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Hindi Section ( 8 Apr 2014, NewAgeIslam.Com)

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Islam and Enivironment इस्लाम और पर्यावरण

 

 

 

 

अभिजीत, न्यु एज इस्लाम

9 अप्रैल, 2014

आज से तकरीबन 1400 साल पहले जब न आबादी की समस्या थी, न शोर करने वाले वाहन थे, न धुआँ उगलने वाली चिमनियाँ था, न कंक्रीट के जंगल बिछे थे और न ही प्रकृति को भोग्या मानने की  नसिकता रखने वाले इंसान थे, उस वक्त अरब के रेगिस्तान में जन्में एक इंसान ने मनुष्यों को उस बात की तरफ आगाह किया था जो आने वाले समय में सारी दुनिया और इंसानियत के लिये बहुत बड़ी समस्या बनने वाली थी। उस इंसान पर अवतरित किताब ने इस बारे में आगाह करते हुये कहा, "जल और थल में बिगाड़ फैल गया स्वयम् लोगों के ही हाथों की कमाई से, ताकि उन्हें उनकी कुछ करतूतों का मजा चखायें, कदाचित् वो बाज आ जायें।" (सूरह रुम, आयत-41)

इस्लामी विश्वासों के अनुसार कुरान ईश्वर की तरफ से भेजी गई आखिरी किताब है और हजरत मोहम्मद नबियों के क्रम में आखिरी भेजे जाने वाले नबी हैं। यानि मोहम्मद (सल्ल0) के बाद नुबुब्बत और कुरान के बाद किताब भेजे जाने का सिलसिला खत्म कर दिया गया। इसका अर्थ ये है कि कुरान और हजरत मोहम्मद (सल्ल0) की शिक्षायें कयामत तक के लिये काम आने वाली है ! ऐसा है तो यकीनन इनकी शिक्षाओं और संदेशों में वैसी बातें या सुझाव भी हैं जो उस जमाने के लिये भले उतनी प्रासंगिक न रही हो पर आज बड़े महत्व की है। हजरत मोहम्मद (सल्ल0) के नबियों के क्रम में आखिरी होने तथा कुरान के आखिरी ईशग्रंथ होने की प्रासंगिकता इन अर्थों में भी है कि इनकी तालीम कयामत तक आने वाली तमाम समस्याओं के निदानार्थ उससे निपटने के उपाय सुझाती है। स्वयम् कुरान इस बारें में बताता है-  हमनें इस किताब में कोई चीज नहीं छोड़ी है (कुरान, 6:38)

इन्हीं तालीमों और संदेशों में पर्यावरण और प्रदूषण के बारे में प्रदत्त शिक्षायें भी हैं जो उस जमाने में उतनी प्रासंगिक नहीं थी क्योंकि तब हमारी पृथ्वी, जल और वायु प्रदूषित नहीं थे पर आज सारा विश्व भीषण पर्यावरण प्रदूषण और मानव समाज इस पर्यावरण संकट के परिणामस्वरुप पैदा हुये विभिन्न तरह-2 के रोगों और अन्य दूसरी समस्याओं से जूझ रहा है और ऐसे में कुरान और हजरत मोहम्मद की तालीमों पर अमल करना इसके समाधान का तथा इससे उत्पन्न रोगों से बचाव के लिये कारगर उपाय हो सकता है।पवित्र कुरान की तकरीबन 700 आयतें और नबी (सल्ल0) की सैकड़ों हदीसें पर्यावरण और प्रकृति की बात करती है,  इंसानों को समझाती है कि ये सारी कायनात अल्लाह की रची हुई है इसलिये प्रकृति का शोषण नहीं बल्कि संरक्षण करना चाहिये। तकरीबन 1400 साल पहले ही इस ग्रंथ ने और इसके लाने वाले ने अपने अनुयायियों को आगाह कर दिया था कि आने वाले समय में प्रदूषण और उससे जनित विभिन्न तरह के रोग मानव जाति के लिये सबसे बड़ी समस्या बनने वाली है। कुरान और नबी (सल्ल0) ने इस खतरे के प्रति आगाह करने के बाद इसके समाधानार्थ उपाय भी बताये थे और ऐसे सुझाव दिये थे जो इस संकट में निवारण में तथा उससे जनित रोगों के उपचार और समस्याओं के समाधान में सहायक हो। ईश्वर ने मनुष्यों के लिये यह धरती बनाई है जिससे हमें कई तरह के फल, फूल, खनिज पदार्थ, अन्न, जल आदि प्राप्त होतें हैं।

इतनी चीजें प्रदान करने वाली इस धरती के प्रति हमारा भी ये कर्तव्य बनता है कि हम इसकी हिफाजत करें और इसे स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त रखें। सहीह मुस्लिम की एक हदीस में आता है- “The world is green and beautiful, and God has appointed you his guardian over it.” पश्चिमी विश्व के चिंतक फ्रांसिस बेकन के इस मान्यता कि प्रकृति जड़ है इसलिये इसका अधिकतम शोषण किया जाना चाहियेपर चलने के कारण पूरी दुनिया में प्रकृति का शोषण करने की होड़ लग गई और जल व थल में बिगाड़ पैदा होने की पवित्र कुरान की भबिष्यवाणी पूरी हो गई। अब प्रकृति इंसानों को जल और थल में बिगाड़ फैलाने की करतूतों के लिये मजा चखा रही है। अपने ग्रंथों में हमने इस पृथ्वी का स्तवन माता कह कर किया है। हमारे महान पूर्वजों और पवित्र ग्रंथों ने तो हमें प्रकृति को माता समझने की तालीम दी थी पर खुद को सर्वश्रेष्ठ समझने की होड़ में हम मानवजाति ने अपने अवांछित कृत्यों और लालच से प्रकृति का ऋतुचक्र बिगाड़ दिया है और प्रकृति के स्वाभाविक ताप नियमन सिद्धांत को गड़बड़ कर दिया है। इन सबके परिणामस्वरुप हम मानव ग्लोबल वार्मिंग यानि विश्वतापीकरण की समस्या से धिर गये हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने वायुमंडल में गैसों का संतुलन बिगाड़ दिया है। वायुमंडल में प्राणवायु ऑक्सीजन की मात्रा धटती जा रही है।

