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Hindi Section ( 30 May 2014, NewAgeIslam.Com)

Indian Muslims and Pakistan भारतीय मुसलमान और पाकिस्तान

 

 

अभिजीत, न्यु एज इस्लाम

31 मई, 2014

 

14 अगस्त 1947, मानव इतिहास का सबसे शर्मनाक दिन था क्योंकि इस दिन कुछ लोगों की राजनीतिक महत्वकांक्षाओं और क्षुद्र स्वार्थों ने लाखों लोगों की जिंदगियां छीन ली थी, हजारों माताओं की गोद सूनी कर दी थी, कई कन्याओं की अस्मत लूट ली थी और हजारों-लाखों बच्चों को अनाथ कर अपनी मातृभूमि का विभाजन कर दिया था! और तो और ये तमाम धृणित काम इन स्वार्थियों ने इस्लाम के नाम पर किया था। उस इस्लाम के नाम पर किया था जिसका अर्थ सलामती है और जिसे लाने वाले को रहमतों का समंदर और अमन का राजकुमार कहा जाता है। पाकिस्तान के नाम पर बने इस मुल्क के दौरान हुई मारकाट में 10 लाख से अधिक जानें गई थी। मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में भारत विभाजन की त्रासदी सर्वोच्च है।

पूर्वजों के अपराधी:-

सत्ता के लालचियों ने इस्लाम को आधार बनाकर खुद को न केवल उस भूमि से काट लिया था बल्कि उसे नापाक भी धोषित कर दिया था जिस मुल्क की मिट्टी में इनके पूर्वक दफन हुये थे, जहां की पवित्र मिट्टी में ख्वाजा गरीब नवाज और इस्लाम के सैकड़ों आबिद और बुर्जुग लेटे हुयें थे, जहां की धरती कयामत के रोज उनके सज्दों की गवाह बनने वाली थी, जहां हजरत बाबा आदम (अलैहे0) के कदम पड़े थे, जहां से हज, नमाज और रोजे जैसे इस्लाम के बुनियादी अरकान शुरु हुये थे, जहां की पवित्र धरती की फिजाओं में तौहीद की पहली सदा आई थी, जहां के आसमानों पर हजरत मोहम्मद (सल्ल0) का पवित्र नाम सबसे पहले जाहिर हुआ था, जहां मानव इतिहास की पहली नमाज पढ़ी गई थी, जहाँ काबे के स्थापित हजरे-अस्वद जन्नत से उतरा था, जो जालिमों से धिरे नबी के नवासे के सपनों का वतन था और जहां से नबी-ए-पाक (सल्ल0) को वलियों की खुश्बू आती थी।

पाकिस्तान बनाकर और वहां हिजरत कर जाने वाले तो पाकिस्तान चले गयें पर कब्रों में दफन उनके पूर्वज आज भी हिंदुस्तान की जमीन में लेटे हुये हैं और हर शबे-बरात पर अपने वारिसों के इस कृत्य पर अफसोस करते हुये पूछतें हैं कि मेरा क्या गुनाह था कि तू इस दिन मेरी मग्रिफत की दुआ करने मेरी कब्र पर नहीं आया ? मजहब के नाम पर पाकिस्तान लेने वालों और वहां हिजरत करके जाने वाले रोजे-कयामत को क्या अपने पूर्वजों से नजर मिला सकेंगें? उस दिन इससे बड़ी भी उनके लिये कोई जिल्लत की बात होगी कि हिंदुस्तान को अपना मुस्तकबिल बनाने वाले उनके भाईयों के पूर्वज अपने वंशजों की वजह से तो मग्रिफत पा जायेंगें पर पाकिस्तान हिजरत करने वालों के दादा-परदादा इससे वंचित रह जायेंगें। अगर पाकिस्तान बनाने वाले स्वार्थी जमातों के मन में अपने बाप-दादाओं के प्रति थोड़ा भी सम्मान होता तो पाकिस्तान कभी न बनाया जाता।

