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Hindi Section ( 28 May 2017, NewAgeIslam.Com)

Instead of Protecting Our Sect, Let Us Protect Our Religion मसलक जताने या बचाने के बजाय दीन की रक्षा की जाए

 

अब्दुर्रहमान आबिद

17 मई, 2017

आज हम अपने पाठकों के लिए महिलाओं से सहानुभूति के नाम पर इस्लामी शरीअत में हस्तक्षेप के प्रयासों के संबंध में लिखना चाहते थे,क्योंकि शरीअत के खिलाफ एक समय में तीन मोर्चे खुले हुए हैं, एक राजनीतिक मोर्चा है,दूसरा मीडिया मोर्चा तीसरा उन तथाकथित मुस्लिम पुरुषों और महिलाओं का मोर्चा है जो अपनी मूर्खतापूर्ण सोच की वजह से या इस्लाम दुश्मन ताकतों के चाटूकार बन कर उन्हें खुश कर कुछ पाने के लिए इस्लामी शरीअत के नाव में छेद करके बेड़ा ग़र्क़ करने की भरपूर संघर्ष कर रहे हैं।

सत्ताधारी दल उन सभी व्यक्तियों और समूहों को प्रोत्साहित कर रही है जो किसी भी तरह से और किसी भी कारण से इस्लामी शरीअत में हस्तक्षेप करने के लिए सरकार के सहायक की भूमिका निभा रहे हैं। दर्जनों सामजिक संगठन और व्यक्ति जिनके नाम से भी जनता परिचित नहीं थी आज वह मीडिया की कृपा से पूरे देश में पहचाने जाने लगे और सत्ताधारी दल भाजपा और उसके अभिभावक संघ परिवार के भी योग्य बने हुए हैं। माना कि यह प्रतिष्ठा और कुबूलियत सामयिक और अस्थायी है। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि कई पिटे हुए राजनीतिक मोहरे इसी बहाने राजनीति और सरकार में दीन ईमान का सौदा करके कुछ पाने की कोशिशों में किसी हद तक गिरने को तयार हैं बल्कि वह तो गिरावट और ज़लालत के अंतिम सीमा तक जा चुके हैं। बहरहाल हम आज बहुत कुछ लिखना चाहते थे लेकिन शोसल मीडिया पर हमें एक तर्क संगत लेख प्राप्त हुई,इसका अध्ययन करके हमें महसूस हुआ कि आज हम अपने कालम की जगह इसी लेख को पाठकों तक पहुंचाएं, हमें उम्मीद है कि शफीक आज़मी साहब की इस लेख का अध्यन करके कई अपरिपक्व दोस्तों और परिपक्व दुश्मनों की भी आंखें खुलेंगी।

यहाँ हम एक बात और बहुत स्पष्ट रूप से बता देना आवश्यक समझते हैं कि जो सज्जन मसलक की वजह से यह समझ रहे हैं कि इस बहाने चार इमामों के मसलक को या कम से कम हनफ़ी मसलक की उच्च स्थिति को इस बहाने समाप्त करने या दबाने का सुनहरा मौका हाथ आ गया है इसलिए दीन के दुश्मनों के साथ खुलेआम या बैक डोर हां में मिला कर दिल की मुराद पूरी कर लें। तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि शरीअते इस्लाम के एक भाग में अगर खुदा न ख्वास्ता आग लगाने वाले सफल हो गए तो यह धीरे-धीरे पूरे घर में ज़रूर फैलेगी फिर इसे बुझाना आपके बस की बात नहीं होगी। इसलिए समझदारी का तकाजा यह है कि समय पर इस्लामी फिरासत से काम लेते हुए मसलक बचाने और मसलक जताने के बजाय इस्लामी शरीअत की सुरक्षा के लिए गंभीर संघर्ष कीजिये अन्यथा शरीअत पर आंच आई तो कोई मसलक नहीं बचेगा। बहरहाल अब आप शफीक आज़मी साहब की लेखन देखें,और खुद सोचिए कि समय और परिस्थितियों का तकाजा क्या है। (अब्दुर्रहमान आबिद)