वनों के नष्ट होने के कारण बर्षाचक्र भी बदल गया है और पानी की समस्या उत्पन्न हो गई है। जल थल में बिगाड़ पैदा करने के परिणामस्वरुप मानव जीवन को आने वाले भबिष्य में जिन समस्याओं का सामना करना पड़ेगा उसकी कल्पना ही सिहरन पैदा कर देती है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अंतराष्ट्रीय पैनल आई0 पी0 सी0 सी0 ने 6 अप्रैल 2007 को ब्रुसेल्स में एक रिर्पोट जारी की जिसमें अनुमान लगाया गया कि पर्यावरण प्रदूषण के परिणामस्वरुप:-

1. इस सदी के आखिर तक दुनिया के 1 अरब लोगों के लिये भयानक जलसंकट पैदा हो जाएगा। आस्ट्रलिया और अफ्रीका महादेश इससे सबसे ज्यादा पीडि़त होंगें।

2. ग्लेशियरों के पिधलने के कारण 2050 तक दुनिया के कई समुद्री इलाकों के डूब जाने की आशंका है, जिनके परिणामस्वरुप तकरीबन 20 करोड़ लोगों को विस्थापन का सामना करना पड़ सकता है।

3. पर्यटन व मत्स्य उधोगों पर निर्भर रहने वाले देशों की अर्थव्यवस्थायें चरमरा जायेंगी।

4. वृक्ष और जीव-जंतुओं की करीब 30 फीसदी प्रजातियां नष्ट हो जायेंगी।

5. भारत की जीवनदायिनी नदी गंगा प्रायः लुप्त हो जायेगी।

6. 2030 तक ज्यादातर हिमालयी ग्लेशियर पिधल जायेंगें और उसका क्षेत्रफल सिमट कर 5 लाख वर्गकिलोमीटर से धटकर 1 लाख वर्गकिलोमीटर तक रह जायेगा। इन समस्याओं से मनुष्य आज भीषण संकट में धिरा हुआ है और समाधानार्थ रास्ता तलाशने में जुटा है। दुनिया के विभिन्न देशों की सरकारें मीटिंग कर रहीं है कि इस संकट से कैसे निकला जाये।

* सारी सृष्टि अल्लाह की

कुरान में अल्लाह तआला के 99 नाम बताए गयें हैं जो उनके गुणों के आधार पर है। इन्हीं नामों में उनका एक नाम खालिक भी है जिसका अर्थ है बनाने वाला। ये तमाम कायनात, तारे, ग्रह, जीव-जंतु सब उसी की रचना है। कुरान में कई जगहों पर इस बारे में कहा गया है:-

- और वही है जिसने यह जमीन फैला रखी है, इसमें पहाड़ों के खूंटे गाड़ रखें हैं और नदियाँ बहा दी है। उसी ने हर तरह के फलों के जोड़े पैदा कियें हैं और वही दिन को रात से छिपाता है। इन सारी चीजों में बड़ी निशानियां है उनलोगों के लिये जो सोच-विचार से काम लेतें हैं। और देखो जमीन में अलग-2 भूभाग पाये जाते हैं जो एक-दूसरे से मिले हुये अवस्थित हैं। अंगूर के बाग हैं, खेतियां हैं, खजूर के पेड़ है जिनमें से कुछ इकहरे और कुछ दोहरे। सबको एक ही पानी सिंचित करता है मगर स्वाद में हम किसी को अच्छा बना देतें हैं और किसी को उससे कम। इन सब चीजों में बहुत सी निशानियां है उन लोगों के लिये जो बुद्धि से काम लेतें हैं। (सूरह रअद, आयत-3,4)

- आसमानों और जमीनों का पैदा करना इंसान को पैदा करने की अपेक्षा यकीनन अधिक बड़ा काम है, मगर ज्यादातर लोग जानतें नहीं है। (कुरान, 40:157)

* अल्लाह की बनाई दुनिया की रखवाली हमारी जिम्मेदारी

ईश्वर ने मनुष्य को धरती पर अपना खलीफा नियुक्त किया है, इसलिये ईश्वर की बनाई जो भी चीजें हैं उन सबके संरक्षण की जिम्मेदारी हम इंसानों पर ही हैं। अल्लाह की बनाई हर मख्लूक की हिफाजत, उसका सरंक्षण हमारी जिम्मेदारी है। कुरान में आता है, "और याद करो जब तुम्हारे रब ने फरिश्तों से कहा, मैं धरती में खलीफा बनाने वाला हूँ, उन्होंने ने कहा, क्या उसमें तू उसे नियुक्त करेगा जो उसमें बिगाड़ पैदा करेगा और रक्तपात करेगा?" (कुरान, 2”30) अल्लाह ने जब मानवजाति का सृजन कर ये इच्छा की थी कि उन्हें वह अपना खलीफा नियुक्त करेगा जो उसके बनाई चीजों का निगरां होगा जब फरिश्तों ने ये आशंका जताई थी कि आपकी ये रचना आपकी बनाई सृष्टि में बिगाड़ पैदा करेगा। आज हम इंसानों ने फरिश्तों की आशंका को अपने कृत्यों से सत्य साबित कर दिया है। अल्लाह ने अगर हमें अपनी बनाई चीजों की हिफाजत करने वाला बनाया है तो हमारी ये जिम्मेदारी है उसकी रचनाओं को हम न बिगाड़ें। अल्लाह ने इस सृष्टि को पूरी संतुलन के साथ बनाया है इसलिये इसका संतुलन बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है। अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो ये खुदा के विश्वास को तोड़ना होगा।

* अल्लाह की बनाई चीजों में बिगाड़ पैदा करने वाले हम कौन?