बंटवारा: मुसलमानों के लिये अभिशाप:-

भारत-पाकिस्तान विभाजन का सबसे ज्यादा नुकसान मुसलमानों को ही हुआ। अगर भारत का विभाजन न हुआ तो इस क्षेत्र में मुसलमान अपनी आबादी के हिसाब से एक बड़ी ताकत बनकर उभरते। विभाजन ने मुसलमानों को तीन हिस्सों में तक्सीम कर दिया। इसका खामियाजा मुसलमानों को इस रुप में भुगतना पड़ा कि आज पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले मुसलमानों की हालत एकदम जर्जर है, आजादी के वक्त पाकिस्तान की हालत जर्जर नहीं थी पर भारत के मुकाबले मजहब का दामन थामने के कारण पाकिस्तान विकास की दौर में निरंतर पिछड़ता चला गया। आज हिंदुस्तान जहां दुनिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में है वहीं पाकिस्तान की गिनती दुनिया के फिसड्डी मुल्कों में होती है। वह सर से पांव तक विश्व बैंक और अमेरिका का कर्जदार है जिसके नतीजे में अमेरिका कभी भी उसके मुल्क में धुसकर ड्रोन हमले कर देता है और उसके नागरिकों का कत्लेआम करता है। वहां राजनीतिक अस्थिरता है, नागरिकों की आबरु और जान-माल खतरे में है। एक लेखक ने पाकिस्तान की हालत पर टिप्पणी करते हुये बिलकुल सही लिखा था कि आज पाकिस्तान में पांच हाथी हैं जो हर वक्त आपस में लड़ते रहतें हैं, पंजाबी, पख्तून, सिंधी, बलूच और मुहाजिर। इनके आपसी इख्तेलाफ में नागरिकों की सुरक्षा और देश के विकास की बातें नदारद हो चुकीं हैं।

खुशकिस्मत हैं वो जो पाकिस्तान नहीं गये:-

हिंदुस्तान में मोहब्बत, अम्न और भाईचारा का पैगाम देने वाले मुस्लिम विद्वानों को सर-आंखों पर बिठाया जाता है, मुसलमान तो मुसलमान हिंदू भी उनके कदमों तले बैठकर किसी मसले पर रहनुमाई हासिल करतें हैं पर पाकिस्तान में अमन और मोहब्बत (जो इस्लाम की मूल तालीम है) की बात करने वालों को या तो कत्ल कर दिया जाता है या उन्हें इतना सताया जाता है कि वो खुद ब खुद वतन छोड़ देतें हैं। अल्लामा जावेद अहमद गामदी को वतन छोड़ कर जाना पड़ा क्योंकि उन्होंने कट्टरपंथियों की मुखालफत की थी, अगर वतन छोड़कर न जाते तो हकीकी इस्लाम को बचाने की कोशिश में शहीद होने वालों के सूची में उनका नाम भी शामिल हो जाता। इसी तरह ओसामा बिन लादेन के तथाकथित जिहाद की तमाम दलीलों को गैर इस्लामी और आत्मधाती हमला को हराम बताने वाले मौलाना ताहिरुल कादरी के ऊपर कुफ्र के फतवे लगाये गये।

पकिस्तान की वर्तमान हालत किसी गैर-मुस्लिम मुल्क नहीं बल्कि सऊदी अरब से प्रकाशित होने वाले सबसे प्रतिष्ठित अखबार दैनिक 'अरब न्यूज' ने बयान की जो रियाद, जेद्दा और दम्माम से प्रकाशित होता है। इस अखबार पर सऊदी सरकार का वरदहस्त है।

न्यू ऐज इस्लाम (1जुलाई, 2013) पर प्रकाशित अपने लेख में लेखक मोहम्मद इजहारुल हक ने इस अखबार में पाकिस्तान के संदर्भ में प्रकाशित आलेख का हवाला देते हुये जो लिखा  है, उसका सार-संक्षेपण इस तरह हैः-