कुछ सज्जन कहते हैं कि सहीह हदीसों पर ही पालन करना चाहिए। उनसे सहीह हदीसों की व्याख्या मालूम की जाती है तो कहते हैं:बुखारी और मुस्लिम। यानी बुखारी और मुस्लिम के अलावा जितनी हदीस की अन्य किताबें हैं, अमल से उनका संबंध नहीं, क्योंकि वह सब ज़ईफ़ हदीसों का संग्रह हैं। ज़ईफ़ हदीसों को यह लोग मौजुअ रिवायत समझते हैं। यह बड़ा ही खतरनाक और भयानक दृष्टिकोण है, इसलिए कि ज़ईफ़ रिवायतों को अगर मुनकर और मौजुअ मान लिया जाए, जैसा कि वे कहते हैं, तब तो हमारे सभी मोहद्देसीन सहित इमाम बुखारी और इमाम मुस्लिम,सभी मौजुअ रिवायात को बढ़ावा देने और दुनिया में फैलाने वाले शुमार होंगे और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मौजुअ और झूठी रिवायात को फैलाने वालों को सख्त से सख्त अंजाम की धमकी दी है, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया: अनुवाद: जिसने जानबूझकर हमारी ओर झूठी बात मंसूब की, वह अपना ठिकाना नरक में बनाए। (बुखारी, तिर्मिज़ी)

इमाम बुखारी,इमाम मुस्लिम,इमाम निसाई,इमाम तिर्मिज़ी और इमाम अबु दाउद आदि सभी मोहद्देसीन अपनी किताबों में जईफ हदीसों को जगह देते हैं। इमाम बुखारी '' बुख़ारी शरीफ़ '' में न सही, मगर अन्य पुस्तकों में जईफ हदीसों का उल्लेख करते हैं।

