह न बनाओ !

खुदा ने तमाम चौपायों और दूसरे अन्य परिंदों को हमारी सहायता पहुँचाने के लिए बनाया है [ और जिसने हर प्रकार की चीजें पैदा कीं, और तुम्हारे लिए नौकाएं और चौपाएं बनायें जिस पर तुम सवारी करते हो ! ताकि तुम उनकी पीठ पर जम कर बैठो फिर जब तुम उनपर बैठो तो अपने रब का अहसान याद करो, और कहो: महिमावान है वह जिसने हमारे लिए इन्हें काम पर लगाया, और हम इन्हें बस में करने की शक्ति नहीं रखते थे ! (सूरह-ज़ुखुरफ, आयत-13) ] तो हमारा भी कर्तव्य है कि हम उसके इस अहसान के बदले उसकी इन कृतियों को तकलीफ न दें, पेट भरने मात्र के लिए इन मासूमों का क़त्ल न करें और न ही इन मख्लूकों के साथ कुछ ऐसा करें कि खुदा का प्रकोप हमें झेलना पड़ जाये ! जीव-हत्या, पशु-बलि और मांसाहार ये तीनों ही निंदनियें है ! चींटी जैसी सूक्ष्म प्राणी को जब हजरत मूसा (अलै0) ने क़त्ल कर दिया था तो खुदा उनसे नाराज़ हो गए थे तो फिर हमारी बिसात ही क्या है कि हम उसके मख्लूकों को तकलीफ दें?

जहाँ पवित्र वेद मनुष्य, प्रकृति और जीव-जंतुओं के बीच कैसा संबंध हो यह बताते हुए कहती है,

 मित्रस्यया चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम! मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि समीक्षे ! मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे !!

अर्थात, “सम्पूर्ण जीव-जन्तु मेरी और मित्रता के भाव से देखे, मैं भी उन्हें मित्र दृष्टि से देखूं और हम दोनों एक-दूसरे को मित्र की दृष्टि से देखें !

वहीँ  पवित्र कुरान मोमिनो का आवाहन करते हुए कहता है, “न उसके मांस अल्लाहको पहुँचते हैं, और न उनके रक्त , परन्तु उसे तुम्हारा तक्वा (धर्मनिष्ठा) पहुँचता है!(सूरह अल-हज, आयत-37)

अभिजीत मुज़फ्फरपुर (बिहार) में जन्मे और परवरिश पाये और स्थानीय लंगट सिंह महाविद्यालय से गणित विषय में स्नातक हैं। ज्योतिष-शास्त्र, ग़ज़ल, समाज-सेवा और विभिन्न धर्मों के धर्मग्रंथों का अध्ययन, उनकी तुलना तथा उनके विशलेषण में रूचि रखते हैं! कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में ज्योतिष विषयों पर इनके आलेख प्रकाशित और कई ज्योतिष संस्थाओं के द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकता की कोशिशों के लिए कटिबद्ध हैं तथा ऐसे विषयों पर आलेख 'कांति' आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। इस्लामी समाज के अंदर के तथा भारत में हिन्दू- मुस्लिम रिश्तों के ज्वलंत सवालों का समाधान क़ुरान और हदीस की रौशनी में तलाशने में रूचि रखते हैं।

URL:  http://www.newageislam.com/hindi-section/islamic-views-on-animal-slaughtering-and-non-vegetarianism-जीव-हत्या,-पशु-बलि-और-मांसाहार-इस्लाम-की-नज़र-में/d/66375

 

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