सऊदी सरकार दो देशों को बहुत अहमियत देता है, एक पाकिस्तान और दूसरा मिश्र। ये दोनों मुल्क सऊदी अरब के दो हाथ हैं। मिश्र में हुये हालिया परिवर्तनों के बाद उसको लेकर तो अरब निश्चिंत हो गया है पर पाकिस्तान को लेकर उसकी चिंता बनी हुई है, क्योंकि वहां के हालात बुरी तरह बिगड़ चुकें हैं। सऊदी अरब जानता है कि पाकिस्तान की समस्या वित्तीय समस्या नहीं है, क्योंकि जितना पैसा उसे दिया जायेगा सब व्यर्थ चला जायेगा। अखबार अमेरिका की मिसाल देते हुये लिखता है कि पिछले कुछ बरसों से अमेरिका पाकिस्तान को दो अरब डाॅलर की सहायता दे रहा है, मगर कोई चमत्कार पैदा नहीं हुआ और हिंसा, गरीबी, भष्ट्राचार और नाकामी का मनहूस दायरा लगातार फैल रहा है। मिश्र में उम्मीद की किरण दिख रही है पर ऐसी कोई किरण दूर-2 तक पाकिस्तान में नहीं दिखता, अगर कोई रौशनी है तो उस आग की है, जो आत्मधाती हमलावर लगाते फिरते हैं और जिसके शोले चारों तरफ फैल रहें हैं। अखबार आगे लिखता है कि असली समस्या पाकिस्तान के मनःस्थिति की है, एक तरफ जहां आंकड़े ये बतातें हैं कि पाकिस्तानियों में आयोडीन की जर्बदस्त कमी है जिसके कारण वो कई तरह की गंभीर बीमारियों मसलन गर्भपात, थायरायड, मानसिक अस्थिरता आदि के शिकार हैं, मगर वो आयोडीन का इस्तेमाल इसलिये नहीं करते क्योंकि उन्हें ये लगता है पाकिस्तान के खिलाफ पश्चिम और भारत की संयुक्त साजिश है। पाकिस्तान की बदहाली का एक बड़ा कारण ये भी है कि उसकी अवाम स्वस्थ नहीं है। अखबार ने पोलियो का भी जिक्र किया कि पाकिस्तान के कट्टरपंथी संगठन पोलिया बहिष्कार को लेकर कत्लेआम पर भी उतर आयें हैं। सऊदी अरब, मिश्र समेत कई मुस्लिम देशों में पोलियो उन्मूलन अभियान अत्यंत सफल हुआ है पर पाकिस्तान में ये अभियान पूरी तरह नाकाम हो गया। पोलियों उन्मूलन तो दूर उल्टा वहां पोलियो पीडि़तों की तादाद बढ़ती जा रही है।

पाकिस्तान में व्याप्त इस चौतरफा तबाही के लिये अखबार ने जनरल जियाउल हक के शासन को जिम्मेदार ठहराते हुये लिखा कि उनके शासनकाल में पाकिस्तान में जेहादी विचारधारा फैली और दुनिया भर से जेहादी आकर पाकिस्तान की अफगान सीमा पर आबाद हो गये, फिर यही कश्मीर के मामले में भी दुहराया गया। बकौल अखबार पाकिस्तान की सबसे बड़ी त्रासदी उग्रवाद है जो हद से ज्यादा बढ़ चुका है। इराक के बाद सबसे ज्यादा आत्मधाती हमला यहीं हो रहा है। ये आत्मधाती हमला मस्जिद, बाजार और तमाम सार्वजनिक स्थानों पर किये जा रहें हैं और ये केवल सैनिकों के खिलाफ ही नहीं है।"

मोहम्मद इजहारुल हक ने इस आलेख को असाधारण बताते हुये लिखा कि इस आलेख का अंतिम पैरा इस लायक है कि इसका सार नहीं बल्कि पूरा अनुवाद पेश किया जाये,

"पाकिस्तानी (उलेमा) इस बारे में कुछ करने की क्षमता नहीं रखते। जो आवाज बुलंद करतें हैं और तालिबान की आलोचना करतें हैं, मार दिये जातें हैं, उलेमा का एक और बड़ा समूह अवसरवादी है और धर्म को राजनीति में इस्मेताल करता है। ये उलेमा तालिबान के अपराधों के बारे में खामोश रहतें हैं ताकि सरकार के साथ अपने झगड़े में उन्हें इस्तेमाल करें। एक तीसरा समूह भी है जिसने आराम को चुना है और खामोशी को अपनाये हुये है।"