यह बहुत अज्ञानता की बात है, अन्यथा जिन सज्जनों को हदीस के ज्ञान की '' हवा भी लगी है ”, वे जानते हैं कि हदीसों के केवल दो ही प्रकार: सहीह और जईफ नहीं, बल्कि उसकी कई प्रकार, जैसे: सहीह, सहीह लगीरह, हसन, हसन लगीरह आदि हैं। और वे यह भी जानते हैं कि इमाम बुखारी और मुस्लिम नें क्योंकि इल्तेजाम कर रखा है कि वह अपनी पुस्तक में केवल उन्हीं रिवायतों को जगह देंगे,जो इन किस्मों में से उच्च स्तर की होंगीl बाकी किस्में बुखारी और मुस्लिम में जगह नहीं पा सकीं । लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह हदीसें परीक्षण,उनके और पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बीच जितने लोग इस रिवायत की नकल करने में वास्ता बनते, उनके जीवन के अहवाल, के याद रखने की शक्ति,कौशल, बर्दाश्त करनें की क्षमता अदालत आदि को जाँचनें के बाद इस हदीस में सहीह,हसन,सही लगीरह या हसन लगीरह और जईफ आदि का हुक्म लगा दिया। अगर रिवायत सबसे उच्च श्रेणी की होती है,तो उसको सहीह कह देते हैं, अगर कहीं कोई कमी कोताही दिखती तो उसे हसन आदि कह देते, कई बार सभी शर्तें पाई जातीं,लेकिन उसे केवल अपने विशेष जौक (इल्लते ख़ुफ़िया)के कारण छोड़ देते। हाँ!अगर इस रिवायत के बारे में पता हो जाता है कि वह झूठी है तो उसे मुनकर और मौजुअ करार देते और अपनी किताबों में नकल ही नहीं करते। मौजुआत की किताबें अलग से लिखी गई हैं, ताकि किसी मौजूअ रिवायत के बारे में अनुसंधान करना हो तो इस पुस्तक में इसका विवरण मिल जाए। मगर ये सारे निर्णय इज्तेहाद हुआ करते हैं,उनमें गलती भी हो सकती है। यह बात नहीं है कि इमाम बुखारी और इमाम मुस्लिम रहमतुल्लाह अलैहि ने जिन रिवायतों को छोड़ दिया है, वह सही नहीं हो सकती हैं, या जिन्हें अपनाया है वह हर दृष्टि से सहीह ही हैं। क्योंकि इन लोगों की बीसियों रिवायतों पर मोहद्देसीन ने कलाम किया है,बल्कि कुछ को तो शाज़ भी कहा है। जैसे: बुखारी की वह रिवायत जिसमें घटना '' इफक '' के संबंध में हज़रत साद बिन मुआज़ रदिअल्लाहु अन्हु का नाम आया ऐसे ही इमाम मुस्लिम की वह रिवायत जिसमें हज़रत उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहु अन्हा के निकाह को लेकर हज़रत सुफियान का नाम आया है। जिन रिवायतों को इन लोगों ने छोड़ दिया है, उनके लिए भी जरूरी नहीं कि वह सहीह न हों, चूंकि बहुत सारी ऐसी रिवायतें हैं जो उन दोनो इमामों की शर्तों पर पूरी उतरती थीं,लेकिन इन लोगों ने अपने विशेष जौक (इल्लते ख़ुफ़िया) की वजह से उन्हें छोड़ दिया। इसलिए बाद में '' इमाम हाकिम नीसापुरी 'ने उन्हीं रिवायतों को इकट्ठा करके''मुसतदरक हाकिम''लिखी,इसलिए मुस्तदरक हाकिम की रिवायतों को' 'सहीह अला शर्तुस शैखैन' 'के नाम से याद किया जाता है। कई बार ऐसा होता है कि एक मुहद्दिस एक हदीस पर सहीह होने का हुक्म लगाता है तो दूसरा इसी हदीस पर हसन होने का हुक्म लगा देता है,किसी हदीस पर एक मुहद्दिस सेहत का हुक्म लगाता है तो दूसरा उसी पर जईफ का हुक्म लगा देता है। इसलिए इमाम बुखारी और इमाम मुस्लिम ने कभी यह दावा नहीं किया कि सभी सहीह हदीसें उनकी किताब में आ गई हैं, या उनकी किताब के अलावा सहीह रिवायतें कहीं और नहीं हैं। लेकिन शरई अहकाम और हराम और हलाल का फैसला करने के लिए हदीसों का केवल सही होना पर्याप्त नहीं है। बल्कि हदीस का सहीह और हसन होना, शरई अहकाम के रास्ते में प्रारंभिक चरण की चीज़ है। चूंकि रिवायत कितनी भी मजबूत हो, लेकिन इस पर अमल होना आवश्यक नहीं, उदाहरण के लिए, अनुवाद: यानी आग पर पर पकी हुई चीज खाने से वुज़ू टूटने की रिवायत बहुत ही मजबूत है,ऐसे ही बैतूल मुक़द्दस की ओर रुख करके नमाज़ पढ़ने वाली रिवायत बहुत ही उच्च स्तर की है, लेकिन उन पर अमल नहीं किया जा सकता। चूँकि रिवायतों का केवल सहीह और मजबूत होना ही अमल के लिए पर्याप्त नहीं है। अमल के बाब में मूल बात इन रिवायतों की गहराई में जाकर उनकी सही समझ पाना है, और इसी गीराई और गहराई को '' फिकह '' की संज्ञा दी है। इस्लामी शरीअत में यही दरजा आवश्यक है। फिकह कहते हैं दीनी समझ को। यह ऐसा फन है जिसमें सहाबा के बीच भी परस्पर मर्तबे में अंतर था, इसलिए सहाबा में भी मतभेद हुए और कहना चाहिए कि चारों इमामों के अक्सर मतभेद का आधार सहाबा के मतभेद ही हैं, और वह गलत भी नहीं, तो हज़रत औन बिन अब्दुल्लाह ताबई फरमाते हैं मुझे यह बात नापसंद नहीं है कि सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम में मतभेद नहीं होता इसलिए कि अगर वह हज़रात किसी चीज पर एकमत हों और फिर कोई व्यक्ति उनके खिलाफ करे तो वह सुन्नत को छोड़ने वाला है और अगर मतभेद हो, फिर कोई व्यक्ति इनमें से किसी भी कौल के अनुसार कार्य करे तो वह सुन्नत की हद से नहीं निकला। (दारमी)