कुरान से हमें ये भी मालूम होता है कि ये सारी कायनात ईश्वर ने तय व्यवस्था के साथ बनाई है यह मिजान (संतुलन) पर है। कुरान में इससे संबंधित कई आयतें हैं:-

- सूरज और चांद एक हिसाब के पाबंद हैं। और तारे और पेड़ सब सज्दे में हैं। आसमान को उसने ऊँचा किया और तुला स्थापित कर दी। इसका तकाजा ये है कि तुम तुला में विध्न न पैदा करो। (सूरह रहमान, आयत-5-8)

- अल्लाह की बनाई हुई संरचना बदली नहीं जा सकती है। There is no altering the creation of Allah (Suran Rum,30 :30)

- तुम रहमान की रचना में किसी तरह की विसंगति नहीं पाओगे। (कुरान, 67:3) अल्लाह का निजाम जब एक तय व्यवस्था के तहत है तो फिर उसकी एक सामान्य मख्लूक होकर हमें ये हक नहीं है कि हम उसकी व्यवस्था में किसी तरह के परिवर्तन की कोशिश करें। खुद ईश्वर को ये पसंद नहीं है। कुरान में है,

- धरती पर बिगाड़ पैदा करने की कोशिश न कर, अल्लाह बिगाड़ पैदा करने वालों को पसंद नहीं करता। (कुरान, 28:77)

- अल्लाह की अता की हुई रोजी खाओ और पिओ मगर जमीन में फसाद न पैदा करना।(कुरान, 2:60)

अल्लाह ने ये दुनिया और ये धरती केवल हमारे लिये ही नहीं बनाई है बल्कि ये उसके पैदा की गई तमाम मख्लूकों के लिये है। कुरान में आता है:-

- जमीन को उसने सब खिलकत के लिये बनाया है। (कुरान, सूरह रहमान 55:10)

- जमीन में चलने वाले किसी जानवर और हवा में पंख से उड़नेवाले किसी पक्षी को देख लो, ये सब तुम्हारी ही तरह की जातियां हैं हमने उनके भाग्य के लेख में कोई कमी नहीं छोड़ी है और ये सबके सब अपने रब की तरफ समेटे जातें हैं। (कुरान, सूरह अनआम, आयत-38)

* हजरत मोहम्मद (सल्ल0) और पर्यावरण

हजरत मोहम्मद साहब (सल्ल0) को सारे इंसानियत के लिये रहमत बनाकर भेजा गया था और चूंकि वो आखिरी नबी भी थे इस लिहाज से सारी दुनिया उनकी ही उम्मती है, इसलिये उनकी तालीमें तमाम मख्लूकों के हक में बात करती है। उनकी समस्याओं के समाधान हेतू मार्ग दिखाती है । भीषण पर्यावरण संकट से निपटने की सीख भी नबी (सल्ल0) की तालीम में मौजूद है। अपनी तालीम में उन्होंनें पर्यावरण संरक्षण व अल्लाह के तय निजाम की बेहतरी के लिये हर वो उपाय बताये जो आज प्रासंगिक है। उनकी तालीम में वृक्षारोपण और वन संरक्षण की बातें हैं, वन्य जीव संरक्षण के उपाय सुझाये गयें हैं, पानी के महत्त्व को बताया गया है और इन सबके अलावा वो तमाम बातें हैं जिसके अनुपालन कर मानव जाति प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर चल सकता है।

* वृक्षारोपण व वन संरक्षण की तालीम:-

 हमारी संस्कृति में वृ़क्षों को माता-पिता के रुप में प्रतिष्ठित किया गया है। जैसे माता-पिता हमारे पालक हैं उसी तरह वृक्ष सारी धरती और उसपर रहने वाले जीवों के अस्तित्व का आधार हैं। वृक्षों के बिना इनमें से किसी के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती। वृक्ष न हो तो हमारा सांस लेना दूभर हो जायेगा, भूस्खलन की समस्या पैदा हो जायेगी, बर्षा नहीं होगा, वृक्षों की पत्तें और इसके फल-फूल पर जीवन गुजारने वाले जीवो के अस्तित्व पर संकट आ जायेगा। वृक्षों की इसी फजीलत के कारण दुनिया के हर मजहब में इनका आला मुकाम है । हिंदू धर्म में वृक्ष लगाने वालों के लिये अनंत पुण्य की बात कही गई है, सिख धर्म में उन्हें प्रत्यक्ष देवरुप में प्रतिष्ठा दी गई है। इस्लाम को लाने वाले की तालीम भी इससे अछूती नहीं है। नबी (सल्ल0) ने अपने उम्मतियों को ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने ,वृक्षों को अनावश्यक न काटने, प्रदूषण नियंत्रक तुलसी जैसे पौधे लगाने तथा औषधियों गुणों से भरपूर पौधों के इस्तेमाल करने का निर्देश दिया है। बुखारी शरीफ की एक हदीस के अनुसार पेड़ लगाना भी एक प्रकार का दान है क्योंकि वृक्ष पक्षियों और कई दूसरे जीवों के लिये आश्रय स्थली बनती है, इसके पत्ते कई जीवों के आहार के काम में आतें हैं और इसकी छाया राहगीरों को शीतलता प्रदान करती है।

मस्नदे-अहमद की एक हदीस में वृक्षारोपण की फजीलत बताते हुये रसूल (सल्ल0) ने तो ये तक कहा कि  "अगर कयामत कायम होने वाली हो और किसी के पास बोने के लिये खजूर की कोई कोंपल हो तो उसे चाहिये कि वह उसे बो दे। उसके इस अमल के बदले उसे अज्र और सबाब मिलेगा।" रसूल (सल्ल0) खुद अपनी दुआओं से खुदा से ये कामना करते थे कि खुदा वृक्ष उगने की जगहों पर बारिश कर। इस बारे मे एक हदीस हजरत अनस से रिवायत हुई है, नबी (सल्ल0) की दुआ पर छह दिनों तक बारिश होती रही और जब बारिश खत्म न हुई तो एक आदमी नबी (सल्ल0) के पास आया और आकर फरमाया, या रसूल्लाह (सल्ल0) माल-मवेशी बर्बाद हो गया, रास्ते बंद हो गये इसलिये आप अल्लाह से दुआ करे कि अब बारिश रोक लें। अनस (रजि0) कहतें हैं कि रसूल (सल्ल0) ने हाथ उठाकर फरमाया कि "ऐ अल्लाह! हमारे इर्द गिर्द बारिश बरसा। हमपर न बरसा। टीलों, पहाडि़यों, मैदानों , वादियों तथा पेड़ों की उगने की जगहों पर बारिश बरसा।" (सहीह बुखारी, बारिश की दुआ)

वृक्षारोपण की फजीलत बताने वाली कई हदीसें हैं:-

* वृक्ष लगाना सदका है:- इस्लाम के पांच बुनियादी अरकानों में एक जकात भी है। नबी (सल्ल0) के इस हदीस को सामने रखें तो मालूम होता है कि पेड़ लगाना भी खुदा की नजर में सदका या खैरात ही हैं।