पाकिस्तान की ये हकीकत और वर्तमान स्थिति उस मुल्क के पत्रकार का आकलन है जिसके पाकिस्तान का हितैषी होने को लेकर कोई शुब्हा नहीं हो सकता। भूख, गरीबी, अशिक्षा, जाहिलीयत, कट्टरपंथ, फसाद और राजनीतिक अस्थिरता वाला पाकिस्तान आज एक ऐसी बंद गली में आकर खड़ा है जिससे बाहर आने की कोई सूरत नहीं दिखती। ऐसे में अगर जफर आगा जैसे मुस्लिम बुद्धिजीवी अपने आप को खुशकिस्मत मानतें हुये ये कहतें हों तो इसमें आश्चर्य क्या है, जफर कहतें हैं, हिंदू भारत में रहने वाले 15 करोड़ मुसलमान कम से कम फिलहाल तो पाकिस्तानी मुसलमानों से कहीं ज्यादा सुरक्षित हैं। इसलिये तो मैं कहता हूँ कि हमारे माँ-बाप का हमपर बड़ा एहसान है कि उन्होनें अकीदे के जुनून में पाकिस्तान जाने की गलती नहीं की और लोकतांत्रिक हिंदुस्तान को अपना वतन कबूल किया, जहां आज नहीं तो कल हम तरक्की करेंगें। ज्रा सोचिये अगर आपके और हमारे माँ-बाप गलती से पाकिस्तान चले गये होते तो आज हमारा और हमारे बच्चों का क्या हाल होता? शायद हम भी दीवाने पाकिस्तानी जेहादियों की तरह हाथ में ए0 के0 47 लटकाये इस्लामी हुकूमत की तलाश में मासूमों का खून बहा रहे होते। अगर हम इस दीवानगी में बच भी जाते तो बहुत संभव था कि हमारे बच्चे तालिबानियों के बहकाबे में आकर आत्मधाती हमलावर बन खुदा न खास्ता कितने मासूमों का खून बहाते और खुद भी जान से जाते।

जावेद अख्तर की भी मुसलमानों को यही सलाह है कि वो एक बार पाकिस्तान होकर आये फिर वो यहां आकर इस मुल्क की मिट्टी को चूमने लगेंगें।

पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर बना था पर इसके बाबजूद करोड़ों मुसलमान थे जिन्होनें अपना मुस्तकबिल हिंदू बहुल भारत में देखा। मौलाना आजाद और देबबंद के उलेमाओं ने तो पाकिस्तान निर्माण का खुलकर विरोध किया था। शायद उन्हें मालूम था कि सिर्फ मजहब से मुल्क नहीं बनता। उनकी ये सोच 1971 में बाँग्लादेश बनने के साथ हकीकत में तब्दील गई। मजहबी उन्माद और भाईचारा हिंदुस्तानी तहजीब के आगे हार गया। पश्चिमी पाकिस्तानियों के साथ पूर्वी पाकिस्तान के मुसलमानों की मजहबी भाईचारा अपने बांग्लाभाषी हिंदू भाईचारा के आगे कहीं खड़ा न हो सका। मुस्लिम बहुल बांग्लादेश अपने ऊपर शासन करने वाले अपने ही मजहबी भाईयों से इतना उकता गया कि उसने लाखों शहादतें दे देकर पाकिस्तान से खुद को मुक्त कर लिया।

उर्दू के मशहूर व्यंगकार और शायर इब्ने इंशा पाकिस्तान चले गये थे, पर जल्द ही उकता कर वहां से वापस आ गये। किसी ने पूछा, वापस क्यों आ गये? इंशा का जबाब था, वहां सबकुछ तो ठीक है पर वहां मुसलमान बहुत हैं। मजहब इंसान के सांस्कृतिक खालीपन को नहीं भर सकता, अगर भर सकता होता तो इंशा कभी लौट कर हिंदुस्तान नहीं आते। यह हिंदुस्तानी तहजीब है जो मुसलमानों को पाकिस्तान या किसी और इस्लामिक मुल्क में हिजरत करने देती। वो जानतें हैं कि मजहब को आधार बनाकर हिजरत करना उनकी मजहबी भावनाओं को तो तृप्त कर देगा पर सांस्कृतिक खालीपन को कभी न भर पायेगा।