उमर बिन अब्दुल अजीज रहमतुल्लाह अलैहि ने फरमाया अनुवाद: मुझे यह बात पसंद नहीं कि सहाबा में मतभेद न होगा,क्योंकि अगर सहाबा में मतभेद न होता तो रुखसतें न होतीं। (ज़र्कानी अलल मवाहिब बहवाला एतेदाल फी मिरात बीर रिजाल)।

हज़रत अब्दुल्ला बिन मुबारक कहा करते थे: कुरआन और हदीस की तुलना में, ऐसे ही सहाबा के इज्माई कौल विश्वसनीय है न राय। हाँ जहां सहाबा में मतभेद है,इसमें हम उस चीज को विकल्प करेंगे। जो कुरआन और हदीस के करीब होगी। (एतेदाल फी मिरात बीर रिजाल)

अगर शरई अहकाम के लिए केवल हदीस का सहीह होना ही पर्याप्त होता है। तो सहाबा में मतभेद क्यों होता उनके पक्ष में तो सभी रिवायतें सहीह से भी बढ़कर कतई यानी कुरआन के समकक्ष थी। उन्होंने हदीसों को अपने कानों से पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फ़रमाते हुए सुना था,सहाबा में सबसे अधिक हदीस रिवायत करने वाले हज़रत अबु हुरैरा रदिअल्लाहु अन्हु हैं,लेकिन फतावा हज़रत उमर और हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हुमा आदि के चलते थे। कारण उसकी यही है कि शरई अहकाम के लिए केवल नुसुस पर्याप्त नहीं, बल्कि उस के लिए '' नुफ़्क़ा ''और दीनी समझ का होना भी आवश्यक है। अल्लाह पाक का इरशाद है अनुवाद:क्यों नहीं निकली हर समूह में से एक जमाअत कि वह दीन में समझ पैदा करे और कौम के लोगों को जब लौटकर आएं तो उन्हें बाख़बर करे ताकि वे लोग बचें (कुरआन)।

इसी फिकह के बारे में नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:अनुवाद:जिन लोगों को हदीस पहुंचाई जाती है, उनमें कई ऐसे हैं, जो हदीस सुनने वालों से अधिक रक्षा करने वाले हैं। (मुस्नद अहमद, अबू दाऊद, तिर्मिज़ी, इब्ने माजा) इसी मलका के बारे में हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का इरशाद है, यानी कई लोग जो (हदीस जिसमें) फिकह ( का खजाना है, इसके) हामिल हैं (लेकिन) वे (खुद) गैर फकीह हैं। (तिर्मिज़ी) इसी मलका  की वजह से हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने हज़रत मुआज़ बिन जबल रदिअल्लाहु अन्हु के बारे में फरमाया था: मुआज़ मेरे सहाबा में सबसे अधिक हराम और हलाल को जानने वाले हैं। (तिर्मिज़ी)यदि केवल हदीस मजबूत होना ही काफी होता जैसा कि यह दीन के नादान दोस्त समझ रहे हैं: तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ये कहते: जिसने सबसे अधिक मुझसे हदीसें सुनी हैं, वही सबसे बड़ा शरई अहकाम का जानने वाला है। क्योंकि जिस व्यक्ति ने अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सीधे (प्रत्यक्ष) हदीस सुनी, उसके पक्ष में वह हदीस कुरआन के बराबर है। क्योंकि वह बिल्कुल सटीक और निश्चित है। वहाँ किसी सहीह और जईफ की संभावना ही नहीं।