- ये हदीस मुस्लिम शरीफ में आई है और हजरत जाबिर से रिवायत हैं कि रसूल (सल्ल0) ने इर्शाद फरमाया, जो मुसलमान दरख्त लगता है, उनमें से जितना हिस्सा खा लिया लिया जाये वह दरख्त लगाने वाले के लिये सदका हो जाता है और जो हिस्सा उसमें से चुरा लिया जाये वह भी सदका हो जाता है (यानि उस पर भी मालिक को सदके का सबाब मिलता है) और जितना हिस्सा उसमें से दरिंदे खा जाते हैं वो भी उसके लिये सदका हो जाता है और जितना हिस्सा उसमें से परिंदे खा जाते हैं वी भी उसके लिये खैरात हो जाता है। (गरज यह है कि जो कोई उस दरख़्त से कुछ भी फल वगैरह कम कर देता है तो वह उस दरख्त लगाने वाले के लिये सदका हो जाता है)

- हजरत कासिम फरमातें हैं कि दमिश्क में हजरत अबुदद्र्दा के पास से एक शख्स का गुजर हुआ। उस वक्त हजरत अबूदद्र्दा कोई पौधा लगा रहे थे। उस शख्स ने हजरत अबुदद्र्दा से कहा, क्या आप भी ये दुनियावी काम कर रहें हैं, हालांकि आप तो रसूल (सल्ल0) के सहाबी हैं? हजरत अबुदद्र्दा ने फरमाया, मुझे मलामत करने में जल्दी न करो, मैंने रसूलल्लाह (सल्ल0) को यह इर्शाद फरमातें सुना है कि जो शख्स पौधा लगाता है और उसमें से कोई इंसान या अल्लाह की मख्लूक में से कोई भी मख्लूक खाती है तो वह उस पौधा लगाने वाले के लिये सदका होता है। (मस्नदे अहमद)

* पेड़ लगाने का अज्र:- पेड़ लगाना सिर्फ पेड़ लगाने वाले को ही फायदा नहीं देता बल्कि उसके फायदे उस पेड़ लगाने की आने वाली कई नस्ले, मुसाफिरों, राहगीरों, परिंदों सबको अपने छांव तले सुकून देता है, आश्रय देता है, जिंदगी देता है, इसलिये पेड़ लगाने वाले की नेकियां खुदा की नजरों में असीम होती है। जिसका इजहार रसूल (सल्ल0) की इन हदीसों में हुआ है:-

- हजरत अबू अय्युब अंसारी रिवायत करतें हैं, रसूल (सल्ल0) ने इर्शाद फरमाया, जो शख्स पौधा लगाता है फिर उस दरख्त से जितना फल पैदा होता है, अल्लाह फल की पैदावार के बकद्र पौधा लगाने वाले के लिये अज्र लिख देंतें हैं।

- हजरत जाबिर रिवायत करतें हैं कि रसूल (सल्ल0) ने इर्शाद फरमाया, जो शख्स बंजर जमीन को काश्त के काबिल बनाता है तो उसे उसका अज्र मिलता है। (इब्ने हव्वान)

- कोई पेड़ लगाता है और उसकी देखभाल करता है तो अल्लाह उसके लिये जन्नत में एक पौधा लगा देता है। (अहमद बिन हंबल)

* पेड़ काटने की मनाही:- इंसान आज अपनी जरुरतों को पूरा करने के एवज में बेतहाशा पेड़ों की कटाई करता चला जा रहा है और प्रकृति के सौंदर्य रुप जंगलों को निर्ममता से नष्ट करता चला जा रहा है जिसके परिणामस्वरुप धरती का तापमान निरंतर बढ़ता चला रहा है और ग्लेशियरों के पिधलने की शुरुआत हो गई है। ओजोन का छिद्र निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। नबी-ए-पाक (सल्ल0) ने इन्हीं बातों के चलते लोगो को अनावश्यक वृक्ष न काटने की ताकीद की थी और कहा था कि अगर किसी कारण से पेड़ काटना पड़े  तो चाहिये कि उसके बदले एक पेड़ लगा दे। अबू हुरैरा से रिवायत है मैनें फतह-मक्का के दिन एक ऐसी बात महफूज की जिसे मेरे कानों ने सुना, दिल ने उसे याद रखा तथा मेरी आंखों ने उसे देखा, जब आपने ये हदीस फरमाई। लिहाजा अगर कोई आदमी अल्लाह और आखिरत पर ईमान रखता है तो उसके लिये जायज नहीं कि वह मक्का में मारपीट करे या वहां के कोई पेड़ काटे (बुखारी शरीफ, किताबुल इल्म)

* नबी (सल्ल0) ने मोमिन की मिसाल पेड़ से दी:-

नबी (सल्ल0) वृक्षों का महत्व और उसकी बिशेषताओं को जानतें थे। वो जानतें थे कि पेड़-पौधे से मानवजाति को कितने लाभ हैं और वह मनुष्यों के लिये कितना आवश्यक है, इन्हीं कारणों से नबी (सल्ल0) ने सच्चे और फरमाबदार मुसलमान की मिसाल पेड़ से दी। ये हदीस इब्ने उमर से रिवायत है, नबी (सल्ल0) ने इर्शाद फरमाया, पेड़ों में एक ऐसा पेड़ है जिसके पत्ते नहीं झड़ते और वह मुसलमान की तरह है। मुझे बताओ वह पेड़ कौन सा है? इस पर लोगों नें जंगली पेड़ों का ख्याल किया। अब्दुल्ला बिन उमर ने कहा , मेरे दिल में आया कि वह खजूर का पेड़ है मगर (बुर्जुर्गो से) मुझे शरम आई आखिर सहाबा (रजि0) ने कहा, आप ही बता दीजिये वह कौन सा पेड़ है? आपने फरमाया, वह खजूर का पेड़ है। (बुखारी शरीफ, किताबुल इल्म) मोमिन के गुणों में एक गुण ये भी है वो दूसरे के दुःखों को दूर करने में लगा रहता है, उसकी ये स्वाभाविक प्रवृति होती है कि वो दूसरों के ऊपर आने वाले संकट को अपने ऊपर ले ले। वृक्ष अपने गुणों के आधार पर मोमिन ही है।