दारुल अमन है हिंदुस्तान:-

जिस मुल्क में मुसलमानों को उनके मजहबी अकीदे के कारण परेशान नहीं किया जाता और जहां उन्हें मजहब के अरकानों को पूरा करने की पूरी छूट मिलती है, इस्लाम की परिभाषा में वो मुल्क दारुल-अमन की परिभाषा में आता है। अगर दारुल-अमन की इस परिभाषा को मानी जाये, फिर तो पाकिस्तान के मुकाबले हिंदुस्तान इस श्रेणी में आता है क्योंकि बहुसंख्यक हिंदुओं वाले इस मुल्क का संविधान मुसलमानों के मजहबी अकीदे का न केवल सम्मान करता है वरन् उन्हे उनके अकीदे के लिहाज से अपने मजहब पर अमल करने की पूरी छूट और सहूलियत भी देता है जबकि इस्लाम के नाम पर बने पाकिस्तान मे मुसलमानों का कोई भी फिरका आज सुरक्षित नहीं है। पहले अहमदियों को काफिर धोषित कर उनका कत्लेआम किया गया और अब शियाओं को निशाना बनाया जा रहा है। वहां नमाज पढ़ने के दौरान नमाजियों को गोलियों से भून दिया जाता है, ताजिया और मुहर्रम के जुलूसों पर आत्मधाती हमले किये जातें हैं, नमाज पढ़ने के तरीकों को लेकर वाद-विवाद और खून-खराबा होते रहतें हैं। भारत में शायद ही कोई धटना धटिट हुई होगी जब नमाज पढ़ने वाले मुूसलमानों के ऊपर किसी ने गोली चलाई होगी। यहां तक की जहां पूरा इस्लामी विश्व शिया-सुन्नी मतभेदों से जूझ रहा है वहीं हिंदुस्तान के शिया और सुन्नी साथ नमाज पढ़ने के लिये आपसी सहमति बना लेते हैं।

पाकिस्तानी अवाम की सुरक्षा आज खुदा के भरोसे ही है क्योंकि हुकूमत न तो कट्टरपंथियों पर लगाम पा रही है और न ही उसमें ड्रोन हमले करने को वाले अमेरिका को रोकने का साहस है। कट्टरपंथी मौलाना शासनतंत्र पर बुरी तरह हावी है और महिलाओं की स्थिति और भी नारकीय है। पाकिस्तान में जब अहमदियों को गैर-मुस्लिम धोषित किये जाने का आंदोलन चल रहा था तब वहां सरकार ने मुनीर कमीशन नाम से एक आयोग गठित किया था। इस आयोग ने अपनी रिर्पोट में जो बातें कहीं वह पाकिस्तान में इस्लाम और मुसलमानों की हालत बयान कर देता है। मुनीर ने अपनी रिर्पोट में कहा कि अगर पाकिस्तान में मौजूद इस्लाम के तमाम फिरके के मौलानाओ की परिभाषाओं को मान लिया जाये तो फिर पाकिस्तान में कोई मुसलमान ही नहीं बचेगा क्योंकि हर फिरके के उलेमाओं ने अपने मानने वालों के अलावा तमाम दूसरे फिरके वालों को काफिर और मुरतद धोषित कर रखा है। अहमदियों को गैर-मुस्लिम करार दिलवाने के लिये किये जा रहे आंदोलनों में शियाओं ने भी भाग लिया था पर आज उन्हीं शियाओं के साथ पाकिस्तान में दोयम दजे का व्यवहार किया जाता है, आये दिन उनका कत्लेआम किया जाता है और उन्हें भी अहमदियों की तरह काफिर धोषित किये जाने की मांग उठाई जाती है। वहीं इसके उलट भारत में इस्लाम के मानने वाले तमाम फिरकों के लोग अमल और सूकून के साथ जिंदगी गुजार रहे हैं। कभी किसी को उसके मजहबी अकीदे के कारण प्रताडि़त नहीं किया जाता और न ही मुसलमान होने के कारण उनके साथ किसी तरह का भेदभाव होता है। भारत दुनिया का अकेला मुल्क है जहां इस्लाम के तमाम फिरकों की नफरत कभी वैचारिक मतभेद से आगे जाकर खून-खराबे तक नहीं पहुँची। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अल्तमश कबीर ने एक कार्यक्रम में ये बात कही थी कि हिंदुस्तान दुनिया के चंद मुल्कों में से एक है जो अपने अक्लियतों को भी तरक्की के तमाम अवसर प्रदान करता है इस्लाम का सबसे अच्छा रुप भी भारत में ही दिखता है। चंद गुमराहों को छोड़ दे तो कुल मिलाकर दुनिया भर में जेहाद के नाम पर चलाये जा रहे आतंकी संगठनों में भारतीय मुसलमानों की उपस्थिति नदारद है। वहीं पाकिस्तान का युवा गुमराह होकर जेहादी गतिविधियों में लिप्त है।