इल्म वाले जानते हैं कि केवल हदीसों का मज़बुत होना ही अमल के लिये काफी नहीं, उन्हीं कारणों से गैर मुजतहिद मोहद्देसीन शरई अहकाम नहीं निकाला करते थे,बल्कि वह खुद भी फ़ुक़्हा ही का अनुसरण करते थे। प्रसिद्ध मुहद्दिस हज़रत इमाम शाअबी का मकुला प्रसिद्ध है:अनुवाद:हम मोहद्देसीन तो दवाख़ाना रहे हैं,डॉक्टर तो आप (फ़ुक़्हा)हज़रात हैं। इमाम तिर्मिज़ी रहमतुल्लाह अलैह की शैली को देखिए! हज़रत अपनी सुनन 'तिर्मिज़ी' 'में जहां हदीस के सहीह, हसन और ज़इफ आदि होने का हुक्म लगाते हैं, लेकिन जहां शरई अहकाम, हराम और हलाल का वर्णन करते हैं, वहाँ फ़ुक़्हा ही बातें नकल करते हैं। एक जगह '' इमाम तिर्मिज़ी '' फ़ुक़्हा के मसलक नकल करने के बाद कहते हैं: अनुवाद: फ़ुक़्हा ने ऐसा ही कहा है और वही लोग हदीस के मतलब को अधिक बेहतर समझते हैं। (तिर्मिज़ी)

अक्सर मोहद्देसीन खुद भी मुक़ल्लिद थे,इसलिए प्रसिद्ध गैर मुक़ल्लिद आलिम नवाब सिद्दीक हसन भोपाली साहब इमाम बुखारी के बारे में लिखते हैं कि: वह शाफ़ेई मसलक के थे। (अब्जदुल उलूम 810) इसी तरह इमाम मुस्लिम रहमतुल्लाह अलैह के बारे में भी नवाब साहब ने शाफई मसलक का होना उल्लेख किया है। (अलहत 98) कारण बिल्कुल स्पष्ट है कि हदीसों के बीच तत्बीक देना और उनसे शरई अहकाम निकालना, इसके लिए हदीस सहीह और हसन होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि इसके लिए और भी कई अन्य बातें आवश्यक होती हैं।

शरीअत के अहकाम के लिए जो अन्य आवश्यक हैं,उनमें सबसे महत्वपूर्ण चीज सहाबा के आसार हैं। इस्लामी अहकाम और शरीअत मोहम्मदी में सहाबा के आसार निर्णायक बात हुआ करते हैं। इसलिए हज़रत इब्राहीम नखई (96 हिजरी), जो खुद भी सहाबा के शिष्य हैं, कहते हैं अगर सहाबा को देख लेता कि वह कलाई तक वज़ू करते हैं,तो अमल उस पर करता,जिस पर सहाबा रिजवानुल्लाह अलैहिम अजमईन को देखता और कुरआन में जो आया है:यानी वुज़ू में कोहनी तक हाथ धोए (माइदा) तो उसे ऐसे ही पढ़ता,जैसा कि कुरआन में है। कारण यह है कि सहाबा पर सुन्नत छोड़ने की तोहमत लगाई जा सकती, वह इल्म वाले थे और सभी प्राणियों में सबसे पवित्र पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इत्तेबा के इच्छुक और उत्सुक थे। इन प्रक्रियाओं के बारे में किसी प्रकार का संदेह वही कर सकता है, जिसको अपने दीन में शक हो। (अल्हुज्जा फी ब्यानुल मुहज्जा 401/2)

हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रहमतुल्लाह अलैह (जिन्हें  हदीसों को जमा करने वाला कहा जा सकता है, यानी हदीसों नबविया अला साहिबुह्स्स्लातु वस्सलाम को किताब की शक्ल में जमा कराने और इसके लिए आधिकारिक तौर पर काम शुरू करने का श्रेय आप ही के सिर जाता है।)सहाबा के अनुसरण के बाबत अपने एक पत्र (जिसे इमाम अबु दाउद ने भी नकल किया है, इस) में कहते हैं, अनुवाद: सहाबा का अनुसरण न करना (दीन में) कमी है। और उनसे आगे बढ़ना (दीन में) ज़्यादती और तकान है। एक जमाअत ने (उनकी इत्तेबा नहीं की, बल्कि) उनसे कोताही की, तो उसने गलत किया और दूसरी उनसे आगे बढ़ गई तो उन्होंने गुलू किया,सहाबा इसी इफरात और तफरीत के बीच सीधी राह पर थे। (अल एतेदालू फी मिरात बीर रिजाल)।