संकट और दुर्भाग्य दूर करने के वृक्ष के गुणों की कद्र सभी धर्मों में समान है। हिंदू परंपरा में अगर किसी कन्या की कुंडली में मंगल दोष है तो विवाह पूर्व उसकी शादी वटवृक्ष से कराई जाती है। इसके पीछे मान्यता ये है कि मंगल दोष के कारण कन्या के वैवाहिक जीवन में उसके पति के ऊपर जो कष्ट आने वाले थे वो उसे उस वटवृक्ष ने अपने ऊपर ले लिया। वृक्षों का स्वभाव ही है कि वो हमारे लिये संकट और दुःख का कारण बनने वाली चीजों को ले लेतें हैं और बदले में हमें जीवन और सौभाग्य प्रदान करतें हैं। दूषित कार्बनडाई ऑक्साइड लेकर हमें जीवनवायु देने वाला वृक्ष हमारे दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिणत कर देता है। ये हदीस इब्ने अब्बास से रिवायत है। उन्होंनें फरमाया कि नबी (सल्ल0) मदीना या मक्का के किसी बाग से गुजरे तो वहां दो आदमियों की आवाज सुनी जिनपर कब्र में अजाब हो रहा था। उस वक्त आपने फरमाया, इन दोनों को अजाब दिया जा रहा है। फिर आपने खजूर की एक जर शाख मंगवाई और उसके दो टुकड़े करके हर कब्र पर एक टुकड़ा रख दिया। आपसे मालूम किया गया, या रसूल (सल्ल0) ! आपने ऐसा क्यों किया? फर्माया, उम्मीद है जब तक ये शाख तर रहेगी इन पर अजाब कम होगा। (बुखारी शरीफ, किताबुल वुजु)

इस हदीस के लब्जी माने को छोड़कर अगर हम जाहिरी माने पर विचार करें तो ये स्पष्ट होता है कि उस व्यक्ति के ऊपर हो रहे अजाब उस खजूर की डाली ने ले लिया और उसका अजाब कम हो गया।

* जीव संरक्षण की तालीम

धरती का तापमान निरंतर बढ़ रहा है, जंगल सिमटते जा रहें हैं जिसके कारण पशु-पक्षियों की कई प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर है। पहले जंगलों में शेर, बाध, चीते जैसे जानवर बहुतायत में पाए जाते थे आज उनकी संख्या अंगुलियों पर गिनने लायक रह गई है। वन्य प्राणी प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में अत्यंत सहायक होतें हैं ये बात अब दुनिया को समझ में आ रही है जब वन्य जीव लुप्त हो रहें है। उनकी धटती संख्या पर्यावरण संतुलन के लिये खतरा पैदा कर रही है। उदाहरण के लिये गिद्ध मृत जीव-जंतुओं को खाता है, और वायुमंडल दूषित होने से बचाता है, पर आज 90 फीसदी से ज्यादा गिद्ध लुप्त हो चुकें हैं। एक बड़े जानवर के लाश को गिद्धों का समूह 20 मिनट में चट कर जाता था पर आज उनकी तादाद नगण्य हो जाने के कारण मरे जानवरों को ठिकाना लगाना चुनौती बनता जा रहा है।

मुहम्मद (सल्ल0) को सारी दुनिया के लिये रहमत बना कर भेजा गया था इसलिये उनकी रहमत की साये में खुदा की बनाई तमाम मख्लूक आती थी । नबी (सल्ल0) की सीरत इस बात की तस्दीक करती है।

- ये हदीस अब्दुल्ला बिन उमर से रिवायत से रिवायत है कि बिल्ली को तकलीफ देने वाली एक महिला के बारे में रसूल (सल्ल0) ने फरमाया था कि यह औरत इस बिल्ली के कारण नरक में दाखिल होगी, जिसने इसे बांध दिया और न ही उसे छोड़ा ताकि वह जमीन के कीड़े-मकोड़े खा सके।

- हजरत अबू हुरैरा से रिवायत एक हदीस है जिसमें वो फर्मातें हैं कि रसूल (सल्ल0) ने एक व्यक्ति को जन्नत की खुशखबरी दी क्योंकि उसने प्यास से हांफ रहे एक कुत्ते को पानी पिलाया था।

- एक बार नबी (सल्ल0) किसी अंसारी के बाग में दाखिल हुये, अंदर एक ऊँट था

जो नबी (सल्ल0) को देखकर आवाज करने लगा और उसकी आँखों से आंसू गिरने लगे तो रसूल (सल्ल0) उसके पास आये और उसकी गर्दन पर हाथ फेरा तो वह चुप हो गया। रसूल (सल्ल0) ने पूछा, इसका मालिक कौन है? एक अंसारी लड़के ने उत्तर दिया कि ये मेरा ऊँट है। तो रसूल (सल्ल0) ने फरमाया, क्या इस जानवर के बारे में तुमको अल्लाह का डर नहीं है। इस ने मुझसे शिकायत की है कि तुम इसे तेज-2 हांकते हो और निरंतर उसके ऊपर भारी बोझ डाले रखते हो। (अबू दाऊद)

- एक बार एक सहाबी नबी (सल्ल0) की खिदमत में हाजिर हुये, उनके हाथ में किसे परिंदे के बच्चे थे जो बेचैनी से चीख रहे थे। नबी (सल्ल0) ने पूछा, ये बच्चे कैसे हैं? सहाबी ने फरमाया, मैं एक झाड़ी के पास से गुजरा तो इन बच्चों की आवाज आ रही थी, तो मैं इनको निकाल लाया। इतनी देर में इन परिंदों की मां भी आकर सहाबी के सर के ऊपर बेचैनी से मंडराने लगी। नबी (सल्ल0) उस सहाबी पर नाराज हो गये और हुक्म दिया कि जाओ और जाकर अभी इन बच्चों को उस जगह पर छोड़ आओ जहां से लाये हो। (अबू दाऊद)