भारतीय अभिनेता शाहरुख खान को पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने जब पाकिस्तान आकर बसने का आमंत्रण देकर ये साबित करना चाहा कि हिंदू बहुल भारत में मुसलमानों के जान माल की हिफाजत नहीं हो सकती तो उनके इस बयान ने राष्ट्रवादी मुसलमानों को आगबबूला कर दिया। इस मसले पर इन मुसलमानों की प्रतिक्रियाओं ने ये साबित कर दिया कि वो कोई और पीढ़ी थी जिसके मन में पाकिस्तान को लेकर मुहब्बत थी। इस मसले पर पाकिस्तान के उस बयान को लेकर उन्हें लताड़ने वाले कई बयान आये। प्रसिद्ध सुन्नी धर्मगुरु मौलाना खालिद रशीद फिरंग महली ने पाकिस्तान को चेतावनी देते हुये कहा कि वो भारत के आंतरिक मामलों में दखल न दे क्योंकि इस मुल्क का मुसलमान यहां पूरी तरह सुरक्षित है और इज्जत की जिंदगी जी रहा है और मुझे नहीं लगता कि हिंदुस्तान में कभी किसी को मुसलमान होने का खामियाजा भुगतना पड़ा है। उन्होंनें पाकिस्तान को अपने गिरेबान में झांकने की नसीहत दी और कहा कि पाकिस्तान में इसी मुसलमानों का रोज कत्लेआम हो रहा है इसलिये मलिक को वहां के मुसलमानों की चिंता करनी चाहिये। इसी तरह मौलाना आगा खान रुही ने कहा कि दाऊद को पनाह देने वाला पाकिस्तान अपना मुँह बंद रखे और शाहरुख या किसी अन्य मुसलमान की चिंता न करे। अपने देश में मुस्लिम आतंकवादियों का पनाह देने वाला मुल्क किसी की हिफाजत नहीं कर सकता। रहमान मलिक को चाहिये कि वह कराँची में रह रहे दाऊद और दूसरे आतंकियों से अपने मुल्क को बचाये।

पाकिस्तान की नजर में भारतीय मुसलमान:-

जब कश्मीर पर कब्जे की ख्वाहिश जन्मती है तो पाकिस्तान अपने आपको इस रुप के दिखाता है मानो भारत मुसलमानों के लिये जहन्नम है और पाकिस्तान जन्नत और इसी आधार पर वो भारतीय मुसलमानों की हिंदुस्तान के प्रति निष्ठा डिगाने की कोशिश करता है। मगर हकीकत ये है कि जिस पाकिस्तान ने आज तक उन मुसलमानों को नहीं अपनाया जो हिंदुस्तान से वहां हिजरत करके गये थे वो भारतीय मुसलमानों की क्या चिंता करेगा? दरहकीकत भारतीय मुसलमानों के लिये फिक्रमंद होना तो दूर उल्टा वह उन्हें दुनिया और हिंदुस्तान की कानून की नजरों में गद्दार, देशद्रोही और दहशतगर्द साबित करना चाहता है। जब मुबई हमले के बाद पाकिस्तान दुनिया के सामने अपने गुनाहों के कारण चेहरा छिपा रहा था तब अपनी छवि बचाने के लिये उसने भरतीय मुसलमानों का सहारा लिया। अपनी कालिख उसने भारत के बेगुनाह मुसलमानों के कपड़े से पोछने की कोशिश की। इस हमले के कारण पाकिस्तान पर जो आरोप लग रहे थे, उससे अपने बचाव के लिये उसने अंतराष्ट्रीय बिरादरी के सामने भारतीय मुसलमानों को बदनाम करना शुरु कर दिया। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि "उनके पास जो सूचनायें हैं उसके अनुसार हिंदुस्तान के शहर मुंबई पर हुये हमले में कम से कम 40 हिंदुस्तानी मुसलमानों ने हमलावरों की मदद की थी।" पाकिस्तान के इस अमल से कई सवाल उठते हैं मसलन, क्या अपने इस बयान के द्वारा क्या पाकिस्तान भारतीय मुसलमानों को पुलिस और जांच ऐजेंसियों के जांच केे दायरे में लाने का काम नहीं कर रहा है? क्या पाकिस्तान का ये बयान उन लोगों के आरोपों को बल नहीं देगा जिनकी नजर में भारतीय मुसलमानों की वतनपरस्ती संदिग्ध है?