हज़रत अबू ज़ैद कैर्वानी मालकी (मृतक 386 हिजरी) ने अपनी पुस्तक ''अल जामेअ़ '' में '' अहले सुन्नत वल जमाअत" के अकाइद और उनकी प्रक्रियाओं को इस तरह वर्णित किया है:

पवित्र पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नतों के बारे में यह बात मुसल्लम है कि न उसका मुकाबला राय से होगा और न क़यास से। और सलफ सालेहीन (सहाबा) ने जहां तावील की है, हम भी तावील करेंगे और जिस पर अमल किया, उस पर हम भी अमल करेंगे और जहां उन्होंने ठहराव किया, हमारे लिए भी ठहराव की गुंजाइश है और जहाँ उन्होंने कुछ कुछ बयान किया है,हम उसकी इत्तेबाअ करेंगे, और जो इतम्बात किया है, उसकी इक्तेदार करेंगे और जहाँ उन्होंने तावील में मतभेद किया है, तो हम उनकी जमाअत से न निकलेंगे। (अल जामेअ)

इमाम अहमद इब्ने हंबल कहते हैं:हमारे नज़दीक सुन्नत के उसूल वे हैं,जिन पर हज़रात सहाबा थे। (फतावा इब्ने तैमिया 155/4)

कहने का अर्थ यह है कि हदीसों का केवल सहीह और मजबूत होना ही अमल के लिए पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस के लिए और भी कई चीजों की जरूरत होती है। और अगर स्वीकार कर लिया जाए कि जो रिवायत अधिक मजबूत हो, उस पर अमल किया जाए और इस के मुकाबले जो कमजोर हो, उसे छोड़ दिया जाए,तब तो दीन का जनाज़ा निकल जाएगा। चूंकि प्रमाणपत्र के आधार पर सबसे मजबूत रिवायत '' कुरआन शरीफ '' की है, जो अर्थ और शब्द दोनों आधार पर मुतवातिर है, हदीसों के संग्रह की कोई भी रिवायत सनद की मजबूती और ताकत में उसका मुकाबला नहीं कर सकती। कुरआन फिर भी '' हदीस ''की तुलना में मजबूत है। अब अगर किसी जगह कुरआन और हदीस में जाहिर तौर पर टकराव दिखे,यानी कुरआन से एक हुक्म निकल रहा हो,जबकि हदीस से इस हुक्म के बिल्कुल खिलाफ दूसरा हुक्म निकल रहा हो, तो क्या केवल इसलिए छोड़ दिया जाएगा कि वे अपने प्रतिद्वंद्वी के सामने कमजोर है? अगर यही नियम स्वीकार कर लिया जाए, तो इन हदीसों के मुकाबले मजबूत है, उसे तो आदेश यह है: यानी एक साथ केवल चार महिलाओं से ही शादी कर सकते हो (अधिक नहीं) (सूरह निसा आयत नंबर 3)। क्या पवित्र पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को आप भी यहूदी व ईसाई की तरह अपने तान व तशनीअ का निशाना बनाओ गे? । नऊज़ोबिल्लाह मिन जालिक!