- हजरत अब्दुर्रहमान बिन अब्दुल्ला से रिवायत है, वो फरमातें हैं कि हम लोग एक बार नबी (सल्ल0) के साथ सफर में थे। इस बीच नबी (सल्ल0) हाजत के लिये गये तब तक हम एक चिडि़या देखी जो अपने दो बच्चों के साथ थी। हमने उसके चूजों को पकड़ लिया तो उसकी मां जमीन पर आकर तड़पने लगी, इसी बीच रसूल (सल्ल0) आ गये और फरमाया, किसने इस चिडि़या के बच्चों को तकलीफ दी है? इसके बच्चे को अभी वापस लौटाओ। (अबू दाऊद)

- एक बार कुछ सहाबियों ने चींटियों के एक बिल को जला दिया, यह खबर सुनकर नबी (सल्ल0) बहुत नाराज हुये और गुस्से में फरमाया, किसने इन चीटिंयों को ऐसी तकलीफ दी है? सहाबियों ने कहा, ये हरकत हमसे हुई है। नबी (सल्ल0) ने गुस्से में फरमाया, आग के साथ सिवाए रब्बुल आलमीन के किसी को ये अख्तियार नहीं को वो किसी को आग में जलाये या उन्हें अजाब दे। (अबू दाऊद)

- नबी (सल्ल0) ने फरमाया, जो कोई व्यक्ति बगैर किसी अपराध के किसी गौरैया या उससे बड़े जानवर को मारता है, तो अल्लाह तआला उससे कियामत के दिन इस बारे में उससे सवाल करेगा। (नसाई शरीफ) हमारे पवित्र ग्रंथ वेद में मनुष्य और जीव-जंतुओं के मध्य संबंध बताते हुये कहा गया है,  "मित्रस्यया चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्। मित्रस्यामं चक्षुषा समीक्षामहे।" इस मंत्र में तीन प्रमुख बातें हैं।

प्रथम संपूर्ण जीव जंतु मेरी ओर मित्रता के भाव से देखें। द्वितीय, मैं भी उन्हें मित्र दृष्टि से देखूं और तृतीय हम दोनों एक दूसरे को मित्र दृष्टि से देखें। (यजुर्वेद, 36: 18) मनुष्य और जीव-जंतुओं के बीच अत्यंत प्राचीन काल से ही अन्योन्याश्रय संबंध रहा है। उनकी रचना ईश्वर ने मनुष्यों की भलाई के लिये ही की है। इसलिये अगर प्रकृति का संतुलन बनाए रखना है तो जीव-जंतुओं के प्रति भी हमें दया भाव रखना होगा। उनके जीवन का आधार और आश्रय स्थली जंगलों को बचाए रखना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास हो सकता है। वेद और नबी (सल्ल0) की तालीम इस दिशा में हमारे मार्गदर्शनार्थ सबसे सहायक होगा।

* जल संरक्षण की तालीम

पर्यावरण प्रदूषण की सबसे ज्यादा मार जल स्त्रोतों पर पड़ी है। आज पूरी दुनिया पीने के पानी की किल्लत, सूखती नदियां और दूषित पानी की समस्या से जूझ रही है। आइंसटीन के द्वारा जताई गई आशंका कि तृतीय विश्व युद्ध पानी के लिये लड़ा जाएगा, साकार होने के कगार पर है। जल की खपत कम की जाये, नदियों को प्रदूषण मुक्त रखने की कोशिश हो, पानी को दूषित न किया जाये ये तमाम शिक्षायें मुहम्मद (सल्ल0) ने आज से 1400 साल पहले दी थी। आज उनकी शिक्षाओं से भटकने का परिणाम है कि दुनिया पेय जल की किल्लत, नदियों के प्रदूषण आदि समस्याओं को झेल रही है।

जल ही जीवन है ये तो सामान्य बोलचाल की भाषा में प्रयुक्त होने वाला शब्द है पर जल से जीवन है, ये कुरान से साबित है। पवित्र कुरान कहता है, प्रत्येक जीवन पानी से बना है। इसी तरह सूरह अंबिया में आता है कि अल्लाह ने हर जानदार चीज पानी से बनाई। (सूरह अंबिया, 21:30)

* पानी अल्लाह की तरफ से एक नेअमत:- इस्लाम धर्म में तो पानी का बड़ा आला मुकाम रखा गया है क्योंकि बिना गुस्ल या वुजू के नमाज हो नहीं सकती। इबादत से पूर्व गुस्ल या वुजू करना अनिवार्य रखा गया है यहां तक की रसूल (सल्ल0) ने अपनी एक हदीस में सफाई को आधा ईमान बताया। कुरआन में पानी को न सिर्फ पाक करार दिया गया है बल्कि इसे अल्लाह की तरफ से मनुष्य के लिये एक नेअमत बताया गया है-

- हमने आकाश से पाक पानी उतारा। (सूरह फरकान, 25:48)

- फिर तुमने यह पानी देखा जिसे तुम पीते हो? उसे मेघ से तुमने उतारा है, या हम हैं उतारने वाले? (सूरह वाकिया, 56:68-69)

- कुरान में आता है कि सृष्टि से पूर्व अल्लाह का सिंहासन पानी पर था। (11:7)