जाहिर है कि पाकिस्तान की मंशा न केवल भारतीय मुसलमानों को बदनाम करने की है बल्कि वो ये भी चाहता है कि इन आरोपों के कारण सुरक्षा ऐजेंसिया मुसलमान युवकों को हिरासत में ले और उनके अंदर भारत सरकार और कानून व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश पैदा हो, जिसका इस्तेमाल वो भारत के खिलाफ कर सके।

हकीकत तो ये है कि पाकिस्तान को मुसलमानों से कोई मुहब्बत नहीं है, अगर होती तो वो रोज कत्ल होते अपने मुल्क के लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करता, बांग्लादेश में अपने ही हममजहबों का कत्लेआम नहीं करवाता, न ही वहां की महिलाओं के साथ बलात्कार करता। मुसलमानों को लेकर वेदना होती तो अपने लोगों और अफगानिस्तान पर हमले करने वाले अमेरिका की गोद में जाकर न बैठता और न ही अपने कसाब को बचाने के लिये निर्दोष भारतीय मुसलमानों की जिंदगियां और भबिष्य तबाह करने की कोशिश करता।

पाकिस्तान परस्त आतंकवादियों के द्वारा देश में जो बम-विस्फोट करवाये जातें हैं, वो बम मजहब पूछ कर नहीं फोड़े जाते। इन बम धमाकों में मुसलमान भी मरतें हैं, उनकी महिलायें भी विधवा होतीं हैं और उनके बच्चे भी अनाथ होतें हैं। पाकिस्तान की शह पर चलाये जा रहे जेहाद ने सबसे अधिक कश्मीरियों का ही नुकसान किया है। इस्लाम के नाम पर बना पाकिस्तान जहां आज इस्लाम की बदनामी और मुसलमानो की बदहाली का मर्कज बना हुआ है, वहीं हिंदुस्तान मुसलमानों के लियेे हर लिहाज से स्वर्गतुल्य है।

इस्लाम, भारत और पाकिस्तान:-

भारत से अलग होने की सबसे बड़ी वजह ये बताई जाती थी कि मुसलमान हिंदू अक्सरियत वाले इस मुल्क में अपने मजहबी अकीदों का ठीक तरह से पालन नहीं कर पायेंगें, इसलिये जब पाकिस्तान बना तो बड़े-2 दावे किये गये कि ये मुल्क मुसलमानों के लिये जन्नत होगा, अमन की जगह बनेगा और मुसलमानों को हिंदुओ की गुलामी नहीं करनी पड़ेगी। ये सारे दावे और स्वप्न धूल-घूसरित हो गये। आज पाकिस्तान बने हुये 6 दशक से अधिक का समय बीत चुका है, अगर भारत और पाकिस्तान में इस्लाम बिषय पर चर्चा की जाये तो पाकिस्तान जहां आज इस्लाम के बदनामी का मर्कज बना हुआ है वहीं हिंदुस्तान इस्लाम और मुसलमानों को शान को दुनिया में और बढ़ा रहा है। अलकायदा जैसे संगठनों को जहां सबसे ज्यादा लड़ाके पाकिस्तान मुहैया कराता है वहीं अलकायदा सरगना अपने फौज में किसी भारतीय मुसलमान को देखने को तरस जाता है।