इसी तरह हदीसों से साबित होता है कि कयामत के दिन शफाअत होगी, जबकि कुरआन कहता है: (सूरह बक़रा आयत नंबर 254) यानी क़यामत के दिन शफाअत नहीं होगी, तो क्या केवल इसलिए शफाअत की हदीसों का इनकार कर दिया जाएगा कि वे कुरआन की तुलना में सनद से कमजोर हैं। ऐसे ही हदीस में आता है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया (हम अम्बिया वारिस नहीं बनाते,हमारा जो कुछ तुर्कह होता है, वह सदका होता है।) जबकि कुरआन कहता है, अनुवाद: अल्लाह तुम्हें आदेश देता है तुम्हारी औलाद (की मीरास) के बाब में। (निसा) यानी हर बच्चे का हिस्सा अल्लाह की तरफ से निर्धारित है,माता-पिता इसके हिस्से समाप्त नहीं कर सकते। तो क्या इस हदीस को महज इसलिए छोड़ दिया जाएगा की वह अपने मुकाबले वाली आयत की तुलना में सैंड से कमजोर है। ऐसे ही हदीसों में आता है कि एक वुज़ू से कई नमाज़ें अदा की जाती हैं, जबकि कुरआन कहता है: यानी नमाज़ के लिए खड़े हो, तो वुजू करो! इस आयत से मालूम होता है कि जब भी नमाज़ के लिए खड़े हो, तो वूज़ू करो। तो क्या इन हदीसों, जिनसे एक वुज़ू से कई नमाज़ें पढ़ने का सबूत मिलता है,उनका इनकार क्या केवल इसलिए कर दिया जाएगा कि वे सनद के आधार पर कुरआन के मुकाबले कमजोर हैं?हरगिज नहीं किया जा सकता है। चूंकि यह सिद्धांत ही गलत है। अगर इस नियम को स्वीकार कर लिया जाए तो कुरआन और हदीस का एक टुकड़ा अपने ही दूसरे हिस्से की तक़ज़ीब करता हुआ दिखेगा। कुरआन '' हदीस '' की तक़ज़ीब करेगा और हदीस '' कुरआन''की तक़ज़ीब करेगी। और यह ऐसी भयानक मुसीबत होगी, जिसकी वजह से पूरी उम्मत हलाक हो जाएगी। पिछली उम्मतें इसी लिये हलाक़ हुईं। हदीस में आता है,अनुवाद:उमर बिन शोएब अपने पिता और वे अपने दादा से नकल करके बताते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कुछ लोगों के बारे में सुना कि वह कुरआन में आपसी मतभेद कर रहे हैं और आपस में एक दुसरे से झगड़ रहे हैं (सख्त नाराज़ हुए और) कहा: तुमसे पहले जो लोग थे, उनकी मौत और बर्बादी का कारण यही बात बनी थी कि उन्होंने अल्लाह की किताब के एक हिस्से से दूसरे हिस्से की (तक़ज़ीब) की। सुन लो! अल्लाह की किताब इस शान से नाज़िल हुई है कि इसका एक हिस्सा दूसरे हिस्से को सच्चा साबित करता है। इसलिए किसी एक हिस्से को किसी दुसरे हिस्से से मत झुठलाओ। और इस (तरह की किसी आयत के अर्थ और मतलब के बारे में) तुम वही बात कहो जो ( अल्लाह की किताब के सही अर्थ और मतलब जानने और बताने वालों के द्वारा) तुम्हारे ज्ञान में (आई) है और जो चीज़ तुम्हारे ज्ञान में नहीं है, उसे ज्ञान रखने वालों के हवाले कर दो। ( मुस्नद अहमद, बुखारी फी खल्के अफआलुल आबिद 30)

(नोट: लंबाई की वजह से कुरान की आयतों व हदीसों की अरबी इबारत को हटा दिया गया है और अनुवाद बाकी रखा गया)

(शफीक आजमी अज़ अइम्मतुल मसाजिद, गैरुल अरब)

17 मई, 2017 स्रोत: रोज़नामा हमारा समाज, नई दिल्ली

URL for Urdu article: http://www.newageislam.com/urdu-section/abdul-rahman-abid/instead-of-protecting-our-sect,-let-us-protect-our-religion--مسلک-جتانے-یا-بچانے-کے-بجائے-دین-کی-حفاظت-کی-جائے/d/111198

URL: http://www.newageislam.com/hindi-section/abdul-rahman-abid,-tr-new-age-islam/instead-of-protecting-our-sect,-let-us-protect-our-religion--मसलक-जताने-या-बचाने-के-बजाय-दीन-की-रक्षा-की-जाए/d/111316

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