* पानी ने मुसलमानों को अजीम नेअमतें दी:-

इस्लाम की तीन अजीम नेअमतें पानी की बदौलत हासिल हुई। हजरत इब्राहीम (अलैहे0) अपनी पत्नी बीबी हाजरा और छोटे बच्चे इस्माइल (अलैहे0) को अल्लाह के आदेश पर मक्का के बियांबान में छोड़ आयें जहां न कोई आबादी थी, न भोजन और न ही कोई जल-स्तोत्र। हजरत इब्राहीम(अलैह0) अपनी बीबी को कुछ चने और थोड़ा पानी देकर वहां से चले गये। जब पानी खत्म हो गया तो भूखे हजरत इस्माइल (अलैहे0) रोने लगे। एक माँ कभी भी अपने बच्चे का रोना नहीं देख सकती, बीबी हाजरा से अपने बच्चे की प्यास  देखी न गई और वो पानी की तलाश में भटकने लगीं। भटकते-2 बीबी हाजरा सफा पर्वत पर चढ़ी, वहां पानी न दिखा तो फिर मरवा पर्वत पर चढ़ी। वहां भी पानी न मिला तो वापस सफा भी आयीं और इस तरह सफा और मरवा के बीच पानी की तलाश में दौड़ती रहीं और सात बार उन्होंनें सफा और मरवा का चक्कर लगाया। उनका ये अमल अल्लाह को इतना पसंद आया कि सफा और मरवा के चक्क्कर को कयामत तक हज करनेवालों के लिये जरुरी आमाल में शामिल फरमा दिया। जब बीबी हाजरा परेशानहाल होकर आई तो देखा कि हजरत इब्राहीम (अलैहे0) के पैरों के पास से एक जलस्तोत्र जारी था (जिसे फरिश्ते जिब्रील ने अपने परों से खोदा था) यही झरना आज आबे-जमजम के नाम से जाना जाता है। पानी मिलने के बाद बीबी हाजरा और हजरत हजरत इस्माईल (अलैहे0) वहीं रहने लगे। इसी दौरान यमन से जुरहम नाम का एक कबीला पानी की तलाश में निकला हुआ था जब उसने अपने आसपास पक्षियों को उड़ता पाया तो उन्हें अंदाजा हो गया कि अवश्य ही आस-पास कोई जल-स्तोत्र है। इसे खोजते-2 जुरहम कबीले वाले वहां तक पहुंच गये जहां बीबी हाजरा रह रहीं थीं और बीबी की इजाजत पर वो कबीले वाले इसी जगह आबाद हो गये। बाद में इसी कबीले की एक लड़की से हजरत इस्माइल का निकाह हुआ। और इन्ही हजरत इस्माइल (अलैहे0) के वंश में आखिरी नबी मुहम्मद (सल्ल0) का जन्म हुआ।

इसका अर्थ ये है कि पानी की खोज ने मोमिनों को चार अजीम नेअमते दी। पहली, सफा मरवा के बीच के दौड़ जैसे हज के महत्वपूर्ण रिवाज। दूसरी आबे-जमजम। तीसरी अल्लाह का मुकद्दस धर आबाद हुआ और चौथा  अल्लाह के एक रसूल की शादी हुई जिस वंश में आगे हजरत मुहम्मद मुस्तफा (सल्ल0) की विलादत हुई। इसलिए ऐसी अजीम फजीलत वाले पानी को दूषित करना अजीम गुनाह है।

* पानी बचाने की तालीम:-

मुहम्मद साहब की पैदाईश जहां हुई थी वो इलाका रेगिस्तान था यानि वहां पानी का बेहद किल्लत थी ! इस कारण नबी (सल्ल0) को पानी का मोल पता था। उनकी सीरत से पता चलता है कि उन्हें पानी की बर्बादी पसंद नहीं थी, वो अपने सहाबियों को हर वक्त ये ताकीद करते थे कि वो पानी का दुरुपयोग न करें।

- अनस से रिवायत है, हमने नबी (सल्ल0) को इस हालत में देखा कि अज्र की नमाज का वक्त हो चुका था, लोगों ने वुजू के लिये पानी तलाश किया, मगर न मिला। आखिर रसूल (सल्ल0) के पास एक बर्तन में वुजू के लिये पानी लाया गया तो आपने अपना हाथ मुबारक उस बर्तन में रख दिया तथा लोगों को हुक्म दिया कि इससे वूजू करें। अनस कहतें हैं कि पानी आपकी अंगुलियों के नीचे से फूट रहा था, यहां तक कि जब लोगों ने वुजू कर लिया। (तफ्सीर में आता है वुजू करने वालों की तादाद 300 के करीब था)

- अबू जुहैफा से रिवायत है, उन्होंनें फर्माया कि एक दिन नबी (सल्ल0) दोपहर के वक्त हमारे यहां तशरीफ लाये। वुजू का पानी आपके पास लाया गया। आपने वूजू फर्माया, फिर आपके वजू के बचे पानी से हम वजू फर्माने लगे और उस पानी को बदन पर मलने लगें।

* पानी को प्रदूषित न करने का हुक्म:-

ये बात कुरान से साबित है कि पानी अल्लाह की नेअमत है जिसे अल्लाह ने पाक ठहराया है। ऐसे में हमें ये हक नहीं है कि हम इस नेमत को नापाक करें। मुहम्मद साहब ने अपने सहाबियों को पानी गंदा न करने की सीख दी। अबू हुरैरा से रिवायत है कि नबी (सल्ल0) ने फर्माया, तुममें से कोई ठहरे हुये पानी में पेशाब न करे क्योंकि मुम्किन है कि उससे फिर गुस्ल करने की जरुरत पड़ जाये। (बुखारी शरीफ, वजू का बयान)

* पानी पाक करने का जरिया है:-अल्लाह की इबादत के लिए मन की पाकीजगी के साथ जिस्म की पाकीजगी की भी जरुरत होती है जो हमें पानी के जरिए हासिल होती है। कुरान मजीद में इस बारे में इर्शाद हुआ है, हे ईमान लाने वालों! जब तुम नमाज के लिए उठो तो अपने मुंह और हाथ केहुनियों तक धो लिया करो, और अपने सिरों पर मस्ह कर लो और अपने दोनों पांव टखनों तक धो लो। और यदि नापाक हो तो नहा कर पाक हो लो। (कुरान, 5:6) नबी करीम (सल्ल0) की एक हदीस में है, इंसान के लिये खाना वरदान हों जाता है अगर वह खाने के पहले और खाने के बाद अपने हाथ धो ले। (तिर्मिजी)

* जागृति के प्रयास और हमारा दायित्व

दुनिया की सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाला मुल्क इंडोनेशिया पर्यावरण परिवर्तन के दुष्परिणामों को झेल रहा है। पिछले दशक में सुनामी का दंश झेल चुका यह मुल्क आज पर्यावरण परिवत्र्तनों के प्रति सबसे अधिक जागरुक है। ग्रीन इस्लाम मुहिम इसी जागरुकता की उपज है। आज इंडोनेशिया की मस्जिदों में जुमे के खुत्बे के दौरान इमाम साहब पार्यवरण के प्रति जागरुकता पैदा करने वाली तकरीर करतें है। वहां की मदरसों में पर्यावरण बिषय की पढ़ाई बिशेष रुप से कराई जाती है, मदरसों के छात्रों के द्वारा वृक्षारोपण अभियान चलाया जाता है। इंडोनेशिया दुनिया का पहला इस्लामी मुल्क है जहां पर्यावरण के प्रति जागरुकता पैदा करने वाले फतवे दिये जातें हैं। इंडोनेशिया का अनुशरण करते हुये ये कोशिश अब मलेशिया में भी आरंभ हो चुकी है।