कुरआन शरीफ की पहली आयत ने मुसलमानों को इल्म हासिल करने का निर्देश दिया था और मुहम्मद (सल्ल0) ने इल्म हासिल करने को हर मुसलमान पर फर्ज करार दिया था। नबी (सल्ल0) के आदेश को हिंदुस्तान ने सर आंखों पर लिया परिणामस्वरुप जहां हिंदुस्तान में जामिया मिलिया, उस्मानिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविधालय जैसे विश्व प्रसिद्ध शैक्षणिक इदारे हैं वहीं पाकिस्तान के युवाओं के सामने उच्च और उम्दा तालीम हासिल करना चुनौती बनता जा रहा है।

इस्लाम के नाम पर बने मुल्क पाकिस्तान में आम आदमी तो क्या हुक्मरान तक को सुकून की जिंदगी तो दूर सुकून की मौत भी नसीब नहीं होती। आज हिंदुस्तान की धरती मुसलमानों के खून से गीली नहीं होती पर पाकिस्तान में शायद ही कोई दिन गुजरता है जब वहां किसी मुसलमान का खून नहीं बहता। रसूल अल्लाह के पाक नाम पर वहां के आतंकी अपने संगठन चलातें हैं।

सर्वपंथ समादर भाव वाले भारत के उदारमना हिंदुओं के बीच मुसलमान बेहद सुकून और अमन के साथ है, इनके लिये हिंदुस्तान ही दारुल-अमन है। जहां हमारा देश का निजाम बेहतरीन लोकतंत्र की मिसाल के रुप में पेश किया जाता है वहीं पाकिस्तान में किसी को समझ नहीं आ रहा है कि पाकिस्तान का मुस्तकबिल कौन संवार सकता है, फौज, नेता या फिर जेहादी? पाकिस्तान के अस्तित्व का एकमात्र आधार भारत से नफरत है, उसके नेताओं की राजनीति का बुनियाद भारत विरोघ पर ही टिका है। कौम मजहब से बनती है, बांग्लादेश बनने के बाद भी इस सिद्धांत को गलत मानने को पाकिस्तान में कोई तैयार नहीं है। भारत से नफरत की भावना उसे भारतीय मुसलमानों को बदनाम करने और उनकी जिंदगियां तबाह करने से भी नहीं रोकती।

भारत में रहने वाले मुसलमान पाकिस्तान की हकीकत को समझतें हैं, उन्हें हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी होने का फर्क भी पता है और ये भी पता है कि वतन के टुकड़े करने वाले केवल सत्ता के भूखे थे जिन्हें इस्लाम से कोई लेना देना था। भारत माँ के करुणामयी आँचल में बैठे मुसलमान और जेहादी साये में पल रहे पाकिस्तान के मुसलमानों के रोजमर्रा की जिंदगी का एक बहुत बड़ा फर्क ये भी है कि भारतीय मुसलमान हर रात कल का सूरज देखने की उम्मीद के साथ सुकून से सोता है वहीं एक पाकिस्तानी की रात किसी अनहोनी की आशंका में सारी रात जगती है।

 

अभिजीत मुज़फ्फरपुर (बिहार) में जन्मे और परवरिश पाये और स्थानीय लंगट सिंह महाविद्यालय से गणित विषय में स्नातक हैं। ज्योतिष-शास्त्र, ग़ज़ल, समाज-सेवा और विभिन्न धर्मों के धर्मग्रंथों का अध्ययन, उनकी तुलना तथा उनके विशलेषण में रूचि रखते हैं! कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में ज्योतिष विषयों पर इनके आलेख प्रकाशित और कई ज्योतिष संस्थाओं के द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकता की कोशिशों के लिए कटिबद्ध हैं तथा ऐसे विषयों पर आलेख 'कांति' आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। इस्लामी समाज के अंदर के तथा भारत में हिन्दू- मुस्लिम रिश्तों के ज्वलंत सवालों का समाधान क़ुरान और हदीस की रौशनी में तलाशने में रूचि रखते हैं।

 URL: 

http://newageislam.com/hindi-section/abhijeet,-new-age-islam/indian-muslims-and-pakistan--भारतीय-मुसलमान-और-पाकिस्तान/d/87290

 

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