इस्लाम की तालीमें पर्यावरण संरक्षण और अल्लाह की दी हुई तमाम नेअतमों की हिफाजत करने को हमें प्रेरित करती है। कितनी शर्म की बात है कि अल्लाह ने रसूल ने अपनी एक हदीस में फरमाया था कि तीन चीजों में सबकी हिस्सेदारी है, पानी, आग और धास (अबू दाऊद, किताब-23, हदीस-3470) एक दूसरी हदीस में है कि कियामत के रोज अल्लाह तीन लोगों की बख्शिश से इंकार कर देगा जिनमें एक वो होगा जिसने अपने पास अधिक पानी होते हुये भी किसी मुसाफिर को पानी देने से इंकार किया होगा। यानि पानी भी उन नेअमतों में से है जिस किसी का हक नहीं है, अगर कोई मांगे तो उसे देने से इंकार नहीं किया जा सकता मगर आज हमारे देश को सीलबंद पानी बेचनेवाली कंपनियां लूट रहीं है। हमारे ही पानी को जिस पर खुदा ने किसी का हक नहीं रखा हमीं को बेच कर हमारे ही देश को खोखला कर रही है और हम बैठे तमाशा देख रहें है। नबी (सल्ल0) ने फरमाया था कि कोई मोमिन अगर कोई गलत काम होता देखे तो उसे अपने हाथों से रोक दे, अगर हाथ से नहीं रोक सकता तो जुबान से रोक दे। मगर आज हम पानी के व्यापारियों के खिलाफ मुंह भी नहीं खोल पा रहें हैं।

रसूल (सल्ल0) ने अपनी एक हदीस में फरमाया, "अल्लाह ने तमाम धरती को मस्जिद और पाक करने वाली बना दी। (बुखारी शरीफ, वुजु का बयान) अगर खुदा ने हमारी इस प्यार धरती को हमारे लिये मस्जिद का दर्जा दिया और पाक करार दिया तो क्या हमें ये हक है कि हम प्रदूषण फैला कर इसे नापाक करें ?"आज भारत के सामान्य मुसलमानों में पर्यावरण, गंगा प्रदूषण, हिमालय प्रदूषण आदि मुद्दों पर सामने आकर मुखर होने के प्रयास का अभाव दिखता है। गंगा और हिमालय चूँकि हिंदुओं की आस्था से जुड़े हैं इसलिये मुसलमान गंगा अथवा हिमालय प्रदूषण के मुद्दे पर खड़ा नहीं होता पर ऐसा करते वक्त वो भूल जाता है कि नदी अपना पानी मजहब देखकर नहीं देती, प्रकृति अपना सौंदर्य किसी खास मजहब वालों को ही नहीं दिखाता। अगर सूर्य को अर्ध्य देने के लिये हिंदुओं को पानी चाहिये तो पानी से वुजू करना मुसलमान की भी जरुरत है। प्रकृति से प्रेम करना, खुदा की बनाई मख्लूकों को अपने रहमत में साए में रखना और कुदरत की दी हुई नेमतों को संभालना हम सब का साझी जिम्मेदारी है, अपने महान पूर्वजों की परंपरा का पालन करना है और सारी इंसानियत के लिये रहमत बनाकर भेजे गये मुहम्मद (सल्ल0) की सुन्नत पर अमल करना है।

पर्यावरण को लेकर सोचने वाले तमाम लोगों का ये मत है कि पर्यावरण संरक्षण को यदि धर्म के साथ जोड़ दिया तो जनता अधिक जागरुक हो सकती है, इंडोनेशिया ने इस बारे में शुरुआत कर दी है, अब हमारे हमवतन मुसलमानों और हिंदुओं की ये जिम्मेदारी बनती है कि वो वेद, अपने महान पूर्वजों तथा कुरान और नबी (सल्ल0) के आदेशों पर चलते हुये पर्यावरण संरक्षण की कोशिश में लग जायें और निरंतर प्रदूषित हो रही गंगा और हिमालय को बचाने के प्रयासों में जुट जायें। इस दिशा में सबसे बेहतर ये होगा कि हम धार्मिक पर्व त्याहारों, जन्मदिन, विवाह बर्षगांठ आदि के अवसर पर कम से कम एक वृक्ष लगाने का संकल्प लें, एक दूसरे को उपहार में पर्यावरण मित्र कहलाने वाले और औषधीय गुणों से भरपूर रैहान (तुलसी) का पौधा भेंट करें,  मदरसों, स्कूल, कॉलेजों , धार्मिक प्रवचन और खुत्बों के माध्यम से गंगा व अन्य नदियों के जल सरंक्षण, वन्य जीव संरक्षण व हिमालय प्रदूषण के प्रति जागरुकता पैदा करें और ईश्वर के उस विश्वास को और उसकी अपेक्षाओं को पूरा करें जिसके लिये उसने हमें रचा है। कुरान की आयत है,  "ऐ आदम की संतान! हर इबादत के अवसर पर अपनी सज्दा से सुशोभित रहो, खाओ-पीओ और सीमा से आगे न बढ़ो। अल्लाह सीमा से बढ़ने वालों को पसंद नहीं करता।"

अभिजीत मुज़फ्फरपुर (बिहार) में जन्मे और परवरिश पाये और स्थानीय लंगट सिंह महाविद्यालय से गणित विषय में स्नातक हैं। ज्योतिष-शास्त्र, ग़ज़ल, समाज-सेवा और विभिन्न धर्मों के धर्मग्रंथों का अध्ययन, उनकी तुलना तथा उनके विशलेषण में रूचि रखते हैं! कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में ज्योतिष विषयों पर इनके आलेख प्रकाशित और कई ज्योतिष संस्थाओं के द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकता की कोशिशों के लिए कटिबद्ध हैं तथा ऐसे विषयों पर आलेख 'कांति' आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। इस्लामी समाज के अंदर के तथा भारत में हिन्दू- मुस्लिम रिश्तों के ज्वलंत सवालों का समाधान क़ुरान और हदीस की रौशनी में तलाशने में रूचि रखते हैं।

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/abhijeet-अभिजीत/islam-and-enivironment-इस्लाम-और-पर्यावरण/d/66464

 

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